Monday, February 23, 2026

14>মহা শক্তিশালী শিব স্তুতি::----

 মহা শক্তিশালী শিব স্তুতি::-----

মহা ভয়,কঠিন বিপদ থেকে রক্ষা পেতে 

প্রতি সোমবার জপ করতে হবে।

★★মন্ত্র::--

আশুতোষ শশাঙ্কশেখর,

চন্দ্রমৌলী চিদম্বরা,

কোটি কোটি প্রণাম শম্ভু

কোটি নমণ দিগম্বরা।

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আশুতোষ শশাঙ্ক শেখর (শিব স্তোত্র)
আশুতোষ শশাঙ্ক শেখর চন্দ্র মৌলি চিদম্বরা,
কোটি কোটি প্রণাম শম্ভু কোটি নমন দিগম্বর।
নির্বিকার ওংকার অবিনাশী তুমি দেবাদিদেব,

জগত স্রষ্টা প্রলয় কর্তা শিবম সত্যম সুন্দরা।

দয়ানিধি দানিশ্বর জয় জটাধর অভয়ংকরা,

আশুতোষ শশাঙ্ক শেখর...
শূলপাণি ত্রিশূলধারী অউগড় বাঘম্বরী,
নাথ নাগেশ্বর হরো হর পাপ তাপ অভিশাপ তম।
জগতপতি অনুরাগী ভক্তি সদাই তব চরণ হো,
জনম জীবন জগত কা সংতাপ তাপ মিটে সভি।
আশুতোষ শশাঙ্ক শেখর...



Monday, February 16, 2026

13>|| মহাশিবরাত্রি 2026 ||

   13>|| মহাশিবরাত্রি 2026 ||

          <----আদ্যনাথ---->


২০২৬ সালের মহা শিবরাত্রি ১৫ ফেব্রুয়ারি, রবিবার (২রা ফাল্গুন, ১৪৩২ বঙ্গাব্দ) পালিত হবে। চতুর্দশী তিথি শুরু হবে ১৫ ফেব্রুয়ারি বিকেল ৫:০৪ মিনিটে এবং শেষ হবে ১৬ ফেব্রুয়ারি বিকেল ৫:৩৪ মিনিটে । 


নিশিতা কাল (নিশিতা পূজার সময়) ১৫ ফেব্রুয়ারি রাত ১২:০৯ থেকে ১:০১ পর্যন্ত । চার প্রহর পূজার সময় সন্ধ্যা ০৬:১১ থেকে ভোর ০৬:৫৯ পর্যন্ত ।



শিব অর্থ জ্ঞান। তিনি আশুতোষ।

শিব শান্ত,সৌম্য,ধীর,স্থির, আবার প্রলয়,

ধংস, তান্ডব।


তন্ত্রের দেবতা, রুদ্র,প্রলয়,

"সত্যম শিবম সুন্দরম"।


সুন্দরম অর্থ অদ্বৈতম। শিব হচ্ছে অদ্বৈত অর্থাৎ পবিত্র,এই পবিত্রবোধই হলো সৌন্দর্য এবং সেই সৌন্দর্যই হল সত্য ও শিবময়। 'সত্যম-শিবম-সুন্দরম ' ।


শিবপূজায় শিবলিঙ্গ স্নানার্থে প্রধাণত গঙ্গাজল বা গঙ্গাজল মিশ্রিত জল ব্যবহার করা হয় । আর বেলপাতা দেওয়া হয় তিনটি পাতাযুক্ত একটি যৌগিক পত্রকে । তবে বিশেষ লক্ষ্যণীয়, শিবের পূজার বেলপাতার প্রতিটি যৌগিক পত্রের নিচে বৃন্ত বা বোঁটার কাছের একটু মোটা অংশ অবশ্যই ভেঙ্গে বাদ দিয়ে তবে সেই বেলপাতা অর্পণ করা উচিত। 


সব ব্রতের মধ্যে সর্বশ্রেষ্ঠ হল এই মহাশিবরাত্রি। 


ব্রতের আগের দিন নিরামিষ আহার করা উচিত।  ব্রতের দিন উপবাসী থাকাই বাঞ্ছনীয়। তারপর রাত্রিবেলা চার প্রহরে শিবলিঙ্গকে দুধ, দই, ঘৃত, মধু ও গঙ্গাজল দিয়ে স্নান করানো উচিত। 

তারপর বেলপাতা, নীলকন্ঠ ফুল, ধুতুরা, আকন্দ, অপরাজিতা প্রভৃতি ফুল দিয়ে পূজা করা হয়।

  ‘ওঁ নমঃ শিবায়’ এই মহামন্ত্রেই জপ করা উচিত । 

 রাত্রি জাগরণ  ও শিবের ব্রতকথা, মন্ত্র আরাধণা করাই শিব পূজার বিধি। 


ভারতবর্ষের বারোটি জ্যোতির্লিঙ্গ তথা সমস্ত শিবমন্দিরে এই পূজা চলে, তান্ত্রিকেরাও এইদিন সিদ্ধিলাভের জন্য বিশেষ সাধনা করে। 


শিবরাত্রি' কথাটা দুটি শব্দ থেকে এসেছে। 'শিব' ও 'রাত্রি', যার অর্থ শিবের জন্য রাত্রী। শিবরাত্রির সঙ্গে প্রচলিত আছে নানা কথা। পুরাণ মতে দেবী পার্বতীর সঙ্গে এদিন দেবাদিদেব মহাদেবের মিলন হয়।  আবার শোনা যায় এদিন থেকেই বিশ্ব ব্রহ্মাণ্ড সৃষ্টি করেছিলেন। 


যজ্ঞের মধ্যে যেমন অশ্বমেধ যজ্ঞ, তীর্থের মধ্যে যেমন গঙ্গা তেমনই পুরাণ অনুযায়ী ব্রতের মধ্যে শ্রেষ্ঠ হল শিব চতুর্দশীর ব্রত। তাই শিবরাত্রির ব্রত পালন করলে ধর্ম, অর্থ, কাম, মোক্ষ- এই চতুর্বিধ ফল লাভ হয়। 


হিন্দু মহাপুরাণ তথা শিবমহাপুরাণ অনুসারে এইরাত্রেই শিব সৃষ্টি, স্থিতি ও প্রলয়ের মহা তান্ডব নৃত্য করেছিলেন । আবার এইরাত্রেই শিব ও পার্বতীর বিবাহ হয়েছিল । এর নিগুঢ় অর্থ হল শিব ও শক্তি তথা পুরুষ ও আদিশক্তি বা পরাপ্রকৃতির মিলন। এই মহাশিবরাত্রিতে শিব তার প্রতীক লিঙ্গ তথা শিবলিঙ্গ রূপে প্রকাশিত হয়ে জীবের পাপনাশ ও মুক্তির পথ দিয়েছিলেন।


মহাশিবরাত্রি ব্রতকথা::----


শিবমহাপুরাণ অনুসারে, অতি প্রাচীনকালে বারাণসী তথা কাশীধামে এক নিষ্ঠুর ব্যাধ বাস করত। সে প্রচুর জীবহত্যা করত। একদিন শিকারে বেরিয়ে তার খুব দেরি হওয়ার ফলে সে জঙ্গলে পথ হারিয়ে রাতে হিংস্র জন্তুর ভয়ে এক গাছের উপর আশ্রয় নেয় । কোনো শিকার না পেয়ে সে হতাশ হয়ে গাছ থেকে একটা করে পাতা ছিঁড়ে নিচে ফেলতে থাকে । সেই গাছটি ছিল বেলগাছ । আর সেই বেলগাছের নিচে একটি শিবলিঙ্গ ছিল। সেদিন ছিল শিবচতুর্দশী অর্থাৎ মহাশিবরাত্রি। আর ব্যাধও ছিল উপবাসী। তার ফেলা বেলপাতাগুলো শিবলিঙ্গের মাথায় পড়ে এর ফলে তার শিবচতুর্দশী ব্রতের ফল লাভ হয় তার অজান্তেই। পরদিন ব্যাধ বাড়ী ফিরে এলে তার খাবার সে এক অতিথিকে দিয়ে দেয়। এতে তার ব্রতের পারণ ফল লাভ হয়।


এর কিছুদিন পরে সেই ব্যাধ মারা গেলে যমদূতরা তাকে নিতে আসে। কিন্তু শিবচতুর্দশী ব্রতের ফল লাভ হেতু শিবদূতরা এসে যুদ্ধ করে যমদূতদের হারিয়ে ব্যাধকে নিয়ে যায়। যমরাজ তখন শিকার করেন যে শিবচতুর্দশী ব্রত পালন করে এবং শিব ভক্ত যেই জন, তার উপর যমের কোনো অধিকার থাকেনা। সে মুক্তিলাভ করে। এইভাবে মর্ত্যলোকে শিবচতুর্দশী ব্রতের প্রচার ঘটে।


জ্যোতির্লিঙ্গ পূজা::--


মহাশিবরাত্রি অনুষ্ঠানে ভারতবর্ষের বারোটি জ্যোতির্লিঙ্গ তথা সোমনাথ, মল্লিকার্জুন, মহাকালেশ্বর, ওঁকারেশ্বর, কেদারনাথ, ভীমশঙ্কর, বিশ্বেশ্বর, ত্র্যয়ম্বকেশ্বর, বৈদ্যনাথ, নাগেশ্বর, রামেশ্বর ও ঘুশ্মেশ্বর এ বহু মানুষের সমাগম হয় ও সবার হাতে এই জ্যোতির্লিঙ্গের পূজা ও পবিত্র স্পর্শলাভ ঘটে।


সকাল সকাল স্নন করে পরিষ্কার পরিচ্ছন্ন বস্ত্র ধারণ করে ৷ শিবমন্দিরে কালো তিল দিয়ে  মন প্রাণ দিয়ে একাগ্র চিত্তে  ভোলেবাবার অভিষেক করালে জীবনে কালসর্প দোষ থেকে মুক্তি পাওয়া সম্ভব।


আবার মধু দিয়ে স্নান বা অভিষেক করালে ধনপ্রাপ্তি হবে ফলে পাওয়া সম্ভব 

 অপার ঐশ্বর্য ৷ 


এইদিনে ভোলানাথের প্রিয় ভাং, বেলপাতা ও ধুতরা ফুল দিয়ে পুজো করলে কেটেযায় জীবনের সমস্ত বাধা বিপত্তি ৷

   <----আদ্যনাথ রায় চৌধুরী---->

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Tuesday, May 6, 2025

12>शिवलिङ्ग (शिवलिंग),का अर्थ

 12>शिवलिङ्ग (शिवलिंग),का अर्थ


शिवलिङ्ग (शिवलिंग), का अर्थ है भगवान शिव का आदि-अनादी स्वरुप। शून्य, आकाश, अनन्त, ब्रह्माण्ड और निराकार परमपुरुष का प्रतीक होने से इसे लिंग कहा गया है।स्कन्द पुराण में कहा है कि आकाश स्वयं लिंग है। धरती उसका पीठ या आधार है और सब अनन्त शून्य से पैदा हो उसी में लय होने के कारण इसे लिंग कहा है | वातावरण सहित घूमती धरती या सारे अनन्त ब्रह्माण्ड (ब्रह्माण्ड गतिमान है) का अक्ष/धुरी (axis) ही लिंग है।


पुराणो में शिवलिंग को कई अन्य नामो से भी संबोधित किया गया है जैसे : प्रकाश स्तंभ/लिंग, अग्नि स्तंभ/लिंग, उर्जा स्तंभ/लिंग, ब्रह्माण्डीय स्तंभ/लिंग |

उत्पत्ति

शिवलिंग भगवान शिव और देवी शक्ति (पार्वती) का आदि-आनादी एकल रूप है तथा पुरुष और प्रकृति की समानता का प्रतिक भी अर्थात इस संसार में न केवल पुरुष का और न केवल प्रकृति (स्त्री) का वर्चस्व है अर्थात दोनों सामान है | हम जानते है की सभी भाषाओँ में एक ही शब्द के कई अर्थ निकलते है जैसे: सूत्र के - डोरी/धागा, गणितीय सूत्र, कोई भाष्य, लेखन को भी सूत्र कहा जाता है जैसे नासदीय सूत्र, ब्रह्म सूत्र आदि | अर्थ :- सम्पति, मतलब (मीनिंग), उसी प्रकार यहाँ लिंग शब्द से अभिप्राय चिह्न, निशानी या प्रतीक है, लिङ्ग का यही अर्थ वैशेषिकशास्त्र में कणाद मुनि ने भी प्रयोग किया। ब्रह्माण्ड में दो ही चीजे है : ऊर्जा और पदार्थ । हमारा शरीर प्रदार्थ से निर्मित है और आत्मा ऊर्जा है । इसी प्रकार शिव पदार्थ और शक्ति ऊर्जा का प्रतीक बन कर शिवलिंग कहलाते है | ब्रह्मांड में उपस्थित समस्त ठोस तथा उर्जा शिवलिंग में निहित है। वास्तव में शिवलिंग हमारे ब्रह्मांड की आकृति है | अब जरा आईंसटीन का सूत्र देखिये जिस के आधार पर परमाणु बम बनाया गया, परमाणु के अन्दर छिपी अनंत ऊर्जा की एक झलक दिखाई जो कितनी विध्वंसक थी सब जानते है | e / c = m c {e=mc^2}

इसके अनुसार पदार्थ को पूर्णतयः ऊर्जा में बदला जा सकता है अर्थात दो नही एक ही है पर वो दो हो कर स्रष्टि का निर्माण करता है। हमारे ऋषियो ने ये रहस्य हजारो साल पहले ही ख़ोज लिया था | हम अपने देनिक जीवन में भी देख सकते है कि जब भी किसी स्थान पर अकस्मात् उर्जा का उत्सर्जन होता है तो उर्जा का फैलाव अपने मूल स्थान के चारों ओर एक वृताकार पथ में तथा उपर व निचे की ओर अग्रसर होता है अर्थात दशोदिशाओं (आठों दिशों की प्रत्येक डिग्री (360 डिग्री)+ऊपर व निचे) होता है, फलस्वरूप एक क्षणिक शिवलिंग आकृति की प्राप्ति होती है जैसे बम विस्फोट से प्राप्त उर्जा का प्रतिरूप, शांत जल में कंकर फेंकने पर प्राप्त तरंग (उर्जा) का प्रतिरूप आदि।

स्रष्टि के आरम्भ में महाविस्फोट (bigbang) के पश्चात् उर्जा का प्रवाह वृत्ताकार पथ में तथा ऊपर व नीचे की ओर हुआ फलस्वरूप एक महाशिवलिंग का प्राकट्य हुआ जैसा की आप उपरोक्त चित्र में देख सकते है | जिसका वर्णन हमें लिंगपुराण, शिवमहापुराण, स्कन्द पुराण आदि में मिलता है की आरम्भ में निर्मित शिवलिंग इतना विशाल (अनंत) तथा की देवता आदि मिल कर भी उस लिंग के आदि और अंत का छोर या शास्वत अंत न पा सके। पुराणो में कहा गया है की प्रत्येक महायुग के पश्चात समस्त संसार इसी शिवलिंग में समाहित (लय) होता है तथा इसी से पुनः सृजन होता है ।

शास्त्रों में महात्म्य

शिवलिंग के महात्म्यका वर्णन करते हुए शास्त्रों ने कहा है कि जो मनुष्य किसी तीर्थ की मृत्तिका से शिवलिंग बना कर उनका विधि-विधान के साथ पूजा करता है, वह शिवस्वरूप हो जाता है। शिवलिंग का सविधि पूजन करने से मनुष्य सन्तान, धन, धन्य, विद्या, ज्ञान, सद्बुद्धि, दीर्घायु और मोक्ष की प्राप्ति करता है। जिस स्थान पर शिवलिंग की पूजा होती है, वह तीर्थ न होने पर भी तीर्थ बन जाता है। जिस स्थान पर सर्वदा शिवलिंग का पूजन होता है, उस स्थान पर मृत्यु होने पर मनुष्य शिवलोक जाता है। शिव शब्द के उच्चारण मात्र से मनुष्य समस्त पापों से मुक्त हो जाता है और उसका बाह्य और अंतकरण शुद्ध हो जाता है। दो अक्षरों का मंत्र शिव परब्रह्मस्वरूप एवं तारक है। इससे अलग दूसरा कोई तारक ब्रह्म नहीं है।

हिमानी शिवलिंग

हिमानी शिवलिंग अमरनाथ की गुफा में हिम से अपने आप बनने वाले शिवलिंग को कहले हैं जिसका भारतीय जीवन में धार्मिक महत्व है और जिसे देखने दूर-दूर से लोग आते हैं। यह शिवलिंग मौसम में बदलाव के अनुसार चंद्रमा की कलाओं के रूप में घटता बढ़ता रहता है और पूर्णिमा के दिन लगभग 10 या 12 फीट की ऊंचाई तक बनता है। हर साल श्रावण पूर्णिमा के दिन जुलाई-अगस्त माह में शिवलिंग अपनी अधिकतम ऊँचाई पाता है और इस दिन संसार भर के श्रद्धालु गुफा में स्थित मंदिर में इकट्ठा होते हैं।


अमरनाथ श्रीनगर के पूर्व में १४५ किमी. दूर स्थित है। अमरनाथ गुफा जहां स्थित है वह जगह बर्फ से ढकी घाटी है और समुद्र तल से १३७०० फीट ऊँचाई पर स्थित है। सितंबर से जून तक यह पूरी घाटी बर्फ से ढकी होती है और यहां पहुँचना दुष्कर ही नहीं नामुमकिन होता है। अमरनाथ गुफा लगभग १५० फीट ऊंची और ९० फीट लंबी है।
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11>আরব সাগরের মাঝে ভগবান শিবের আশ্চর্য মন্দির...

 11>আরব সাগরের মাঝে ভগবান শিবের আশ্চর্য মন্দির...


গুজরাত থেকে মাত্র ১ কিলোমিটার দূরে আরব সাগরের মধ্যেই রয়েছে ভগবান শিবের মন্দির। নাম নিশকলঙ্গেশ্বর মন্দির। মন্দিরটি দেখতে ভিড় জমান বহু ভক্ত। মাঝ সমুদ্রে দাঁড়িয়ে থাকা এই মন্দিরটি, তা আজও বহু মানুষকে অবাক করে। যার কারণে এটি হয়ে উঠেছে উল্লেখযোগ্য পর্যটন কেন্দ্র।


চারিদিকে শুধু জল আর জল। তার মধ্যে এক টুকরো জমির উপর নির্মিত এই মন্দিরটি। তবে কিছুক্ষণের জন্যই এই মন্দিরে পা রাখার সুযোগ মেলে। এখানে ভগবান শিবের দর্শন করতে হলে দুপুর ১টা থেকে রাত ১০টার মধ্যে আসতে হয়। কারণ, অন্য সময় জলের তলায় থাকে এই মন্দিরের প্রবেশ পথ। কোনও এক আশ্চর্য কারণে বেলা ১টা থেকে রাত ১০টা পর্যন্ত প্রবেশ পথে সমুদ্রের জল আসে না। তখনই দর্শনার্থীরা সেই মন্দিরে পায়ে হেঁটে প্রবেশ করতে পারেন। ভগবান শিবের পুজো দিতে পারেন।

জোয়ারের সময় মন্দিরটি জলের তলায় চলে যায়। শুধুমাত্র মন্দিরের ২০ ফুট লম্বা পাথরের তৈরি থামটির উপরের অংশ ও মন্দিরের ধ্বজাটি দেখা যায়। আবার দুপুর ১টার পর মন্দিরের উপর থেকে জল নামতে শুরু করে। দর্শনার্থীরা একে একে আসতে শুরু করেন।

বর্ষার সময় অবশ্য অন্য রূপ ফুটে ওঠে মন্দিরটির। চারিদিকের জল ফুলে ফেঁপে ওঠে। মন্দিরের থামটি ছাড়া মন্দিরের কোনও চিহ্নই চোখে পড়ে না। তবুও বছরের প্রায় প্রত্যেকদিনই ভগবান শিবের দর্শন করতে বহু মানুষ এখানে ভিড় করেন।

ইতিহাসের বহু কাহিনিও জুড়ে রয়েছে এই মন্দিরের সঙ্গে। এই মন্দিরের ভিতরে ৫টি শিবলিঙ্গ রয়েছে। পাণ্ডবরা নাকি সেই শিব লিঙ্গের আরাধনা করতেন। এমন অনেক ইতিহাসের কাহিনি আজও শোনা যায়।
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10>|| Shiv Temple of India (शिव मंदिर) & Mata

 



10>Shiv Temple of India (शिव मंदिर) & Mata Temple (माता के मंदिर)

भीमशंकर ज्योतिर्लिंग- कुंभकर्ण के पुत्र को मार कर यहां स्थापित हुए थे भगवान शिव

यह हैं किन्नर कैलाश, कहते है महादेव के इस धाम में जाने की इंसान एक बार ही कर पाता है हिम्मत

बाबा तामेश्वरनाथ धाम- इस शिवलिंग की कुंती ने की थी सबसे पहले पूजा

शलमाला नदी में एक साथ बने है हज़ारों शिवलिंग, नदी की धारा स्वयं करती है अभिषेक

सलेमाबाद शिव मंदिर में पिछले 15 सालों से रोज़ नाग आ कर करता है शिव जी की पूजा

अदभुत- सूर्य की किरणें पड़ते ही सुनहरा हो जाता है कैलाश, बनती है ॐ की आकृति

श्रीखंड महादेव यात्रा- अमरनाथ से भी कठिन है महादेव की यह यात्रा

मंढीप बाबा- इस स्वयंभू शिवलिंग दर्शन के लिए पार करनी पड़ती है एक ही नदी 16 बार, साल में एक बार होते है दर्शन

असीरगढ़ का किला – श्रीकृष्ण के श्राप के कारण यहां आज भी भटकते हैं अश्वत्थामा, किले के शिवमंदिर में प्रतिदिन करते है पूजा

काठगढ़ महादेव – यहां है आधा शिव आधा पार्वती रूप शिवलिंग (अर्धनारीश्वर शिवलिंग)

स्तंभेश्वर महादेव – शिव पुत्र कार्तिकेय ने करी थी स्थापना, दिन में दो बार नज़रों से ओझल होता है यह मंदिर

टूटी झरना मंदिर- रामगढ़(झारखंड) – यहाँ स्वयं माँ गंगा करती है शिवजी का जलाभिषेक

बिजली महादेव- कुल्लू -हर बारह साल में शिवलिंग पर गिरती है बिजली

लिंगाई माता मंदिर – स्त्री रूप में होती है शिवलिंग की पूजा

अचलेश्वर महादेव – अचलगढ़ – एक मात्र मंदिर जहां होती है शिव के अंगूठे की पूजा

ममलेश्वर महादेव मंदिर – यहां है 200 ग्राम वजनी गेहूं का दाना – पांडवों से है संबंध

नागचंद्रेश्वर मंदिर – साल में मात्र एक दिन खुलता है मंदिर

चमत्कारिक भूतेश्वर नाथ शिवलिंग – हर साल बढ़ती है इसकी लम्बाई

अनोखा शिवलिंग – महमूद गजनवी ने इस पर खुदवाया था कलमा

महादेवशाल धाम – जहाँ होती है खंडित शिवलिंग की पूजा – गई थी एक ब्रिटिश इंजीनियर की जान

निष्कलंक महादेव – गुजरात – अरब सागर में स्तिथ शिव मंदिर – यहां मिली थी पांडवों को पाप से मुक्ती

परशुराम महादेव गुफा मंदिर – मेवाड़ का अमरनाथ – स्वंय परशुराम ने फरसे से चट्टान को काटकर किया था निर्माण

कमलनाथ महादेव मंदिर – झाडौल – यहां भगवान शिव से पहले की जाती है रावण की पूजा

कामेश्वर धाम कारो – बलिया – यहाँ भगवान शिव ने कामदेव को किया था भस्म

अचलेश्वर महादेव – धौलपुर(राजस्थान) – यहाँ पर है दिन मे तीन बार रंग बदलने वाला शिवलिंग

लक्ष्मणेश्वर महादेव – खरौद – यहाँ पर है लाख छिद्रों वाला शिवलिंग (लक्षलिंग)

भोजेश्वर मंदिर (Bhojeshwar Temple) – भोपाल – यहाँ है एक ही पत्थर से निर्मित विशव का सबसे बड़ा शिवलिंग (World’s tallest shivlinga made by one rock)


जंगमवाड़ी मठ – वाराणसी : जहा अपनों की मृत्यु पर शिवलिंग किये जाते हे दानएक हथिया देवाल- मात्र एक हाथ से और एक रात में बने इस प्राचीन शिव मंदिर के शिवलिंग की नहीं होती है पूजा, आखिर क्यों? Mata Temple (माता के मंदिर)


कामाख्या शक्तिपीठ से जुड़े कुछ रोचक तथ्य, जो कम लोगों को है पता

मैहर देवी का मंदिर: ये है माँ शारदा का इकलौता मंदिर, यहाँ आज भी आते हैं आल्हा और उदल

चूड़ामणि देवी मंदिर- मान्यता है की इस मदिर में चोरी करने पर ही पूरी होती है मनोकामना

श्राई कोटि माता मंदिर- यहां पति-पत्नी एक साथ नहीं कर सकते मां दुर्गा के दर्शन, शिव पुत्रों से जुडी है कहानी

ज्वालामुखी देवी – यहाँ अकबर ने भी मानी थी हार – होती है नौ चमत्कारिक ज्वाला की पूजा

दंतेश्वरी मंदिर – दन्तेवाड़ा – एक शक्ति पीठ – यहाँ गिरा था सती का दांत

51 Shakti Peeth (51 शक्ति पीठ)

करणी माता मंदिर, देशनोक (Karni Mata Temple , Deshnok) – इस मंदिर में रहते है 20,000 चूहे, चूहों का झूठा प्रसाद मिलता है भक्तों को


कामाख्या मंदिर – सबसे पुराना शक्तिपीठ – यहाँ होती हैं योनि कि पूजा, लगता है तांत्रिकों व अघोरियों का मेला

तरकुलहा देवी (Tarkulha Devi) – गोरखपुर – जहाँ चढ़ाई गयी थी कई अंग्रेज सैनिकों कि बलि

तनोट माता मंदिर (जैसलमेर) – जहा पाकिस्तान के गिराए 3000 बम हुए थे बेअसर

दैवीय चमत्कार- 50 लाख लीटर पानी से भी नहीं भरा शीतला माता के मंदिर में स्तिथ ये छोटा सा घडा़

जीजी बाई का मंदिर- एक अनोखा मंदिर जहाँ मन्नत पूरी होने पर मां दुर्गा को चढ़ती है चप्पल और सैंडिल

जीण माता मंदिर- औरंगजेब भी नहीं कर पाया था इस मंदिर को खंडित, मधुमक्खियों ने की थी रक्षा

सिमसा माता मंदिर- जहां फर्श पर सोने से होती है नि:संतान महिलाओं को संतान की प्राप्ति

मां बम्लेश्वरी मंदिर- ऊंचे पहाड़ पर स्थित माता के इस मंदिर से जुड़ी है एक प्रसिद्ध प्रेम कहानी

चौसठ योगिनी मंदिर, मुरैना- यह मंदिर कहलाता था तांत्रिक विश्वविद्यालय, होते थे तांत्रिक अनुष्ठान

कैला देवी मंदिर, करौली- यहाँ डकैत भी आकर करते है माँ काली की साधना

Hanuman Temple (हनुमान मंदिर)

चमत्कारिक मेहंदीपुर बालाजी मंदिर- प्रेत-भूत बाधा दूर करने का सबसे प्रसिद्ध और विश्वसनीय स्थान

भारत के प्रसिद्ध 16 हनुमान मंदिर

गिरजाबंध हनुमान मंदिर – रतनपुर – एक अति प्राचीन मंदिर जहाँ स्त्री रूप में होती है हनुमान कि पूजा

तेलंगाना में है हनुमान जी और उनकी पत्नी सुवर्चला का मंदिर

कष्टभंजन हनुमान मंदिर- जहाँ हनुमान जी के पैरों में स्त्री रूप में बैठे है शनि देव

भारत में दो जगह है हनुमान पुत्र मकरध्वज के मंदिर

Other Temple (अन्य मंदिर)

इस मंदिर में है अदभुत ‘शालिग्राम’, पिछले 200 सालों से बढ़ रहा है आकार

श्रीकृष्ण जी की ये 7 प्रतिमाएं हैं बहुत विशेष, जानिए क्या है कारण?

गंधर्वसेन मंदिर,गंधर्वपुरी- जहां चूहे लगाते हैं इच्छाधारी नाग की परिक्रमा

ये है वो 10 म‌ंद‌िर जिनका पांडवों से है विशेष संबंध

भारत के 10 रहस्यमय मंदिर, कोई नहीं जान पाया अब तक इनके राज

‘मत्स्य माताजी’- एक अनोखा मंदिर जहां होती है व्हेल मछली की पूजा

सूर्य मंदिर, मुलतान- श्री कृष्ण पुत्र सांबा ने करवाया था निर्माण

बद्रीनाथ धाम- यही वेदव्यास जी ने लिखी थी महाभारत, कहते है इसे धरती का वैकुंठ

सर्प मंदिर, मन्नारशाला – भारत के 7 आश्चर्यों में होती है गिनती, मंदिर परिसर में है 30000 सर्प प्रतिमाएं

नारायण धाम, उज्जैन- यहाँ कृष्ण संग विराजित है सुदामा, दोस्ती को समर्पित है यह मंदिर

ये हैं भारत के 7 प्रसिद्ध, खूबसूरत बौद्ध मंदिर

शनि पर्वत, मुरैना- हनुमान जी ने लंका से फेंका तो यहां गिरे शनिदेव, मौजूद हैं गिरने के निशान

शनि शिंगणापुर- इस गांव में नहीं लगते है कहीं भी ताले, शनिदेव करते हैं रक्षा

भारत के 10 प्रसिद्ध सूर्य मंदिर

पाकिस्तान स्तिथ हिन्दुओं के 20 प्राचीन, पौराणिक और ऐतिहासिक मंदिर

भारत के 10 सबसे अमीर मंदिर

अद्भुत हैंगिंग लेपाक्षी टेम्पल

अदभुत गणेश प्रतिमा – दंतेवाड़ा में 3000 फ़ीट की ऊँचाई पर स्थापित 10 वि सदी की गणेश प्रतिमा

अष्टविनायक – गणेश जी के आठ अति प्राचीन मंदिर, जहाँ है स्वयंभू गणेश जी

चमत्कारिक कनिपक्कम गणपति मंदिर (आंध्रप्रदेश) – लगातार बढ़ा रहा है मूर्ति का आकार

भारत के प्रमुख तीर्थ – 51 शक्ति पीठ, 12 ज्योतिर्लिंग, 7 सप्तपुरी और 4 धाम

पहाड़ी मंदिर – रांची – भारत का एक मात्र मंदिर जहाँ राष्ट्रीय पर्वो पर फहराया जाता है तिरंगा

बाबा हरभजन सिंह मंदिर – सिक्किम – इस मृत सैनिक की आत्मा आज भी करती है देश की रक्षा

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Sunday, September 8, 2024

9|| কোটিলিঙ্গেসর টেম্পল, কর্ণাটক।

 কোটিলিঙ্গেসর টেম্পল, কর্ণাটক।

Kammasandra in Kolar district, Karnataka, India. 

কোটিলিঙ্গেশ্বর কর্ণাটকের কমমাসান্দ্র, কোলারে, অবস্থিত।

মন্দিরের প্রধান আকর্ষণ হল 108 ফুট (33 মিটার) লম্বা একটি বিশাল লিঙ্গ এবং 35 ফুট (11 মিটার) লম্বা নন্দী মূর্তি, যা 15 একর (61,000 মি 2 ) এলাকা জুড়ে লক্ষ লক্ষ ছোট লিঙ্গ দ্বারা বেষ্টিত। নন্দী মূর্তিটি একটি প্ল্যাটফর্মের উপরে স্থাপন করা হয়েছে যার দৈর্ঘ্য 60 ফুট (18 মিটার), প্রস্থ 40 ফুট (12 মিটার) এবং উচ্চতা 4 ফুট (1.2 মিটার)। প্রাঙ্গণের মধ্যে বিভিন্ন দেবদেবীর জন্য এগারোটি ছোট মন্দির নির্মিত হয়েছে। লিঙ্গের কাছে একটি জলের ট্যাঙ্ক স্থাপন করা হয়েছে, যা ভক্তরা অভিষেক করতে ব্যবহার করেন । মূর্তিগুলি 1 ফুট (0.30 মিটার) এবং 3 ফুট (0.91 মিটার) উচ্চতার মধ্যে পরিবর্তিত হয়। মন্দিরের সাথে একটি গেস্ট হাউস , একটি বিবাহ হল, একটি ধ্যান হল এবং একটি প্রদর্শনী কেন্দ্র রয়েছে । 

মন্দিরটিতে এশিয়ার বৃহত্তম এবং উচ্চতম লিঙ্গ রয়েছে। লিঙ্গের সংখ্যা ~6.5 লক্ষ (অর্থাৎ 1 m² জমির মধ্যে 10টি লিঙ্গ, বোঝায় 61,000 m² জমিতে প্রায় 6.1 লক্ষ লিঙ্গ থাকতে পারে) এবং এক কোটি (দশ মিলিয়ন) নয়।

কন্নড় ভাষায় 'কোটি' মানে এক কোটি ,

আর কোটিলিঙ্গেশ্বর হল এক কোটি শিবলিঙ্গ। বিশ্বের সবচেয়ে উঁচু শিবলিঙ্গ সহ মন্দিরটি এখানে বিভিন্ন আকারের 90+ লক্ষ অন্যান্য শিবলিঙ্গের সাথে স্থাপন করা হয়েছে। 33 মিটার উঁচু শিবলিঙ্গ এবং 11 মিটার উঁচু ভগবান নন্দী, ষাঁড় মন্দিরের প্রধান আকর্ষণ। 


এটি কোলার জেলার একটি ছোট গ্রাম কমাসনাদ্রে অবস্থিত। যদিও প্রতিদিন প্রচুর ভক্তরা মন্দিরে যান, মন্দিরটি মহা শিবরাত্রিতে লক্ষ লক্ষ পর্যটকদের ভীড় হয়। শিবরাত্রি সাধারণত ফেব্রুয়ারি বা মার্চ মাসেই হয়। ভগবান বিষ্ণু, ব্রহ্মা, মহেশ, রাম, দেবী অন্নপূর্ণেশ্বরী, দেবী কারুমারি আম্মা, ভগবান ভেঙ্কটরামণি স্বামী, ভগবান পান্ডুরঙ্গ স্বামী, ভগবান রাম, সীতা এবং লক্ষ্মণ মন্দির, ভগবান পঞ্চমুখ গণপতি, ভগবান অন্নপূর্ণেশ্বরীর মতো 11টি ছোট মন্দির রয়েছে। এবং একই প্রাঙ্গনে দেবী কন্নিকা পরমেশ্বরী মন্দির।

মন্দিরটি সাধারণত বেশিরভাগ দিনে সকাল 6:00 টায় খোলে এবং রাত 9:00 টায় বন্ধ হয়।

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Monday, February 20, 2023

8>|| মহাশিবরাত্রি 2023 ||

  || মহাশিবরাত্রি 2023 ||

          <----আদ্যনাথ---->

মাঘ মাসের কৃষ্ণপক্ষের চতুর্দশী তিথিতে শিবরাত্রি পালন করা হয়। এদিন ভক্তি মনে পুজো করলে বাবা ভোলেনাথের 

কৃপা লাভ হয়।

এই বছর ১৮ ফেব্রুয়ারি শনিবার পড়েছে মহাশিবরাত্রির তিথি।

 ১৮ ফেব্রুয়ারি২০২৩-- সন্ধ্যা ৬/৫/৩০ থেকে ১৯ ফেব্রুয়ারি ঘ ৩/৩৮/৩৪ পর্যন্ত থাকবে শিব চতুর্দশীর তিথি। 

শিব অর্থ জ্ঞান। তিনি আশুতোষ।

শিব শান্ত,সৌম্য,ধীর,স্থির, আবার প্রলয়,

ধংস, তান্ডব।

তন্ত্রের দেবতা, রুদ্র,প্রলয়,

"সত্যম শিবম সুন্দরম"।


সুন্দরম অর্থ অদ্বৈতম। শিব হচ্ছে অদ্বৈত অর্থাৎ পবিত্র,এই পবিত্রবোধই হলো সৌন্দর্য এবং সেই সৌন্দর্যই হল সত্য ও শিবময়। 'সত্যম-শিবম-সুন্দরম ' ।


শিবপূজায় শিবলিঙ্গ স্নানার্থে প্রধাণত গঙ্গাজল বা গঙ্গাজল মিশ্রিত জল ব্যবহার করা হয় । আর বেলপাতা দেওয়া হয় তিনটি পাতাযুক্ত একটি যৌগিক পত্রকে । তবে বিশেষ লক্ষ্যণীয়, শিবের পূজার বেলপাতার প্রতিটি যৌগিক পত্রের নিচে বৃন্ত বা বোঁটার কাছের একটু মোটা অংশ অবশ্যই ভেঙ্গে বাদ দিয়ে তবে সেই বেলপাতা অর্পণ করা উচিত। 


সব ব্রতের মধ্যে সর্বশ্রেষ্ঠ হল এই মহাশিবরাত্রি। ব্রতের আগের দিন ভক্তগণ নিরামিষ আহার করে।  ব্রতের দিন তারা উপবাসী থাকে। তারপর রাত্রিবেলা চার প্রহরে শিবলিঙ্গকে দুধ, দই, ঘৃত, মধু ও গঙ্গাজল দিয়ে স্নান করানো হয়। তারপর বেলপাতা, নীলকন্ঠ ফুল, ধুতুরা, আকন্দ, অপরাজিতা প্রভৃতি ফুল দিয়ে পূজা করা হয়। আর  ‘ওঁ নমঃ শিবায়’ এই মহামন্ত্র জপ করা হয় । সেদিন রাত্রি জাগরণ করা হয় ও শিবের ব্রতকথা, মন্ত্র আরাধণা করা হয়। ভারতবর্ষের বারোটি জ্যোতির্লিঙ্গ তথা সমস্ত শিবমন্দিরে এই পূজা চলে, তান্ত্রিকেরাও এইদিন সিদ্ধিলাভের জন্য বিশেষ সাধনা করে। 


শিবরাত্রি' কথাটা দুটি শব্দ থেকে এসেছে। 'শিব' ও 'রাত্রি', যার অর্থ শিবের জন্য রাত্রী। শিবরাত্রির সঙ্গে প্রচলিত আছে নানা কথা। পুরাণ মতে দেবী পার্বতীর সঙ্গে এদিন দেবাদিদেব মহাদেবের মিলন হয়। । আবার শোনা যায় এদিন থেকেই বিশ্ব ব্রহ্মাণ্ড সৃষ্টি করেছিলেন। 


শিবরাত্রির ব্রত পালন করার আগের দিন সংযম করতে হয়। এদিন সিদ্ধ চালের ভাত বা আমিষ খেতে নেই। আতপ চালের সিদ্ধ ভাত খাওয়ার নিয়ম এদিন। এছাড়া কেউ চাইলে ময়দার তৈরি খাবারও খেতে পারেন। তবে সন্দক লবণ দিয়েই রান্না করতে হয়। এদিন সাধারণ লবণ একদমই খেতে নেই। ব্রতের দিন উপোস করে নিষ্ঠা করে কিছু নিয়ম মানলে ভক্তের মনোবাঞ্ছা পূরণ করেন দেবাদিদেব।   


যজ্ঞের মধ্যে যেমন অশ্বমেধ যজ্ঞ, তীর্থের মধ্যে যেমন গঙ্গা তেমনই পুরাণ অনুযায়ী ব্রতের মধ্যে শ্রেষ্ঠ হল শিব চতুর্দশীর ব্রত। তাই শিবরাত্রির ব্রত পালন করলে ধর্ম, অর্থ, কাম, মোক্ষ- এই চতুর্বিধ ফল লাভ হয়। 

 

হিন্দু মহাপুরাণ তথা শিবমহাপুরাণ অনুসারে এইরাত্রেই শিব সৃষ্টি, স্থিতি ও প্রলয়ের মহা তান্ডব নৃত্য করেছিলেন । আবার এইরাত্রেই শিব ও পার্বতীর বিবাহ হয়েছিল । এর নিগুঢ় অর্থ হল শিব ও শক্তি তথা পুরুষ ও আদিশক্তি বা পরাপ্রকৃতির মিলন। এই মহাশিবরাত্রিতে শিব তার প্রতীক লিঙ্গ তথা শিবলিঙ্গ রূপে প্রকাশিত হয়ে জীবের পাপনাশ ও মুক্তির পথ দিয়েছিলেন।


মহাশিবরাত্রি ব্রতকথা::----

শিবমহাপুরাণ অনুসারে, অতি প্রাচীনকালে বারাণসী তথা কাশীধামে এক নিষ্ঠুর ব্যাধ বাস করত। সে প্রচুর জীবহত্যা করত। একদিন শিকারে বেরিয়ে তার খুব দেরি হওয়ার ফলে সে জঙ্গলে পথ হারিয়ে রাতে হিংস্র জন্তুর ভয়ে এক গাছের উপর আশ্রয় নেয় । কোনো শিকার না পেয়ে সে হতাশ হয়ে গাছ থেকে একটা করে পাতা ছিঁড়ে নিচে ফেলতে থাকে । সেই গাছটি ছিল বেলগাছ । আর সেই বেলগাছের নিচে একটি শিবলিঙ্গ ছিল। সেদিন ছিল শিবচতুর্দশী অর্থাৎ মহাশিবরাত্রি। আর ব্যাধও ছিল উপবাসী। তার ফেলা বেলপাতাগুলো শিবলিঙ্গের মাথায় পড়ে এর ফলে তার শিবচতুর্দশী ব্রতের ফল লাভ হয় তার অজান্তেই। পরদিন ব্যাধ বাড়ী ফিরে এলে তার খাবার সে এক অতিথিকে দিয়ে দেয়। এতে তার ব্রতের পারণ ফল লাভ হয়।


এর কিছুদিন পরে সেই ব্যাধ মারা গেলে যমদূতরা তাকে নিতে আসে। কিন্তু শিবচতুর্দশী ব্রতের ফল লাভ হেতু শিবদূতরা এসে যুদ্ধ করে যমদূতদের হারিয়ে ব্যাধকে নিয়ে যায়। যমরাজ তখন শিকার করেন যে শিবচতুর্দশী ব্রত পালন করে এবং শিব ভক্ত যেই জন, তার উপর যমের কোনো অধিকার থাকেনা। সে মুক্তিলাভ করে। এইভাবে মর্ত্যলোকে শিবচতুর্দশী ব্রতের প্রচার ঘটে।


জ্যোতির্লিঙ্গ পূজা::--

মহাশিবরাত্রি অনুষ্ঠানে ভারতবর্ষের বারোটি জ্যোতির্লিঙ্গ তথা সোমনাথ, মল্লিকার্জুন, মহাকালেশ্বর, ওঁকারেশ্বর, কেদারনাথ, ভীমশঙ্কর, বিশ্বেশ্বর, ত্র্যয়ম্বকেশ্বর, বৈদ্যনাথ, নাগেশ্বর, রামেশ্বর ও ঘুশ্মেশ্বর এ বহু মানুষের সমাগম হয় ও সবার হাতে এই জ্যোতির্লিঙ্গের পূজা ও পবিত্র স্পর্শলাভ ঘটে।



মহাশিবরাত্রির পূজার বিধি চার প্রহর::


মহাশিবরাত্রির চার প্রহরের পুজোর সময় বা নির্ঘণ্ট, 


1--->প্রথম প্রহর পুজোর সময় --- 

১৮ ফেব্রুয়ারি ২০২৩, সন্ধে ০৬.৪১ থেকে রাত ০৯.৪৭ পর্যন্ত ৷


2---> দ্বিতীয় প্রহরের পুজোর সময় ---

রাত ০৯.৪৭-মধ্যরাত ১২.৫৩ পর্যন্ত ৷


3--->তৃতীয় প্রহরের পুজোর সময় ---

 ১৯ ফেব্রুয়ারি রাত ১২.৫৩ থেকে রাত ০৩.৫৮ পর্যন্ত ৷

4---->চতুর্থ প্রহরের পুজোর সময় ---

 ১৯ ফেব্রুয়ারি রাত ০৩.৫৮ থেকে সকাল ০৭.০৬ পর্যন্ত ৷


মহাশিবরাত্রির দিনে প্রদোষ শনিব্রত সংযোগ তৈরি হচ্ছে এর গুরুত্ব অসীম, অপার ৷ এইদিন শনির দোষ থেকে মুক্তি পেতে মহাদেবকে কালো তিল দিয়ে অভিষেক করলে মুক্তি পাওয়া যায় নানান কষ্ট থেকে ।


সকাল সকাল স্নন করে পরিষ্কার পরিচ্ছন্ন বস্ত্র ধারণ করে ৷ শিবমন্দিরে কালো তিল দিয়ে  মন প্রাণ দিয়ে একাগ্র চিত্তে  ভোলেবাবার অভিষেক করালে জীবনে কালসর্প দোষ থেকে মুক্তি পাওয়া সম্ভব।

আবার মধু দিয়ে স্নান বা অভিষেক করালে ধনপ্রাপ্তি হবে ফলে পাওয়া সম্ভব 

 অপার ঐশ্বর্য ৷ 

এইদিনে ভোলানাথের প্রিয় ভাং, বেলপাতা ও ধুতরা ফুল দিয়ে পুজো করলে কেটেযায় জীবনের সমস্ত বাধা বিপত্তি ৷

   <----আদ্যনাথ রায় চৌধুরী---->

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      महाशिवरात्रि::--

   18/02/3023

महाशिवरात्रि का त्योहार हर साल फाल्गुन माह के कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी तिथि को मनाया जाता है. ऐसी मान्यताएं है कि इस दिन भगवान शिव और देवी पार्वती का विवाह संपन्न हुआ था. ऐसा भी कहा जाता है कि इस दिन भगवान शिव के 12 ज्योतिर्लिंगों का धरती पर प्रकाट्य हुआ था. 


इस साल 18 फरवरी को रात 8 बजकर 03 मिनट पर प्रारंभ होगा और इसका समापन रविवार, 19 फरवरी को शाम 04 बजकर 19 मिनट पर होगा. चूंकि महाशिवरात्रि की पूजा निशिता काल में की जाती है, इसलिए यह त्योहार 18 फरवरी को ही मनाना उचित होगा.


इस साल महाशिवरात्रि का पर्व बेहद खास रहने वाला है. इस बार महाशिवरात्रि पर त्रिग्रही योग का निर्माण होने जा रहा है. 17 जनवरी 2023 को न्याय देव शनि कुंभ राशि में विराजमान हुए थे. अब 13 फरवरी को ग्रहों के राजा सूर्य भी इस राशि में प्रवेश करने वाले हैं. 18 फरवरी को शनि और सूर्य के अलावा चंद्रमा भी कुंभ राशि में होगा. इसलिए कुंभ राशि में शनि, सूर्य और चंद्रमा मिलकर त्रिग्रही योग का निर्माण करेंगे. ज्योतिषविद ने इसे बड़ा ही दुर्लभ संयोग माना है.

इस दिन भगवान शिव का अभिषेक करने से सभी दुख और पीड़ा दूर हो जाती है, साथ ही सभी प्रकार के भय से मुक्ति मिल जाती है। जो भक्त इस दिन केवल 'ॐ नमः शिवाय' इस मूल मंत्र का भी जाप करते हैं, भोलेनाथ उनपर भी अपनी कृपा दृष्टि सदैव बनाएं रखते हैं। 

इन चमत्कारी मन्त्र का पाठ करने से महादेव अपने भक्तों की सभी मनोकामाना पूर्ण कर देते हैं।

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::--अतः 18/02/2023 रात 12 बजेसे 1 बजे तक एक घण्टा जथा सम्भब

    "ॐ नमः शिवाय" मन्त्र पाठ कीजिये।


       <----आद्यनाथ राय चौधुरी---->