Friday, March 11, 2016

6> || *शिवरात्रि - ***( 1 to 8 )

6>শিব=Post=6***शिवरात्रि - ***( 1 to 7 ) 

1>शिवरात्रि -------07--03--2016 इस साल सोमबार के दिन शिवरात्रि।
                                ए एक सुंदर एबं महा जोग।
2>बहुत ही महत्वपूर्ण है भगवान शिव से जुड़े यह सात रहस्य !
3>महादेव शिव के अस्त्र त्रिशूल से जुड़े इन गुप्त एवं गहरे राज को जान हैरान रह
                                                जायेंगे आप ! Nu

4>जाने कैलाश पर्वत एवं शिवलिंग में स्थापित आश्चर्यचकित करने वाले
                                            अलौकिक शक्तियों का वैज्ञानिक सत्य !
5>क्यों खोला था शिव ने अपना तीसरा नेत्र, क्या है तीसरे नेत्र का रहस्य?
6>कौन हैं शिव
7>भगवान शिव के ग्यारह रुद्र रूप
8>শিবরাত্রি  ব্রত = তথা মহা শিবরাত্রি ব্রত।


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1>शिवरात्रि -------07--03--2016 इस साल सोमबार के दिन शिवरात्रि।
                                ए एक सुंदर एबं महा जोग। 
     इस बारे में कुंछ लिखने के इच्छा हुआ ,अतः लिख ने के प्रयास कर रहा हूँ।

 प्रत्येक माह में शिवरात्रि की तिथि होती है। लेकिन फाल्गुन माह के कृष्ण पक्ष त्रयोदशी को भगवान शिव का वरदान प्राप्त है और यह तिथि भगवान शिव की पूजा-अर्चना के लिए समर्पित मानी गई है। ज्योतिषाचार्यों के मुताबिक महाशिवरात्रि अद्भुत संयोग लेकर आ रही है। इस बार महाशिवरात्रि का पर्व सोमवार को मनाया जाएगा। वर्षों बाद इस तरह का संयोग निर्मित हुआ है। इसलिए इस महाशिवरात्रि का महत्व कई गुना अधिक होगा।

सोमवार का दिन महादेव की आराधना का महत्वपूर्ण दिन होता है, इसलिए यह तिथि अपने आप में ही श्रेष्ठ मानी जाती है। महाशिवरात्रि फाल्गुन कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी की तिथि घनिष्ठा नक्षत्र में मनाई जाएगी। सात मार्च को महाशिवरात्रि के दिन सोमवार पड़ रहा है। इस वर्ष महाशिवरात्रि का यह अद्भुत संयोग महादेव की आराधना के लिए सर्वोत्तम होगा।
सिंहस्थ योग का पुण्य: सालों बाद सिंहस्थ का योग निर्मित हुआ है। देव गुरु बृहस्पति सिंह राशि में गोचर करेंगे। इस प्रकार से यह तिथि धार्मिक कार्यों की दृष्टि से खास है। इस दौरान महाशिवरात्रि की पूजा करने से भगवान प्रसन्न होंगे साथ ही अपने भक्तों पर विशेष कृपा करेंगे।

रात्रि जागरण का महत्व: महाशिवरात्रि का पर्व दिन भर पूजन के साथ ही रात भर महादेव की भक्ति करने का होता है। महाशिवरात्रि का अर्थ ही होता है रात्रि में जागरण कर शिव की आराधना करना। महाशिवरात्रि की तिथि को रात में भजन-कीर्तन, शिव नाम जाप करने से भक्तों के कष्टों का अंत होगा।

चंद्र दोष से मुक्ति
सोमवार को महाशिवरात्रि की तिथि होने से जिन राशि के जातकों की कुंडली में चंद्र देव की स्थिति कमजोर है वे जातक रात में दुग्ध से चंद्र देव को अघ्र्य अर्पित करते हुए आराधना कर इस दोष से मुक्ति प्राप्त कर सकते हैं।
राशि के मुताबिक करें पूजा

मेष- इस राशि के जातकों को जल से महादेव का अभिषेक करना चाहिए।
वृषभ- गंगा जल मिश्रित जल अथवा गंगा जल महादेव को करे अर्पित।
मिथुन- भगवान को बेलपत्र अर्पित करें।
कर्क- दूध से महादेव के शिवलिंग का अभिषेक करें।
सिंह- अनार का रस अर्पित करते हुए महादेव का अभिषेक करें।
कन्या- भगवान शिव को गन्ने के रस से स्नान कराए।
तुला- इस राशि के जातक चांदी से निर्मित सर्प महादेव को अर्पित करें।
वृश्चिक- लाल वस्त्र अर्पित करें।
धनु- केशर युक्त दूध अर्पित करें।
मकर व कुंभ- महादेव का अभिषेक कर काले तिल अर्पित करें।
मीन- पीले पदार्थो का भोग लगाएं।
भगवान शिव की वेशभूषा के 15 रहस्य...

✔ चन्द्रमा : शिव का एक नाम 'सोम' भी है। सोम का अर्थ चन्द्र होता है। उनका दिन सोमवार है। चन्द्रमा मन का कारक है। शिव द्वारा चन्द्रमा को धारण करना मन के नियंत्रण का भी प्रतीक है। हिमालय पर्वत और समुद्र से चन्द्रमा का सीधा संबंध है।

चन्द्र कला का महत्व : मूलत: शिव के सभी त्योहार और पर्व चान्द्रमास पर ही आधारित होते हैं। शिवरात्रि, महाशिवरात्रि आदि शिव से जुड़े त्योहारों में चन्द्र कलाओं का महत्व है।

कई धर्मों का प्रतीक चिह्न : यह अर्द्धचन्द्र शैवपंथियों और चन्द्रवंशियों के पंथ का प्रतीक चिह्न है। मध्य एशिया में यह मध्य एशियाई जाति के लोगों के ध्वज पर बना होता था। चंगेज खान के झंडे पर अर्द्धचन्द्र होता था। इस्लाम का प्रतीक चिह्न है अर्द्धचन्द्र। इस अर्धचंद्र का ध्वज पर होने का अपना ही एक अलग इतिहास है।

चन्द्रदेव से संबंध : भगवान शिव के सोमनाथ ज्योतिर्लिंग के बारे में मान्यता है कि भगवान शिव द्वारा सोम अर्थात चन्द्रमा के श्राप का निवारण करने के कारण यहां चन्द्रमा ने शिवलिंग की स्थापना की थी। इसी कारण इस ज्योतिर्लिंग का नाम 'सोमनाथ' प्रचलित हुआ।

✔ त्रिशूल : भगवान शिव के पास हमेशा एक त्रिशूल ही होता था। यह बहुत ही अचूक और घातक अस्त्र था। इसकी शक्ति के आगे कोई भी शक्ति ठहर नहीं सकती।

त्रिशूल 3 प्रकार के कष्टों दैनिक, दैविक,भौतिक के विनाश का सूचक भी है। इसमें 3तरह की शक्तियां हैं- सत, रज और तम। प्रोटॉन, न्यूट्रॉन और इलेक्ट्रॉन।

त्रिशूल के 3 शूल सृष्टि के क्रमशः उदय,संरक्षण और लयीभूत होने का प्रतिनिधित्व करते भी हैं। शैव मतानुसार शिव इन तीनों भूमिकाओं के अधिपति हैं। यह शैव सिद्धांत के पशुपति, पशु एवं पाश का प्रतिनिधित्व करता है।

माना जाता है कि यह महाकालेश्वर के 3कालों (वर्तमान, भूत, भविष्य) का प्रतीक भी है। इसके अलावा यह स्वपिंड, ब्रह्मांड और शक्ति का परम पद से एकत्व स्थापित होने का प्रतीक है। यह वाम भाग में स्थिर इड़ा, दक्षिण भाग में स्थित पिंगला तथा मध्य देश में स्थित सुषुम्ना नाड़ियों का भी प्रतीक है।

शिव का सेवक वासुकि : शिव को नागवंशियों से घनिष्ठ लगाव था। नाग कुल के सभी लोग शिव के क्षेत्र हिमालय में ही रहते थे। कश्मीर का अनंतनाग इन नागवंशियों का गढ़ था। नाग कुल के सभी लोग शैव धर्म का पालन करते थे। भगवान शिव के नागेश्वर ज्योतिर्लिंग नाम से स्पष्ट है कि नागों के ईश्वर होने के कारण शिव का नाग या सर्प से अटूट संबंध है। भारत में नागपंचमी पर नागों की पूजा की परंपरा है।

विरोधी भावों में सामंजस्य स्थापित करने वाले शिव नाग या सर्प जैसे क्रूर एवं भयानक जीव को अपने गले का हार बना लेते हैं। लिपटा हुआ नाग या सर्प जकड़ी हुई कुंडलिनी शक्ति का प्रतीक है।

नागों के प्रारंभ में 5 कुल थे। उनके नाम इस प्रकार हैं- शेषनाग (अनंत), वासुकि, तक्षक,पिंगला और कर्कोटक। ये शोध के विषय हैं कि ये लोग सर्प थे या मानव या आधे सर्प और आधे मानव? हालांकि इन सभी को देवताओं की श्रेणी में रखा गया है, तो निश्‍चित ही ये मनुष्य नहीं होंगे।

नाग वंशावलियों में 'शेषनाग' को नागों का प्रथम राजा माना जाता है। शेषनाग को ही'अनंत' नाम से भी जाना जाता है। ये भगवान विष्णु के सेवक थे। इसी तरह आगे चलकर शेष के बाद वासुकि हुए, जो शिव के सेवक बने। फिर तक्षक और पिंगला ने राज्य संभाला। वासुकि का कैलाश पर्वत के पास ही राज्य था और मान्यता है कि तक्षक ने ही तक्षकशिला (तक्षशिला) बसाकर अपने नाम से 'तक्षक' कुल चलाया था। उक्त पांचों की गाथाएं पुराणों में पाई जाती हैं।

उनके बाद ही कर्कोटक, ऐरावत, धृतराष्ट्र,अनत, अहि, मनिभद्र, अलापत्र, कंबल,अंशतर, धनंजय, कालिया, सौंफू, दौद्धिया,काली, तखतू, धूमल, फाहल, काना इत्यादि नाम से नागों के वंश हुए जिनके भारत के भिन्न-भिन्न इलाकों में इनका राज्य था।

✔ डमरू : सभी हिन्दू देवी और देवताओं के पास एक न एक वाद्य यंत्र रहता है। उसी तरह भगवान के पास डमरू था, जो नाद का प्रतीक है। भगवान शिव को संगीत का जनक भी माना जाता है। उनके पहले कोई भी नाचना, गाना और बजाना नहीं जानता था। भगवान शिव दो तरह से नृत्य करते हैं- एक तांडव जिसमें उनके पास डमरू नहीं होता और जब वे डमरू बजाते हैं तो आनंद पैदा होता है।

अब बात करते हैं नाद की। नाद अर्थात ऐसी ध्वनि, जो ब्रह्मांड में निरंतर जारी है जिसे'ॐ' कहा जाता है। संगीत में अन्य स्वर तो आते-जाते रहते हैं, उनके बीच विद्यमान केंद्रीय स्वर नाद है। नाद से ही वाणी के चारों रूपों की उत्पत्ति मानी जाती है- 1. पर, 2.पश्यंती, 3. मध्यमा और 4. वैखरी।

आहत नाद का नहीं अपितु अनाहत नाद का विषय है। बिना किसी आघात के उत्पन्न चिदानंद, अखंड, अगम एवं अलख रूप सूक्ष्म ध्वनियों का प्रस्फुटन अनाहत या अनहद नाद है। इस अनाहत नाद का दिव्य संगीत सुनने से गुप्त मानसिक शक्तियां प्रकट हो जाती हैं। नाद पर ध्यान की एकाग्रता से धीरे-धीरे समाधि लगने लगती है। डमरू इसी नाद-साधना का प्रतीक है।

✔ शिव का वाहन वृषभ : वृषभ शिव का वाहन है। वे हमेशा शिव के साथ रहते हैं। वृषभ का अर्थ धर्म है। मनुस्मृति के अनुसार'वृषो हि भगवान धर्म:'। वेद ने धर्म को 4 पैरों वाला प्राणी कहा है। उसके 4 पैर धर्म, अर्थ,काम और मोक्ष हैं। महादेव इस 4 पैर वाले वृषभ की सवारी करते हैं यानी धर्म, अर्थ,काम और मोक्ष उनके अधीन हैं।

एक मान्यता के अनुसार वृषभ को नंदी भी कहा जाता है, जो शिव के एक गण हैं। नंदी ने ही धर्मशास्त्र, अर्थशास्त्र, कामशास्त्र और मोक्षशास्त्र की रचना की थी।

✔ जटाएं : शिव अंतरिक्ष के देवता हैं। उनका नाम व्योमकेश है अत: आकाश उनकी जटास्वरूप है। जटाएं वायुमंडल की प्रतीक हैं। वायु आकाश में व्याप्त रहती है। सूर्य मंडल से ऊपर परमेष्ठि मंडल है। इसके अर्थ तत्व को गंगा की संज्ञा दी गई है अत: गंगा शिव की जटा में प्रवाहित है। शिव रुद्रस्वरूप उग्र और संहारक रूप धारक भी माने गए हैं।

✔ गंगा : गंगा को जटा में धारण करने के कारण ही शिव को जल चढ़ाए जाने की प्रथा शुरू हुई। जब स्वर्ग से गंगा को धरती पर उतारने का उपक्रम हुआ तो यह भी सवाल उठा कि गंगा के इस अपार वेग से धरती में विशालकाय छिद्र हो सकता है, तब गंगा पाताल में समा जाएगी।

ऐसे में इस समाधान के लिए भगवान शिव ने गंगा को सर्वप्रथम अपनी जटा में विराजमान किया और फिर उसे धरती पर उतारा। गंगोत्री तीर्थ इसी घटना का गवाह है।

✔ भभूत या भस्म : शिव अपने शरीर पर भस्म धारण करते हैं। भस्म जगत की निस्सारता का बोध कराती है। भस्म आकर्षण, मोह आदि से मुक्ति का प्रतीक भी है। देश में एकमात्र जगह उज्जैन के महाकाल मंदिर में शिव की भस्म आरती होती है जिसमें श्मशान की भस्म का इस्तेमाल किया जाता है।

यज्ञ की भस्म में वैसे कई आयुर्वेदिक गुण होते हैं। प्रलयकाल में समस्त जगत का विनाश हो जाता है, तब केवल भस्म (राख) ही शेष रहती है। यही दशा शरीर की भी होती है।

✔ तीन नेत्र : शिव को 'त्रिलोचन' कहते हैं यानी उनकी तीन आंखें हैं। प्रत्येक मनुष्य की भौहों के बीच तीसरा नेत्र रहता है। शिव का तीसरा नेत्र हमेशा जाग्रत रहता है, लेकिन बंद। यदि आप अपनी आंखें बंद करेंगे तो आपको भी इस नेत्र का अहसास होगा।

संसार और संन्यास : शिव का यह नेत्र आधा खुला और आधा बंद है। यह इसी बात का प्रतीक है कि व्यक्ति ध्यान-साधना या संन्यास में रहकर भी संसार की जिम्मेदारियों को निभा सकता है

त्र्यंबकेश्वर : त्र्यंबकेश्वर ज्योतिर्लिंग के व्युत्पत्यर्थ के संबंध में मान्यता है कि तीन नेत्रों वाले शिवशंभू के यहां विराजमान होने के कारण इस जगह को त्र्यंबक (तीन नेत्र) के ईश्वर कहा जाता है।

पीनिअल ग्लैंड : आध्यात्मिक दृष्टि से कुंडलिनी जागरण में एक चक्र को भेदने के बाद जब षट्चक्र पूर्ण हो जाता है तो इसके बाद आत्मा का तीसरा नेत्र मलशून्य हो जाता है। वह स्वच्छ और प्रसन्न हो जाता है।

कुमारस्वामी ने शिव के तीसरे नेत्र को प्रमस्तिष्क (सेरिब्रम) की पीयूष-ग्रंथि (पीनिअल ग्लैंड) माना है। पीयूष-ग्रंथि उन सभी ग्रंथियों पर नियंत्रण रखती है जिनसे उसका संबंध होता है। कुमारस्वामी ने पीयूष-ग्रंथि को जागृत, स्पंदित एवं विकसित करने की प्रक्रियाओं का विवेचन किया है।

✔ हस्ति चर्म और व्याघ्र चर्म : शिव अपनी देह पर हस्ति चर्म और व्याघ्र चर्म को धारण करते हैं। हस्ती अर्थात हाथी और व्याघ्र अर्थात शेर। हस्ती अभिमान का और व्याघ्र हिंसा का प्रतीक है अत: शिवजी ने अहंकार और हिंसा दोनों को दबा रखा है।

✔ शिव का धनुष पिनाक : शिव ने जिस धनुष को बनाया था उसकी टंकार से ही बादल फट जाते थे और पर्वत हिलने लगते थे। ऐसा लगता था मानो भूकंप आ गया हो। यह धनुष बहुत ही शक्तिशाली था। इसी के एक तीर से त्रिपुरासुर की तीनों नगरियों को ध्वस्त कर दिया गया था। इस धनुष का नाम पिनाक था। देवी और देवताओं के काल की समाप्ति के बाद इस धनुष को देवराज को सौंप दिया गया था।

उल्लेखनीय है कि राजा दक्ष के यज्ञ में यज्ञ का भाग शिव को नहीं देने के कारण भगवान शंकर बहुत क्रोधित हो गए थे और उन्होंने सभी देवताओं को अपने पिनाक धनुष से नष्ट करने की ठानी। एक टंकार से धरती का वातावरण भयानक हो गया। बड़ी मुश्किल से उनका क्रोध शांत किया गया, तब उन्होंने यह धनुष देवताओं को दे दिया।

देवताओं ने राजा जनक के पूर्वज देवराज को धनुष दे दिया। राजा जनक के पूर्वजों में निमि के ज्येष्ठ पुत्र देवराज थे। शिव-धनुष उन्हीं की धरोहरस्वरूप राजा जनक के पास सुरक्षित था। इस धनुष को भगवान शंकर ने स्वयं अपने हाथों से बनाया था। उनके इस विशालकाय धनुष को कोई भी उठाने की क्षमता नहीं रखता था। लेकिन भगवान राम ने इसे उठाकर इसकी प्रत्यंचा चढ़ाई और इसे एक झटके में तोड़ दिया।

✔ शिव का चक्र : चक्र को छोटा, लेकिन सबसे अचूक अस्त्र माना जाता था। सभी देवी-देवताओं के पास अपने-अपने अलग-अलग चक्र होते थे। उन सभी के अलग-अलग नाम थे। शंकरजी के चक्र का नाम भवरेंदु, विष्णुजी के चक्र का नाम कांता चक्र और देवी का चक्र मृत्यु मंजरी के नाम से जाना जाता था। सुदर्शन चक्र का नाम भगवान कृष्ण के नाम के साथ अभिन्न रूप से जुड़ा हुआ है।

यह बहुत कम ही लोग जानते हैं कि सुदर्शन चक्र का निर्माण भगवान शंकर ने किया था। प्राचीन और प्रामाणिक शास्त्रों के अनुसार इसका निर्माण भगवान शंकर ने किया था। निर्माण के बाद भगवान शिव ने इसे श्रीविष्णु को सौंप दिया था। जरूरत पड़ने पर श्रीविष्णु ने इसे देवी पार्वती को प्रदान कर दिया। पार्वती ने इसे परशुराम को दे दिया और भगवान कृष्ण को यह सुदर्शन चक्र परशुराम से मिला।

✔ त्रिपुंड तिलक : माथे पर भगवान शिव त्रिपुंड तिलक लगाते हैं। यह तीन लंबी धारियों वाला तिलक होता है। यह त्रिलोक्य और त्रिगुण का प्रतीक है। यह सतोगुण,रजोगुण और तमोगुण का प्रतीक भी है। यह त्रिपुंड सफेद चंदन का या भस्म का होता है।

त्रिपुंड दो प्रकार का होता है- पहला तीन धारियों के बीच लाल रंग का एक बिंदु होता है। यह बिंदु शक्ति का प्रतीक होता है। आम इंसान को इस तरह का त्रिपुंड नहीं लगाना चाहिए। दूसरा होता है सिर्फ तीन धारियों वाला तिलक या त्रिपुंड। इससे मन एकाग्र होता है।

✔ कान में कुंडल : शिव कुंडल : हिन्दुओं में एक कर्ण छेदन संस्कार है। शैव, शाक्त और नाथ संप्रदाय में दीक्षा के समय कान छिदवाकर उसमें मुद्रा या कुंडल धारण करने की प्रथा है। कर्ण छिदवाने से कई प्रकार के रोगों से तो बचा जा ही सकता है साथ ही इससे मन भी एकाग्र रहता है। मान्यता अनुसार इससे वीर्य शक्ति भी बढ़ती है।

कर्णकुंडल धारण करने की प्रथा के आरंभ की खोज करते हुए विद्वानों ने एलोरा गुफा की मूर्ति, सालीसेटी, एलीफेंटा, आरकाट जिले के परशुरामेश्वर के शिवलिंग पर स्थापित मूर्ति आदि अनेक पुरातात्विक सामग्रियों की परीक्षा कर निष्कर्ष निकाला है कि मत्स्येंद्र और गोरक्ष के पूर्व भी कर्णकुंडल धारण करने की प्रथा थी और केवल शिव की ही मूर्तियों में यह बात पाई जाती है।

भगवान बुद्ध की मूर्तियों में उनके कान काफी लंबे और छेदे हुए दिखाई पड़ते हैं। प्राचीन मूर्तियों में प्राय: शिव और गणपति के कान में सर्प कुंडल, उमा तथा अन्य देवियों के कान में शंख अथवा पत्र कुंडल और विष्णु के कान में मकर कुंडल देखने में आता है।

✔ रुद्राक्ष : माना जाता है कि रुद्राक्ष की उत्पत्ति शिव के आंसुओं से हुई थी। धार्मिक ग्रंथानुसार 21 मुख तक के रुद्राक्ष होने के प्रमाण हैं, परंतु वर्तमान में 14 मुखी के पश्चात सभी रुद्राक्ष अप्राप्य हैं। इसे धारण करने से सकारात्मक ऊर्जा मिलती है तथा रक्त प्रवाह भी संतुलित रहता है।महाशिवरात्रि इस बार सात मार्च को पंचग्रही व शिव योग में हर्षोल्लास से मनाया जाएगा। इस दिन कुंभ राशि में सूर्य, चंद्रमा, बुध, शुक्र व केतु, पांच ग्रह मिलन (युति) करेंगे। ज्योतिषाचार्यों के अनुसार स्थिर राशि कुंभ में पांच ग्रहों का यह योग महाशिवरात्रि पर चारों प्रहर की पूजा करने वाले शिव भक्तों को स्थिर लक्ष्मी व आरोग्यता प्रदान करेगा।

इस बार शैव और वैष्णव दोनों मतों के लोग एक ही दिन शिवरात्रि का पर्व मनाएंगे। महाशिवरात्रि पर पंचग्रही योग 18 साल बाद बन रहा है। इससे पूर्व यह विशेष योग 25 फरवरी 1998 में बना था। इसके बाद 9 मार्च 2024 को यह योग बनेगा।

भगवान शिव को प्रसन्न करने की रात

शैव व वैष्णव दोनों मतों के लोगों के एक ही दिन यह पर्व मनाने के कारण चार प्रहर की पूजा भी इसी दिन की जाएगी। भगवान शिव को प्रसन्न करने के लिए हर प्रहर में गन्ना, डाब (कुशा), दुग्ध, खस आदि का अभिषेक किया जाएगा। साथ ही रुद्र पाठ, शिव महिमन और तांडव स्त्रोत का पाठ होगा। षोड्षोपचार पूजन के साथ भगवान शिव को आक, धतूरा, भांग, बेर, गाजर चढ़ाया जाएगा। किसी व्यक्ति की कुंड़ली में राहु-केतु के मध्य में आने पर बनने वाला कालसर्प योग के निवारण के लिए भी विशेष पूजा की जाएगी।

चार प्रहर पूजन का समय इस बार 07/03/2016

प्रथम प्रहर : सायंकाल 6.27 से रात्रि 9.32 बजे तक
द्वितीय प्रहर : रात्रि 9.33 से 12.37 बजे तक
तृतीय प्रहर : मध्यरात्रि 12.38 से 3.42 बजे तक
चतुर्थ प्रहर : मध्यरात्रि बाद 3.43 से प्रात: 6.47 बजे तक
निशीथ काल : मध्यरात्रि 12.13 से 1.02 बजे तक
इस प्रकार पांच प्रहर तो रोजना होती हैं।
This timing event pl be follow by PONJIKA

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2>बहुत ही महत्वपूर्ण है भगवान शिव से जुड़े यह सात रहस्य !

एक परम दिव्य तत्व के तीन भाग ( ब्र्ह्मा, विष्णु, शिव ) का अंतिम भाग है भगवान शिव. महादेव शिव के गुण एवं उनकी अद्भुत महिमा अपरम्पार एवं अनन्त है. यदि हम सरल शब्दों में कहे तो भगवान शिव अव्यक्त एवं अनन्त स्वरूप के देवता है तथा उनके गुणों एवं महिमा की गिनती हम साधारण मनुष्यो के बस की बात नहीं .

स्वयं शास्त्रों में लिखी एक बात भगवान शिव के गुणों की अनन्ता को प्रदर्शित करती है. जिसके अनुसार यदि पर्वत जितना काजल लेकर, समुद्र रूपी दवात में रखे तथा कल्पवृक्ष को कलम बनाकर पृथ्वी रूपी कागज में स्वयं ज्ञान की देवी सरस्वती शिव के गुणों को लिखना प्रारम्भ करें तो भी भगवान शिव के गुणों एवं उनकी महिमा की गाथा का अंत नहीं होगा.

महादेव शिव के ऐसे ही गुणगान से जुडा उनका एक नाम बहुत ही अद्भुत एवं प्रभावकारी माना जाता है. यह नाम विशेषकर सावन के महीने भगवान शिव के हर भक्त के मुंह में होता है. भगवान शिव का वह पावन नाम है ”हर”. भगवान शिव के सभी भक्त हर हर महदेव का जयकार करते है.

हर शब्द से अभिप्राय है हरण करने वाला. पुराणों के अनुसार महादेव शिव तथा उनका परम नाम सभी भक्तो के दुःख को हर लेता है. बुद्धि, विचार, कर्म तथा वाणी से जुड़े हर पकार के दोष भगवान शिव के एक नाम ”हर” जपने से दूर हो जाते है . दूसरे शब्दों में भगवान शिव का यह नाम पाप, दोष तथा दुर्गुण आदि का निवारण करता है.
भगवान शिव की अपार महिमा तथा उनके वेशभूसा, श्रृंगार भगवान शिव को सबसे अनोखा एवं निराला बनाती है.
आइये जानते है सबसे निराले एवं रहस्मयी देवो के देव महादेव शिव से जुड़े साथ अनोखी बाते :-

सर्प :-

भगवान शिव सदैव अपने गले में सर्प धारण करते है जबकि वही अन्य सभी देवो के गलो में पुष्पों का हार होता है.

भगवान शिव के गले में सर्प धारण करने का अर्थ है जिन्हे संसार पसंद नहीं करता भगवान शिव उन्हें भी अपने गले से लगाते है. भगवान शिव हर प्राणी से प्यार करते है चाहे उसकी प्रकृति एवं स्वभाव कैसा ही क्यों न हो.

त्रिनेत्र :-

भगवान शिव त्रिनेत्रधारी है. सम्पूर्ण जगत भगवान शिव द्वारा रांची गई है इसके साथ ही भगवान शिव समय के भी रचियता है तथा वे काल से भी पर है. भगवान शिव भुत, भविष्य तथा वर्तमान तीनो के ज्ञाता है तथा उन्हें प्रत्यक्ष देख सकते है.

संसार जिस सत्य को अपनी आँखों के सामने होते हुए भी देख नहीं पाता वह सत्य कभी भी भगवान शिव के आँखों से औझल नहीं होती. क्योकि भगवान शिव ही इस समस्त संसार को बनाने वाले है.

डमरू :-

भगवान शिव जितने महान एवं परम योगी है, संगीत एवं नृत्य कला में भी वे उतने ही कुशल है. भगवान शिव के डमरू से निकली ध्वनि के नाध्य से ही संस्कृत भाषा के व्याकरण का जन्म हुआ था.

संस्कृत भाषा सभी भाषाओं की जननी है तथा ज्ञान विज्ञान का आधार है. तथा इससे यह अभिप्राय निकलता है की शिव के डमरू से ज्ञान विज्ञान, तकनीकी, चिकित्सा विज्ञान, सभ्यता एवं संस्कृति का उदय हुआ है.

त्रिशूल :-

महादेव शिव अपने एक हाथो से अपने भक्तो को वरदान देते है तो वही दूसरे हाथो से दुष्टों एवं पापियों का संहार भी करते है. भगवान शिव ने अपने त्रिशूल से कई असुरो एवं अत्याचारियो का संहार किया है.

महादेव शिव के त्रिशूल के तिन शुक्ल मनुष्य के भीतर से तीन ( भौतिक, दैहिक, देविक ) प्रकार के पाप निकालकर उनका जीवन सुखमय बनाने का प्रतीक है.

चन्द्रमा :-

शिव के श्रृंगार को और सुंदर बनाता है उनके मस्तक पर विराजमान चंद्रमा. ज्योतिष में चंद्रमा मन का कारक है और यह नए विचारों को उत्पन्न करता है.

नियंत्रण और सदुपयोग से मन मनुष्य को प्रगति की ओर लेकर जाता है तो अनियंत्रण से पतन की ओर. शिव ने इसे मस्तक पर धारण किया है. इसका मतलब है, उनका मन पर पूरा नियंत्रण है. स्वयं के मन पर भी और संसार के मन पर भी.

भस्म :-

महादेव शिव अपने शरीर में भस्म रमाते है यह प्रतीक है के मनुष्य का शरीर नाशवान है, तथा अंत में वह भगवान शिव में समा जाएगा. परन्तु इस सत्य को जानते हुए भी मनुष्य इससे अंजान होने का बहाना करता है और संसार की झूठी माया मोह में फसा रहता है.

भस्म का तातपर्य भगवान शिव के अमर होने तथा संसार के नाश्वान होने से है.

नंदी :-

भगवान शिव की सवारी है नंदी तथा भगवान शिव को बहुत प्रिय है. नंदी के नाम के संबंध में अनेक अर्थ जुड़े हुए है जो भगवान शिव की महिमा का गुणगान करते है. लेकिन इन सब में सबसे गहन अर्थ नंदी के पैरो से जुडा हुआ है.

नंदी के चार चरण है जिनकी सहायता से वह भगवान शिव को एक स्थान से दूसरे स्थान तक ले जाते है. ये चारो चरण मनुष्य की चार अवस्थाओं ( ब्रह्मचर्य, वामप्रस्थ, सन्यास, गृहस्थ ) और चार पुरुषार्थ ( धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष) को प्रदर्शित करते है.
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3>महादेव शिव के अस्त्र त्रिशूल से जुड़े इन गुप्त एवं गहरे राज को जान हैरान रह जायेंगे आप !

धार्मिक ग्रंथो में यह वर्णन मिलता है के इस सम्पूर्ण सृष्टि के संचालन का दायित्व त्रिदेवो (ब्र्ह्मा, विष्णु, महेश) के हाथो में है . ब्रह्म देव ने इस सृष्टि का निर्माण किया है, भगवान विष्णु इस सृष्टि के पालनकर्ता है तथा महादेव शिव संहारकर्ता है.

देवो के देव महादेव शिव अत्यन्त निराले तथा इसके साथ ही उनकी वेशभूषा भी अत्यन्त विचित्र है. भगवान शिव का प्रमुख अस्त्र त्रिशूल है. शिव शंकर के हाथ में मौजूद यह त्रिशूल अपने विषय में एक अलग ही कथा प्रस्तुत करता है.

कुछ लोग भगवान शिव के अस्त्र त्रिशूल को विनाश की निशानी मानते है. परन्तु वास्तव में भगवान शिव के त्रिशूल के रहस्य को समझपाना भगवान शिव के समान ही रहस्मयी एवं बहुत कठिन है.

हमारे हिन्दू धार्मिक पुराणों एवं ग्रंथो में अनेक गूढ़ रहस्य छिपे हुए है जिनमे से एक है भगवान शिव के हाथ में उपस्थित त्रिशूल.

आइये जानते है भगवान शिव के त्रिशूल से जुड़े अनोखे एवं रहस्मयी बाते.

भगवान शिव के त्रिशूल के संबंध में कहा जाता है की यह त्रिदेवो का प्रतीक ब्र्ह्मा, विष्णु, महेश है यानि इसे रचना, पालन एवं विनाश के रूप में देखा जाता है. इसे भुत, भविष्य तथा वर्तमान के साथ स्वर्ग, धरती तथा पाताल एवं इच्छा क्रिया एवं बुद्धि का प्रतीक भी माना जाता है.

इसके साथ ही हिन्दू धर्म में देवियो के हाथो में भी त्रिशूल देखा जाता है. देवी शक्ति दुष्टों का विनाश अपने शस्त्र त्रिशूल से करती है. अतः भगवान शिव के त्रिशूल को त्रिदेवियों माता लक्ष्मी, सरस्वती एवं पार्वती के प्रतीक के रूप में भी देखा जाता है.

ऐसा भी कहा जाता है की भगवान शिव के त्रिशूल का निर्माण भौतिक लोक, पूर्वजो की दुनिया तथा विचारों की दुनिया के सर्वविनाश के लिए हुआ था.

ताकि दुनिया में मनुष्य के बढ़ते पाप का विनाश कर एक नए आध्यात्मिक दुनिया का निर्माण हो सके ताकि सृष्टि में कोई पाप शेष ना रहे.

त्रिशूल, तीनों गुण सत, रज, तम का भी परिचायक है और त्रिशूल का शिव के हाथ में होने का अर्थ है कि भगवान तीनों गुणों से ऊपर है, वह निर्गुण है.

शिव का त्रिशूल पवित्रता एवं शुभकर्म का प्रतीक है तथा इसमें मनुष्य के अतीत, भविष्य तथा वर्तमान के कष्टों को दूर करने की ताकत होती है. इतना ही नहीं इसी के साथ हमारी आत्मा जन्म एवं मृत्यु के चक्र को छोड़ मोक्ष की प्राप्ति द्वारा ईश्वर का सानिध्य पा सकती है.

शिव के त्रिशूल में इंसानी मस्तिष्क और शरीर में व्याप्त विभिन्न बुराइयों और नकारात्मकता को समाप्त करने की भी ताकत है. मनुष्य शरीर में भी त्रिशूल, जहां तीन नाड़ियां मिलती हैं, मौजूद है और यह ऊर्जा स्त्रोतों, इड़ा, पिंगला और सुषुम्ना को दर्शाता है.

सुषुम्ना जो कि मध्य में है, को सातवां चक्र और ऊर्जा का केंद्र कहा जाता है. हमारे शरीर में एक स्थान ऐसा होता है जो बाहरी उठापटक को पूरी तरह नजरअंदाज करता है और यह तभी कार्य करता है जब सुषुम्ना तक ऊर्जा पहुंचने लगती है.

सुषुम्ना तक ऊर्जा पहुंचने के साथ ही जीवन की असली शुरुआत होती है. जब बाहर हो रही किसी भी तरह की गतिविधियों का प्रभाव मनुष्य के भीतर नहीं होता.

वहीं अन्य दो कोनों को इड़ा और पिंगला कहा जाता है. इड़ा और पिंगला को शिव और शक्ति का नाम भी दिया जाता है. इन्हें शिव और शक्ति का नाम लिंग के अनुसार नहीं बल्कि उनकी विेशेषताओं के आधार पर दिया गया है.
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4>जाने कैलाश पर्वत एवं शिवलिंग में स्थापित आश्चर्यचकित करने वाले अलौकिक शक्तियों का वैज्ञानिक सत्य !

सनातन धर्म के अनुसार जब सम्पूर्ण बर्ह्माण्ड में कुछ नहीं था तब ईश्वर ने स्वयं प्रकट होकर अपने में एक स्त्री शक्ति को स्थान देकर पृथक किया. ईश्वर की स्त्री पुरष शक्ति ने विभक्त होकर त्रिदेवो एवं त्रिशक्तियों को उतपन्न किया.

महादेव शिव ने ब्रह्माण्ड सृजनी शक्ति के साथ एक दिव्य लिंग के रूप में प्रकट हुए जिसका ना कोई आदि था और न कोई अंत. उस दव्य लिंग ने ब्र्ह्मा एवं विष्णु से कहा की जो भी मेरा आदि या अंत पा लेगा वह सर्वपूजित होगा. अंत में सत्य की वजह से भगवान विष्णु विजय हुए.

उस ब्रह्माण्ड सृजनी शक्ति के साथ भगवान शिव ने लिंग रूप में धरती पर वास किया. वह शक्ति कुछ और नहीं बल्कि अणु एवं परमाणु शक्ति थी जिसके द्वारा आज विनाशकारी बमो का निर्माण किया जाता है पहले इसी शक्ति का प्रयोग ब्र्ह्मास्त्र के रूप में किया जाता था.

शिवलिंग का जो आकार है वह भी इसी आधार पर है की इसके अंदर उपस्थित संचारित होने वाली ऊर्जा और विफसोट अंदर ही बनी रहे. ऐसा ही आकार आत्मा का भी माना जाता है.

भारत का रेडियोएक्टिविटी मैप उठा लो तो हैरान हो जाओगे की भारत सरकार के नुक्लिएर रिएक्टर के अलावा सभी ज्योत्रिलिंगो के स्थानों पर सबसे ज्यादा रेडिएशन पाया जाता है. शिवलिंग और कुछ नहीं बल्कि न्यूक्लिअर रिएक्टर्स ही हैं तभी उनपर जल चढ़ाया जाता है ताकि वो शांत रहे.

महादेव के सभी प्रिय पदार्थ जैसे किए बिल्व पत्र, आक, आकमद, धतूरा, गुड़हल, आदि सभी न्यूक्लिअर एनर्जी सोखने वाले हैं . क्यूंकि शिवलिंग पर चढ़ा पानी भी रिएक्टिव हो जाता है तभी जल निकासी नलिका को लांघा नहीं जाता. भाभा एटॉमिक रिएक्टर का डिज़ाइन भी शिव लिंग की तरह है.

एक्सिस मुंडी :-

एक्सिस मुंडी को ब्रह्माण्ड का केंद्र, आकाशीय ध्रुव बिंदु और भगौलिक बिंदु, आकाश एवं पृथ्वी के बीच संबंध दर्शाने वाला एक ध्रुव है जहा सभी दिशाएं आकर मिलती है. तथा यह नाम वास्तविक एवं महान, सबसे पवित्र तथा अनोखी रहस्मयी शक्ति वाले पहाड़ों में से एक कैलाश पर्वत से संबंधित है.

एक्सिस मुंडी ऐसी जगह होती है जहा अलौकिक शक्तियों का प्रवाह होता है तथा जहा आप उन से सम्पर्क बना सकते है रुसी वैज्ञानिकों ने यह स्थान कैलाश पर्वत को बताया है.

अप्राकृतिक शक्तियों का भंडारक कैलाश पर्वत चार महान नदियों के स्रोतों से घिरा हुआ है सिंधु, सतलज, ब्र्ह्म्पुत्र तथा घाघरा. तथा इसके साथ कैलाश पर्वत दो मांसरोवरो से घिरा जो इसके आधार है. पहला सरोवर है मानसरोवर जो दुनिया के सबसे उच्च्तम शुद्ध जलो में से एक कहा गया है तथा इसका आकर सूर्य की तरह है.

दुसरा सरोवर है राक्षस सरोवर जो दुनिया के उच्च्तम खारे जल का सरोवर कहलाता है तथा इसका आकर चन्द्र की तरह है. ये दोनों झीले सौर एवं चन्द्र दोनों ऊर्जा को प्रदर्शित करते है जो सकरात्मक एवं नकरात्मक ऊर्जा को भी दिखाता है. कैलाश पर्वत को दक्षिण की दिशा से देखने में वास्तव में स्वस्तिका का निशान देखा जा सकता है.

कैलाश पर्वत एवं उसके आस पास के वातावरण का अध्ययन कर रहे रुसी वैज्ञानिकों ने बताया की की वहां पर उपस्थित अलौकिक शक्तियों के माध्यम से ही तपस्वी भगवान से टेलीपेथी के माध्यम से सम्पर्क साधते थे.

कैलास पर्वत तथा यहाँ के वातावरण पर रुसी वैज्ञानिक ने अनेको रिसर्च किया तथा उनके इस रिसर्च से जो परिणाम निकले उसे कोई नकार नहीं सकता. उन्होंने बताया के कैलश पर्वत एक विशाल पिरामिड है जो लगभग सो पिरामिडों का केंद्र है.

कैलाश पर्वत अपने आप में अनेको अलौकिक शक्तियों को समेटे हुए है. रुसी वैज्ञानिकों ने दावा किया था की कैलाश पर्वत प्रकृति के माध्यम से उतपन्न हुआ उच्च्तम पिरामिडों में से एक है.

हमारे परम्पराओ के पीछे कितना गूढ़ विज्ञान छुपा हुआ है यह हमे पता नहीं है. जो वास्तविक ज्ञान है उससे हम अभी तक अपरिचित है तथा विज्ञान के नाम पर हमे जो पढ़ाया जा रहा है वह हमे हमारी परम्पराओ से दूर कर रहा है.
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5>क्यों खोला था शिव ने अपना तीसरा नेत्र, क्या है तीसरे नेत्र का रहस्य?


रामचरित मानस के अनुसार तारका नाम का एक असुर हुआ उसने सभी देवताओं को हराकर तीनों लोकों को जीत लिया। वह अमर था। इसीलिए देवता उसका कुछ नहीं बिगाड़ सकते थे। आखिर में सभी देवता उसके आतंक से परेशान होकर ब्रह्माजी के पास पहुंचे। तब ब्रह्माजी ने देवताओं को बताया कि इस असुर का संहार सिर्फ शिव पुत्र के द्वारा ही हो सकता है। तब सभी देवता चिंतित हो गए क्योंकि सती के देह त्याग के बाद से शिव समाधि में बैठे थे। तब ब्रह्माजी बोले कि सती ने देह त्याग के बाद हिमाचल के यहां जन्म लिया है।
उन्होंने पार्वती के रूप में शिव को पाने के लिए बहुत तप किया लेकिन वे तो समाधि लगाकर बैठे हैं। इसलिए आप लोग जाकर कामदेव को शिवजी के पास भेजो ताकि उनके मन में काम का भाव उत्पन्न हो। इसके अलावा कोई उपाय नहीं है। देवताओं ने जब कामदेव को जाकर सारी बात बताई। तब कामदेव फूलों का धनुष लेकर निकल पड़े। उनके प्रभाव से सभी पशु-पक्षी काम के बस में हो गए। लेकिन जब कामदेव शिव के पास पहुंचे तो वे डर गए।
उन्होंने शिव को मनाने के लिए बसंत को भेजा लेकिन शिव की समाधि नहीं टूटी। जब कामदेव सारी कोशिश कर हार गए। तब उन्होंने शिव पर काम के पांच बाण चलाए। क्रोध के कारण शिव का तीसरा नेत्र खुल गया और जैसे ही उन्होंने कामदेव को देखा तो वे जलकर भस्म हो गए। साधारण रूप में देखें तो शिव ईश्वर हैं और बुरे लोगों को अपने तीसरे नेत्र की अग्नि से जलाकर भस्म कर देते है और यदि अलग तरह से देखने का प्रयत्न करें तो शिव का तीसरा नेत्र ज्ञान पुंज है जो अज्ञान का नाश करता है!

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6>कौन हैं शिव

शिव संस्कृत भाषा का शब्द है, जिसका अर्थ है, कल्याणकारी या शुभकारी। यजुर्वेद में शिव को शांतिदाता बताया गया है। 'शि' का अर्थ है, पापों का नाश करने वाला, जबकि 'व' का अर्थ देने वाला यानी दाता।

क्या है शिवलिंग.

शिव की दो काया है। एक वह, जो स्थूल रूप से व्यक्त किया जाए, दूसरी वह, जो सूक्ष्म रूपी अव्यक्त लिंग के रूप में जानी जाती है। शिव की सबसे ज्यादा पूजा लिंग रूपी पत्थर के रूप में ही की जाती है। लिंग शब्द को लेकर बहुत भ्रम होता है। संस्कृत में लिंग का अर्थ है चिह्न। इसी अर्थ में यह शिवलिंग के लिए इस्तेमाल होता है। शिवलिंग का अर्थ है : शिव यानी परमपुरुष का प्रकृति के साथ समन्वित-चिह्न

शिव, शंकर, महादेव...

शिव का नाम शंकर के साथ जोड़ा जाता है लोग कहते हैं - शिव शंकर भोलेनाथ। इस तरह अनजाने ही कई लोग शिव और शंकर को एक ही सत्ता के दो नाम बताते हैं असल में, दोनों की प्रतिमाएं अलग-अलग आकृति की हैं शंकर को हमेशा तपस्वी रूप में दिखाया जाता है कई जगह तो शंकर को शिवलिंग का ध्यान करते हुए दिखाया गया है शिव ने सृष्टि की स्थापना पालना और विनाश के लिए क्रमश: ब्रह्मा, विष्णु और महेश
(महेश भी शंकर का ही नाम है)
नामक तीन सूक्ष्म देवताओं की रचना की है इस तरह शिव ब्रह्मांड के रचयिता हुए और शंकर उनकी एक रचना भगवान शिव को इसीलिए महादेव भी कहा जाता है इसके अलावा शिव को 108 दूसरे नामों से भी जाना और पूजा जाता है

अर्द्धनारीश्वर क्यों..

शिव को अर्द्धनारीश्वर भी कहा गया है, इसका अर्थ यह नहीं है कि शिव आधे पुरुष ही हैं या उनमें संपूर्णता नहीं दरअसल यह शिव ही हैं, जो आधे होते हुए भी पूरे हैं। इस सृष्टि के आधार और रचयिता यानी स्त्री-पुरुष शिव और शक्ति के ही स्वरूप हैं इनके मिलन और सृजन से यह संसार संचालित और संतुलित है दोनों ही एक-दूसरे के पूरक हैं नारी प्रकृति है और नर पुरुष प्रकृति के बिना पुरुष बेकार है और पुरुष के बिना प्रकृति दोनों का अन्योन्याश्रय संबंध है अर्धनारीश्वर शिव इसी पारस्परिकता के प्रतीक हैं आधुनिक समय में स्त्री-पुरुष की बराबरी पर जो इतना जोर है, उसे शिव के इस स्वरूप में बखूबी देखा-समझा जा सकता है। यह बताता है कि शिव जब शक्ति युक्त होता है तभी समर्थ होता है। शक्ति के अभाव में शिव 'शिव' न होकर 'शव' रह जाता है

नीलकंठ क्यों...

अमृत पाने की इच्छा से जब देव-दानव बड़े जोश और वेग से मंथन कर
रहे थे, तभी समुद से कालकूट नामक भयंकर विष निकला उस विष की अग्नि से दसों दिशाएं जलने लगीं समस्त प्राणियों में हाहाकार मच गया। देवताओं और दैत्यों सहित ऋषि, मुनि, मनुष्य, गंधर्व और यक्ष आदि उस विष की गरमी से जलने लगे देवताओं की प्रार्थना पर, भगवान शिव विषपान के लिए तैयार हो गए उन्होंने भयंकर विष को हथेलियों में भरा और भगवान विष्णु का स्मरण कर उसे पी गए भगवान विष्णु अपने भक्तों के संकट हर लेते हैं उन्होंने उस विष को शिवजी के कंठ (गले) में ही रोक कर उसका प्रभाव खत्म कर दिया। विष के कारण भगवान शिव का कंठ नीला पड़ गया और वे संसार में नीलकंठ के नाम से प्रसिद्ध हुए

भोले बाबा

शिव पुराण में एक शिकारी की कथा है एकबार उसे जंगल में देर हो गई तब उसने एक बेल वृक्ष पर रात बिताने का निश्चय किया जगे रहने के लिए उसने एक तरकीब सोची वह सारी रात एक-एक पत्ता तोड़कर नीचे फेंकता रहा कथानुसार, बेल के पत्ते शिव को बहुत प्रिय हैं बेल वृक्ष के ठीक नीचे एक शिवलिंग था
शिवलिंग पर प्रिय पत्तों का अर्पण होते देख शिव प्रसन्न हो उठे, जबकि शिकारी को अपने शुभ काम का अहसास न था उन्होंने शिकारी को दर्शन देकर उसकी मनोकामना पूरी होने का वरदान दिया कथा से यह साफ है कि शिव कितनी आसानी से प्रसन्न हो जाते हैं शिव महिमा की ऐसी कथाओं और बखानों से पुराण भरे पड़े हैं

शिव स्वरूप

भगवान शिव का रूप-स्वरूप जितना विचित्र है, उतना ही आकर्षक भी शिव जो धारण करते हैं, उनके भी बड़े व्यापक अर्थ हैं :

जटाएं :
शिव की जटाएं अंतरिक्ष का प्रतीक हैं

चंद्र :
चंद्रमा मन का प्रतीक है शिव का मन चांद की तरह भोला, निर्मल, उज्ज्वल और जाग्रत है

त्रिनेत्र :
शिव की तीन आंखें हैं इसीलिए इन्हें त्रिलोचन भी कहते हैं। शिव की ये आंखें सत्व, रज, तम (तीन गुणों), भूत, वर्तमान, भविष्य (तीन कालों), स्वर्ग, मृत्यु पाताल (तीनों लोकों) का प्रतीक हैं

सर्पहार :
सर्प जैसा हिंसक जीव शिव के अधीन है। सर्प तमोगुणी व संहारक जीव है, जिसे शिव ने अपने वश में कर रखा है

त्रिशूल :
शिव के हाथ में एक मारक शस्त्र है त्रिशूल भौतिक, दैविक, आध्यात्मिक इन तीनों तापों को नष्ट करता है

डमरू :
शिव के एक हाथ में डमरू है, जिसे वह तांडव नृत्य करते समय बजाते हैं डमरू का नाद ही ब्रह्मा रूप है

मुंडमाला :
शिव के गले में मुंडमाला है, जो इस बात का प्रतीक है कि शिव ने मृत्यु को वश में किया हुआ है

छाल :
शिव ने शरीर पर व्याघ्र चर्म यानी बाघ की खाल पहनी हुई है व्याघ्र हिंसा और अहंकार का प्रतीक माना जाता है इसका अर्थ है कि शिव ने हिंसा और अहंकार का दमन कर उसे अपने नीचे दबा लिया है

भस्म :
शिव के शरीर पर भस्म लगी होती है शिवलिंग का अभिषेक भी भस्म से किया जाता है भस्म का लेप बताता है कि यह संसार नश्वर है

वृषभ :
शिव का वाहन वृषभ यानी बैल है वह हमेशा शिव के साथ रहता है वृषभ धर्म का प्रतीक है महादेव इस चार पैर वाले जानवर की सवारी करते हैं जो बताता है कि धर्म अर्थ कम और मोक्ष उनकी कृपा से ही मिलते है

ओम नमो शिवा


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7>भगवान शिव के ग्यारह रुद्र रूप


शास्त्रों के मुताबिक शिव ग्यारह अलग-अलग रुद्र रूपों में दु:खों का नाश करते हैं। यह ग्यारह रूप एकादश रुद्र के नाम से जाने जाते हैं। लगभग सभी पुराणों में शिव को त्याग, तपस्या, वात्सल्य तथा करुणा की मूर्ति बताया गया है। शिव सहज ही प्रसन्न हो जाने वाले एवं मनोवांछित फल देने वाले हैं। भगवान शिव के अनगिनत रूप हैं, क्योंकि सारी प्रकृति को ही शिव स्वरूप माना गया है। यही कारण है कि शिव को दु:खों को नाश करने वाले देवता के रुप में पूजा जाता है।


1. शम्भू - शास्त्रों के मुताबिक यह रुद्र रूप साक्षात ब्रह्म है। इस रूप में ही वह जगत की रचना, पालन और संहार करते हैं।


2. पिनाकी - ज्ञान शक्ति रुपी चारों वेदों के के स्वरुप माने जाने वाले पिनाकी रुद्र दु:खों का अंत करते हैं।


3. गिरीश - कैलाशवासी होने से रुद्र का तीसरा रुप गिरीश कहलाता है। इस रुप में रुद्र सुख और आनंद देने वाले माने गए हैं।


4. स्थाणु - समाधि, तप और आत्मलीन होने से रुद्र का चौथा अवतार स्थाणु कहलाता है। इस रुप में पार्वती रूप शक्ति बाएं भाग में विराजित होती है।


5. भर्ग - भगवान रुद्र का यह रुप बहुत तेजोमयी है। इस रुप में रुद्र हर भय और पीड़ा का नाश करने वाले होते हैं।


6. भव - रुद्र का भव रुप ज्ञान बल, योग बल और भगवत प्रेम के रुप में सुख देने वाला माना जाता है।


7. सदाशिव - रुद्र का यह स्वरुप निराकार ब्रह्मका साकार रूप माना जाता है। जो सभी वैभव, सुख और आनंद देने वाला माना जाता है।


8. शिव - यह रुद्र रूप अंतहीन सुख देने वाला यानि कल्याण करने वाला माना जाता है। मोक्ष प्राप्ति के लिए शिव आराधना महत्वपूर्ण मानीजाती है।


9. हर - इस रुप में नाग धारण करने वाले रुद्र शारीरिक, मानसिक और सांसारिक दु:खों को हर लेते हैं। नाग रूपी काल पर इन का नियंत्रण होता है।


10. शर्व - काल को भी काबू में रखने वाला यह रुद्र रूप शर्व कहलाता है।


11. कपाली - कपाल रखने के कारण रुद्र का यह रूप कपाली कहलाता है। इस रुप में ही दक्ष का दंभ नष्ट किया, किंतु प्राणीमात्र के लिए रुद्र का यही रूप समस्त सुख देने वाला माना जाता है।

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8>শিবরাত্রি  ব্রত = তথা মহা শিবরাত্রি ব্রত।
                      <--©➽-আদ্যনাথ--->
 ফাল্গুন মাসে  শিবরাত্রি উপলক্ষে সকল শিব মন্দির জেগে ওঠে। গ্রাম গঞ্জে,
শহরের অলিতে গলিতে অজস্র শিবমন্দির জেগে ওঠে। কারণ সকল ব্রতের মধ্যে শিবরাত্রিকেই তো শ্রেষ্ঠ ব্রত বলে গণ্য। 
এই ব্রত পালন করলে সকল মন কামনা পূর্ণ হয়ে যায়।

ব্রতকথা অনুযায়ী, শিবরাত্রি ব্রতের ব্যাখ্যা করেন মহাদেব স্বয়ং। পার্বতী মহাদেবকে জিজ্ঞাসা করেছিলেন, প্রভু, এমন এক সহজ ব্রত বলে দিন, যা সকলেই পালন করে পাপমুক্ত হতে পারে। মহাদেব বললেন, ‘ফাল্গুন মাসের কৃষ্ণপক্ষের চতুর্দশী তিথিতে যে ভয়ানক অন্ধকার রাত্রি হয়, তা-ই শিবরাত্রি। শিবরাত্রিতে যে উপবাস করে, আমি তার উপর খুব সন্তুষ্ট হই।... শিবরাত্রিতে চার প্রহরে চারটি গঙ্গামাটির শিব গড়ে পূজা করবে।... ওই দিন রাত্রি জাগবে...’ পুজোর উপকরণ সরল, বেলপাতা আর গঙ্গাজলই যথেষ্ট। জটিল মন্ত্রতন্ত্র কিছু নেই, দীর্ঘ প্রস্তুতিরও প্রয়োজন নেই। সাধে কি আর সবচেয়ে জনপ্রিয় ব্রত, সহজে পাপমুক্তি আর সপরিবার মঙ্গলের ব্যবস্থা!

 শিবরাত্রির ব্রত স্ত্রী পুরুষ সকলেরই পালনীয় ব্রত । ছেলেরাও শিবরাত্রি করতে পারে এবং করেও। আসলে প্রথম শিবরাত্রি তো করেছিল এক জন পুরুষই! সে গল্পও শুনিয়েছেন শিব। বারাণসীর এক ব্যাধ—পশুহত্যাই তার জীবিকা। পাপের ভারা তাই কানায় কানায় পূর্ণ। সারা দিন শিকারের পর ক্লান্তিতে গাছতলায় ঘুমিয়ে পড়েছিল, সন্ধে হয়ে যাওয়ায় বাড়ি যেতে পারবে না ভেবে সে গাছের ডালেই রাতটা কাটিয়ে দেয়। গাছটা ছিল বেলগাছ, আর তলায় ছিল একটা শিবলিঙ্গ। ব্যাধের গায়ে লেগে একটা বেলপাতা শিশিরের জলের সঙ্গে মিশে শিবের মাথায় পড়ল। সেটা ছিল শিবরাত্রি, আর ব্যাধও ছিল উপবাসী। পর দিন বাড়ি ফিরে স্নান করে সে দেখে, এক অতিথি উপস্থিত। তাঁকে খাইয়ে তার পরেই ব্যাধ নিজে খেয়েছিল। ফলে তার ব্রত পালন ঠিকমতই সম্পন্ন হল। ব্যাধ মারা যাওয়ার পর শিবদূত আর যমদূতদের মধ্যে মারামারি লেগে গেল তাকে নিয়ে যাওয়ার জন্য। শেষে শিবের দূতেরাই জয়ী হল, আর যমরাজও স্বীকার করলেন, শিবচতুর্দশী করলে তার উপর আর যমের অধিকার থাকবে না। মানুষকে পাপ থেকে উদ্ধারের এটাই একমাত্র উপায়, পার্বতীকে জানালেন শিব।

সত্যি, শিব তো আশুতোষ, খুব সহজেই তাঁর মন পাওয়া যায়। 
ব্রহ্মা বিষ্ণু মহেশ্বরকে সৃষ্টি স্থিতি প্রলয়ের দেবতা বলে সাধারণ ভাবে চিহ্নিত করা হলেও, শিবভক্তরা শিবকেই সব কিছুর স্রষ্টা ও সংহারকর্তা বলে মানেন। পৌরাণিক নানা কাহিনিতে ব্রহ্মা ও বিষ্ণুর থেকে শিবের শ্রেষ্ঠত্ব প্রমাণ করা হয়েছে। সব থেকে পরিচিত বোধহয় সেই স্তম্ভরূপী শিবের গল্প, যেখানে হংসের রূপ নিয়ে ব্রহ্মা স্তম্ভের শীর্ষ আর বরাহের রূপ নিয়ে বিষ্ণু তার তলদেশ নির্ণয়ের চেষ্টা করে ব্যর্থ হন, ব্রহ্মা আবার মিথ্যে করে বলেন, তিনি শীর্ষদেশ দেখতে পেয়েছেন, তাতে শিব অভিশাপ দেন— ভারতে আর ব্রহ্মার পূজা হবে না। শেষে ব্রহ্মা বিষ্ণু দুজনেই শিবকে স্রষ্টা হিসেবে মেনে নেন। শিবের লিঙ্গপূজা প্রচলনের গল্প আছে ‘কূর্মপুরাণ’-এ। দেবদারু বনে তপস্যারত মুনিঋষিরা ছদ্মবেশী শিব আর বিষ্ণুকে চিনতে পারেননি, নানা ঘটনার পর প্রকৃত রূপ দেখে তাঁর বন্দনা করেন এবং লিঙ্গপূজা প্রচলিত হয়। ব্রাহ্মণ্য পরিমণ্ডলে নিজের জায়গা করে নিতে ভূতপ্রেত নিয়ে দক্ষযজ্ঞ পণ্ড করতে হয়েছিল শিবকে, নাচতে হয়েছিল প্রলয়নাচন। কিন্তু সব কিছু সত্ত্বেও শিবের মধ্যে সেই দ্বৈত সত্তাই থেকে গিয়েছে— এক দিকে তিনি শ্মশানের দেবতা, ভূতপ্রেত তাঁর অনুচর, কাপালিকরা তাঁর সাধক; অন্য দিকে তিনি কৈলাসে পার্বতী কার্তিক গণেশকে নিয়ে ঘোর সংসারী। আর এই সংসারী, সহজে সন্তুষ্ট, আলাভোলা শিবকে কাছের করে নিতে মধ্যযুগের বাঙালির কোনও অসুবিধেই হয়নি।

পালরাজাদের লিপি থেকে বেশ কিছু শিবমন্দির তৈরির কথা জানা যায়। 
প্রাচীন পাশুপত সম্প্রদায়ের শৈবদের 
জন্য রাজানুগ্রহের কথাও আছে সেখানে। সুন্দরবনে জটার দেউল, বর্ধমানের রাঢ়েশ্বর, বাঁকুড়ার এক্তেশ্বর ষাঁড়েশ্বর শৈলেশ্বর-এর মতো আটশো-হাজার বছরের শিবমন্দির টিকে আছে এখনও। পাল-সেন যুগের বাংলায় শিবের যে সব মূর্তির সন্ধান পাওয়া গিয়েছে, তার মধ্যে লিঙ্গমূর্তি বাদ দিলে শিব-পার্বতীর মূর্তি, বিশেষত উমা-মহেশ্বরের সংখ্যা খুবই বেশি। অর্থাৎ বাঙালি মননে একক শিব নয়, হরগৌরীর কল্পনাই প্রাধান্য পেয়েছে। শিব ও শক্তির এই সব যুগ্মমূর্তির পিছনে 
 তন্ত্রচর্চার প্রভাব ছিল।সে যাই হোক, শিব ও পার্বতীর পারিবারিক রূপ যে ভাবে পরে বাঙালির সমাজ সংস্কৃতির অবিচ্ছেদ্য অঙ্গ হয়ে উঠল, তার সূত্র কিছুটা হলেও যে এর মধ্যে থেকে গিয়েছে, সন্দেহ নেই।

একসময়  চৈতন্যের বৈষ্ণবধর্ম যেমন বিষ্ণুপুরের মল্লরাজাদের আনুকূল্য নিয়ে সবাইকে টানল, তেমনই শিবের মাহাত্ম্য সবার মন জয় করে নিল। বাংলার প্রতি গ্রামে গড়ে উঠল ছোটবড় শিবমন্দির, পূজার চল হল লিঙ্গমূর্তিতে। দ্বাদশ শিব, ১০৮ শিবমন্দির তৈরি করে অভিজাতরাও পুণ্যের ভাগ নিতে এগিয়ে এলেন।
 এমনি করে ঘরের অন্দরমহলে ব্রতকথার 
মাধ্যমে শিবের পূজা শুরু হল  ঘরের অন্দরমহলে। 
কৃষিজীবী সমাজের প্রাত্যহিক যাপনেও মিশে গেল শিবের উৎসব— সারা বাংলা জুড়ে আজও চৈত্র-বৈশাখে ‘গাজন’ হয়, যে নাম নাকি এসেছে শিববিবাহের এই লৌকিক উৎসবে সমবেত মানুষের 
"গর্জন" থেকে। রাঢ়ের সব থেকে বড় লোক-উৎসব এই "গাজন", 
উত্তরবঙ্গে আবার তারই নাম গম্ভীরা। গাজনের গানে লৌকিক শিবের কত না কীর্তিকলাপ— চাষবাস শুরুর গল্প বোধহয় সব থেকে আগ্রহ জাগায়। ‘শিবায়ন’ কাব্যেও আছে এমন গল্প। পার্বতীর পরামর্শে শিব চাষ করবার  মনস্থির করলেন। কিন্তু চাষ করার মতন জমি কোথায় ? তখন ইন্দ্রের কাছে শিব জমি চাইলেন। ইন্দ্র আদিগন্ত পতিত জমি দিলেন চাষের জন্য। যম দিলেন তাঁর মহিষ, শিবের ষাঁড় আর যমের মহিষ হাল চষবে। বিশ্বকর্মা চাষের যন্ত্রপাতি বানালেন, বীজ দিলেন কুবের। হাল চষার জন্য এগিয়ে এলেন ভীম, দশমনি কাস্তে দিয়ে ফসলও কাটলেন। ধান হল মাত্র দু’হাল। শিব বললেন, ধান পুড়িয়ে দাও। ভীম ধানে আগুন দিয়ে ফুঁ দিলেন— ধান পুড়তে লাগল, পুড়তেই লাগল। এ থেকেই তৈরি হল নানা রঙের ধান এবং নানান ধরনের  ধানের বীজ। 
অর্থাৎ  শিবরাত্রির ব্রত শুধু  শিবের মাথায় জল ঢেলে ভাল বর চাওয়া নয়, শিবের মহিমা মধ্যযুগ থেকে আজ পর্যন্ত অনেকটাই ব্যাপক। গবেষকদের মতে, বাংলায় এর উৎস আরও দূর অতীতে। 
সেই কারণেই শিবরাত্রির ব্রত কতার মাহত্য অনেক। যা বলে বা লিখে শেষ করা অসম্ভব।
 <--©➽-আদ্যনাথ রায় চৌধুরী--->
  11/03/2021;; 08:20:12 pm
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Friday, February 19, 2016

5>|| शिव के 19 अवतारों* ==>( 1 to 11 )

 5>|| शिव के 19 अवतारों***(1 to 11 )

1>----------------दिसंबर शुक्रवार को पूर्णिमा है।
2>----------------भगवान शिव के 19 अवतारों मे से भिक्षुवर्य अवतार:-
3>----------------सोमवार ही शिव का दिन क्यों?
4>----------------भगवान शिव की अर्ध परिक्रमा क्यों.. ??
5>----------------वाह भोले तेरी महिमा कोई न जाने आपका प्रेम भी अदभुत है
6>----------------जानिए भगवान शिव जी के 108 नाम – संस्कृति।
7>----------------जानिए शिवलिंग पर क्यों नहीं चढ़ाते शंख से जल।
8>----------------जानिए अमरनाथ गुफा के अद्भुत रहस्य।
9>----------------बाबा बर्फानी =बाबा बर्फानी नहीं अमरनाथ बाबा कहो,  ( a to d ) 
10>---------------अमरनाथ
11>----------------द्वादश ज्योतिर्लिंग


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ॐ नमोः शिबाय
1> दिसंबर शुक्रवार को पूर्णिमा है।
पूर्णिमा के दिन शिवलिंग पर शहद, कच्चा दूध, बेलपत्र, शमीपत्र और फल चढ़ाने से भगवान शिव की जातक पर सदैव कृपा बनी रहती है, आर्थिक संकट दूर होते है ।
 पूर्णिमा के दिन घिसे हुए सफ़ेद चंदन में केसर मिलाकर भगवान शंकर को अर्पित करने से घर से कलह और अशांति दूर होती है।
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2>भगवान शिव के 19 अवतारों मे से भिक्षुवर्य अवतार:-

भगवान शिव के 19 अवतारों मे से
"भगवान् शिव का चौदहवाँ अवतार  "भिक्षुवर्य अवतार:-
भगवान शंकर देवों के देव हैं।
संसार में जन्म लेने वाले हर प्राणी के जीवन के रक्षक भी हैं।
भगवान शंकर का भिक्षुवर्य अवतार यही संदेश देता है।
धर्म ग्रंथों के अनुसार विदर्भ नरेश सत्यरथ को शत्रुओं ने मार डाला।
उसकी गर्भवती पत्नी ने शत्रुओं से छिपकर अपने प्राण बचाए।
समय आने पर उसने एक पुत्र को जन्म दिया।
रानी जब जल पीने के लिए सरोवर गई तो उसे घडिय़ाल ने अपना आहार बना लिया।
तब वह बालक भूख-प्यास से तड़पने लगा।
इतने में ही शिवजी की प्रेरणा से एक भिखारिन वहां पहुंची।
तब शिवजी ने भिक्षुक का रूप धर उस भिखारिन को बालक का परिचय दिया और उसके पालन-पोषण का निर्देश दिया तथा यह भी कहा कि यह बालक विदर्भ नरेश सत्यरथ का पुत्र है।
यह सब कह कर भिक्षुक रूपधारी शिव ने उस भिखारिन को अपना वास्तविक रूप दिखाया।
शिव के आदेश अनुसार भिखारिन ने उस बालक का पालन-पोषण किया।
बड़ा होकर उस बालक ने शिवजी की कृपा से अपने दुश्मनों को हराकर पुन: अपना राज्य प्राप्त किया।
।।हर हर महादेव ।।
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3>सोमवार ही शिव का दिन क्यों?

सनातन धर्म में हर दिवस का संबंध किसी न किसी देवता से है। रविवार को भगवान भास्कर की उपासना की जाती है। मंगलवार को भगवान् मारूतिनन्दन का दिन माना जाता है। कहीं कहीं इसे मंगलमूर्ति गणपति का भी दिवस मानते हैं। बुधवार को बुध की पूजा का विधान है क्योंकि यह शांति का दिवस है। बृहस्पतिवार को कदली वृक्ष में गुरु की पूजा की जाती है। शुक्रवार भगवती संतोषी का दिवस प्रसिद्ध है तो शनिवार को महाकाल रूप भैरव एवं महाकाली की सपर्या संपन्न की जाती है। ठीक ऐसे ही भगवान् शंकर सोमवार को सबसे ज्यादा पूजे जाते हैं। हर सनातनधर्मी का आग्रह होता है कि और किसी दिन शिव मंदिर जाएँ या न जाएँ लेकिन सोमवार को दर्शन अवश्य करेंगे। आखिर ऐसा क्यों? शिव के लिए सोमवार का आग्रह ही क्यों? आईए! इस पर कुछ विचार करें।

सबसे पहले दिनों की उत्पत्ति के सन्दर्भ में विचार करते हैं। वास्तव में ये सारे दिवस भगवान् शंकर से ही प्रकट माने जाते हैं। शिव-महापुराण के अनुसार प्राणियों की आयु का निर्धारण करने के लिए भगवान् शंकर ने काल की कल्पना की। उसी से ही ब्रह्मा से लेकर अत्यन्त छोटे जीवों तक की आयुष्य का अनुमान लगाया जाता है। उस काल को ही व्यवस्थित करने के लिए महाकाल ने सप्तवारों की कल्पना की। सबसे पहले ज्योतिस्वरूप सूर्य के रूप में प्रकट होकर आरोग्य के लिए प्रथमवार की कल्पना की-

संसारवैद्यः सर्वज्ञः सर्वभेषजभेषजम्।
आय्वारोग्यदं वारं स्ववारं कृतवान्प्रभुः॥

अपनी सर्वसौभाग्यदात्री शक्ति के लिए द्वितीयवार की कल्पना की। उसके बाद अपने ज्येष्ठ पुत्र कुमार के लिए अत्यन्त सुन्दर तृतीयवार की कल्पना की। तदनन्तर सर्वलोकों की रक्षा का भार वहन करने वाले परम मित्र मुरारी के लिए चतुर्थवार की कल्पना की। देवगुरु के नाम से पञ्चमवार की कल्पना कर उसका स्वामी यम को बना दिया। असुरगुरु के नाम से छठे वार की कल्पना करके उसका स्वामी ब्रह्मा को बना दिया एवं सप्तमवार की कल्पना कर उसका स्वामी इंद्र को बना दिया। नक्षत्र चक्र में सात मूल ग्रह ही दृष्टिगोचर होते हैं, इसलिए भगवान् ने सूर्य से लेकर शनि तक के लिए सातवारों की कल्पना की। राहु और केतु छाया ग्रह होने के कारण दृष्टिगत न होने से उनके वार की कल्पना नहीं की गई।

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4>भगवान शिव की अर्ध परिक्रमा क्यों.. ??
शिवजी की आधी परिक्रमा करने का विधान है। वह इसलिए की शिव के सोमसूत्र को लांघा नहीं जाता है। जब व्यक्ति आधी परिक्रमा करता है तो उसे चंद्राकार परिक्रमा कहते हैं। शिवलिंग को ज्योति माना गया है और उसके आसपास के क्षेत्र को चंद्र। आपने आसमान में अर्ध चंद्र के ऊपर एक शुक्र तारा देखा होगा। यह शिवलिंग उसका ही प्रतीक नहीं है बल्कि संपूर्ण ब्रह्मांड ज्योतिर्लिंग के ही समान है।

''अर्द्ध सोमसूत्रांतमित्यर्थ: शिव प्रदक्षिणीकुर्वन सोमसूत्र न लंघयेत ।।
इति वाचनान्तरात।''
सोमसूत्र :
शिवलिंग की निर्मली को सोमसूत्र की कहा जाता है। शास्त्र का आदेश है कि शंकर भगवान की प्रदक्षिणा में सोमसूत्र का उल्लंघन नहीं करना चाहिए, अन्यथा दोष लगता है। सोमसूत्र की व्याख्या करते हुए बताया गया है कि भगवान को चढ़ाया गया जल जिस ओर से गिरता है, वहीं सोमसूत्र का स्थान होता है।
क्यों नहीं लांघते सोमसूत्र :
सोमसूत्र में शक्ति-स्रोत होता है अत: उसे लांघते समय पैर फैलाते हैं और वीर्य ‍निर्मित और 5 अन्तस्थ वायु के प्रवाह पर विपरीत प्रभाव पड़ता है। इससे देवदत्त और धनंजय वायु के प्रवाह में रुकावट पैदा हो जाती है। जिससे शरीर और मन पर बुरा असर पड़ता है। अत: शिव की अर्ध चंद्राकार प्रदशिक्षा ही करने का शास्त्र का आदेश है।
तब लांघ सकते हैं :
शास्त्रों में अन्य स्थानों पर मिलता है कि तृण, काष्ठ, पत्ता, पत्थर, ईंट आदि से ढके हुए सोम सूत्र का उल्लंघन करने से दोष नहीं लगता है,
लेकिन
‘शिवस्यार्ध प्रदक्षिणा’
का मतलब शिव की आधी ही प्रदक्षिणा करनी चाहिए।
किस ओर से परिक्रमा : भगवान शिवलिंग की परिक्रमा हमेशा बांई ओर से शुरू कर जलाधारी के आगे निकले हुए भाग यानी जल स्रोत तक जाकर फिर विपरीत दिशा में लौटकर दूसरे सिरे तक आकर परिक्रमा पूरी करें।
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5>वाह भोले तेरी महिमा कोई न जाने
आपका प्रेम भी अदभुत है 

एक गाँव के बाहर बने शिवमंदिर मे चार पाँच गजेडी रोज गाँजा पीते थे , पिछले कइ साल से
जब भी वो गाँजा पीते थे तब "बम भोले" का जयकारा करते थे चिल्लम की हर फुँक के साथ,
एक दिन खुद शिव जी उनके इस भग्ति माध्यम से प्रसन्न हो गये, वो एक साधारण मनुष्य के रूप मे उन गजेडीयो के पास आ कर बैठ गये, गजेडीयो ने चिल्लम बनाना शुरू किया तो एक
गजेडी ने शिव जी को गाजा आफर किया, प्रायः गजेडीयो मे मेहमानवाजी बडे उच्च स्तर
की होती है इसलिए गजेडीयो ने पहला चिल्लम भोलेनाथ को ही दिया, एक फुँक मे ही शिव ने पुरा चिल्लम खाली कर दिया , गजेडीयो को लग गया कि ये कोइ उच्च कोटी का पीने वाला है , फिर भी उन्होने दुसरा चिल्लम बनाया और फिर पहला मौका भोलेनाथ को दिया शिव ने फिर एक फुँक मे ही पुरा चिल्लम खाली कर दिया, हर फुक के बाद एक गजेडी , भोलेनाथ से पुछता " नशा आया ? जवाब मे शिव केवल मुस्कुरा के ना मे सर हिला देते, ऍसे कर के जब पाँच चिल्लम खाली हो गये तो गजेडी आखीरी चिल्लम भरने लगे तभी उनमे से एक गजेडी ने पुछा " क्यो अभी भी नशा नही हुआ ? तब शिव ने कहा " जानते हो मै कौन हुँ ! कौन हो भाऊ !

शिव " मै इस ससांर का सहाँरक , सभी भुत प्रेत यक्ष असुर गंधर्व का स्वामी , ब्रम्हाड का
आदिवासी हिमालय का निवासी हुँ , आदि अंत प्रारंभ ,नाश और नशा सब की सीमा मुझसे
प्रारंभ होती है मुझपर खत्म , शकंर नाम है मेरा , जिसको तुम लोग रोज याद करते हो "
गजेडी जोर से चिल्लाया " अब इसको चिल्लम मत देना बे , गाँजा चढ गया इसको
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6> जानिए भगवान शिव जी के 108 नाम – संस्कृति।

सनातन धर्म में भगवान को कई नामों से जाना जाता है। वस्तुत: यह नाम देवताओं और महान श्रषियों द्वारा भगवान की स्तुति करने पर प्रकट होते हैं। भगवान शिव जी को भी कई नामों से जाना जाता है, पर सनातन धर्म से 108 नामों का अलग ही महत्व होता है।
पढ़िए उनमे से उनके मुख्य 108 नाम। भगवान शिव नामावली

1. शिव – कल्याण स्वरूप - - - - - - - - - - - - - - - - - - - -- 2. महेश्वर – माया के अधीश्वर
3. शम्भू – आनंद स्स्वरूप वाले - -- - - - - - - - - - - - - - -- 4. पिनाकी – पिनाक धनुष धारण करने वाले
5. शशिशेखर – सिर पर चंद्रमा धारण करने वाले - - - -- - - 6. वामदेव – अत्यंत सुंदर स्वरूप वाले
7. विरूपाक्ष – भौंडी आँख वाले -- -- - - - - - - - - - - - - - - 8. कपर्दी – जटाजूट धारण करने वाले
9. नीललोहित – नीले और लाल रंग वाले - - - - - - - - - -10. शंकर – सबका कल्याण करने वाले
11. शूलपाणी – हाथ में त्रिशूल धारण करने वाले - - - - - 12. खटवांगी – खटिया का एक पाया रखने वाले
13. विष्णुवल्लभ – भगवान विष्णु के अतिप्रेमी - - - - - - 14. शिपिविष्ट – सितुहा में प्रवेश करने वाले
15. अंबिकानाथ – भगवति के पति - - - - - - - - - - - 16. श्रीकण्ठ – सुंदर कण्ठ वाले
17. भक्तवत्सल – भक्तों को अत्यंत स्नेह करने वाले - - --18. भव – संसार के रूप में प्रकट होने वाले
19. शर्व – कष्टों को नष्ट करने वाले - - - - - - - - - - - 20. त्रिलोकेश – तीनों लोकों के स्वामी
21. शितिकण्ठ – सफेद कण्ठ वाले -- - - - - - - - - - -22. शिवाप्रिय – पार्वती के प्रिय
23. उग्र – अत्यंत उग्र रूप वाले - - - - - - - - - - - - 24. कपाली – कपाल धारण करने वाले
25. कामारी – कामदेव के शत्रु - - - - - - - - - - - - - -26. अंधकारसुरसूदन – अंधक दैत्य को मारने वाले
27. गंगाधर – गंगा जी को धारण करने वाले-- - - - - - - -28. ललाटाक्ष – ललाट में आँख वाले
29. कालकाल – काल के भी काल- - - - - - - - - - - - 30. कृपानिधि – करूणा की खान
31. भीम – भयंकर रूप वाले----------------------------------32. परशुहस्त – हाथ में फरसा धारण करने वाले
33. मृगपाणी – हाथ में हिरण धारण करने वाले--------------34. जटाधर – जटा रखने वाले
35. कैलाशवासी – कैलाश के निवासी-------------------------36. कवची – कवच धारण करने वाले
37. कठोर – अत्यन्त मजबूत देह वाले------------------------38. त्रिपुरांतक – त्रिपुरासुर को मारने वाले
39. वृषांक – बैल के चिह्न वाली झंडा वाले--------------------40. वृषभारूढ़ – बैल की सवारी वाले
41. भस्मोद्धूलितविग्रह – सारे शरीर में भस्म लगाने वाले---42. सामप्रिय – सामगान से प्रेम करने वाले
43. स्वरमयी – सातों स्वरों में निवास करने वाले--------------44. त्रयीमूर्ति – वेदरूपी विग्रह करने वाले
45. अनीश्वर – जिसका और कोई मालिक नहीं है-------------46. सर्वज्ञ – सब कुछ जानने वाले
47. परमात्मा – सबका अपना आपा----------------------------48. सोमसूर्याग्निलोचन – चंद्र, सूर्य और अग्निरूपी
                                                                                                 आँख वाले
49. हवि – आहूति रूपी द्रव्य वाले------------------------------50. यज्ञमय – यज्ञस्वरूप वाले
51. सोम – उमा के सहित रूप वाले-----------------------------52. पंचवक्त्र – पांच मुख वाले
53. सदाशिव – नित्य कल्याण रूप वाले-------------------------54. विश्वेश्वर – सारे विश्व के ईश्वर
55. वीरभद्र – बहादुर होते हुए भी शांत रूप वाले---------------56. गणनाथ – गणों के स्वामी
57. प्रजापति – प्रजाओं का पालन करने वाले--------------------58. हिरण्यरेता – स्वर्ण तेज वाले
59. दुर्धुर्ष – किसी से नहीं दबने वाले-------------------------------60. गिरीश – पहाड़ों के मालिक
61. गिरिश – कैलाश पर्वत पर सोने वाले-------------------------62. अनघ – पापरहित
63. भुजंगभूषण – साँप के आभूषण वाले-------------------------64. भर्ग – पापों को भूंज देने वाले
65. गिरिधन्वा – मेरू पर्वत को धनुष बनाने वाले-----------------66. गिरिप्रिय – पर्वत प्रेमी
67. कृत्तिवासा – गजचर्म पहनने वाले-----------------------------68. पुराराति – पुरों का नाश करने वाले
69. भगवान् – सर्वसमर्थ षड्ऐश्वर्य संपन्न--------------------------70. प्रमथाधिप – प्रमथगणों के अधिपति
71. मृत्युंजय – मृत्यु को जीतने वाले-------------------------------72. सूक्ष्मतनु – सूक्ष्म शरीर वाले
73. जगद्व्यापी – जगत् में व्याप्त होकर रहने वाले----------------74. जगद्गुरू – जगत् के गुरू
75. व्योमकेश – आकाश रूपी बाल वाले-------------------------76. महासेनजनक – कार्तिकेय के पिता
77. चारुविक्रम – सुन्दर पराक्रम वाले----------------------------78. रूद्र – भक्तों के दुख देखकर रोने वाले
79. भूतपति – भूतप्रेत या पंचभूतों के स्वामी----------------------80. स्थाणु – स्पंदन रहित कूटस्थ रूप वाले
81. अहिर्बुध्न्य – कुण्डलिनी को धारण करने वाले----------------82. दिगम्बर – नग्न, आकाशरूपी वस्त्र वाले
83. अष्टमूर्ति – आठ रूप वाले-----------------------------------84. अनेकात्मा – अनेक रूप धारण करने वाले
85. सात्त्विक – सत्व गुण वाले------------------------------------86. शुद्धविग्रह – शुद्धमूर्ति वाले
87. शाश्वत – नित्य रहने वाले- - - - - - - - - - - - - - - - - - - - -88. खण्डपरशु – टूटा हुआ फरसा धारण करने                                                                                                         वाले
89. अज – जन्म रहित- - - - - - - -- - - - - - - - - - - - - - - - - 90. पाशविमोचन – बंधन से छुड़ाने वाले
91. मृड – सुखस्वरूप वाले- - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - 92. पशुपति – पशुओं के मालिक
93. देव – स्वयं प्रकाश रूप- - -- - -- - - - - - - - - - - - - - - --94. महादेव – देवों के भी देव
95. अव्यय – खर्च होने पर भी न घटने वाले- - - - - - - - - - - 96. हरि – विष्णुस्वरूप
97. पूषदन्तभित् – पूषा के दांत उखाड़ने वाले- - -- - - - - - - 98. अव्यग्र – कभी भी व्यथित न होने वाले
99. दक्षाध्वरहर – दक्ष के यज्ञ को नष्ट करने वाले- - - - - - - -100. हर – पापों व तापों को हरने वाल
101. भगनेत्रभिद् – भग देवता की आंख फोड़ने वाले- - - - -102. अव्यक्त – इंद्रियों के सामने प्रकट न होने वाले
103. सहस्राक्ष – अनंत आँख वाले- -- - - - - - - - - - - - - - --104. सहस्रपाद – अनंत पैर वाले
105. अपवर्गप्रद – कैवल्य मोक्ष देने वाले- - - - - - - - - - - - 106. अनंत – देशकालवस्तुरूपी परिछेद से रहित
107. तारक – सबको तारने वाला- - - - - - - - - - - - - - - - - -108. परमेश्वर – सबसे परे ईश्वर
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7>जानिए शिवलिंग पर क्यों नहीं चढ़ाते शंख से जल।

शिवलिंग भगवान शिव का ही एक रूप है यह रुप हमें परमपिता परमात्मा शिव के निराकार स्वरुप को दर्शाता है। माना जाता है कि शिवलिंग ही उस निराकार ज्योतिर्मय स्वरुप का प्रतीक है। शिवलिंग का रोज अभिषेक होता है हमारे देश में 12 शिवलिंग के मंदिर हैं , इनमें रोज शिवलिंग को जल चढ़ाया जाता है पर शंख से नहीं चढ़ाया जाता है, आखिर क्यों?

हम सब जानते है की पूजन कार्य में शंख का उपयोग महत्वपूर्ण होता है। लगभग सभी देवी-देवताओं को शंख से जल चढ़ाया जाता है लेकिन शिवलिंग पर शंख से जल चढ़ाना वर्जित माना गया है। आखिर क्यों शिवजी को शंख से जल अर्पित नहीं करते है ? इस संबंध में शिवपुराण में एक कथा बताई गई है।

शिवपुराण की कथा
शिवपुराण के अनुसार शंखचूड नाम का महापराक्रमी दैत्य हुआ। शंखचूड दैत्यराम दंभ का पुत्र था। दैत्यराज दंभ को जब बहुत समय तक कोई संतान उत्पन्न नहीं हुई तब उसने भगवान विष्णु के लिए कठिन तपस्या की। तप से प्रसन्न होकर विष्णु प्रकट हुए। विष्णुजी ने वर मांगने के लिए कहा तब दंभ ने तीनों लोको के लिए अजेय एक महापराक्रमी पुत्र का वर मांगा। श्रीहरि तथास्तु बोलकर अंतध्र्यान हो गए। तब दंभ के यहां एक पुत्र का जन्म हुआ जिसका नाम शंखचूड़ पड़ा। शंखचुड ने पुष्कर में ब्रह्माजी के निमित्त घोर तपस्या की और उन्हें प्रसन्न कर लिया। ब्रह्मा ने वर मांगने के लिए कहा तब शंखचूड ने वर मांगा कि वो देवताओं के लिए अजेय हो जाए। ब्रह्माजी ने तथास्तु बोला और उसे श्रीकृष्णकवच दिया। साथ ही ब्रह्मा ने शंखचूड को धर्मध्वज की कन्या तुलसी से विवाह करने की आज्ञा दी। फिर वे अंतध्र्यान हो गए।

ब्रह्मा की आज्ञा से तुलसी और शंखचूड का विवाह हो गया। ब्रह्मा और विष्णु के वरदान के मद में चूर दैत्यराज शंखचूड ने तीनों लोकों पर स्वामित्व स्थापित कर लिया। देवताओं ने त्रस्त होकर विष्णु से मदद मांगी परंतु उन्होंने खुद दंभ को ऐसे पुत्र का वरदान दिया था अत: उन्होंने शिव से प्रार्थना की। तब शिव ने देवताओं के दुख दूर करने का निश्चय किया और वे चल दिए। परंतु श्रीकृष्ण कवच और तुलसी के पतिव्रत धर्म की वजह से शिवजी भी उसका वध करने में सफल नहीं हो पा रहे थे तब विष्णु ने ब्राह्मण रूप बनाकर दैत्यराज से उसका श्रीकृष्णकवच दान में ले लिया। इसके बाद शंखचूड़ का रूप धारण कर तुलसी के शील का हरण कर लिया। अब शिव ने शंखचूड़ को अपने त्रिशुल से भस्म कर दिया और उसकी हड्डियों से शंख का जन्म हुआ। चूंकि शंखचूड़ विष्णु भक्त था अत: लक्ष्मी-विष्णु को शंख का जल अति प्रिय है और सभी देवताओं को शंख से जल चढ़ाने का विधान है। परंतु शिव ने चूंकि उसका वध किया था अत: शंख का जल शिव को निषेध बताया गया है। इसी वजह से शिवजी को शंख से जल नहीं चढ़ाया जाता है। साभार -अजबगजब.काम
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8>जानिए अमरनाथ गुफा के अद्भुत रहस्य।

अमरनाथ गुफा भगवान शिव से संबधिंत है। अमरनाथ गुफा में भगवान शिव का हर वर्ष प्राकृतिक शिव लिंग बनता है जिसके दर्शन के लिए भारत ही नहीं समुचे विश्व से लोग आते हैं। जानिए इस गुफा से के सबसे अद्भुत औऱ अनजाने रहस्य।।
शास्त्रों में जगह-जगह पर भगवान शिव के महात्म्य का वर्णन मिलता है। ऋग्वेद में भी शिवजी का गुणगान मिलता है। श्री अमरनाथ धाम एक ऐसा शिव धाम है जिसके संबंध में मान्यता है कि भगवान शिव साक्षात श्री अमरनाथ गुफा में विराजमान रहते हैं।

बाबा बर्फानी से जुडे हैरान कर देने वाले तथ्य –
धार्मिक व ऐतिहासिक दृष्टी से अति महत्वपूर्ण श्री अमरनाथ यात्रा को कुछ शिव भक्त स्वर्ग की प्राप्ति का माध्यम बताते हैं तो कुछ लोग मोक्ष प्राप्ति का। श्री अमरनाथ यात्रा हमारी एकता का भी प्रतीक माना जता है। पावन गुफा में बर्फीली बूंदों से बनने वाला हिमशिवलिंग ऐसा दैवी चमत्कार है जिसे देखने के लिए हर कोई लालायित रहता है और जो देख लेता है वो धन्य हो जाता है।
भारत के कोने-कोने से और विदेशों से असंख्य शिव भक्त लगभग 14 हजार फुट की ऊंचाई पर स्थित श्री अमरनाथ की गुफा में प्रकृति के इस चमत्कार के दर्शन करने के लिए अनेकों बाधाएं पार करके भी पहुंचते हैं। श्री अमरनाथ गुफा में स्थित पार्वती पीठ 51 शक्तिपीठों में से एक है। मान्यता है कि यहां भगवती सती का कंठ भाग गिरा था।
कश्मीर घाटी में स्थित पावन श्री अमरनाथ गुफा प्राकृतिक है। यह पावन गुफा लगभग 160 फुट लम्बी, 100 फुट चौड़ी और काफी ऊंची है। कश्मीर में वैसे तो 45 शिव धाम, 60 विष्णु धाम, 3 ब्रह्मा धाम, 22 शक्ति धाम, 700 नाग धाम तथा असंख्य तीर्थ हैं पर श्री अमरनाथ धाम का सबसे अधिक महत्व है।

काशी में लिंग दर्शन एवं पूजन से दस गुणा, प्रयाग से सौ गुणा, नैमिषारण्य तथा कुरुक्षेत्र से हजार गुणा फल देने वाला श्री अमरनाथ स्वामी का पूजन है। देवताओं की हजार वर्ष तक स्वर्ण पुष्प मोती एवं पट्टआ वस्त्रों से पूजा का जो फल मिलता है, वह श्री अमरनाथ की रसलिंग पूजा से एक ही दिन में प्राप्त हो जाता है।

श्री अमरनाथ गुफा में शिव भक्त प्राकृतिक हिमशिवलिंग के साथ-साथ बर्फ से ही बनने वाले प्राकृतिक शेषनाग, श्री गणेश पीठ व माता पार्वती पीठ के भी दर्शन करते हैं। प्राकृतिक रूप से प्रति वर्ष बनने वाले हिमशिवलिंग में इतनी अधिक चमक विद्यमान होती है कि देखने वालों की आंखों को चकाचौंध कर देती है।

हिमशिवलिंग पक्की बर्फ का बनता है जबकि गुफा के बाहर मीलों तक सर्वत्र कच्ची बर्फ ही देखने को मिलती है। मान्यता यह भी है कि गुफा के ऊपर पर्वत पर श्री राम कुंड है। भगवान शिव ने माता पार्वती को सृष्टिआ की रचना इसी अमरनाथ गुफा में सुनाई थी।

गुफा की खोज –
इस गुफा की खोज बूटा मलिक नामक एक बहुत ही नेक और दयालु एक मुसलमान गडरिए ने की थी। वह एक दिन भेड़ें चराते-चराते बहुत दूर निकल गया। एक जंगल में पहुंचकर उसकी एक साधू से भेंट हो गई। साधू ने बूटा मलिक को कोयले से भरी एक कांगड़ी दे दी। घर पहुंचकर उसने कोयले की जगह सोना पाया तो वह बहुत हैरान हुआ। उसी समय वह साधू का धन्यवाद करने के लिए गया परन्तु वहां साधू को न पाकर एक विशाल गुफा को देखा। उसी दिन से यह स्थान एक तीर्थ बन गया।
एक बार देवर्षि नारद कैलाश पर्वत पर भगवान शंकर के दर्शनार्थ पधारे। भगवान शंकर उस समय वन विहार को गए हुए थे और पार्वती जी वहां विराजमान थीं। पार्वती जी ने देवर्षि के आने का कारण पूछा तो उन्होंने कहा-देवी! भगवान शंकर, जो हम दोनों से बड़े हैं, के गले में मुंडमाला क्यों है? भगवान शंकर के वहां आने पर यही प्रश्र पार्वती जी ने उनसे किया। भगवान शंकर ने कहा-हे पार्वती! जितनी बार तुम्हारा जन्म हुआ है, उतने ही मुंड मैंने धारण किए हैं।

पार्वती जी बोलीं –
मेरा शरीर नाशवान है, मृत्यु को प्राप्त होता है परन्तु आप अमर हैं, इसका कारण बताने का कष्ट करें। भगवान शंकर ने कहा -यह सब अमरकथा के कारण है। इस पर पार्वती जी के हृदय में भी अमरत्व प्राप्त करने की भावना पैदा हो गई और वह भगवान से कथा सुनाने का आग्रह करने लगीं।
भगवान शंकर ने बहुत वर्षों तक टालने का प्रयत्न किया परन्तु अंतत: उन्हें अमरकथा सुनाने को बाध्य होना पड़ा। अमरकथा सुनाने के लिए समस्या यह थी कि कोई अन्य जीव उस कथा को न सुने। इसलिए शिव जी पांच तत्वों (पृथ्वी, जल, वायु, आकाश और अग्रि) का परित्याग करके इन पर्वत मालाओं में पहुंच गए और श्री अमरनाथ गुफा में पार्वती जी को अमरकथा सुनाई।
श्री अमरकथा गुफा की ओर जाते हुए वह सर्वप्रथम पहलगाम पहुंचे, जहां उन्होंने अपने नंदी (बैल) का परित्याग किया। उसके बाद चंदनबाड़ी में अपनी जटा से चंद्रमा को मुक्त किया। शेषनाग नामक झील पर पहुंच कर उन्होंने गले से सर्पों को भी उतार दिया। प्रिय पुत्र श्री गणेश जी को भी उन्होंने महागुणस पर्वत पर छोड़ देने का निश्चय किया। फिर पंचतरणी नामक स्थान पर पहुंच कर शिव भगवान ने पांचों तत्वों का परित्याग किया।

इसके पश्चात ऐसी मान्यता है कि शिव-पार्वती ने इस पर्वत शृंखला में तांडव किया था। तांडव नृत्य वास्तव में सृष्टिआ के त्याग का प्रतीक माना गया। सब कुछ छोड़ अंत में भगवान शिव ने इस गुफा में प्रवेश किया और पार्वती जी को अमरकथा सुनाई। किंवदंती के अनुसार रक्षा बंधन की पूर्णिमा के दिन जो सामान्यत: अगस्त के बीच में पड़ती है, भगवान शंकर स्वयं श्री अमरनाथ गुफा में पधारते हैं।

ऐसा भी ग्रंथों में लिखा मिलता है कि भगवान शिव इस गुफा में पहले पहल श्रावण की पूर्णिमा को आए थे इसलिए उस दिन को श्री अमरनाथ की यात्रा को विशेष महत्व मिला। रक्षा बंधन की पूर्णिमा के दिन ही छड़ी मुबारक भी गुफा में बने हिमशिवलिंग के पास स्थापित कर दी जाती है।

श्री अमरनाथ गुफा में बर्फ से बने शिवलिंग की पूजा होती है। इस सम्बन्ध में अमरेश महादेव की कथा भी मशहूर है। इसके अनुसार आदिकाल में ब्रह्म, प्रकृति, अहंकार, स्थावर (पर्वतादि) जंगल (मनुष्य) संसार की उत्पत्ति हुई। इस क्रमानुसार देवता, ऋषि, पितर, गंधर्व, राक्षस, सर्प, यक्ष, भूतगण, दानव आदि की उत्पत्ति हुई।

इस तरह नए प्रकार के भूतों की सृष्टिआ हुई परन्तु इंद्रादि देवता सहित सभी मृत्यु के वश में हुए थे। देवता भगवान सदाशिव के पास आए क्योंकि उन्हें मृत्यु का भय था। भय से त्रस्त सभी देवताओं ने भगवान भोलेनाथ की स्तुति कर मृत्यु बाधा से मुक्ति का उपाय पूछा। भोलेनाथ स्वामी बोले-मैं आप लोगों की मृत्यु के भय से रक्षा करूंगा। कहते हुए सदाशिव ने अपने सिर पर से चंद्रमा की कला को उतार कर निचोड़ा और देवगणों से बोले, यह आप लोगों के मृत्युरोग की औषधि है
उस चंद्रकला के निचोडऩे से पवित्र अमृत की धारा बह निकली। चंद्रकला को निचोड़ते समय भगवान सदाशिव के शरीर से अमृत बिंबदु पृथ्वी पर गिर कर सूख गए। पावन गुफा में जो भस्म है, वह इसी अमृत ङ्क्षबदु के कण है। सदाशिव भगवान देवताओं पर प्रेम न्यौछावर करते समय स्वयं द्रवीभूत हो गए और देवताओं से कहा-देवताओ! आपने मेरा बर्फ का लिंग शरीर इस गुफा में देखा है। इस कारण मेरी कृपा से आप लोगों को मृत्यु का भय नहीं रहेगा।
अब आप यहीं अमर होकर शिव रूप को प्राप्त हो जाएं। आज से मेरा यह अनादि लिंग शरीर तीनों लोकों में अमरेश के नाम से विख्यात होगा। भगवान सदाशिव देवताओं को ऐसा वर देकर उस दिन से लीन होकर गुफा में रहने लगे। भगवान सदाशिव महाराज ने देवताओं की मृत्यु का नाश किया, इसलिए तभी से उनका नाम अमरेश्वर प्रसिद्ध हुआ है।
मनुष्य श्री अमरनाथ जी की यात्रा करके शुद्धि को प्राप्त करता है तथा शिवलिंग के दर्शनों से भीतर-बाहर से शुद्ध होकर धर्म, अर्थ, काम वचन तथा मोक्ष को प्राप्त करने में समर्थ हो जाता है। अमरनाथ धाम पहुंचना सौभाग्य की बात है। वहां भगवान शिव के दर्शन करने से सर्वसुख की प्राप्ति होती है। बाबा बर्फानी की गुफा में प्रवेश करके भगवान शिव की साक्षात उपस्थिति का एहसास होता है।
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9>बाबा बर्फानी  ( a to d ) 

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बाबा बर्फानी नहीं अमरनाथ बाबा कहो, जानिए प्राचीन इतिहास

अमरनाथ गुफा श्रीनगर से करीब 145 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। अमरनाथ गुफा हिमालय पर्वत श्रेणियों में स्थित एक पर्वत की गुफा है। समुद्र तल से 3,978 मीटर की ऊंचाई पर स्थित यह गुफा 150 फीट ऊंची और करीब 90 फीट लंबी है। अमरनाथ यात्रा पर जाने के लिए 2 रास्ते हैं। एक पहलगाम होकर जाता है और दूसरा सोनमर्ग बालटाल से जाता है यानी देशभर के किसी भी क्षेत्र से पहले पहलगाम या बालटाल पहुंचना होता है। इसके बाद की यात्रा पैदल की जाती है।

पहलगाम से अमरनाथ जाने का रास्ता सरल और सुविधाजनक समझा जाता है। बालटाल से अमरनाथ गुफा की दूरी 14 किलोमीटर है, लेकिन यह मार्ग पार करना मुश्किलभरा होता है। इसी वजह से अधिकतर यात्री पहलगाम के रास्ते अमरनाथ जाते हैं।

अमरनाथ गुफा हिन्दुओं का प्रमुख तीर्थस्‍थल है। इसके बारे में बहुत भ्रम फैलाया जाता है। आजकल बाबा अमरनाथ को 'बर्फानी बाबा' कहकर प्रचारित करने का चलन भी चल रहा है। इसी तरह धर्म का बिगाड़ होता है। असल में यह अमरेश्वर महादेव का स्थान है। प्राचीनकाल में इसे 'अमरेश्वर' कहा जाता था।

यह बहुत ही गलत धारणा फैलाई गई है कि इस गुफा को पहली बार किसी मुस्लिम ने 18वीं-19वीं शताब्दी में खोज निकाला था। वह गुज्जर समाज का एक गडरिया था, जिसे बूटा मलिक कहा जाता है। क्या गडरिया इतनी ऊंचाई पर, जहां ऑक्सीजन नहीं के बराबर रहती है, वहां अपनी बकरियों को चराने ले गया था? स्थानीय इतिहासकार मानते हैं कि 1869 के ग्रीष्मकाल में गुफा की फिर से खोज की गई और पवित्र गुफा की पहली औपचारिक तीर्थयात्रा 3 साल बाद 1872 में आयोजित की गई थी। इस तीर्थयात्रा में मलिक भी साथ थे।

स्वामी विवेकानंद ने 1898 में 8 अगस्त को अमरनाथ गुफा की यात्रा की थी और बाद में उन्होंने उल्लेख किया कि मैंने सोचा कि बर्फ का लिंग स्वयं शिव हैं। मैंने ऐसी सुन्दर, इतनी प्रेरणादायक कोई चीज नहीं देखी और न ही किसी धार्मिक स्थल का इतना आनंद लिया है।

खराब मौसम : यूं तो हर वर्ष 2 जून से 2 अगस्त तक चलने वाली यात्रा में कम से कम 5 से 10 लोगों की मौत होती ही है और ज्यादा से ज्यादा 60-65 लोग खराब मौसम और हृदयाघात से मर जाते हैं। लेकिन वर्ष 1996 में अमरनाथ यात्रा के दौरान खराब मौसम के कारण 250 यात्री मारे गए थे। यह अमरनाथ यात्रा के इतिहास की सबसे बड़ी प्राकृतिक त्रासदी मानी जाती है।

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एक अंग्रेज लेखक लारेंस अपनी पुस्तक 'वैली ऑफ कश्मीर' में लिखते हैं कि पहले मट्टन के कश्मीरी ब्राह्मण अमरनाथ के तीर्थयात्रियों की यात्रा कराते थे। बाद में बटकुट में मलिकों ने यह जिम्मेदारी संभाल ली, क्योंकि मार्ग को बनाए रखना और गाइड के रूप में कार्य करना उनकी जिम्मेदारी थी। वे ही बीमारों, वृद्धों की सहायता करते और उन्हें अमरनाथ के दर्शन कराते थे इसलिए मलिकों ने यात्रा कराने की जिम्मेदारी संभाल ली। इन्हें मौसम की जानकारी भी होती थी। आज भी चौथाई चढ़ावा इस मुसलमान गडरिए के वंशजों को मिलता है।

दरअसल, मध्यकाल में कश्मीर घाटी पर विदेशी ईरानी और तुर्क आक्रमणों के चलते वहां अशांति और भय का वातावरण फैल गया जिसके चलते वहां से हिन्दुओं ने पलायन कर दिया। पहलगांव को विदेशी मुस्लिम आक्रांताओं ने सबसे पहले इसलिए निशाना बनाया, क्योंकि इस गांव की ऐतिहासिकता और इसकी प्रसिद्धि इसराइल तक थी। यहीं पर सर्वप्रथम यहूदियों का एक कबीला आकर बस गया था।

इस हिल स्टेशन पर हिन्दू और बौद्धों के कई मठ थे, जहां लोग ध्यान करते थे। ऐसा एक शोध हुआ है कि इसी पहलगांव में ही मूसा और ईसा ने अपने जीवन के अंतिम दिन बिताए थे। बाद में उनको श्रीनगर के पास रौजाबल में दफना दिया गया। पहलगांव का अर्थ होता है गड़रिए का गांव।

ऐसे में जब आक्रमण हुआ तो 14वीं शताब्दी के मध्य से लगभग 300 वर्ष की अवधि के लिए अमरनाथ यात्रा बाधित रही। कश्मीर के शासकों में से एक था 'जैनुलबुद्दीन' (1420-70 ईस्वी), उसने अमरनाथ गुफा की यात्रा की थी। फिर 18वीं सदी में फिर से शुरू की गई। वर्ष 1991 से 95 के दौरान आतंकी हमलों की आशंका के चलते इसे इस यात्रा को स्थगित कर दिया गया था।

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पौराणिक मान्यता है कि एक बार कश्मीर की घाटी जलमग्न हो गई। उसने एक बड़ी झील का रूप ले लिया। जगत के प्राणियों की रक्षा के उद्देश्य से ऋषि कश्यप ने इस जल को अनेक नदियों और छोटे-छोटे जलस्रोतों के द्वारा बहा दिया। उसी समय भृगु ऋषि पवित्र हिमालय पर्वत की यात्रा के दौरान वहां से गुजरे। तब जल स्तर कम होने पर हिमालय की पर्वत श्रृखंलाओं में सबसे पहले भृगु ऋषि ने अमरनाथ की पवित्र गुफा और बर्फानी शिवलिंग को देखा। मान्यता है कि तब से ही यह स्थान शिव आराधना का प्रमुख देवस्थान बन गया और अनगिनत तीर्थयात्री शिव के अद्भुत स्वरूप के दर्शन के लिए इस दुर्गम यात्रा की सभी कष्ट और पीड़ाओं को सहन कर लेते हैं। यहां आकर वह शाश्वत और अनंत अध्यात्मिक सुख को पाते हैं।

कितनी प्राचीन गुफा? : जम्मू-कश्मीर की राजधानी श्रीनगर से करीब 141 किलोमीटर दूर 3,888 मीटर की ऊंचाई पर स्थित अमरनाथ गुफा को पुरातत्व विभाग वाले 5 हजार वर्ष पुराना मानते हैं अर्थात महाभारत काल में यह गुफा थी। लेकिन उनका यह आकलन गलत हो सकता है, क्योंकि सवाल यह उठता है कि जब 5 हजार वर्ष पूर्व गुफा थी तो उसके पूर्व क्या गुफा नहीं थी? हिमालय के प्राचीन पहाड़ों को लाखों वर्ष पुराना माना जाता है। उनमें कोई गुफा बनाई गई होगी तो वह हिमयुग के दौरान ही बनाई गई होगी अर्थात आज से 12 से 13 हजार वर्ष पूर्व।

पुराण के अनुसार काशी में दर्शन से दस गुना, प्रयाग से सौ गुना और नैमिषारण्य से हजार गुना पुण्य देने वाले श्री बाबा अमरनाथ के दर्शन हैं। और कैलाश को जो जाता है, वह मोक्ष पाता है। पुराण कब लिखे गए? कुछ महाभारतकाल में और कुछ बौद्धकाल में। तब पुराणों में इस तीर्थ का जिक्र है।

इसके बाद ईसा पूर्व लिखी गई कल्हण की 'राजतरंगिनी तरंग द्वि‍तीय' में उल्लेख मिलता है कि कश्मीर के राजा सामदीमत (34 ईपू-17वीं ईस्वीं) शिव के भक्त थे और वेपहलगाम के वनों में स्थित बर्फ के शिवलिंग की पूजा करने जाते थे। बर्फ का शिवलिंग कश्मीर को छोड़कर विश्व में कहीं भी नहीं मिलता।

इस उल्लेख से पता चलता है कि यह तीर्थ कितना पुराना है। पहले के तीर्थ में साधु-संत और कुछ विशिष्ट लोगों के अलावा घरबार छोड़कर तीर्थयात्रा पर निकले लोग ही जा पाते थे, क्योंकि यात्रा का कोई सुगम साधन नहीं था इसलिए कुछ ही लोग दुर्गम स्थानों की तीर्थयात्रा कर पाते थे।

बृंगेश संहिता, नीलमत पुराण, कल्हण की राजतरंगिनी आदि में अमरनाथ तीर्थ का बराबर उल्लेख मिलता है। बृंगेश संहिता में कुछ महत्वपूर्ण स्थानों का उल्लेख है, जहां तीर्थयात्रियों को अमरनाथ गुफा की ओर जाते समय धार्मिक अनुष्ठान करने पड़ते थे। उनमें अनंतनया (अनंतनाग), माच भवन (मट्टन), गणेशबल (गणेशपुर), मामलेश्वर (मामल), चंदनवाड़ी (2,811 मीटर), सुशरामनगर (शेषनाग, 3454 मीटर), पंचतरंगिनी (पंचतरणी, 3,845 मीटर) और अमरावती शामिल हैं।

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गुफा के दर्शन का महत्व : इस गुफा का महत्व इसलिए नहीं है कि यहां हिम शिवलिंग का निर्माण होता है। इस गुफा का महत्व इसलिए भी है कि इसी गुफा में भगवान शिव ने अपनी पत्नी देवी पार्वती को अमरत्व का मंत्र सुनाया था और उन्होंने कई वर्ष रहकर यहां तपस्या की थी, तो यह शिव का एक प्रमुख और पवित्र स्थान है।

शिव के 5 प्रमुख स्थान हैं- 1. कैलाश पर्वत, 2. अमरनाथ, 3. केदारनाथ, 4. काशी और 5. पशुपतिनाथ।

अमरनाथ की कहानी : शास्त्रों के अनुसार इसी गुफा में भगवान शिव ने माता पार्वती को अमरत्व का रहस्य बताया था। माता पार्वती के साथ ही इस रहस्य को शुक (तोता) और दो कबूतरों ने भी सुन लिया था। यह शुक बाद में शुकदेव ऋषि के रूप में अमर हो गए, जबकि गुफा में आज भी कई श्रद्धालुओं को कबूतरों का एक जोड़ा दिखाई देता है जिन्हें अमर पक्षी माना जाता है।

भगवान शिव जब पार्वती को अमरकथा सुनाने ले जा रहे थे, तो उन्होंने छोटे-छोटे अनंत नागों को अनंतनाग में छोड़ा, माथे के चंदन को चंदनवाड़ी में उतारा, अन्य पिस्सुओं को पिस्सू टॉप पर और गले के शेषनाग को शेषनाग नामक स्थल पर छोड़ा था। ये सभी स्थान अभी भी अमरनाथ यात्रा के दौरान रास्ते में दिखाई देते हैं।
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10>अमरनाथ

स्थान: अमरनाथ, जम्मू एवं कश्मीर

अमरनाथ हिन्दुओ का एक प्रमुख तीर्थस्थल है। यह कश्मीर राज्य के श्रीनगर शहर के उत्तर-पूर्व में १३५ सहस्त्रमीटर दूर समुद्रतल से १३,६०० फुट की ऊँचाई पर स्थित है। इस गुफा की लंबाई (भीतर की ओर गहराई) १९ मीटर और चौड़ाई १६ मीटर है। गुफा ११ मीटर ऊँची है। अमरनाथ गुफा भगवान शिव के प्रमुख धार्मिक स्थलों में से एक है। अमरनाथ को तीर्थों का तीर्थ कहा जाता है क्यों कि यहीं पर भगवान शिव ने माँ पार्वती को अमरत्व का रहस्य बताया था।

यहाँ की प्रमुख विशेषता पवित्र गुफा में बर्फ से प्राकृतिक शिवलिंग का निर्मित होना है। प्राकृतिक हिम से निर्मित होने के कारण इसे स्वयंभू हिमानी शिवलिंगभी कहते हैं। आषाढ़ पूर्णिमा से शुरू होकर रक्षाबंधन तक पूरे सावन महीने में होने वाले पवित्र हिमलिंग दर्शन के लिए लाखो लोग यहां आते है। गुफा की परिधि लगभग डेढ़ सौ फुट है और इसमें ऊपर से बर्फ के पानी की बूँदें जगह-जगह टपकती रहती हैं। यहीं पर एक ऐसी जगह है, जिसमें टपकने वाली हिम बूँदों से लगभग दस फुट लंबा शिवलिंग बनता है। चन्द्रमा के घटने-बढ़ने के साथ-साथ इस बर्फ का आकार भी घटता-बढ़ता रहता है। श्रावण पूर्णिमा को यह अपने पूरे आकार में आ जाता है और अमावस्या तक धीरे-धीरे छोटा होता जाता है। आश्चर्य की बात यही है कि यह शिवलिंग ठोस बर्फ का बना होता है, जबकि गुफा में आमतौर पर कच्ची बर्फ ही होती है जो हाथ में लेते ही भुरभुरा जाए। मूल अमरनाथ शिवलिंग से कई फुट दूर गणेश, भैरव और पार्वती के वैसे ही अलग अलग हिमखंड हैं।

अमरनाथ गुफा में बर्फ से बना प्रकृतिक शिवलिंग


जनश्रुति प्रचलित है कि इसी गुफा में माता पार्वती को भगवान शिव ने अमरकथा सुनाई थी, जिसे सुनकर सद्योजात शुक-शिशु शुकदेव ऋषि के रूप में अमर हो गये थे। गुफा में आज भी श्रद्धालुओं को कबूतरों का एक जोड़ा दिखाई दे जाता है, जिन्हें श्रद्धालु अमर पक्षी बताते हैं। वे भी अमरकथा सुनकर अमर हुए हैं। ऐसी मान्यता भी है कि जिन श्रद्धालुओं को कबूतरों को जोड़ा दिखाई देता है, उन्हें शिव पार्वती अपने प्रत्यक्ष दर्शनों से निहाल करके उस प्राणी को मुक्ति प्रदान करते हैं। यह भी माना जाता है कि भगवान शिव ने अद्र्धागिनी पार्वती को इस गुफा में एक ऐसी कथा सुनाई थी, जिसमें अमरनाथ की यात्रा और उसके मार्ग में आने वाले अनेक स्थलों का वर्णन था। यह कथा कालांतर में अमरकथा नाम से विख्यात हुई।


कुछ विद्वानों का मत है कि भगवान शंकर जब पार्वती को अमर कथा सुनाने ले जा रहे थे, तो उन्होंने छोटे-छोटे अनंत नागों को अनंतनाग में छोड़ा, माथे के चंदनको चंदनबाड़ी में उतारा, अन्य पिस्सुओं को पिस्सू टॉप पर और गले के शेषनाग को शेषनाग नामक स्थल पर छोड़ा था। ये तमाम स्थल अब भी अमरनाथ यात्रा में आते हैं। अमरनाथ गुफा का सबसे पहले पता सोलहवीं शताब्दी के पूर्वाध में एक मुसलमान गडरिए को चला था।  आज भी चौथाई चढ़ावा उस मुसलमान गडरिए के वंशजों को मिलता है। आश्चर्य की बात यह है कि अमरनाथ गुफा एक नहीं है। अमरावती नदी के पथ पर आगे बढ़ते समय और भी कई छोटी-बड़ी गुफाएं दिखती हैं। वे सभी बर्फ से ढकी हैं।

अमरनाथ यात्रा

अमर नाथ यात्रा पर जाने के भी दो रास्ते हैं। एक पहलगाम होकर और दूसरा सोनमर्ग बलटाल से। यानी कि पहलमान और बलटाल तक किसी भी सवारी से पहुँचें, यहाँ से आगे जाने के लिए अपने पैरों का ही इस्तेमाल करना होगा। अशक्त या वृद्धों के लिए सवारियों का प्रबंध किया जा सकता है। पहलगाम से जानेवाले रास्ते को सरल और सुविधाजनक समझा जाता है। बलटाल से अमरनाथ गुफा की दूरी केवल १४ किलोमीटर है और यह बहुत ही दुर्गम रास्ता है और सुरक्षा की दृष्टि से भी संदिग्ध है। इसीलिए सरकार इस मार्ग को सुरक्षित नहीं मानती और अधिकतर यात्रियों को पहलगाम के रास्ते अमरनाथ जाने के लिए प्रेरित करती है। लेकिन रोमांच और जोखिम लेने का शौक रखने वाले लोग इस मार्ग से यात्रा करना पसंद करते हैं। इस मार्ग से जाने वाले लोग अपने जोखिम पर यात्रा करते है। रास्ते में किसी अनहोनी के लिए भारत सरकार जिम्मेदारी नहीं लेती है।
पहलगाम से अमरनाथ

पहलगाम जम्मू से ३१५ किलोमीटर की दूरी पर है। यह विख्यात पर्यटन स्थल भी है और यहाँ का नैसर्गिक सौंदर्य देखते ही बनता है। पहलगाम तक जाने के लिए जम्मू-कश्मीर पर्यटन केंद्र से सरकारी बस उपलब्ध रहती है। पहलगाम में गैर सरकारी संस्थाओं की ओर से लंगर की व्यवस्था की जाती है। तीर्थयात्रियों की पैदल यात्रा यहीं से आरंभ होती है।

पहलगाम के बाद पहला पड़ाव चंदनबाड़ी है, जो पहलगाम से आठ किलोमीटर की दूरी पर है। पहली रात तीर्थयात्री यहीं बिताते हैं। यहाँ रात्रि निवास के लिए कैंप लगाए जाते हैं। इसके ठीक दूसरे दिन पिस्सु घाटी की चढ़ाई शुरू होती है। कहा जाता है कि पिस्सु घाटी पर देवताओं और राक्षसों के बीच घमासान लड़ाई हुई जिसमें राक्षसों की हार हुई। लिद्दर नदी के किनारे-किनारे पहले चरण की यह यात्रा ज्यादा कठिन नहीं है। चंदनबाड़ी से आगे इसी नदी पर बर्फ का यह पुल सलामत रहता है।

चंदनबाड़ी से १४ किलोमीटर दूर शेषनाग में अगला पड़ाव है। यह मार्ग खड़ी चढ़ाई वाला और खतरनाक है। यहीं पर पिस्सू घाटी के दर्शन होते हैं। अमरनाथ यात्रा में पिस्सू घाटी काफी जोखिम भरा स्थल है। पिस्सू घाटी समुद्रतल से ११,१२० फुट की ऊँचाई पर है। यात्री शेषनाग पहुँच कर ताजादम होते हैं। यहाँ पर्वतमालाओं के बीच नीले पानी की खूबसूरत झील है। इस झील में झांककर यह भ्रम हो उठता है कि कहीं आसमान तो इस झील में नहीं उतर आया। यह झील करीब डेढ़ किलोमीटर लम्बाई में फैली है। किंवदंतियों के मुताबिक शेषनाग झील में शेषनाग का वास है और चौबीस घंटों के अंदर शेषनाग एक बार झील के बाहर दर्शन देते हैं, लेकिन यह दर्शन खुशनसीबों को ही नसीब होते हैं। तीर्थयात्री यहाँ रात्रि विश्राम करते हैं और यहीं से तीसरे दिन की यात्रा शुरू करते हैं।

शेषनाग से पंचतरणी आठ मील के फासले पर है। मार्ग में बैववैल टॉप और महागुणास दर्रे को पार करना पड़ता हैं, जिनकी समुद्रतल से ऊँचाई क्रमश: १३,५०० फुट व १४,५०० फुट है। महागुणास चोटी से पंचतरणी तक का सारा रास्ता उतराई का है। यहाँ पांच छोटी-छोटी सरिताएँ बहने के कारण ही इस स्थल का नाम पंचतरणी पड़ा है। यह स्थान चारों तरफ से पहाड़ों की ऊंची-ऊंची चोटियों से ढका है। ऊँचाई की वजह से ठंड भी ज्यादा होती है। ऑक्सीजन की कमी की वजह से तीर्थयात्रियों को यहाँ सुरक्षा के इंतजाम करने पड़ते हैं।

अमरनाथ की गुफा यहाँ से केवल आठ किलोमीटर दूर रह जाती हैं और रास्ते में बर्फ ही बर्फ जमी रहती है। इसी दिन गुफा के नजदीक पहुँच कर पड़ाव डाल रात बिता सकते हैं और दूसरे दिन सुबह पूजा अर्चना कर पंचतरणी लौटा जा सकता है। कुछ यात्री शाम तक शेषनाग तक वापस पहुँच जाते हैं। यह रास्ता काफी कठिन है, लेकिन अमरनाथ की पवित्र गुफा में पहुँचते ही सफर की सारी थकान पल भर में छू-मंतर हो जाती है और अद्भुत आत्मिक आनंद की अनुभूति होती है।

बलटाल से अमरनाथ- जम्मू से बलटाल की दूरी ४०० किलोमीटर है। जम्मू से उधमपुर के रास्ते बलटाल के लिए जम्मू कश्मीर पर्यटक स्वागत केंद्र की बसें आसानी से मिल जाती हैं। बलटाल कैंप से तीर्थयात्री एक दिन में अमरनाथ गुफा की यात्रा कर वापस कैंप लौट सकते हैं।

अमरनाथ गुफा की वार्षिक तीर्थयात्रा इस साल पहली जुलाई से शुरू हुई थी जो 24 अगस्त तक चलेगी। शिवभक्त यहां बर्फानी बाबा के पवित्र गुफा में बर्फ से बने प्राकृतिक शिवलिंग का दर्शन करते हैं। यह तीर्थस्थल समुद्रतल से करीब 3888 मीटर की ऊंचाई पर है।
गौर हो कि बाबा अमरनाथ को तीर्थों का तीर्थ कहा जाता है क्यों कि यहीं पर भगवान शिव ने मां पार्वती को अमरत्व का रहस्य बताया था। अमरनाथ बाबा की प्रसिद्ध गुफा जम्मू और कश्मीर राज्य के श्रीनगर शहर के उत्तर-पूर्व में स्थित है। गुफा 11 मीटर ऊँची है। इसकी लंबाई 19 मीटर और चौड़ाई 16 मीटर है। पवित्र गुफा में बर्फ बना प्राकृतिक शिवलिंग स्थित है। प्राकृतिक हिम से निर्मित होने के कारण इसे हिमानी या बर्फानी शिवलिंग भी कहते हैं। पवित्र हिमलिंग दर्शन के लिए प्रतिवर्ष यहां लाखों की संख्या में लोग आते हैं।
गुफा में ऊपर से बर्फ के समान पानी की बूंदें जगह-जगह टपकती रहती हैं। यहीं पर एक ऐसी जगह है, जिसमें टपकने वाली बर्फ की बूंदों से लगभग दस फुट लंबा शिवलिंग बन जाता है। चन्द्रमा के घटने-बढ़ने के साथ-साथ इस बर्फ का आकार भी घटता-बढ़ता रहता है।


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11>द्वादश ज्योतिर्लिंग


सोमनाथ // मल्लिकार्जुन // महाकालेश्वर // ॐकारेश्वर // वैद्यनाथ // भीमाशंकर

रामेश्वर // नागेश्वर // विश्वनाथ // त्रयम्बकेश्वर // केदारनाथ // घृष्णेश्वर

द्वादश ज्योतिर्लिंग मंदिरों की स्थिति।

हिन्दू धर्म में पुराणों के अनुसार शिवजी जहाँ-जहाँ स्वयं प्रगट हुए उन बारह स्थानों पर स्थित शिवलिंगों को ज्योतिर्लिंगों के रूप में पूजा जाता है। ये संख्या में १२ है। सौराष्ट्र प्रदेश (काठियावाड़) में श्रीसोमनाथ, श्रीशैल पर श्रीमल्लिकार्जुन, उज्जयिनी (उज्जैन) में श्रीमहाकाल, ॐकारेश्वर अथवा अमलेश्वर, परली में वैद्यनाथ, डाकिनी नामक स्थान में श्रीभीमशङ्कर, सेतुबंध पर श्री रामेश्वर, दारुकावन में श्रीनागेश्वर, वाराणसी (काशी) में श्री विश्वनाथ, गौतमी (गोदावरी) के तट पर श्री त्र्यम्बकेश्वर, हिमालय पर केदारखंड में श्रीकेदारनाथ और शिवालय में श्रीघुश्मेश्वर। हिंदुओं में मान्यता है कि जो मनुष्य प्रतिदिन प्रात:काल और संध्या के समय इन बारह ज्योतिर्लिङ्गों का नाम लेता है, उसके सात जन्मों का किया हुआ पाप इन लिंगों के स्मरण मात्र से मिट जाता है।

१२ ज्योतिर्लिंगों के नाम शिव पुराण अनुसार (शतरुद्र संहिता, अध्याय ४२/२-४) हैं।

क्रम.ज्योतिर्लिंगचित्रराज्यस्थितिवर्णन
१ सोमनाथ गुजरात प्रभास पाटन,सौराष्ट्र श्री सोमनाथ सौराष्ट्र, (गुजरात) के प्रभास क्षेत्र में विराजमान है। इस प्रसिद्ध मंदिर को अतीत में छह बार ध्वस्त एवं निर्मित किया गया है। १०२२ ई में इसकी समृद्धि को महमूद गजनवी के हमले से सार्वाधिक नुकसान पहुँचा था।
२ मल्लिकार्जुन आंध्र प्रदेश कुर्नूल आन्ध्र प्रदेश प्रांत के कृष्णा जिले में कृष्णा नदी के तटपर श्रीशैल पर्वत पर श्रीमल्लिकार्जुन विराजमान हैं। इसे दक्षिण का कैलाश कहते हैं।
३ महाकालेश्वर मध्य प्रदेश महाकाल,उज्जैन श्री महाकालेश्वर (मध्यप्रदेश) के मालवा क्षेत्र में क्षिप्रा नदी के तटपर पवित्र उज्जैन नगर में विराजमान है। उज्जैन को प्राचीनकाल में अवंतिकापुरी कहते थे।
४ ॐकारेश्वर मध्य प्रदेश नर्मदा नदी में एक द्वीप पर मालवा क्षेत्र में श्रीॐकारेश्वर स्थान नर्मदा नदी के बीच स्थित द्वीप पर है। उज्जैन से खण्डवा जाने वाली रेलवे लाइन पर मोरटक्का नामक स्टेशन है, वहां से यह स्थान 10 मील दूर है। यहां ॐकारेश्वर और मामलेश्वर दो पृथक-पृथक लिङ्ग हैं, परन्तु ये एक ही लिङ्ग के दो स्वरूप हैं। श्रीॐकारेश्वर लिंग को स्वयंभू समझा जाता है।
५ केदारनाथ उत्तराखंड केदारनाथ श्री केदारनाथ हिमालय के केदार नामक श्रृङ्गपर स्थित हैं। शिखर के पूर्व की ओर अलकनन्दा के तट पर श्री बदरीनाथ अवस्थित हैं और पश्चिम में मन्दाकिनी के किनारे श्री केदारनाथ हैं। यह स्थान हरिद्वार से 150 मील औरऋषिकेश से 132 मील दूर उत्तरांचल राज्य में है।
६ भीमाशंकर महाराष्ट्र भीमाशंकर श्री भीमशङ्कर का स्थान मुंबई से पूर्व और पूना से उत्तर भीमा नदी के किनारे सह्याद्रि पर्वत पर है। यह स्थान नासिकसे लगभग 120 मील दूर है। सह्याद्रि पर्वत के एक शिखर का नाम डाकिनी है। शिवपुराण की एक कथा के आधार पर भीमशङ्कर ज्योतिर्लिङ्ग को असम के कामरूप जिले में गुवाहाटी के पास ब्रह्मपुर पहाड़ी पर स्थित बतलाया जाता है। कुछ लोग मानते हैं कि नैनीताल जिले के काशीपुर नामक स्थान में स्थित विशाल शिवमंदिर भीमशंकर का स्थान है।
७ काशी विश्वनाथ उत्तर प्रदेश वाराणसी वाराणसी (उत्तर प्रदेश) स्थित काशी के श्रीविश्वनाथजी सबसे प्रमुख ज्योतिर्लिंगों में एक हैं। गंगा तट स्थित काशी विश्वनाथ शिवलिंग दर्शन हिंदुओं के लिए सबसे पवित्र है।
८ त्रयम्बकेश्वर महाराष्ट्र त्रयम्बकेश्वर, निकट नासिक श्री त्र्यम्बकेश्वर ज्योतिर्लिङ्ग महाराष्ट्र प्रांत के नासिक जिले में पंचवटी से 18 मील की दूरी पर ब्रह्मगिरि के निकटगोदावरी के किनारे है। इस स्थान पर पवित्र गोदावरी नदी का उद्गम भी है।
९ वैद्यनाथ झारखंड देवघर जिला शिवपुराण में 'वैद्यनाथं चिताभूमौ' ऐसा पाठ है, इसके अनुसार (झारखंड) राज्य के संथाल परगना क्षेत्र में जसीडीह स्टेशन के पास देवघर (वैद्यनाथधाम) नामक स्थान पर श्रीवैद्यनाथ ज्योतिर्लिङ्ग सिद्ध होता है, क्योंकि यही चिताभूमि है। महाराष्ट्र में पासे परभनी नामक जंक्शन है, वहां से परली तक एक ब्रांच लाइन गयी है, इस परली स्टेशन से थोड़ी दूर पर परली ग्राम के निकट श्रीवैद्यनाथ को भी ज्योतिर्लिङ्ग माना जाता है। परंपरा और पौराणिक कथाओं से देवघर स्थित श्रीवैद्यनाथ ज्योतिर्लिङ्ग को ही प्रमाणिक मान्यता है।
१० नागेश्वर गुजरात दारुकावन,द्वारका श्रीनागेश्वर ज्योतिर्लिङ्ग बड़ौदा क्षेत्रांतर्गत गोमती द्वारका से ईशानकोण में बारह-तेरह मील की दूरी पर है। निजाम हैदराबाद राज्य के अन्तर्गत औढ़ा ग्राम में स्थित शिवलिङ्ग को ही कोई-कोई नागेश्वर ज्योतिर्लिङ्ग मानते हैं। कुछ लोगों के मत से अल्मोड़ा से 17 मील उत्तर-पूर्व में यागेश (जागेश्वर) शिवलिङ्ग ही नागेश ज्योतिर्लिङ्ग है।
११ रामेश्वर तमिल नाडु रामेश्वरम श्रीरामेश्वर तीर्थ तमिलनाडु प्रांत के रामनाड जिले में है। यहाँ लंका विजय के पश्चात भगवान श्रीराम ने अपने अराध्यदेव शंकर की पूजा की थी। ज्योतिर्लिंग को श्रीरामेश्वर या श्रीरामलिंगेश्वर के नाम से जाना जाता है।.
१२ घृष्णेश्वर महाराष्ट्र निकटएल्लोरा,औरंगाबाद जिला श्रीघुश्मेश्वर (गिरीश्नेश्वर) ज्योतिर्लिंग को घुसृणेश्वर या घृष्णेश्वर भी कहते हैं। इनका स्थान महाराष्ट्र प्रांत में दौलताबादस्टेशन से बारह मील दूर बेरूल गांव के पास है।
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4>ॐ नमोः शिबाय +शिव महापुराण+शिवजी के विवरण+सोमनाथ+बालकाण्ड+ये 5 चढ़ाए+मनवांछित फल==> (1 to 10 )

 4>|| ॐ नमः शिवाय*** (1 to 10 )

1>-------------ॐ नमः शिवाय
1 A>----------उं नमःशिवा़य
2>-------------।। शिव महापुराण ।।
3>-------------शिवजी के विवरण
4>---------------सोमनाथ
5>---------------महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग की कहानी
6>---------------।।जय श्री बाबा महाकाल ।।
7>---------------बालकाण्ड में भगवान शिव जी के सुन्दर चरित्र का वर्णन
8>---------------ये 5 चढ़ावे भगवान शिव को कभी न चढ़ाए
9>---------------मनवांछित फल==(भोलेनाथ)
10---------------श्री महाकालेश्वर मंदिर
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1>    ॐ नमः शिवाय 

संगतिमेवं प्रतिदिन पठनं यः कुरुते।
शिवसायुज्यं गच्छति भक्त्या यः श्रृणुते ॥ हर...॥ 
 दध्ना च पशु कामाय 
ॐ त्र्यम्बकँ य्यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्द्धनम् ।
नीराजयते ब्रह्मा वेदऋचां पठते॥
अर्थात 
ॐ नमः शिवाय हर हर महादेव
    श्रिया इक्षु रसेन च ।
मध्वाज्येन धनार्थी 
 स्यान् मुमुक्षीस्तीर्थ वारीणा ।।

  विशेष रूप से केवल दूध की धारा से अभिषेक करना चाहिए इससे मनो भीलषित कामना की पूर्ति होती है 
बुद्धि की जड़ता को दूर करने के लिए शक्कर मिले दूध से अभिषेक करना चाहिए  इस करने पर भगवान् शंकर 
की कृपा से उसकी बुद्धि श्रेष्ठ हो जाती है 


1 A> उं नमःशिवा़य
ॐनमः शिवाय
तत्पुरूषाय विद्महे महादेवायधीमही
तनो रूद्रः प्रचोदयात्
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  2>  ।। शिव महापुराण ।।

उर्व्वारूकमिव बन्धनान्न्मृत्योर्म्मुक्षीय मामृतात् ।
ॐ जय गंगाधर जय हर जय गिरिजाधीशा।
त्वं मां पालय नित्यं कृपया जगदीशा॥ हर...॥
कैलासे गिरिशिखरे कल्पद्रमविपिने।
गुंजति मधुकरपुंजे कुंजवने गहने॥
कोकिलकूजित खेलत हंसावन ललिता।
रचयति कलाकलापं नृत्यति मुदसहिता ॥ हर...॥
तस्मिंल्ललितसुदेशे शाला मणिरचिता।
तन्मध्ये हरनिकटे गौरी मुदसहिता॥
क्रीडा रचयति भूषारंचित निजमीशम्।
इंद्रादिक सुर सेवत नामयते शीशम् ॥ हर...॥
बिबुधबधू बहु नृत्यत नामयते मुदसहिता।
किन्नर गायन कुरुते सप्त स्वर सहिता॥
धिनकत थै थै धिनकत मृदंग वादयते।
क्वण क्वण ललिता वेणुं मधुरं नाटयते ॥हर...॥
रुण रुण चरणे रचयति नूपुरमुज्ज्वलिता।
चक्रावर्ते भ्रमयति कुरुते तां धिक तां॥
तां तां लुप चुप तां तां डमरू वादयते।
अंगुष्ठांगुलिनादं लासकतां कुरुते ॥ हर...॥
कपूर्रद्युतिगौरं पंचाननसहितम्।
त्रिनयनशशिधरमौलिं विषधरकण्ठयुतम्॥
सुन्दरजटायकलापं पावकयुतभालम्।
डमरुत्रिशूलपिनाकं करधृतनृकपालम् ॥ हर...॥
मुण्डै रचयति माला पन्नगमुपवीतम्।
वामविभागे गिरिजारूपं अतिललितम्॥
सुन्दरसकलशरीरे कृतभस्माभरणम्।
इति वृषभध्वजरूपं तापत्रयहरणं ॥ हर...॥
शंखनिनादं कृत्वा झल्लरि नादयते।
अतिमृदुचरणसरोजं हृत्कमले धृत्वा।
अवलोकयति महेशं ईशं अभिनत्वा॥ हर...॥
ध्यानं आरति समये हृदये अति कृत्वा।
रामस्त्रिजटानाथं ईशं अभिनत्वा॥
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3>शिवजी के विवरण 
1. शिव जी की जटा :-
 जो कि शरीर और आत्मा का सामंजस्य दिखाता है अगर आपको एक अच्छा विद्यार्थी बनाना है तो उसके लिए 
आपके दिमाग और आत्मा का स्वस्थ होना बहुत जरुरी है। और उसके लिए अपने मन, शरीर और आत्मा के
 बीच संतुलन रखना होगा। जिससे आप किसी भी परेशानी से लड़ सकते हैं।
*****
2.तीसरी आंख :- 
मन की आंखों से देखे अगर हमे ज़िन्दगी में कुछ बनना है तो जो सोचा है उसे पूरा करना होगा। यही हमे ज़िन्दगी
जीना सिखाता है। जो हमे लग रहा है कि यह हम नहीं कर पायेंगे और उसे पाने के लिए जी जान से कोशिश कर के
 हासिल कर लें तो शयद आपको को भी अपने ऊपर आश्चर्य हो। यही सिख हमे मिलती है भगवन शिव से जो हो
 रहा है उसके परे की सोचें और उसे हासिल करने में लग जाएँ।
*******
3.त्रिशूल :- 
मन, बुद्धि और अहंकार पर नियंत्रण अगर आपको ज़िन्दगी बहुत सारी परेशानियों के बाद या सिर्फ हार के डर से
आपने कुछ पाया है, तो यहीँ से आपके अंदर अहंकार आने लगता है। और अगर आपको ज़िन्दगी में आगे सफल 
होना है तो इसे नियंत्रण में रखना जरुरी है। जिस इंसान में अहंकार नहीं होता है उसकी बुद्धि और मन बेहतर 
तरीके से काम करते हैं।
*****
4.ध्यान मुद्रा :-
 मन की शांति दिमाग की शांति का बहुत बड़ा महत्व है हमारी ज़िन्दगी में। यह हमे रोज़मरा की परेशानियों से लड़ने 
की ताकत देता है और हमारे दिमाग को स्वस्थ रहने में मदद करता है।
********
5.शरीर पर राख : -
 सब कुछ अस्थायी है, यहां तक कि हमारा शरीर भी आज कल औरतें ही नहीं बल्कि आदमी भी अपनी खूबसूरती के
लिए ना जाने कितने पैसे खर्च करते हैं। क्या यह सही है। यह जानेते हुए भी कि सब कुछ अस्थायी। पर इसका मतलब 
यह बिल्कुल नहीं है कि आप अपने स्वास्थ को नज़रंदाज़ करें। बाहरी सुंदरता से नहीं अपनी अंदर की सुंदरता को 
बहार निकलने की कोशिश करें।
*********
6.नीलकंठ :- 
बुराई (गुस्से) को ख़त्म करना गुस्सा हम सब का सबसे बड़ा दुश्मन है, इसे खत्म या नियंत्रण करना भी हमारी हीज़िमेदारी है।
 गुस्सा अगर अंदर रहा जाये तो ज़हर है और बहार निकले तो दुसरो के लिए हानिकारक हो सकता है। तो अगली बार गुस्सा
 आये तो बहार टहलने चले जाये या गुस्से को नियंत्रण रखने के लिए शान्त रहे।
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7.डमरू : 
-शरीर की सभी इच्छाओं से मुक्ति भगवन शिव का डमरू यह दिखाता की आप कि इच्छा शक्ति मजबूत हो जिससे आप
 अपनी सारी बुराईयों पर काबू पा सके। और यह सब आपको हासिल होगा सही खान पान और सही व्यायाम से।
********
8.गंगा :- 
अज्ञानता का अंत और ज्ञान तथा शांति की सुबह सही ज्ञान ही इंसान को एक बेहतर मनुष्य बनाता है। और अपने ऊपर
विश्वास करना सिखाता है। जिससे आप ज़िन्दगी उन सारी समस्यों से लड़ सकते है और अपनी ज़िन्दगी को और बेहतर
 बना सकते हैं।
*********-
9.कमंडल : - 
शरीर से सब बुराइयों को हटाना अपने मन और शरीर दोनों से बुरे विचार, नकारात्मकता और गन्दगी को बहार निकल
देना ही अच्छी और बेहतर सोच को जन्म देता है। इसे आपक दिमाग अच्छे से काम और नयी सोच को विकसित करने
 में मदद करता है।
***************
10.गले में नाग : -
अहंकार पर नियंत्रण अहंकार आपका सबसे बड़ा दुश्मन है, और यह क्रोध को जन्म दहवे कर आपका स्वास्थ
 ख़राब करता है। तो अपने अहंकार को खत्म करें और मानसिक और शारीरिक रूप से शांत रहने
 की कोशिश करें।
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4>             सोमनाथ 

             4==1             सोमनाथ         
धार्मिक मान्यता     सोमनाथ भगवान की पूजा और उपासना करने से उपासक भक्त के क्षय तथा कोढ़ आदि रोग 
सर्वथा नष्ट हो जाते हैं और वह स्वस्थ हो जाता है।
सोमनाथ मन्दिर जिसे सोमनाथ ज्योतिर्लिंग भी कहा जाता है, गुजरात (सौराष्ट्र) के काठियावाड़ क्षेत्र के अन्तर्गत 
प्रभास में विराजमान हैं। इसी क्षेत्र में भगवान श्रीकृष्णचन्द्र ने यदु वंश का संहार कराने के बाद अपनी नर लीला 
समाप्त कर ली थी। ‘जरा’ नामक व्याध (शिकारी) ने अपने बाणों से उनके चरणों (पैर) को बींध डाला था।
पौराणिक वर्णन
शिव पुराण के अनुसार द्वादश ज्योतिर्लिंग में सोमनाथ की गणना प्रथम है। इनके आविर्भाव का प्रकरण प्रजापति 
दक्ष और चन्द्रमा के साथ जुड़ा है। जब प्रजापति दक्ष ने अपनी अश्विनी आदि सभी सत्ताइस पुत्रियों का विवाह 
चन्द्रमा के साथ कर दिया, तो वे बहुत प्रसन्न हुए। पत्नी के रूप में दक्ष कन्याओं को प्राप्त कर चन्द्रमा बहुत शोभित 
हुए और दक्षकन्याएँ भी अपने स्वामी के रूप में चन्द्रमा को प्राप्त कर शोभायमान हो उठी। चन्द्रमा की उन 
सत्ताइस पत्नियों में रोहिणी उन्हें अतिशय प्रिय थी, जिसको वे विशेष आदर तथा प्रेम करते थे। उनका इतना प्रेम 
अन्य पत्नियों से नहीं था। चन्द्रमा की उदासीनता और उपेक्षा का देखकर रोहिणी की अपेक्षा शेष स्त्रियाँ बहुत 
दुःखी हुई। वे सभी स्त्रियाँ अपने पिता दक्ष की शरण में गयीं और उनसे अपने कष्टों का वर्णन किया। अपनी पुत्रियों 
की व्यथा और चन्द्रमा के दुर्व्यवहार को सुनकर दक्ष भी बड़े दुःखी हुए। उन्होंने चन्द्रमा से भेंट की और शान्तिपूर्वक 
कहा- ‘कलानिधे! तुमने निर्मल व पवित्र कुल में जन्म लिया है, फिर भी तुम अपनी पत्नियों के साथ भेदभावपूर्ण 
व्यवहार करते हो। तुम्हारे आश्रय में रहने वाली जितनी भी स्त्रियाँ हैं, उनके प्रति तुम्हारे मन में प्रेम कम और अधिक,
 ऐसा सौतेला व्यवहार क्यों है? तुम किसी को अधिक प्यार करते हो और किसी को कम प्यार देते हो, ऐसा क्यों 
करते हो? अब तक जो व्यवहार किया है, वह ठीक नहीं है, फिर अब आगे ऐसा दुर्व्यवहार तुम्हें नहीं करना चाहिए। 
जो व्यक्ति आत्मीयजनों के साथ विषमतापूर्ण व्यवहार करता है, उसे नर्क में जाना पड़ता है।’ इस प्रकार प्रजापति दक्ष
 ने अपने दामाद चन्द्रमा को प्रेमपूर्वक समझाया और ऐसा सोच लिया कि चन्द्रमा में सुधार हो जाएगा। उसके बाद 
प्रजापति दक्ष वापस चले गये।

शिव महापुराण के कोटिरुद्र संहिता के चौदहवें अध्याय में लिखा है-
विमले च कुले त्वं हि समुत्पन्नः कलानिधे।
आश्रितेषु च सर्वेषु न्यूनाधिक्यं कथं तव।।
कृतं चेतत्कृतं तच्च् न कर्त्तव्यं त्वया पुनः।
वर्तनं विषमत्वेन नरकप्रदमीरितम्।।
प्रबल भावी के कारण विवश चन्द्रमा ने अपने ससुर प्रजापति दक्ष की बात नहीं मानी। रोहिणी के प्रति अतिशय 
आसक्ति के कारण उन्होंने अपने कर्त्तव्य की अवहेलना की तथा अपनी अन्य पत्नियों का कुछ भी ख्याल नहीं 
रखा और उन सभी से उदासीन रहे। दुबारा समाचार प्राप्त कर प्रजापति दक्ष बड़े दुःखी हुए। वे पुनः चन्द्रमा के पास 
आकर उन्हें उत्तम नीति के द्वारा समझने लगे। दक्ष ने चन्द्रमा से न्यायोचित बर्ताव करने की प्रार्थना की। बार-बार 
आग्रह करने पर भी चन्द्रमा ने अवहेलनापूर्वक जब दक्ष की बात नहीं मानी, तब उन्होंने शाप दे दिया। दक्ष ने कहा कि 
मेरे आग्रह करने पर भी तुमने मेरी अवज्ञा की है, इसलिए तुम्हें क्षयरोग हो जाय-
श्रयतां चन्द्र यत्पूर्व प्रार्थितो बहुधा मया।,
न मानितं त्वया यस्मात्तस्मात्त्वं च क्षयी भव[1]।।
दक्ष द्वारा शाप देने के साथ ही क्षण भर में चन्द्रमा क्षय रोग से ग्रसित हो गये। उनके क्षीण होते ही सर्वत्र हाहाकार 
मच गया। सभी देवगण तथा ऋषिगण भी चिंतित हो गये। परेशान चन्द्रमा ने अपनी अस्वस्थता तथा उसके कारणों 
की सूचना इन्द्र आदि देवताओं तथा ऋषियों को दी। उसके बाद उनकी सहायता के लिए इन्द्र आदि देवता तथा 
वसिष्ठ आदि ऋषिगण ब्रह्माजी की शरण में गये। ब्रह्मा जी ने उनसे कहा कि जो घटना हो गई है, उसे तो भुगतना 
ही है, क्योंकि दक्ष के निश्चय को पलटा नहीं जा सकता। उसके बाद ब्रह्माजी ने उन देवताओं को एक उत्तम उपाय 
बताया।
ब्रह्माजी का उपाय
ब्रह्माजी ने कहा कि चन्द्रमा देवताओं के साथ कल्याणकारक शुभ प्रभास क्षेत्र में चले जायें। वहाँ पर विधिपूर्वक 
शुभ मृत्युंजय-मंत्र का अनुष्ठान करते हुए श्रद्धापूर्वक भगवान शिव की आराधना करें। अपने सामने शिवलिंग की 
स्थापना करके प्रतिदिन कठिन तपस्या करें। इनकी आराधना और तपस्या से जब भगवान भोलेनाथ प्रसन्न हो जाएँगे, 
तो वे इन्हें क्षय रोग से मुक्त कर देगें। पितामह ब्रह्माजी की आज्ञा को स्वीकार कर देवताओं और ऋषियों के संरक्षण 
में चन्द्रमा देवमण्डल सहित प्रभास क्षेत्र में पहुँच गये।
मृत्यंजय-मंत्र का जप
वहाँ चन्द्रदेव ने मृत्युंजय भगवान की अर्चना-वन्दना और अनुष्ठान प्रारम्भ किया। वे मृत्युंजय-मंत्र का जप तथा भगवान 
शिव की उपासना में तल्लीन हो गये। ब्रह्मा की ही आज्ञा के अनुसार चन्द्रमा ने छः महीने तक निरन्तर तपस्या की और 
वृषभ ध्वज का पूजन किया। दस करोड़ मृत्यंजय-मंत्र का जप तथा ध्यान करते हुए चन्द्रमा स्थिरचित्त से वहाँ निरन्तर 
खड़े रहे। उनकी उत्कट तपस्या से भक्तवत्सल भगवान शंकर प्रसन्न हो गये।
उन्होंने चन्द्रमा से कहा- 'चन्द्रदेव! तुम्हारा कल्याण हो। तुम जिसके लिए यह कठोर तप कर रहे हो, उस अपनी 
अभिलाषा को बताओ। मै तुम्हारी इच्छा के अनुसार तुम्हें उत्तम वर प्रदान करूँगा।’ चन्द्रमा ने प्रार्थना करते हुए 
विनयपूर्वक कहा- ‘देवेश्वर! आप मेरे सब अपराधों को क्षमा करें और मेरे शरीर के इस क्षयरोग को दूर कर दें।’
शिव का वरदान
भगवान शिव ने कहा– 'चन्द्रदेव! तुम्हारी कल प्रतिदिन एक पक्ष में क्षीण हुआ करेगी, जबकि दूसरे पक्ष में प्रतिदिन 
वह निरन्तर बढ़ती रहेगी। इस प्रकार तुम स्वस्थ और लोक-सम्मान के योग्य ही जाओगे। भगवान शिव का कृपा-प्रसाद 
प्राप्त कर चन्द्रदेव बहुत प्रसन्न हुए। उन्होंने भक्तिभावपूर्वक शंकर की स्तुति की। ऐसी स्थिति में निराकार शिव उनकी 
दृढ़ भक्ति को देखकर साकार लिंग रूप में प्रकट हो गये तथा प्रभास क्षेत्र के महत्त्व को बढाने हेतु देवताओं के 
सम्मान तथा चन्द्रमा के यश का विस्तार करने के लिए स्वयं ‘सोमेश्वर’ कहलाने लगे। चन्द्रमा के नाम पर सोमनाथ बने 
भगवान शिव संसार में ‘सोमनाथ’ के नाम से प्रसिद्ध हुए।

        
           4==2   धार्मिक मान्यता
सोमनाथ भगवान की पूजा और उपासना करने से उपासक भक्त के क्षय तथा कोढ़ आदि रोग सर्वथा नष्ट हो जाते हैं 
और वह स्वस्थ हो जाता है। यशस्वी चन्द्रमा के कारण ही सोमेश्वर भगवान शिव इस भूतल को परम पवित्र करते हुए 
प्रभास क्षेत्र में विराजते हैं। उस प्रभास क्षेत्र में सभी देवताओं ने मिलकर एक सोमकुण्ड की भी स्थापना की है। 
ऐसा विश्वास किया जाता है कि इस कुण्ड में शिव तथा ब्रह्मा का सदा निवास रहते हैं। इस पृथ्वी पर यह चन्द्रकुण्ड 
मनुष्यों के पाप नाश करने वाले के रूप में प्रसिद्ध है।   इसे ‘पापनाशक-तीर्थ’ भी कहते हैं। जो मनुष्य इस चन्द्रकुण्ड 
में स्नान करता है, वह सब प्रकार के पापों से मुक्त हो जाता है। इस कुण्ड में बिना नागा किये छः माह तक स्नान करने
 से क्षय आदि दुःसाध्य और असाध्य रोग भी नष्ट हो जाते हैं। मुनष्य जिस किसी भी भावना या इच्छा से इस परम पवित्र 
और उत्तम तीर्थ का सेवन करता है, तो वह बिना संशय ही उसे प्राप्त कर लेता है। शिव महापुराण की कोटिरुद्र 
संहिता के चौदहवें अध्याय में उपर्युक्त आशय वर्णित है-
चन्द्रकुण्डं प्रसिद्ध च पृथिव्यां पापनाशनम्।
तत्र स्नाति नरो यः स सर्वेः पापैः प्रमुच्यते।।
रोगाः सर्वे क्षयाद्याश्च ह्वासाध्या ये भवन्ति वै।
ते सर्वे च क्षयं यान्ति षण्मासं स्नानमात्रतः।।
प्रभासं च परिक्रम्य पृथिवीक्रमसं भवम्।
फलं प्राप्नोति शुद्धात्मा मृतः स्वर्गे महीयते।।
सोमलिंग नरो दृष्टा सर्वपापात्प्रमुच्यते ।
लब्धवा फलं मनोभीष्टं मृतः स्वर्गं समीहते।।


इस प्रकार सोमनाथ के नाम से प्रसिद्ध भगवान शिव देवताओं की प्रार्थना पर लोक कल्याण करने हेतु 
प्रभास क्षेत्र में हमेशा-हमेशा के लिए विराजमान हो गये। इस प्रकार शिव-महापुराण में सोमेश्वर महादेव 
अथवा सोमनाथ ज्योतिर्लिंग की उत्पत्ति का वर्णन है |
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5>महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग की कहानी

उज्जैन नगरी में स्तिथ महाकाल ज्योतिर्लिंग, शिव जी का तीसरा ज्योतिर्लिंग कहलाता है। यह एक मात्र ज्योतिर्लिंग है जो दक्षिणमुखी है। इस ज्योतिर्लिंग से सम्बंधित दो कहानियां पुराणों में वर्णित है जो इस प्रकार है।शिव पुराण में वर्णित कथाशिव पुराण की 'कोटि-रुद्र संहिता' के सोलहवें अध्याय में तृतीय ज्योतिर्लिंग भगवान महाकाल के संबंध में सूतजी द्वारा जिस कथा को वर्णित किया गया है, उसके अनुसार अवंती नगरी में एक वेद कर्मरत ब्राह्मण रहा करते थे। वे अपने घर में अग्नि की स्थापना कर प्रतिदिन अग्निहोत्र करते थे और वैदिक कर्मों के अनुष्ठान में लगे रहते थे। भगवान शंकर के परम भक्त वह ब्राह्मण प्रतिदिन पार्थिव लिंग का निर्माण कर शास्त्र विधि से उसकी पूजा करते थे। हमेशा उत्तम ज्ञान को प्राप्त करने में तत्पर उस ब्राह्मण देवता का नाम ‘वेदप्रिय’ था। वेदप्रिय स्वयं ही शिव जी के अनन्य भक्त थे, जिसके संस्कार के फलस्वरूप उनके शिव पूजा-परायण ही चार पुत्र हुए। वे तेजस्वी तथा माता-पिता के सद्गुणों के अनुरूप थे। उन चारों पुत्रों के नाम 'देवप्रिय', 'प्रियमेधा', 'संस्कृत' और 'सुवृत' थे।उन दिनों रत्नमाल पर्वत पर ‘दूषण’ नाम वाले धर्म विरोधी एक असुर ने वेद, धर्म तथा धर्मात्माओं पर आक्रमण कर दिया। उस असुर को ब्रह्मा से अजेयता का वर मिला था। सबको सताने के बाद अन्त में उस असुर ने भारी सेना लेकर अवन्ति (उज्जैन) के उन पवित्र और कर्मनिष्ठ ब्राह्मणों पर भी चढ़ाई कर दी। उस असुर की आज्ञा से चार भयानक दैत्य चारों दिशाओं में प्रलयकाल की आग के समान प्रकट हो गये। उनके भयंकर उपद्रव से भी शिव जी पर विश्वास करने वाले वे ब्राह्मणबन्धु भयभीत नहीं हुए। अवन्ति नगर के निवासी सभी ब्राह्मण जब उस संकट में घबराने लगे, तब उन चारों शिवभक्त भाइयों ने उन्हें आश्वासन देते हुए कहा- ‘आप लोग भक्तों के हितकारी भगवान शिव पर भरोसा रखें।’ उसके बाद वे चारों ब्राह्मण-बन्धु शिव जी का पूजन कर उनके ही ध्यान में तल्लीन हो गये।सेना सहित दूषण ध्यान मग्न उन ब्राह्मणों के पास पहुँच गया। उन ब्राह्मणों को देखते ही ललकारते हुए बोल उठा कि इन्हें बाँधकर मार डालो। वेदप्रिय के उन ब्राह्मण पुत्रों ने उस दैत्य के द्वारा कही गई बातों पर कान नहीं दिया और भगवान शिव के ध्यान में मग्न रहे। जब उस दुष्ट दैत्य ने यह समझ लिया कि हमारे डाँट-डपट से कुछ भी परिणाम निकलने वाला नहीं है, तब उसने ब्राह्मणों को मार डालने का निश्चय किया।उसने ज्योंही उन शिव भक्तों के प्राण लेने हेतु शस्त्र उठाया, त्योंही उनके द्वारा पूजित उस पार्थिव लिंग की जगह गम्भीर आवाल के साथ एक गडढा प्रकट हो गया और तत्काल उस गड्ढे से विकट और भयंकर रूपधारी भगवान शिव प्रकट हो गये। दुष्टों का विनाश करने वाले तथा सज्जन पुरुषों के कल्याणकर्त्ता वे भगवान शिव ही महाकाल के रूप में इस पृथ्वी पर विख्यात हुए। उन्होंने दैत्यों से कहा- ‘अरे दुष्टों! तुझ जैसे हत्यारों के लिए ही मैं ‘महाकाल’ प्रकट हुआ हूँ।इस प्रकार धमकाते हुए महाकाल भगवान शिव ने अपने हुँकार मात्र से ही उन दैत्यों को भस्म कर डाला। दूषण की कुछ सेना को भी उन्होंने मार गिराया और कुछ स्वयं ही भाग खड़ी हुई। इस प्रकार परमात्मा शिव ने दूषण नामक दैत्य का वध कर दिया। जिस प्रकार सूर्य के निकलते ही अन्धकार छँट जाता है, उसी प्रकार भगवान आशुतोष शिव को देखते ही सभी दैत्य सैनिक पलायन कर गये। देवताओं ने प्रसन्नतापूर्वक अपनी दन्दुभियाँ बजायीं और आकाश से फूलों की वर्षा की। उन शिवभक्त ब्राह्मणों पर अति प्रसन्न भगवान शंकर ने उन्हें आश्वस्त करते हुए कहा कि ‘मै महाकाल महेश्वर तुम लोगों पर प्रसन्न हूँ, तुम लोग वर मांगो।’महाकालेश्वर की वाणी सुनकर भक्ति भाव से पूर्ण उन ब्राह्मणों ने हाथ जोड़कर विनम्रतापूर्वक कहा- 'दुष्टों को दण्ड देने वाले महाकाल! शम्भो! आप हम सबको इस संसार-सागर से मुक्त कर दें। हे भगवान शिव! आप आम जनता के कल्याण तथा उनकी रक्षा करने के लिए यहीं हमेशा के लिए विराजिए। प्रभो! आप अपने दर्शनार्थी मनुष्यों का सदा उद्धार करते रहें।’भगवान शंकर ने उन ब्राह्माणों को सद्गति प्रदान की और अपने भक्तों की सुरक्षा के लिए उस गड्ढे में स्थित हो गये। उस गड्ढे के चारों ओर की लगभग तीन-तीन किलोमीटर भूमि लिंग रूपी भगवान शिव की स्थली बन गई। ऐसे भगवान शिव इस पृथ्वी पर महाकालेश्वर के नाम से प्रसिद्ध हुए।
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6>।।जय श्री बाबा महाकाल ।।
इस मंत्र को संपुट युक्त बनाने के लिए इसका उच्चारण इस प्रकार किया जाता है ।
ॐ हौं जूं स: ॐ भूर्भुवः स्वः
ॐ त्र्यम्बकम् यजामहे सुगन्धिम्पुष्टिवर्धनम्।
उर्वारुकमिव बन्धनात्
मृत्योर्मुक्षीय मामृतात।
ॐ स्वः भुवः भूः ॐ सः जूं हौं ॐ

इस मंत्र का अर्थ है :-
हम भगवान शंकर की पूजा करते हैं, जिनके तीन नेत्र हैं, जो प्रत्येक श्वास में जीवन शक्ति का संचार करते हैं, जो सम्पूर्ण जगत का पालन-पोषण अपनी शक्ति से कर रहे हैं...
उनसे हमारी प्रार्थना है कि वे हमें मृत्यु के बंधनों से मुक्त कर दें, जिससे मोक्ष की प्राप्ति हो जाए...
जिस प्रकार एक ककड़ी अपनी बेल में पक जाने के उपरांत उस बेल-रूपी संसार के बंधन से मुक्त हो जाती है, उसी प्रकार हम भी इस संसार-रूपी बेल में पक जाने के उपरांत जन्म-मृत्यु के बन्धनों से सदा के लिए मुक्त हो जाएं।
तथा आपके चरणों की अमृतधारा का पान करते हुए शरीर को त्यागकर आप ही में लीन हो जाएं...
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7>बालकाण्ड में भगवान शिव जी के सुन्दर चरित्र का वर्णन

बालकाण्ड में भगवान शिव जी के सुन्दर चरित्र का वर्णन गोस्वामी जी ने किया है.शिव पार्वती जी के विवाह का सुन्दर वर्णन है.ऐसा क्यों है सीधे राम जी के जन्म से भी तो शुरु कर सकते थे.शिव पार्वती जी के विवाह का वर्णन क्यों किया ?
संतजन कहते है शिव जी के चरित्र को सुनकर जीवन में जो उतारता है वही राम कथा में प्रवेश का अधिकारी है.शिव जी कौन है ? योगेश्वर है. वैरागी है और गृहस्थ में प्रवेश करने जा रहे है. व्यक्ति गृहस्थी में रहकर ही परिवार के भरण पोषण पैसा कमाने में धर्म अधर्म सब कुछ भूल जाता है. इसलिए भगवान शिव बता रहे है कैसे चले.
जब उनकी बारात चलि है तो शिव जी के हाथ में त्रिशूल है.त्रिशूल अर्थात जो तीन शूल है - "काम", "क्रोध", "लोभ" इन तीनो को अधीन करके चले है। गृहस्थ में प्रवेश करने से पहले तीनो अधीन है. नंदी पर बैठकर चले है. नंदी धर्म का प्रतीक है.अर्थात धर्म हम किसी भी परिस्थिति में नहीं छोडेगे.
उनके भाल पर "चंद्रमा" सुशोभित है जो मन का प्रतीक है. मन कैसा करके चलो ? भोला, निर्मल, पवित्र, सशक्त है. उज्जवल हो. सिर पर जटाओ का मुकुट है, गृहस्थ में प्रवेश करने जा रहे है.और गृहस्थी में जंजाल भी बहुत होते है,परन्तु उन जंजाल रूपी जटाओ को, संकट को भी श्रंगार बनाकर धारण करो.मुकुट के रूप में स्वीकार करो.
जटाओं से "गंगा की धारा" बह रही है,अर्थात गृहस्थी के सिर पर जो जंजालो की जटाए है उनसे कलह के नाले न निकले, विवेक की, भक्ति की, गंगा निकलती रहे. नागों के आभूषण पहन रखे है अर्थात जीवन में संपत्ति इतनी मत बढाओ कि वही संपत्ति एक दिन नाग बनकर डस ले.
"मुंडमाला" है जो इस बात का प्रतीक है कि शिव ने मृत्यु को वश में कर रखा है.भस्म रमा के चले है भस्म काम नाशक है विवाह में हल्दी लगायी जाती है जो कामवर्द्धक है.
शिव के शरीर पर व्याघ्र "चर्म" है, व्याघ्र हिंसा व अंहकार का प्रतीक माना जाता है. इसका अर्थ है कि शिव ने हिंसा व अहंकार का दमन कर उसे अपने नीचे दबा कर चले है.गृहस्थ में हिंसा और अहंकार दोनों की ही जगह नहीं है.
गृहस्थ में सभी का बड़ा ही समन्वय है.जहाँ पत्नी,पुत्र और वाहन सभी की पूजा होती है. पार्वती भवानी है,पुत्र गणेश और कार्तिकेय है.वाहन नंदी है सभी की पूजा होती है.जहाँ सभी आदरणीय और पूजनीय है भगवान राम और कृष्ण के पिता वासुदेव और दशरथ जी के मंदिर नहीं है.केवल शिव जी का परिवार ही है जहाँ सभी की पूजा होती है.
गले में सर्प है उनकी भी पूजा होती है.अर्थात अपने चरित्र को ऐसा बनाये कि सभी आदर करे. कार्तिकेय का वाहन मोर है गणेश जी का वाहन चूहा है, माता का वाहन शेर है. मोर सर्प को खाता है. सर्प चूहे को खा जाता है.सिंह, बैल को खाता है पर सभी साथ-साथ प्यार से रहते है.यही समन्वय परिवार में होना चाहिये.
और गृहस्थ कैसा है ?शिव पार्वती काम चरित्र की नहीं राम चरित्र की चर्चा करते है . भगवान शिव जी ने ही पार्वती जी को राम कथा सुनाई है.कौन कहता है पति-पत्नी में केवल खटसंग अर्थात झगड़ा ही होता है, काम चर्चा ही होती है, संत्संग और राम चर्चा भी हो सकती है.
यदि हम श्रीमद्भागवत में देवहुति और कर्दम जी के गृहस्थ जीवन को देखे तो गृहस्थ में प्रवेश होने पर १४ वर्षों तक दोनों पति पत्नी के बीच में केवल सत्संग ही हुआ है फिर गृहस्थ में प्रवेश किया है. इसलिए भगवान कपिल के रूप में उनके यहाँ अवतरित हुए है. इसलिए जो इस शिव चरित्र को अपने जीवन में उतारता है वही राम कथा में प्रवेश का अधिकारी है !
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8>ये 5 चढ़ावे भगवान शिव को कभी न चढ़ाए

हिंदू धर्म और परंपरा के अनुसार शिवलिंग कभी ऐसी जगह नहीं रखा जाता जहां उसकी उसकी रीति-रिवाज के अनुसार पूजा ना हो सके क्योंकि इससे शिव जी नाराज़ हो सकते हैं। माना जाता है कि भगवान शिव बहुत ही मासूम और रहमदिल हैं जो आसानी से लोगों की मन्नत पूरी कर देते हैं लेकिन इनका ग़ुस्सा भी उतना ही तेज़ है।

शिव जी को बैरागी कहा गया है इस लिए उन्हें आम ज़िन्दगी में इस्तेमाल होने वाली चीज़ें नहीं चढ़ाई जाती हैं। भगवान भोलेनाथ को खुश करने के लिए आप उन्हें भांग-धतूरा, दूध, चंदन, और भस्म चढ़ाते हैं। कहा जाता है कि भोलेनाथ की पूजा करने से वही नही बल्कि सारे भगवान ख़ुश हो जाते हैं। शिव पुराण के अनुसार शिव जी के भक्तों को शिवलिंग पर कभी भी नीचे दी गयी वस्तुएं नहीं चढ़ानी चाहिए।
केतकी
केतकी के फूल एक बार ब्रह्माजी व विष्णुजी में विवाद छिड़ गया कि दोनों में श्रेष्ठ कौन है। ब्रह्माजी सृष्टि के रचयिता होने के कारण श्रेष्ठ होने का दावा कर रहे थे और भगवान विष्णु पूरी सृष्टि के पालनकर्ता के रूप में स्वयं को श्रेष्ठ कह रहे थे। तभी वहां एक विराट लिंग प्रकट हुआ। दोनों देवताओं ने सहमति से यह निश्चय किया गया कि जो इस लिंग के छोर का पहले पता लगाएगा उसे ही श्रेष्ठ माना जाएगा। अत: दोनों विपरीत दिशा में शिवलिंग की छोर ढूढंने निकले। छोर न मिलने के कारण विष्णुजी लौट आए। ब्रह्मा जी भी सफल नहीं हुए परंतु उन्होंने आकर विष्णुजी से कहा कि वे छोर तक पहुँच गए थे। उन्होंने केतकी के फूल को इस बात का साक्षी बताया। ब्रह्मा जी के असत्य कहने पर स्वयं शिव वहाँ प्रकट हुए और उन्होंने ब्रह्माजी की एक सिर काट दिया और केतकी के फूल को श्राप दिया कि शिव जी की पूजा में कभी भी केतकी के फूलों का इस्तेमाल नहीं होगा।
तुलसी

शिव पुराण के अनुसार जालंधर नाम का असुर भगवान शिव के हाथों मारा गया था। जालंधर को एक वरदान मिला हुआ था कि वह अपनी पत्नी की पवित्रता की वजह से उसे कोई भी अपराजित नहीं कर सकता है। लेकिन जालंधर को मरने के लिए भगवान विष्णु को जालंधर की पत्नी तुलसी की पवित्रता को भंग करना पड़ा। अपने पति की मौत से नाराज़ तुलसी ने भगवान शिव का बहिष्कार कर दिया था
नारियल पानी
शिव जी की पूजा नारियल से होती है लेकिन नारियल पानी से नहीं। क्योंकि शिवलिंग पर चढ़ाई जाने वाली सारी चीज़ें निर्मल होनी चाहिए यानि जिसका सेवन ना किया जाए। नारियल पानी देवताओं को चढ़ाये जाने के बाद ग्रहण किया जाता है इसीलिए शिवलिंग पर नारियल पानी नहीं चढ़ाया जाता है।
हल्दी

शिवलिंग पर हल्दी कभी नहीं चढ़ाई जाती है क्योंकि यह महिलाओं की सुंदरता को बढ़ाने के लिए इस्तेमाल होती है। और शिवलिंग भगवान शिव का प्रतीक है।
कुमकुम

सिंदूर या कुमकुम हिंदू महिलाएं अपने पति की लम्बी उम्र के लिए लगाती हैं। जैसा की हम जानते हैं कि भगवान शिव विध्वंसक के रूप में जाने जाते हैं इसलिए शिवलिंग पर कुमकुम नहीं चढ़ाया जाता है।
ये भी पढ़ें:जानें सपने में शिवलिंग और सांप देखने का क्या होता है मतलब
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9>मनवांछित फल==(भोलेनाथ)

हिन्दू धर्म में सभी देवी-देवताओं को प्रसन्न करने, उनकी आराधना करने के विशिष्ट तरीकों का वर्णन उपलब्ध हैं। कुछ ऐसी सामग्रियां और विधियां होती हैं जो विशिष्ट अराध्य देव को बहुत पसंद होती हैं, उनकी पूजा में उन सामग्रियों की उपलब्धता मनवांछित फल प्रदान करती है।

समस्या का कारण
लेकिन कुछ ऐसी सामग्रियां भी होती हैं जिनका प्रयोग करना उलटा परिणाम प्रदान कर सकता है। जहां कुछ चीजें आराध्य देवी-देवताओं को पसंद आती हैं वहीं कुछ उन्हें कतई नापसंद होती हैं, ऐसे में अगर उन्हें वे अर्पित की जाएं या उनकी पूजा में उन सामग्रियों का प्रयोग किया जाए तो यह समस्या का कारण बन सकता है।

भोलेनाथ
भगवान शिव जिन्हें भोलेनाथ भी कहा जाता है और विनाशक भी। जहां वे अपने भक्तों से बहुत ही जल्दी प्रसन्न भी होते हैं तो क्रोध के कारण बहुत जल्दी रौद्र रूप भी धारण कर लेते हैं।

भांग-धतूरे का चढ़ावा
हम ये बात तो जानते ही हैं भगवान शिव को भांग-धतूरे का चढ़ावा बहुत पसंद है, आज हम आपको कुछ ऐसी सामग्रियां बताएंगे जिनका उपयोग शिव आराधना के दौरान बिल्कुल नहीं करना चाहिए।

शिवपुराण
शिवपुराण के अनुसार शिव भक्तों को कभी भी भगवान शिव को इन पांच वस्तुओं का प्रसाद नहीं चढ़ाना चाहिए। आइए जानते हैं क्या हैं वे पांच चीजें।

केतकी के फूल
एक दिन भगवान विष्णु और ब्रह्म देव, खुद को सबसे अधिक ताकतवर साबित करने के लिए आपस में युद्ध कर रहे थे। जैसे ही वे दोनों एक दूसरे पर घातक अस्त्रों का प्रयोग करने लगे वहां ज्योतिर्लिंग के रूप में भगवान शिव प्रकट हुए। शिव ने उन दोनों से इस ज्योतिर्लिंग का आदि और अंत का पता लगाने को कहा, भगवान शिव ने कहा कि दोनों में से जो भी इस सवाल का जवाब दे देगा वहीं सबसे श्रेष्ठ होगा।

ज्योतिर्लिंग
शिव ने उन दोनों से इस ज्योतिर्लिंग का आदि और अंत का पता लगाने को कहा, भगवान शिव ने कहा कि दोनों में से जो भी इस सवाल का जवाब दे देगा वहीं सबसे श्रेष्ठ होगा।

भगवान विष्णु
भगवान विष्णु उस ज्योतिर्लिंग के अंत की ओर बढ़े लेकिन उस छोर का पता लगाने में नाकामयाब रहे। ब्रह्म देव भी ऊपर की ओर बढ़े और अपने साथ केतकी के फूल को ले गए। भगवान विष्णु ने अपनी हार स्वीकार कर ली थी।

ज्योतिर्लिंग का छोरा
वापस आकर ब्रह्मा जी भगवान शिव से कहा कि उन्होंने ज्योतिर्लिंग के अंत का पता लगा लिया है और केतकी के फूल ने भी उनके झूठ को सच करार दे दिया।

अत्यंत क्रोधित
ब्रह्मा जी के इस झूठ ने भगवान शिव को अत्यंत क्रोधित कर दिया, क्रोध में आकर महादेव ने ब्रह्मा जी का एक सिर काट दिया और साथ ही उन्हें श्राप दे दिया कि उनकी कभी कोई पूजा नहीं होगी। ब्रह्माजी का वो कटा सिर केतकी के फूल में बदल गया।

श्राप
भगवान शिव ने केतकी के फूल को भी श्राप देकर कहा कि उनके शिवलिंग पर कभी केतकी के फूल को अर्पित नहीं किया जाएगा। तबसे शिव को केतकी के फूल अर्पित किया जाना अशुभ माना जाता है।

तुलसी
शिवपुराण के अनुसार असुर जालंधर की पत्नी तुलसी के मजबूत पतिधर्म की वजह से उसे कोई भी देव हरा नहीं सकता था। इसलिए भगवान विष्णु ने तुलसी के पतिव्रत को ही खंडित करने की सोची। वह जालंधर का वेष धारण कर तुलसी के पास पहुंच गए, जिसकी वजह से तुलसी का पतिधर्म टूट गया और भगवान शिव ने असुर जालंधर का वध कर उसे भस्म कर दिया।

दैवीय गुणों वाले पत्तों से वंचित
इस पूरी घटना ने तुलसी को बेहद निराश कर दिया उन्होंने स्वयं भगवान शिव को अपने अलौकिक और दैवीय गुणों वाले पत्तों से वंचित कर दिया।

नारियल का पानी
हालांकि शिवलिंग पर नारियल अर्पित किया जाता है लेकिन कभी भी शिवलिंग पर नारियल के पानी से अभिषेक नहीं करना चाहिए। देवताओं को चढ़ाया जाने वाला प्रसाद ग्रहण करना आवश्यक होता है लेकिन शिवलिंग का अभिषेक जिन पदार्थों से होता है उन्हें ग्रहण नहीं किया जाता। इसलिए शिव पर नारियल का जल नहीं चढ़ाना चाहिए

हल्दी
हल्दी का प्रयोग स्त्रियों की सुंदरता बढ़ाने के लिए किया जाता है। इसलिए शिवलिंग पर कभी हल्दी नहीं चढ़ाई जाती, क्योंकि वह स्वयं शिव का रूप है।

कुमकुम या सिंदूर
सिंदूर, विवाहित स्त्रियों का गहना माना गया है। स्त्रियां अपने पति की लंबे और स्वस्थ जीवन की कामना हेतु सिंदूर लगाती हैं। लेकिन शिव तो विनाशक हैं, सिंदूर से उनकी सेवा करना अशुभ माना जाता है।
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10>श्री महाकालेश्वर मंदिर


भारत के द्वादश ज्योतिर्लिंगों में से स्वयंभू दक्षिणमुखी ज्योतिर्लिंग महाकालेश्वर का स्थान प्रमुख है। तांत्रिक परम्परा में मात्र महाकाल को ही दक्षिण मूर्ति पूजा का महत्व प्राप्त है। इसका वर्णन महाभारत, स्कन्दपुराण, वराहपुराण, नृसिंह पुराण, शिवपुराण, भागवत, शिवलीलामृत आदि ग्रन्थों में आता है। वर्तमान मंदिर तीन भाग में सबसे नीचे श्री महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग’ उसके ऊपर ’श्री ओंकारेश्वर’ एवं सबसे ऊपर श्री नागचंद्रेश्वर है। श्री महाकालेश्वर मंदिर के दक्षिण दिशा में श्री वृद्धमहाकालेश्वर एवं श्री सप्तऋषि के मंदिर हैं।



इस मंदिर का वर्णन महाभारत, स्कन्द पुराण, वराहपुराण, नृसिंहपुराण, शिवपुराण, भागवत्, शिवलीलामृत आदि ग्रन्थों में तथा कथासरित्सागर, राजतरंगिणी, कादम्बरी, मेघदूत, रघुवंश आदि काव्यों में इस देवालय का अत्यन्त सुन्दर वर्णन दिया गया है। अलबरूनी व फरिश्ता ने भी इस देवालय का सुन्दर वर्णन किया है। पुराणकारों के कथनानुसार विश्वकर्मा ने श्री महाकालेश्वर के निवासार्थ एक भव्य मन्दिर का निर्माण किया, चारों ओर एक परकोटा खिंचवाया। उस मन्दिर के महाद्वार पर एक बड़ा भारी घण्टा स्वर्ण श्रृंखला से लटकता था, और मन्दिर में सर्वत्र रत्नखचित दीपस्तम्भ थे जिन पर रत्नजड़ित दीप प्रकाशित होते थे।

भारत के द्वादश ज्योतिर्लिंगों में से स्वयंभू दक्षिणमुखी ज्योतिर्लिंग महाकालेश्वर का स्थान प्रमुख है। तांत्रिक परम्परा में मात्र महाकाल को ही दक्षिण मूर्ति पूजा का महत्व प्राप्त है। इसका वर्णन महाभारत, स्कन्दपुराण, वराहपुराण, नृसिंह पुराण, शिवपुराण, भागवत, शिवलीलामृत आदि ग्रन्थों में आता है। वर्तमान मंदिर तीन भाग में सबसे नीचे श्री महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग’ उसके ऊपर ’श्री ओंकारेश्वर’ एवं सबसे ऊपर श्री नागचंद्रेश्वर है। श्री महाकालेश्वर मंदिर के दक्षिण दिशा में श्री वृद्धमहाकालेश्वर एवं श्री सप्तऋषि के मंदिर हैं।

इस मंदिर का वर्णन महाभारत, स्कन्द पुराण, वराहपुराण, नृसिंहपुराण, शिवपुराण, भागवत्, शिवलीलामृत आदि ग्रन्थों में तथा कथासरित्सागर, राजतरंगिणी, कादम्बरी, मेघदूत, रघुवंश आदि काव्यों में इस देवालय का अत्यन्त सुन्दर वर्णन दिया गया है। अलबरूनी व फरिश्ता ने भी इस देवालय का सुन्दर वर्णन किया है। पुराणकारों के कथनानुसार विश्वकर्मा ने श्री महाकालेश्वर के निवासार्थ एक भव्य मन्दिर का निर्माण किया, चारों ओर एक परकोटा खिंचवाया। उस मन्दिर के महाद्वार पर एक बड़ा भारी घण्टा स्वर्ण श्रृंखला से लटकता था, और मन्दिर में सर्वत्र रत्नखचित दीपस्तम्भ थे जिन पर रत्नजड़ित दीप प्रकाशित होते थे।


परमार नरेशों के अभिलेखो का प्रारम्भ ही शिव स्तुति से होता है। परमार शासकों का व्यक्तिगत धर्म शैव धर्म होने के कारण जनता में शैव धर्म का प्रचार प्रसार अधिक हुआ। परमार नरेश वाक्पति राज द्वितीय की उज्जयिनी ताम्र पट्टिका से ज्ञात होता है कि उन्होंने भवानीपति की आराधना की व उज्जयिनी में शिवकुण्ड का निर्माण करवाया। परमार नरेश उदयादित्य ने महाकाल मन्दिर का जीर्णोद्धार करवाकर मन्दिर में नाग बंध अभिलेख उत्कीर्ण करवाया। परमार नरेश नरवर्मन के महाकाल अभिलेख से ज्ञात होता है कि उसने उज्जयिनी में शिव मन्दिर का निर्माण करवाया था।

श्री महाकालेश्वर मंदिर के नीचे सभा मण्डप से लगा हुआ एक कुण्ड है जो ’कोटितीर्थ’ के नाम से प्रसिद्ध है। सभा मण्डप मे एक राम मंदिर है। जिसके पीछे ’अवंतिका देवी’ की प्रतिमा है। श्री महाकालेश्वर मंदिर में प्रातः 4 बजे होने वाली भस्मारती विशेष दर्शनीय है। भस्मारती में सम्पूर्ण जीवन के जन्म से लेकर मोक्ष तक के दर्शन की कल्पना की जा सकती है। यह भस्म निरन्तर प्रज्वलित धूनी से तैयार होती है। मंदिर खुलने का समय प्रातः 4 बजे से रात्रि 11 बजे तक है। त्रिलोकी तीन अवतारों में मृत्युलोक में श्री महाकालेश्वर का अद्वितीय अवतार हैं।

मालववंशीय विक्रमादित्य के विषय में जो आख्यान से प्रतीत होता है इस राजा ने महाकालेश्वर का स्वर्ण शिखर-सुशोभित बड़ा मन्दिर बनवाया। उसके लिए अनेक अलंकार तथा चँवर, वितानादि राजचिन्ह समर्पित किए। इसके बाद ई. सं. ग्वारहवीं शताब्दी में इस मन्दिर का जीर्णोद्धार परमार वंश के भोजराजा ने करवाया था। ई. सं.1265 में दिल्ली के सुलतान शमसुद्दीन इल्तुतमिश ने इस मन्दिर को तुड़वाकर महाकाल का लिंग कोटितीर्थ में फिकवा दिया।

इस घटना के 500 वर्षां पश्चात् जब उज्जैन पर राणोजीराव शिन्दे का अधिकार हुआ उस समय उनके दीवान रामचन्द्रबाबा ने उसी स्थान पर महाकालेश्वर का मन्दिर फिर से बनवाया जो आज भी स्थित है। मन्दिर के अन्दर श्री महाकालेश्वर के पश्चिम, उत्तर और पूर्व की ओर क्रमशः गणेश, गिरिजा और षडानन की मूर्तियाँ स्थापित हैं। दक्षिण की ओर गर्भगृह के बाहर नन्दीकेश्वर विराजमान हैं। लिंग विशाल है और सुन्दर नागवेष्टित रजत जलाधारी में विराजमान हैं। बारह ज्योतिर्लिंगों में महाकालेश्वर ही दक्षिणमुखी मन्दिर है। महाकालेश्वर के गर्भगृह के ऊपर के मंजिल पर ओंकारेश्वर विराजमान हैं। श्री महाकालेश्वर के मन्दिर के दक्षिण दिशा में वृद्धकालेश्वर महाकाल और सप्तऋषि का मन्दिर है। महाकालेश्वर के ऊपर जो ओंकारेश्वर जी का मन्दिर है उसके समीप आसपास षटांगण मे स्वप्नेश्वर महादेव, बद्रीनारायण जी, नृसिंह जी, साक्षी गोपाल तथा अनादि कालेश्वर के भी मन्दिर हैं।

महाकालेश्वर के सभामण्डप में ही एक राम मन्दिर है। राम मन्दिर के पीछे अवन्तिका देवी की प्रतिमा है जो इस अवन्तिका की अधिष्ठात्री देवी हैं। नागपंचमी पर महाकाल मन्दिर के ऊपर विराजित नागचन्द्रेश्वर के दर्शन के लिए हज़ारों श्रद्धालु यहाँ आते हैं। भगवान महाकालेश्वर की आरती दिन में पाँच बार होती है-1. पट खुलने – बंद होने का समय। 2. आरती समय। 3. विशिष्ट कार्यक्रम श्रावणमास के चारों सोमवारों के दिन नगर में महाकालेश्वर की भव्य रजत प्रतिमा की सवारी निकाली जाती है जिसमें नगर के हर धर्म के लोग अपना सहयोग देते हैं। सवारी मन्दिर से निकलकर पहले क्षिप्रा तट पर जाती है। वहाँ पूजन के पश्चात नगर के प्रमुख मार्गों से होते हुए यथा स्थान पहुँच जाती है। पाँचवीं शाही एवं अंतिम सवारी मार्गों में निकाली जाती है। श्रावण मास में काँवड़ यात्रियों की सुविधा के कारण विशेष व्यवस्था होती है।

महाकालेश्वर मंदिर मे अभिषेक एवं पूजन व्यवस्था महाकाल मन्दिर मे प्रबन्ध समिति द्वारा विशेष दर्शन व्यवस्था की सुविधा शुल्क निर्धारित है। जिसका शुल्क समय-समय पर मंदिर समिति के निर्णयानुसार निर्धारित होता है।

महाकालेश्वर की सवारियाँ :-

श्रीमहाकालेश्वर क्षेत्र में ठहरने की व्यवस्था -
धर्मशाला
विश्रामधाम
प्रवचन सभागार

श्री महाकालेश्वर प्रसादी व्यवस्था- महाकालेश्वर सेवा समिति द्वारा तीन प्रकार के प्रसाद तैयार कराकर विक्रय किया जाता है-सूखे मेवा, बेसन लड्डू, चिरौंजी।

अमानती सामान पट-निःशुल्क।

भूतभावन भगवान महाकाल की वर्षभर मे निम्नांकित-सवारियाँ निकाली जाती हैं- सभी सवारियों में प्रशासन की ओर से पुलिस व्यवस्था, प्राचीन राज्य के प्रतीक चोपदार, पुरोहित एवं श्रद्धालुजन सम्मिलित रहते हैं- ये सवारियाँ निश्चित् समय शाम चार बजे निकलती हैं। ये सवारियाँ हैं-
सावन-भादों की 6 सवारियाँ कभी 7 जिसमें एक शाही सवारी (अंतिम सवारी जो भाद्रपद, कृष्ण के अन्तिम सोमवार को निकलती है।)
कार्तिक माह की सवारी (कार्तिक शुक्ल से मार्ग कृष्ण के प्रत्येक सोमवार को)
दशहरा मैदान तक दशहरा के दिन सभी पूजन के लिए
बैकुण्ठ चौदस (कार्तिक शुक्ल चतुर्दशी) को रात्रि 11 बजे गोपाल मन्दिर तक ( यह एक मात्र सवारी रात्रि को निकलती है)
उमा साँझी सवारी

ज्योतिर्लिंग महाकालेश्वर का विभिन्न अवसरों पर आकर्षक श्रृंगार किया जाता है। यह श्रृंगार दर्शनीय होता है।
श्रामण माह में
शिवरात्रि को
नागपंचमी
भाग पूजा
भात-पूजा

भस्मार्ती शिवरात्रि के दूसरे दिवस दोपहर 12 बजे कार्तिक कृष्ण चतुर्दशी रूप चौदस के दिन महाकालेश्वर में विशेष अन्नकूट एवं इसके अलावा महाकालेश्वर मन्दिर में अनेक विभिन्न उल्लेखनीय गतिविधियाँ आयोजित होती हैं जो निम्नानुसार है-

हरिहर मिलाप-हरि (विष्णु) और हर (शिव) का मिलाप
श्रावण महोत्सव- महाकाल मंदिर समिति द्वारा श्रावण भाद्रपद के सोमवार से पहले अर्थात् रविवार की शाम को सांस्कृतिक आयोजन करवाया जाता है। जिसमें देश के ख्यातिनाम शास्त्रीय गायक, वादक भागीदारी करते हैं एवं शास्त्रीय नृत्य का आयोजन भी होता है।

शिवरात्रि को दिन में भस्मारती का आयोजन होता है। इस दिन भस्मारती पूजन एवं दर्शन का विशेष महत्व होता है।

उमा-महेश्वर व्रत

साँझी उत्सव- मालवा की परम्परानुसार यह उत्सव आयोजित होता है।

नाग पंचमी: वर्ष में 1 बार खुलने वाले नागचंद्रेश्वर मन्दिर में दर्शन के लिए भारी संख्या में श्रद्धालुओं की कतार लगती है।

महाकालेश्वर मंदिर में भूतभावन ज्योर्तिलिंग की पूजा अर्चन के लिए 16 पुजारी प्रशासन द्वारा नियुक्त हैं। भस्मारती के नेम्नूकदार 4 परिवार 8 पुजारी हें, इसके अतिरिक्त ब्राह्मण पुरोहित जो सभा मण्डप में विराजित होते हैं, पूजन अर्चन करवाने के लिए अधिकृत हैं। 16 पुजारी में एक पुजारी मुख्य पुजारी होता है।

पुजारियों को महाकालेश्वर मन्दिर संस्थान द्वारा वेतन दिया जाता है। जबकि पुरोहितों को पूजन-अर्चन करवाने की रसीद का 75 प्रतिशत मिलता है। शेष 25 प्रतिशत मन्दिर के विकास में खर्च किया जाता है। मन्दिर प्रवेश द्वार से पूजन की रसीद कटवाने पर ज्योतिर्लिंग महाकालेश्वर के विविध पूजन निम्नानुसार करवाया जा सकता है-

पूजन
सामान्य पूजा
अभिषेक महिम्न स्रोत
रुद्राभिषेक वैदिक पूजा
रुद्राभिषेक ग्यारह दर्शना वैदिक पूजा
लघु रूद्र
महारूद्र रूद्राभिषेक 11 एक दर्शना वैदिक पूजा

इसके अतिरिक्त एवं भाँग पूजा, भण्डारा, अन्नकूट भी करवाया जा सकता है।


मंदिरो का विवरण
उज्जैन, आज भी मंदिरों और पुरानी परम्पराओं को एक-दूसरे से जोड़े हुए है। समय के थपेड़ों ने कई प्राचीन मंदिरों को जीर्ण-शीर्ण कर दिया है, लेकिन जनमानस की आस्थाओं की तरह दृढ़ ये मंदिर आज भी खड़े हैं। श्रद्धालु और सरकार समय-समय पर इन मंदिरों का जीर्णोद्धार करते रहे हैं। उज्जैन की परम्पराएँ और मंदिर पुरातन काल की भाँति आज भी अक्षुण्ण बनी हुई हैं।







भगवान गणेश का यह मन्दिर क्षिप्रा नदी के समीप फ़तेहाबाद रेलवे लाइन पर स्थित है। यह माना जाता है कि इस मंदिर में स्‍थापित गणेश जी की प्रतिमा स्वयंभू है। उनके दोनों ओर उनकी पत्नियां रिद्धि और सिद्धि विराजमान हैं।निरंतर...
श्री महाकालेश्वर मन्दिर


उज्जैन के अधिपति भगवान शिव की महिमा यहाँ के कण-कण में विराजमान हैं। भारत के हृदयस्थल मध्यप्रदेश के उज्जैन में पुण्य सलिला क्षिप्रा के तट के निकट भगवान शिव 'महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग' के रूप में विराजमान हैं।निरंतर...
हरसिद्धि मन्दिर


उज्जैन के प्राचीन पवित्र स्थलों की आकाशगंगा में यह मन्दिर एक विशेष स्थान रखता है। यह मंदिर देवी अन्नपूर्णा को समर्पित है जो गहरे सिंदूरी रंग में रंगी है। देवी अन्नपूर्णा की मूर्ति देवी महालक्ष्मी और देवी सरस्वती की मूर्तियों के बीच विराजमान है।निरंतर...
बड़े गणेशजी का मन्दिर


यह मन्दिर महाकालेश्वर मन्दिर के पास एक तालाब के ऊपर स्थित है, जिसमें भगवान शिव के सुपुत्र की विशाल कलात्मक प्रतिमा स्थापित है। यह शहर में स्थित पारम्परिक मंदिरों में से एक माना जाता है।निरंतर...
श्री रामजनार्दन मन्दिर


प्राचीन विष्णु सागर के तट पर स्थित यह विशाल परकोटे से घिरा मंदिर समूह है। इसमें एक राममंदिर है दूसरा जनार्दन (विष्णु) का मंदिर है। इसे सवाई राजा एवं मालवा के सूबेदार जयसिंह ने बनवाया था। परकोटा तथा कुण्ड मराठाकाल में निर्मित हुए। होल्कर महारानी अहिल्याबाई ने इसका जीर्णोद्धार कराया था।निरंतर...
नगरकोट की रानी का मन्दिर


स्थूल रूप से यह प्रतीत होता है कि यह नगरकोट के परकोटे की रक्षिका देवी है। मन्दिर परमारकालीन है। यहाँ अवन्ति खण्ड में वर्णित नौ मातृकाओं में से सातवीं 'कोटरी देवी' है। दोनों नवरात्रि के अवसर पर यहाँ विशेष नवरात्रि उत्सव मनाया जाता है।निरंतर...
चौबीस खम्बा माता मन्दिर


श्री महाकालेश्वर मन्दिर के पास से पटनी बाजार की ओर जाने वाले मार्ग पर यह पुरातन द्वारा 'चौबीस खम्बा' कहलाता है। यह द्वार बहुत प्राचीन है। यहाँ पर १२ वीं शताब्दी का एक शिलालेख लगा हुआ था उसमें लिखा था कि अनहीलपट्टन के राजा ने अवन्ति में व्यापार करने के लिए नागर व चतुर्वेदी व्यापारियों को यहाँ लाकर बसाया था।निरंतर...
त्रिवेणी नवग्रह (शनि मन्दिर)


शिप्रा नदी के त्रिवेणी घाट पर नवग्रह का यह मन्दिर यात्रियों का प्रमुख केन्द्र है। त्रिवेणी घाट के पास शिप्रा नदी पर खान नदी से संगम है. इस नदी का नाम पास ही इन्दौर नगर में बाणगंगा है। कुछ लोग इस नदी को तुंगभद्रा भी मानते थे। त्रिवेणी संगम की कल्पना के साथ अदृश्य नदी सरस्वती की पौराणिक मान्यता इस स्थान के साथ भी जुड़ी हुई है।निरंतर...
गढ़कालिका मन्दिर


यह मन्दिर कालिका देवी को समर्पित है, जो हिन्दू पौराणिक कथाओं के अनुसार बहुत शक्तिशाली देवी हैं। कालजयी कवि कालिदास गढ़ कालिका देवी के उपासक थे। कालिदास के सम्बन्ध में मान्यता है कि जब से वे इस मंदिर में पूजा-अर्चना करने लगे तभी से उनके प्रतिभाशाली व्यक्तित्व का निर्माण होने लगा।निरंतर...
श्री गोपाल मन्दिर


महाराजा दौलतराव शिन्दे की धर्मपत्नी बायजाबाई शिन्दे ने अपने आराध्य देव गोपाल कृष्ण का यह मन्दिर उन्नीसवीं शताब्दी में बनवाया था. यह मन्दिर मराठा स्थापत्य कला का सुन्दर उदाहरण है। इस मन्दिर के गर्भगृह में गोपाल कृष्ण के अलावा शिव-पार्वती, और बायजाबाई की प्रतिमाएँ भी हैं।निरंतर...
मंगलनाथ मन्दिर


अंकपात के निकट शिप्रा तट के एक टीले पर मंगलनाथ का मन्दिर है। मंगलेश्वर का भव्य मंदिर शिप्रा तट पर स्थित है। मन्दिर के निकट शिप्रा का विशाल घाट है। पौराणिक परंपरा से यह मान्यता है कि उज्जैन मंगलग्रह की जन्मभूमि है। ऐसा भी माना जाता है कि मंगलनाथ के ठीक शीर्ष के ऊपर ही आकाश में मंगलग्रह स्थित है।निरंतर...
सांदिपनी आश्रम


संदीपनी आश्रम का पौराणिक महत्व है। गुरु सांदीपनि‍ के इस आश्रम में ही श्रीकृष्ण, उनके मित्र सुदामा और भाई बलराम ने शिक्षा ग्रहण की। इस जगह का उल्लेख महाभारत में किया गया है।निरंतर...
श्री कालभैरव मन्दिर


आठ भैरव की पूजा शैव परंपरा का एक हिस्सा है और इनमें से काल भैरव को प्रधान माना जाता है। कहते हैं कि शिप्रा के तट पर काल भैरव के मंदिर का निर्माण राजा भद्रसेन ने करावाया था। भगवान काल भैरव को उज्जैन नगर का सेनापति भी कहा जाता है और प्रसाद के रूप में मदिरा का भोग लगाया जाता है।निरंतर...
श्री सिद्धवट मन्दिर (शक्तिभेद तीर्थ)


उज्जैन का सिध्दवट प्रयत्न के अक्षयवट, वृन्दावन के वंशीवट तथा नासिक के पंचवट के समान अपनी पवित्रता के लिए प्रसिध्द है। पुण्यसलिला शिप्रा के सिध्दवट घाट पर अन्त्येष्टि-संस्कार सम्पन्न किया जाता है। स्कन्द पुराण में इस स्थान को प्रेत-शिला-तीर्थ कहा गया है। एक मान्यता के अनुसार पार्वती ने यहाँ तपस्या की थी।निरंतर...
इस्कॉन मन्दिर


इस्कॉन एक अंतरराष्ट्रीय आध्यात्मिक संस्था है। जिसकी स्थापना कृष्ण कृपामूर्ति श्रीमद् अभय चरणारविन्द स्वामी प्रभुपाद ने सन 1966 में न्यूयॉर्क शहर में की। अंग्रेजी में इसे International Society for Krishna Consciousness अर्थात अंतरराष्ट्रीय कृष्ण भावनामृत संघ कहते है। विश्व के लगभग सभी देशों में इस्कॉन ने अपने केंद्र खोल रखे है।निरंतर...
पीर मत्स्येन्द्रनाथ


भर्तृहरि गुफा के चारों ओर का क्षेत्र प्राचीन उज्जैन क्षेत्र था। पुरातत्वीय उत्खनन से प्राप्त अवशेष इसकी प्राचीनता सिद्ध करते हैं। यहीं पर 'पीर मत्स्येन्द्रनाथ' की समाधि है। नवनाथों के प्रमुख 'मत्स्येन्द्रनाथ' थे। नाथ सम्प्रदाय के संतों को पीर कहा जाता है अतः 'मत्स्येन्द्रनाथ' को 'पीर' कहा जाता है।

उज्जैन में 84 महादेव

उज्जैन कैसे पहुँचें


वायु सेवा द्वारा


उज्जैन के शहर के सबसे पास इन्दौर का देवी अहिल्याबाई होलकर हवाई अड्डा है जो यहाँ से 55कि.मी की दूरी पर स्थित है। निजी और सार्वजनिक घरेलू विमान सेवाओं के माध्यम से इन्दौर हवाई अड्डा भारत के अन्य महत्वपूर्ण शहरों से जुड़ा है। पर्यटक उज्जैन तक आने के लिए इन्दौर हवाई अड्डे से टैक्सी भी ले सकते हैं। इन्दौर से उज्जैन तक आने के लिए यात्री बस भी ले सकते हैं।
उज्जैन

55 किमी दूर

इन्दौर हवाई अड्डे (IDR)इन्दौर, मध्य प्रदेश
उज्जैन

172 किमी दूर

भोपाल हवाई अड्डे (BHO)भोपाल, मध्य प्रदेश

उज्जैन सिंहस्थ महाकुम्भ २०१६ मेले में आने के लिये के लिये हवाई उड़ान यहाँ खोजिये|

ट्रेन द्वारा

उज्जैन जंक्शन रेलवे स्टेशन उज्जैन का मुख्य रेलवे स्टेशन है जो भारत के सभी प्रमुख रेलवे स्टेशनों से जुड़ा है। पर्यटक उज्जैन से इंदौर, दिल्ली, पुणे, मुंबई, चेन्नई, कोलकाता, जम्मू, भोपाल, जयपुर, वाराणसी, गोरखपुर, रतलाम, अहमदाबाद, बड़ौदा, ग्वालियर, हैदराबाद, बैंगलोर और अन्य कई बड़े शहरों के लिए सीधी रेलगाडि़याँ ले सकते हैं। आईआरसीटीसी

सड़क मार्ग (बस, टैक्सी)


यह शहर भली प्रकार से राज्य सड़क परिवहन की सार्वजनिक बसों द्वारा जुड़ा है। भोपाल (183 किमी), इन्दौर (55 किमी), अहमदाबाद (400 किमी) तथा ग्वालियर (450 किमी) से उज्जैन के लिए नियमित बसें उपलब्ध हैं। इसके अलावा इन मार्गों पर पर्यटक नियमित रूप से डीलक्स एसी और सुपरफास्ट बसों का लाभ उठा सकते हैं।

टैक्सी सेवा: उज्जैन-इंदौर और उज्जैन-भोपाल और अन्य आसपास के स्थानों के लिये शीघ्र, सुरक्षित और सुविधाजनक अंतर्नगरीय टैक्सी सेवा उपलब्ध है। ये सेवाएँ देश के नामी-गिरामी टैक्सी ऑपरेटर्स द्वारा संचालित की जा रही है।


बस स्टैंड : (१) देवास गेट बस स्टैंड (रेलवे स्टेशन के पास) (२) नानाखेड़ा बस स्टैंड


मध्यप्रदेश के बारे में जानकारी

मध्यप्रदेश राज्य भारत के केन्द्र में स्थित है| अतः अक्सर इसे “भारत का ह्रदय” कहा जाता है| यह राज्य एक समृद्ध सांस्कृतिक विरासत का घर है और व्यवहारिक रूप से यहाँ सब कुछ है; जैसे कि बड़े पठार, शानदार पर्वत श्रृंखला, दूरी तक फैले घने जंगलों के बीच चकरा देने वाली नदियां, वनवासी परिवेश में वन्य जीवों की रोमांचक चित्रमाला, अनगिनत स्मारक|
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