4>|| ॐ नमः शिवाय*** (1 to 10 )
संगतिमेवं प्रतिदिन पठनं यः कुरुते।
2> ।। शिव महापुराण ।।
उर्व्वारूकमिव बन्धनान्न्मृत्योर्म्मुक्षीय मामृतात् ।
1>-------------ॐ नमः शिवाय
1 A>----------उं नमःशिवा़य
2>-------------।। शिव महापुराण ।।
3>-------------शिवजी के विवरण
4>---------------सोमनाथ
5>---------------महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग की कहानी
6>---------------।।जय श्री बाबा महाकाल ।।
7>---------------बालकाण्ड में भगवान शिव जी के सुन्दर चरित्र का वर्णन
8>---------------ये 5 चढ़ावे भगवान शिव को कभी न चढ़ाए
9>---------------मनवांछित फल==(भोलेनाथ)
10---------------श्री महाकालेश्वर मंदिर
10---------------श्री महाकालेश्वर मंदिर
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1> ॐ नमः शिवाय
संगतिमेवं प्रतिदिन पठनं यः कुरुते।
शिवसायुज्यं गच्छति भक्त्या यः श्रृणुते ॥ हर...॥
दध्ना च पशु कामाय
ॐ त्र्यम्बकँ य्यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्द्धनम् ।
नीराजयते ब्रह्मा वेदऋचां पठते॥
अर्थात
ॐ नमः शिवाय हर हर महादेव
श्रिया इक्षु रसेन च ।
मध्वाज्येन धनार्थी
स्यान् मुमुक्षीस्तीर्थ वारीणा ।।
विशेष रूप से केवल दूध की धारा से अभिषेक करना चाहिए इससे मनो भीलषित कामना की पूर्ति होती है
बुद्धि की जड़ता को दूर करने के लिए शक्कर मिले दूध से अभिषेक करना चाहिए इस करने पर भगवान् शंकर
की कृपा से उसकी बुद्धि श्रेष्ठ हो जाती है
की कृपा से उसकी बुद्धि श्रेष्ठ हो जाती है
1 A> उं नमःशिवा़य
ॐनमः शिवाय
तत्पुरूषाय विद्महे महादेवायधीमही
तनो रूद्रः प्रचोदयात्
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------------------------------------
उर्व्वारूकमिव बन्धनान्न्मृत्योर्म्मुक्षीय मामृतात् ।
ॐ जय गंगाधर जय हर जय गिरिजाधीशा।
त्वं मां पालय नित्यं कृपया जगदीशा॥ हर...॥
कैलासे गिरिशिखरे कल्पद्रमविपिने।
गुंजति मधुकरपुंजे कुंजवने गहने॥
कोकिलकूजित खेलत हंसावन ललिता।
रचयति कलाकलापं नृत्यति मुदसहिता ॥ हर...॥
तस्मिंल्ललितसुदेशे शाला मणिरचिता।
तन्मध्ये हरनिकटे गौरी मुदसहिता॥
क्रीडा रचयति भूषारंचित निजमीशम्।
इंद्रादिक सुर सेवत नामयते शीशम् ॥ हर...॥
बिबुधबधू बहु नृत्यत नामयते मुदसहिता।
किन्नर गायन कुरुते सप्त स्वर सहिता॥
धिनकत थै थै धिनकत मृदंग वादयते।
क्वण क्वण ललिता वेणुं मधुरं नाटयते ॥हर...॥
रुण रुण चरणे रचयति नूपुरमुज्ज्वलिता।
चक्रावर्ते भ्रमयति कुरुते तां धिक तां॥
तां तां लुप चुप तां तां डमरू वादयते।
अंगुष्ठांगुलिनादं लासकतां कुरुते ॥ हर...॥
कपूर्रद्युतिगौरं पंचाननसहितम्।
त्रिनयनशशिधरमौलिं विषधरकण्ठयुतम्॥
सुन्दरजटायकलापं पावकयुतभालम्।
डमरुत्रिशूलपिनाकं करधृतनृकपालम् ॥ हर...॥
मुण्डै रचयति माला पन्नगमुपवीतम्।
वामविभागे गिरिजारूपं अतिललितम्॥
सुन्दरसकलशरीरे कृतभस्माभरणम्।
इति वृषभध्वजरूपं तापत्रयहरणं ॥ हर...॥
शंखनिनादं कृत्वा झल्लरि नादयते।
अतिमृदुचरणसरोजं हृत्कमले धृत्वा।
अवलोकयति महेशं ईशं अभिनत्वा॥ हर...॥
ध्यानं आरति समये हृदये अति कृत्वा।
रामस्त्रिजटानाथं ईशं अभिनत्वा॥
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3>शिवजी के विवरण
4> सोमनाथ
4==1 सोमनाथ
शिव महापुराण के कोटिरुद्र संहिता के चौदहवें अध्याय में लिखा है-
विमले च कुले त्वं हि समुत्पन्नः कलानिधे।
आश्रितेषु च सर्वेषु न्यूनाधिक्यं कथं तव।।
कृतं चेतत्कृतं तच्च् न कर्त्तव्यं त्वया पुनः।
वर्तनं विषमत्वेन नरकप्रदमीरितम्।।
न मानितं त्वया यस्मात्तस्मात्त्वं च क्षयी भव[1]।।
4==2 धार्मिक मान्यता
तत्र स्नाति नरो यः स सर्वेः पापैः प्रमुच्यते।।
रोगाः सर्वे क्षयाद्याश्च ह्वासाध्या ये भवन्ति वै।
ते सर्वे च क्षयं यान्ति षण्मासं स्नानमात्रतः।।
प्रभासं च परिक्रम्य पृथिवीक्रमसं भवम्।
फलं प्राप्नोति शुद्धात्मा मृतः स्वर्गे महीयते।।
सोमलिंग नरो दृष्टा सर्वपापात्प्रमुच्यते ।
लब्धवा फलं मनोभीष्टं मृतः स्वर्गं समीहते।।
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3>शिवजी के विवरण
1. शिव जी की जटा :-
जो कि शरीर और आत्मा का सामंजस्य दिखाता है अगर आपको एक अच्छा विद्यार्थी बनाना है तो उसके लिए
आपके दिमाग और आत्मा का स्वस्थ होना बहुत जरुरी है। और उसके लिए अपने मन, शरीर और आत्मा के
बीच संतुलन रखना होगा। जिससे आप किसी भी परेशानी से लड़ सकते हैं।
*****
2.तीसरी आंख :-
मन की आंखों से देखे अगर हमे ज़िन्दगी में कुछ बनना है तो जो सोचा है उसे पूरा करना होगा। यही हमे ज़िन्दगी
जीना सिखाता है। जो हमे लग रहा है कि यह हम नहीं कर पायेंगे और उसे पाने के लिए जी जान से कोशिश कर के
हासिल कर लें तो शयद आपको को भी अपने ऊपर आश्चर्य हो। यही सिख हमे मिलती है भगवन शिव से जो हो
रहा है उसके परे की सोचें और उसे हासिल करने में लग जाएँ।
*******
3.त्रिशूल :-
मन, बुद्धि और अहंकार पर नियंत्रण अगर आपको ज़िन्दगी बहुत सारी परेशानियों के बाद या सिर्फ हार के डर से
आपने कुछ पाया है, तो यहीँ से आपके अंदर अहंकार आने लगता है। और अगर आपको ज़िन्दगी में आगे सफल
होना है तो इसे नियंत्रण में रखना जरुरी है। जिस इंसान में अहंकार नहीं होता है उसकी बुद्धि और मन बेहतर
तरीके से काम करते हैं।
*****
4.ध्यान मुद्रा :-
मन की शांति दिमाग की शांति का बहुत बड़ा महत्व है हमारी ज़िन्दगी में। यह हमे रोज़मरा की परेशानियों से लड़ने
की ताकत देता है और हमारे दिमाग को स्वस्थ रहने में मदद करता है।
********
5.शरीर पर राख : -
सब कुछ अस्थायी है, यहां तक कि हमारा शरीर भी आज कल औरतें ही नहीं बल्कि आदमी भी अपनी खूबसूरती के
लिए ना जाने कितने पैसे खर्च करते हैं। क्या यह सही है। यह जानेते हुए भी कि सब कुछ अस्थायी। पर इसका मतलब
यह बिल्कुल नहीं है कि आप अपने स्वास्थ को नज़रंदाज़ करें। बाहरी सुंदरता से नहीं अपनी अंदर की सुंदरता को
बहार निकलने की कोशिश करें।
*********
6.नीलकंठ :-
बुराई (गुस्से) को ख़त्म करना गुस्सा हम सब का सबसे बड़ा दुश्मन है, इसे खत्म या नियंत्रण करना भी हमारी हीज़िमेदारी है।
गुस्सा अगर अंदर रहा जाये तो ज़हर है और बहार निकले तो दुसरो के लिए हानिकारक हो सकता है। तो अगली बार गुस्सा
आये तो बहार टहलने चले जाये या गुस्से को नियंत्रण रखने के लिए शान्त रहे।
*******-----
7.डमरू :
-शरीर की सभी इच्छाओं से मुक्ति भगवन शिव का डमरू यह दिखाता की आप कि इच्छा शक्ति मजबूत हो जिससे आप
अपनी सारी बुराईयों पर काबू पा सके। और यह सब आपको हासिल होगा सही खान पान और सही व्यायाम से।
********
8.गंगा :-
अज्ञानता का अंत और ज्ञान तथा शांति की सुबह सही ज्ञान ही इंसान को एक बेहतर मनुष्य बनाता है। और अपने ऊपर
विश्वास करना सिखाता है। जिससे आप ज़िन्दगी उन सारी समस्यों से लड़ सकते है और अपनी ज़िन्दगी को और बेहतर
बना सकते हैं।
*********-
9.कमंडल : -
शरीर से सब बुराइयों को हटाना अपने मन और शरीर दोनों से बुरे विचार, नकारात्मकता और गन्दगी को बहार निकल
देना ही अच्छी और बेहतर सोच को जन्म देता है। इसे आपक दिमाग अच्छे से काम और नयी सोच को विकसित करने
में मदद करता है।
***************
10.गले में नाग : -
अहंकार पर नियंत्रण अहंकार आपका सबसे बड़ा दुश्मन है, और यह क्रोध को जन्म दहवे कर आपका स्वास्थ
ख़राब करता है। तो अपने अहंकार को खत्म करें और मानसिक और शारीरिक रूप से शांत रहने
की कोशिश करें।
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4==1 सोमनाथ
धार्मिक मान्यता सोमनाथ भगवान की पूजा और उपासना करने से उपासक भक्त के क्षय तथा कोढ़ आदि रोग
सर्वथा नष्ट हो जाते हैं और वह स्वस्थ हो जाता है।
सर्वथा नष्ट हो जाते हैं और वह स्वस्थ हो जाता है।
सोमनाथ मन्दिर जिसे सोमनाथ ज्योतिर्लिंग भी कहा जाता है, गुजरात (सौराष्ट्र) के काठियावाड़ क्षेत्र के अन्तर्गत
प्रभास में विराजमान हैं। इसी क्षेत्र में भगवान श्रीकृष्णचन्द्र ने यदु वंश का संहार कराने के बाद अपनी नर लीला
समाप्त कर ली थी। ‘जरा’ नामक व्याध (शिकारी) ने अपने बाणों से उनके चरणों (पैर) को बींध डाला था।
प्रभास में विराजमान हैं। इसी क्षेत्र में भगवान श्रीकृष्णचन्द्र ने यदु वंश का संहार कराने के बाद अपनी नर लीला
समाप्त कर ली थी। ‘जरा’ नामक व्याध (शिकारी) ने अपने बाणों से उनके चरणों (पैर) को बींध डाला था।
पौराणिक वर्णन
शिव पुराण के अनुसार द्वादश ज्योतिर्लिंग में सोमनाथ की गणना प्रथम है। इनके आविर्भाव का प्रकरण प्रजापति
दक्ष और चन्द्रमा के साथ जुड़ा है। जब प्रजापति दक्ष ने अपनी अश्विनी आदि सभी सत्ताइस पुत्रियों का विवाह
चन्द्रमा के साथ कर दिया, तो वे बहुत प्रसन्न हुए। पत्नी के रूप में दक्ष कन्याओं को प्राप्त कर चन्द्रमा बहुत शोभित
हुए और दक्षकन्याएँ भी अपने स्वामी के रूप में चन्द्रमा को प्राप्त कर शोभायमान हो उठी। चन्द्रमा की उन
सत्ताइस पत्नियों में रोहिणी उन्हें अतिशय प्रिय थी, जिसको वे विशेष आदर तथा प्रेम करते थे। उनका इतना प्रेम
अन्य पत्नियों से नहीं था। चन्द्रमा की उदासीनता और उपेक्षा का देखकर रोहिणी की अपेक्षा शेष स्त्रियाँ बहुत
दुःखी हुई। वे सभी स्त्रियाँ अपने पिता दक्ष की शरण में गयीं और उनसे अपने कष्टों का वर्णन किया। अपनी पुत्रियों
की व्यथा और चन्द्रमा के दुर्व्यवहार को सुनकर दक्ष भी बड़े दुःखी हुए। उन्होंने चन्द्रमा से भेंट की और शान्तिपूर्वक
कहा- ‘कलानिधे! तुमने निर्मल व पवित्र कुल में जन्म लिया है, फिर भी तुम अपनी पत्नियों के साथ भेदभावपूर्ण
व्यवहार करते हो। तुम्हारे आश्रय में रहने वाली जितनी भी स्त्रियाँ हैं, उनके प्रति तुम्हारे मन में प्रेम कम और अधिक,
ऐसा सौतेला व्यवहार क्यों है? तुम किसी को अधिक प्यार करते हो और किसी को कम प्यार देते हो, ऐसा क्यों
करते हो? अब तक जो व्यवहार किया है, वह ठीक नहीं है, फिर अब आगे ऐसा दुर्व्यवहार तुम्हें नहीं करना चाहिए।
जो व्यक्ति आत्मीयजनों के साथ विषमतापूर्ण व्यवहार करता है, उसे नर्क में जाना पड़ता है।’ इस प्रकार प्रजापति दक्ष
ने अपने दामाद चन्द्रमा को प्रेमपूर्वक समझाया और ऐसा सोच लिया कि चन्द्रमा में सुधार हो जाएगा। उसके बाद
प्रजापति दक्ष वापस चले गये।
दक्ष और चन्द्रमा के साथ जुड़ा है। जब प्रजापति दक्ष ने अपनी अश्विनी आदि सभी सत्ताइस पुत्रियों का विवाह
चन्द्रमा के साथ कर दिया, तो वे बहुत प्रसन्न हुए। पत्नी के रूप में दक्ष कन्याओं को प्राप्त कर चन्द्रमा बहुत शोभित
हुए और दक्षकन्याएँ भी अपने स्वामी के रूप में चन्द्रमा को प्राप्त कर शोभायमान हो उठी। चन्द्रमा की उन
सत्ताइस पत्नियों में रोहिणी उन्हें अतिशय प्रिय थी, जिसको वे विशेष आदर तथा प्रेम करते थे। उनका इतना प्रेम
अन्य पत्नियों से नहीं था। चन्द्रमा की उदासीनता और उपेक्षा का देखकर रोहिणी की अपेक्षा शेष स्त्रियाँ बहुत
दुःखी हुई। वे सभी स्त्रियाँ अपने पिता दक्ष की शरण में गयीं और उनसे अपने कष्टों का वर्णन किया। अपनी पुत्रियों
की व्यथा और चन्द्रमा के दुर्व्यवहार को सुनकर दक्ष भी बड़े दुःखी हुए। उन्होंने चन्द्रमा से भेंट की और शान्तिपूर्वक
कहा- ‘कलानिधे! तुमने निर्मल व पवित्र कुल में जन्म लिया है, फिर भी तुम अपनी पत्नियों के साथ भेदभावपूर्ण
व्यवहार करते हो। तुम्हारे आश्रय में रहने वाली जितनी भी स्त्रियाँ हैं, उनके प्रति तुम्हारे मन में प्रेम कम और अधिक,
ऐसा सौतेला व्यवहार क्यों है? तुम किसी को अधिक प्यार करते हो और किसी को कम प्यार देते हो, ऐसा क्यों
करते हो? अब तक जो व्यवहार किया है, वह ठीक नहीं है, फिर अब आगे ऐसा दुर्व्यवहार तुम्हें नहीं करना चाहिए।
जो व्यक्ति आत्मीयजनों के साथ विषमतापूर्ण व्यवहार करता है, उसे नर्क में जाना पड़ता है।’ इस प्रकार प्रजापति दक्ष
ने अपने दामाद चन्द्रमा को प्रेमपूर्वक समझाया और ऐसा सोच लिया कि चन्द्रमा में सुधार हो जाएगा। उसके बाद
प्रजापति दक्ष वापस चले गये।
शिव महापुराण के कोटिरुद्र संहिता के चौदहवें अध्याय में लिखा है-
विमले च कुले त्वं हि समुत्पन्नः कलानिधे।
आश्रितेषु च सर्वेषु न्यूनाधिक्यं कथं तव।।
कृतं चेतत्कृतं तच्च् न कर्त्तव्यं त्वया पुनः।
वर्तनं विषमत्वेन नरकप्रदमीरितम्।।
प्रबल भावी के कारण विवश चन्द्रमा ने अपने ससुर प्रजापति दक्ष की बात नहीं मानी। रोहिणी के प्रति अतिशय
आसक्ति के कारण उन्होंने अपने कर्त्तव्य की अवहेलना की तथा अपनी अन्य पत्नियों का कुछ भी ख्याल नहीं
रखा और उन सभी से उदासीन रहे। दुबारा समाचार प्राप्त कर प्रजापति दक्ष बड़े दुःखी हुए। वे पुनः चन्द्रमा के पास
आकर उन्हें उत्तम नीति के द्वारा समझने लगे। दक्ष ने चन्द्रमा से न्यायोचित बर्ताव करने की प्रार्थना की। बार-बार
आग्रह करने पर भी चन्द्रमा ने अवहेलनापूर्वक जब दक्ष की बात नहीं मानी, तब उन्होंने शाप दे दिया। दक्ष ने कहा कि
मेरे आग्रह करने पर भी तुमने मेरी अवज्ञा की है, इसलिए तुम्हें क्षयरोग हो जाय-
श्रयतां चन्द्र यत्पूर्व प्रार्थितो बहुधा मया।,आसक्ति के कारण उन्होंने अपने कर्त्तव्य की अवहेलना की तथा अपनी अन्य पत्नियों का कुछ भी ख्याल नहीं
रखा और उन सभी से उदासीन रहे। दुबारा समाचार प्राप्त कर प्रजापति दक्ष बड़े दुःखी हुए। वे पुनः चन्द्रमा के पास
आकर उन्हें उत्तम नीति के द्वारा समझने लगे। दक्ष ने चन्द्रमा से न्यायोचित बर्ताव करने की प्रार्थना की। बार-बार
आग्रह करने पर भी चन्द्रमा ने अवहेलनापूर्वक जब दक्ष की बात नहीं मानी, तब उन्होंने शाप दे दिया। दक्ष ने कहा कि
मेरे आग्रह करने पर भी तुमने मेरी अवज्ञा की है, इसलिए तुम्हें क्षयरोग हो जाय-
न मानितं त्वया यस्मात्तस्मात्त्वं च क्षयी भव[1]।।
दक्ष द्वारा शाप देने के साथ ही क्षण भर में चन्द्रमा क्षय रोग से ग्रसित हो गये। उनके क्षीण होते ही सर्वत्र हाहाकार
मच गया। सभी देवगण तथा ऋषिगण भी चिंतित हो गये। परेशान चन्द्रमा ने अपनी अस्वस्थता तथा उसके कारणों
की सूचना इन्द्र आदि देवताओं तथा ऋषियों को दी। उसके बाद उनकी सहायता के लिए इन्द्र आदि देवता तथा
वसिष्ठ आदि ऋषिगण ब्रह्माजी की शरण में गये। ब्रह्मा जी ने उनसे कहा कि जो घटना हो गई है, उसे तो भुगतना
ही है, क्योंकि दक्ष के निश्चय को पलटा नहीं जा सकता। उसके बाद ब्रह्माजी ने उन देवताओं को एक उत्तम उपाय
बताया।
मच गया। सभी देवगण तथा ऋषिगण भी चिंतित हो गये। परेशान चन्द्रमा ने अपनी अस्वस्थता तथा उसके कारणों
की सूचना इन्द्र आदि देवताओं तथा ऋषियों को दी। उसके बाद उनकी सहायता के लिए इन्द्र आदि देवता तथा
वसिष्ठ आदि ऋषिगण ब्रह्माजी की शरण में गये। ब्रह्मा जी ने उनसे कहा कि जो घटना हो गई है, उसे तो भुगतना
ही है, क्योंकि दक्ष के निश्चय को पलटा नहीं जा सकता। उसके बाद ब्रह्माजी ने उन देवताओं को एक उत्तम उपाय
बताया।
ब्रह्माजी का उपाय
ब्रह्माजी ने कहा कि चन्द्रमा देवताओं के साथ कल्याणकारक शुभ प्रभास क्षेत्र में चले जायें। वहाँ पर विधिपूर्वक
शुभ मृत्युंजय-मंत्र का अनुष्ठान करते हुए श्रद्धापूर्वक भगवान शिव की आराधना करें। अपने सामने शिवलिंग की
स्थापना करके प्रतिदिन कठिन तपस्या करें। इनकी आराधना और तपस्या से जब भगवान भोलेनाथ प्रसन्न हो जाएँगे,
तो वे इन्हें क्षय रोग से मुक्त कर देगें। पितामह ब्रह्माजी की आज्ञा को स्वीकार कर देवताओं और ऋषियों के संरक्षण
में चन्द्रमा देवमण्डल सहित प्रभास क्षेत्र में पहुँच गये।
शुभ मृत्युंजय-मंत्र का अनुष्ठान करते हुए श्रद्धापूर्वक भगवान शिव की आराधना करें। अपने सामने शिवलिंग की
स्थापना करके प्रतिदिन कठिन तपस्या करें। इनकी आराधना और तपस्या से जब भगवान भोलेनाथ प्रसन्न हो जाएँगे,
तो वे इन्हें क्षय रोग से मुक्त कर देगें। पितामह ब्रह्माजी की आज्ञा को स्वीकार कर देवताओं और ऋषियों के संरक्षण
में चन्द्रमा देवमण्डल सहित प्रभास क्षेत्र में पहुँच गये।
मृत्यंजय-मंत्र का जप
वहाँ चन्द्रदेव ने मृत्युंजय भगवान की अर्चना-वन्दना और अनुष्ठान प्रारम्भ किया। वे मृत्युंजय-मंत्र का जप तथा भगवान
शिव की उपासना में तल्लीन हो गये। ब्रह्मा की ही आज्ञा के अनुसार चन्द्रमा ने छः महीने तक निरन्तर तपस्या की और
वृषभ ध्वज का पूजन किया। दस करोड़ मृत्यंजय-मंत्र का जप तथा ध्यान करते हुए चन्द्रमा स्थिरचित्त से वहाँ निरन्तर
खड़े रहे। उनकी उत्कट तपस्या से भक्तवत्सल भगवान शंकर प्रसन्न हो गये।
शिव की उपासना में तल्लीन हो गये। ब्रह्मा की ही आज्ञा के अनुसार चन्द्रमा ने छः महीने तक निरन्तर तपस्या की और
वृषभ ध्वज का पूजन किया। दस करोड़ मृत्यंजय-मंत्र का जप तथा ध्यान करते हुए चन्द्रमा स्थिरचित्त से वहाँ निरन्तर
खड़े रहे। उनकी उत्कट तपस्या से भक्तवत्सल भगवान शंकर प्रसन्न हो गये।
उन्होंने चन्द्रमा से कहा- 'चन्द्रदेव! तुम्हारा कल्याण हो। तुम जिसके लिए यह कठोर तप कर रहे हो, उस अपनी
अभिलाषा को बताओ। मै तुम्हारी इच्छा के अनुसार तुम्हें उत्तम वर प्रदान करूँगा।’ चन्द्रमा ने प्रार्थना करते हुए
विनयपूर्वक कहा- ‘देवेश्वर! आप मेरे सब अपराधों को क्षमा करें और मेरे शरीर के इस क्षयरोग को दूर कर दें।’
अभिलाषा को बताओ। मै तुम्हारी इच्छा के अनुसार तुम्हें उत्तम वर प्रदान करूँगा।’ चन्द्रमा ने प्रार्थना करते हुए
विनयपूर्वक कहा- ‘देवेश्वर! आप मेरे सब अपराधों को क्षमा करें और मेरे शरीर के इस क्षयरोग को दूर कर दें।’
शिव का वरदान
भगवान शिव ने कहा– 'चन्द्रदेव! तुम्हारी कल प्रतिदिन एक पक्ष में क्षीण हुआ करेगी, जबकि दूसरे पक्ष में प्रतिदिन
वह निरन्तर बढ़ती रहेगी। इस प्रकार तुम स्वस्थ और लोक-सम्मान के योग्य ही जाओगे। भगवान शिव का कृपा-प्रसाद
प्राप्त कर चन्द्रदेव बहुत प्रसन्न हुए। उन्होंने भक्तिभावपूर्वक शंकर की स्तुति की। ऐसी स्थिति में निराकार शिव उनकी
दृढ़ भक्ति को देखकर साकार लिंग रूप में प्रकट हो गये तथा प्रभास क्षेत्र के महत्त्व को बढाने हेतु देवताओं के
सम्मान तथा चन्द्रमा के यश का विस्तार करने के लिए स्वयं ‘सोमेश्वर’ कहलाने लगे। चन्द्रमा के नाम पर सोमनाथ बने
भगवान शिव संसार में ‘सोमनाथ’ के नाम से प्रसिद्ध हुए।
वह निरन्तर बढ़ती रहेगी। इस प्रकार तुम स्वस्थ और लोक-सम्मान के योग्य ही जाओगे। भगवान शिव का कृपा-प्रसाद
प्राप्त कर चन्द्रदेव बहुत प्रसन्न हुए। उन्होंने भक्तिभावपूर्वक शंकर की स्तुति की। ऐसी स्थिति में निराकार शिव उनकी
दृढ़ भक्ति को देखकर साकार लिंग रूप में प्रकट हो गये तथा प्रभास क्षेत्र के महत्त्व को बढाने हेतु देवताओं के
सम्मान तथा चन्द्रमा के यश का विस्तार करने के लिए स्वयं ‘सोमेश्वर’ कहलाने लगे। चन्द्रमा के नाम पर सोमनाथ बने
भगवान शिव संसार में ‘सोमनाथ’ के नाम से प्रसिद्ध हुए।
4==2 धार्मिक मान्यता
सोमनाथ भगवान की पूजा और उपासना करने से उपासक भक्त के क्षय तथा कोढ़ आदि रोग सर्वथा नष्ट हो जाते हैं
और वह स्वस्थ हो जाता है। यशस्वी चन्द्रमा के कारण ही सोमेश्वर भगवान शिव इस भूतल को परम पवित्र करते हुए
प्रभास क्षेत्र में विराजते हैं। उस प्रभास क्षेत्र में सभी देवताओं ने मिलकर एक सोमकुण्ड की भी स्थापना की है।
ऐसा विश्वास किया जाता है कि इस कुण्ड में शिव तथा ब्रह्मा का सदा निवास रहते हैं। इस पृथ्वी पर यह चन्द्रकुण्ड
मनुष्यों के पाप नाश करने वाले के रूप में प्रसिद्ध है। इसे ‘पापनाशक-तीर्थ’ भी कहते हैं। जो मनुष्य इस चन्द्रकुण्ड
में स्नान करता है, वह सब प्रकार के पापों से मुक्त हो जाता है। इस कुण्ड में बिना नागा किये छः माह तक स्नान करने
से क्षय आदि दुःसाध्य और असाध्य रोग भी नष्ट हो जाते हैं। मुनष्य जिस किसी भी भावना या इच्छा से इस परम पवित्र
और उत्तम तीर्थ का सेवन करता है, तो वह बिना संशय ही उसे प्राप्त कर लेता है। शिव महापुराण की कोटिरुद्र
संहिता के चौदहवें अध्याय में उपर्युक्त आशय वर्णित है-
चन्द्रकुण्डं प्रसिद्ध च पृथिव्यां पापनाशनम्।और वह स्वस्थ हो जाता है। यशस्वी चन्द्रमा के कारण ही सोमेश्वर भगवान शिव इस भूतल को परम पवित्र करते हुए
प्रभास क्षेत्र में विराजते हैं। उस प्रभास क्षेत्र में सभी देवताओं ने मिलकर एक सोमकुण्ड की भी स्थापना की है।
ऐसा विश्वास किया जाता है कि इस कुण्ड में शिव तथा ब्रह्मा का सदा निवास रहते हैं। इस पृथ्वी पर यह चन्द्रकुण्ड
मनुष्यों के पाप नाश करने वाले के रूप में प्रसिद्ध है। इसे ‘पापनाशक-तीर्थ’ भी कहते हैं। जो मनुष्य इस चन्द्रकुण्ड
में स्नान करता है, वह सब प्रकार के पापों से मुक्त हो जाता है। इस कुण्ड में बिना नागा किये छः माह तक स्नान करने
से क्षय आदि दुःसाध्य और असाध्य रोग भी नष्ट हो जाते हैं। मुनष्य जिस किसी भी भावना या इच्छा से इस परम पवित्र
और उत्तम तीर्थ का सेवन करता है, तो वह बिना संशय ही उसे प्राप्त कर लेता है। शिव महापुराण की कोटिरुद्र
संहिता के चौदहवें अध्याय में उपर्युक्त आशय वर्णित है-
तत्र स्नाति नरो यः स सर्वेः पापैः प्रमुच्यते।।
रोगाः सर्वे क्षयाद्याश्च ह्वासाध्या ये भवन्ति वै।
ते सर्वे च क्षयं यान्ति षण्मासं स्नानमात्रतः।।
प्रभासं च परिक्रम्य पृथिवीक्रमसं भवम्।
फलं प्राप्नोति शुद्धात्मा मृतः स्वर्गे महीयते।।
सोमलिंग नरो दृष्टा सर्वपापात्प्रमुच्यते ।
लब्धवा फलं मनोभीष्टं मृतः स्वर्गं समीहते।।
इस प्रकार सोमनाथ के नाम से प्रसिद्ध भगवान शिव देवताओं की प्रार्थना पर लोक कल्याण करने हेतु
प्रभास क्षेत्र में हमेशा-हमेशा के लिए विराजमान हो गये। इस प्रकार शिव-महापुराण में सोमेश्वर महादेव
अथवा सोमनाथ ज्योतिर्लिंग की उत्पत्ति का वर्णन है |
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प्रभास क्षेत्र में हमेशा-हमेशा के लिए विराजमान हो गये। इस प्रकार शिव-महापुराण में सोमेश्वर महादेव
अथवा सोमनाथ ज्योतिर्लिंग की उत्पत्ति का वर्णन है |
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5>महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग की कहानी
उज्जैन नगरी में स्तिथ महाकाल ज्योतिर्लिंग, शिव जी का तीसरा ज्योतिर्लिंग कहलाता है। यह एक मात्र ज्योतिर्लिंग है जो दक्षिणमुखी है। इस ज्योतिर्लिंग से सम्बंधित दो कहानियां पुराणों में वर्णित है जो इस प्रकार है।शिव पुराण में वर्णित कथाशिव पुराण की 'कोटि-रुद्र संहिता' के सोलहवें अध्याय में तृतीय ज्योतिर्लिंग भगवान महाकाल के संबंध में सूतजी द्वारा जिस कथा को वर्णित किया गया है, उसके अनुसार अवंती नगरी में एक वेद कर्मरत ब्राह्मण रहा करते थे। वे अपने घर में अग्नि की स्थापना कर प्रतिदिन अग्निहोत्र करते थे और वैदिक कर्मों के अनुष्ठान में लगे रहते थे। भगवान शंकर के परम भक्त वह ब्राह्मण प्रतिदिन पार्थिव लिंग का निर्माण कर शास्त्र विधि से उसकी पूजा करते थे। हमेशा उत्तम ज्ञान को प्राप्त करने में तत्पर उस ब्राह्मण देवता का नाम ‘वेदप्रिय’ था। वेदप्रिय स्वयं ही शिव जी के अनन्य भक्त थे, जिसके संस्कार के फलस्वरूप उनके शिव पूजा-परायण ही चार पुत्र हुए। वे तेजस्वी तथा माता-पिता के सद्गुणों के अनुरूप थे। उन चारों पुत्रों के नाम 'देवप्रिय', 'प्रियमेधा', 'संस्कृत' और 'सुवृत' थे।उन दिनों रत्नमाल पर्वत पर ‘दूषण’ नाम वाले धर्म विरोधी एक असुर ने वेद, धर्म तथा धर्मात्माओं पर आक्रमण कर दिया। उस असुर को ब्रह्मा से अजेयता का वर मिला था। सबको सताने के बाद अन्त में उस असुर ने भारी सेना लेकर अवन्ति (उज्जैन) के उन पवित्र और कर्मनिष्ठ ब्राह्मणों पर भी चढ़ाई कर दी। उस असुर की आज्ञा से चार भयानक दैत्य चारों दिशाओं में प्रलयकाल की आग के समान प्रकट हो गये। उनके भयंकर उपद्रव से भी शिव जी पर विश्वास करने वाले वे ब्राह्मणबन्धु भयभीत नहीं हुए। अवन्ति नगर के निवासी सभी ब्राह्मण जब उस संकट में घबराने लगे, तब उन चारों शिवभक्त भाइयों ने उन्हें आश्वासन देते हुए कहा- ‘आप लोग भक्तों के हितकारी भगवान शिव पर भरोसा रखें।’ उसके बाद वे चारों ब्राह्मण-बन्धु शिव जी का पूजन कर उनके ही ध्यान में तल्लीन हो गये।सेना सहित दूषण ध्यान मग्न उन ब्राह्मणों के पास पहुँच गया। उन ब्राह्मणों को देखते ही ललकारते हुए बोल उठा कि इन्हें बाँधकर मार डालो। वेदप्रिय के उन ब्राह्मण पुत्रों ने उस दैत्य के द्वारा कही गई बातों पर कान नहीं दिया और भगवान शिव के ध्यान में मग्न रहे। जब उस दुष्ट दैत्य ने यह समझ लिया कि हमारे डाँट-डपट से कुछ भी परिणाम निकलने वाला नहीं है, तब उसने ब्राह्मणों को मार डालने का निश्चय किया।उसने ज्योंही उन शिव भक्तों के प्राण लेने हेतु शस्त्र उठाया, त्योंही उनके द्वारा पूजित उस पार्थिव लिंग की जगह गम्भीर आवाल के साथ एक गडढा प्रकट हो गया और तत्काल उस गड्ढे से विकट और भयंकर रूपधारी भगवान शिव प्रकट हो गये। दुष्टों का विनाश करने वाले तथा सज्जन पुरुषों के कल्याणकर्त्ता वे भगवान शिव ही महाकाल के रूप में इस पृथ्वी पर विख्यात हुए। उन्होंने दैत्यों से कहा- ‘अरे दुष्टों! तुझ जैसे हत्यारों के लिए ही मैं ‘महाकाल’ प्रकट हुआ हूँ।इस प्रकार धमकाते हुए महाकाल भगवान शिव ने अपने हुँकार मात्र से ही उन दैत्यों को भस्म कर डाला। दूषण की कुछ सेना को भी उन्होंने मार गिराया और कुछ स्वयं ही भाग खड़ी हुई। इस प्रकार परमात्मा शिव ने दूषण नामक दैत्य का वध कर दिया। जिस प्रकार सूर्य के निकलते ही अन्धकार छँट जाता है, उसी प्रकार भगवान आशुतोष शिव को देखते ही सभी दैत्य सैनिक पलायन कर गये। देवताओं ने प्रसन्नतापूर्वक अपनी दन्दुभियाँ बजायीं और आकाश से फूलों की वर्षा की। उन शिवभक्त ब्राह्मणों पर अति प्रसन्न भगवान शंकर ने उन्हें आश्वस्त करते हुए कहा कि ‘मै महाकाल महेश्वर तुम लोगों पर प्रसन्न हूँ, तुम लोग वर मांगो।’महाकालेश्वर की वाणी सुनकर भक्ति भाव से पूर्ण उन ब्राह्मणों ने हाथ जोड़कर विनम्रतापूर्वक कहा- 'दुष्टों को दण्ड देने वाले महाकाल! शम्भो! आप हम सबको इस संसार-सागर से मुक्त कर दें। हे भगवान शिव! आप आम जनता के कल्याण तथा उनकी रक्षा करने के लिए यहीं हमेशा के लिए विराजिए। प्रभो! आप अपने दर्शनार्थी मनुष्यों का सदा उद्धार करते रहें।’भगवान शंकर ने उन ब्राह्माणों को सद्गति प्रदान की और अपने भक्तों की सुरक्षा के लिए उस गड्ढे में स्थित हो गये। उस गड्ढे के चारों ओर की लगभग तीन-तीन किलोमीटर भूमि लिंग रूपी भगवान शिव की स्थली बन गई। ऐसे भगवान शिव इस पृथ्वी पर महाकालेश्वर के नाम से प्रसिद्ध हुए।
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6>।।जय श्री बाबा महाकाल ।।
इस मंत्र को संपुट युक्त बनाने के लिए इसका उच्चारण इस प्रकार किया जाता है ।
ॐ हौं जूं स: ॐ भूर्भुवः स्वः
ॐ त्र्यम्बकम् यजामहे सुगन्धिम्पुष्टिवर्धनम्।
उर्वारुकमिव बन्धनात्
मृत्योर्मुक्षीय मामृतात।
ॐ स्वः भुवः भूः ॐ सः जूं हौं ॐ
इस मंत्र का अर्थ है :-
ॐ त्र्यम्बकम् यजामहे सुगन्धिम्पुष्टिवर्धनम्।
उर्वारुकमिव बन्धनात्
मृत्योर्मुक्षीय मामृतात।
ॐ स्वः भुवः भूः ॐ सः जूं हौं ॐ
इस मंत्र का अर्थ है :-
हम भगवान शंकर की पूजा करते हैं, जिनके तीन नेत्र हैं, जो प्रत्येक श्वास में जीवन शक्ति का संचार करते हैं, जो सम्पूर्ण जगत का पालन-पोषण अपनी शक्ति से कर रहे हैं...
उनसे हमारी प्रार्थना है कि वे हमें मृत्यु के बंधनों से मुक्त कर दें, जिससे मोक्ष की प्राप्ति हो जाए...
जिस प्रकार एक ककड़ी अपनी बेल में पक जाने के उपरांत उस बेल-रूपी संसार के बंधन से मुक्त हो जाती है, उसी प्रकार हम भी इस संसार-रूपी बेल में पक जाने के उपरांत जन्म-मृत्यु के बन्धनों से सदा के लिए मुक्त हो जाएं।
तथा आपके चरणों की अमृतधारा का पान करते हुए शरीर को त्यागकर आप ही में लीन हो जाएं...
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7>बालकाण्ड में भगवान शिव जी के सुन्दर चरित्र का वर्णन
बालकाण्ड में भगवान शिव जी के सुन्दर चरित्र का वर्णन गोस्वामी जी ने किया है.शिव पार्वती जी के विवाह का सुन्दर वर्णन है.ऐसा क्यों है सीधे राम जी के जन्म से भी तो शुरु कर सकते थे.शिव पार्वती जी के विवाह का वर्णन क्यों किया ?
संतजन कहते है शिव जी के चरित्र को सुनकर जीवन में जो उतारता है वही राम कथा में प्रवेश का अधिकारी है.शिव जी कौन है ? योगेश्वर है. वैरागी है और गृहस्थ में प्रवेश करने जा रहे है. व्यक्ति गृहस्थी में रहकर ही परिवार के भरण पोषण पैसा कमाने में धर्म अधर्म सब कुछ भूल जाता है. इसलिए भगवान शिव बता रहे है कैसे चले.
जब उनकी बारात चलि है तो शिव जी के हाथ में त्रिशूल है.त्रिशूल अर्थात जो तीन शूल है - "काम", "क्रोध", "लोभ" इन तीनो को अधीन करके चले है। गृहस्थ में प्रवेश करने से पहले तीनो अधीन है. नंदी पर बैठकर चले है. नंदी धर्म का प्रतीक है.अर्थात धर्म हम किसी भी परिस्थिति में नहीं छोडेगे.
उनके भाल पर "चंद्रमा" सुशोभित है जो मन का प्रतीक है. मन कैसा करके चलो ? भोला, निर्मल, पवित्र, सशक्त है. उज्जवल हो. सिर पर जटाओ का मुकुट है, गृहस्थ में प्रवेश करने जा रहे है.और गृहस्थी में जंजाल भी बहुत होते है,परन्तु उन जंजाल रूपी जटाओ को, संकट को भी श्रंगार बनाकर धारण करो.मुकुट के रूप में स्वीकार करो.
जटाओं से "गंगा की धारा" बह रही है,अर्थात गृहस्थी के सिर पर जो जंजालो की जटाए है उनसे कलह के नाले न निकले, विवेक की, भक्ति की, गंगा निकलती रहे. नागों के आभूषण पहन रखे है अर्थात जीवन में संपत्ति इतनी मत बढाओ कि वही संपत्ति एक दिन नाग बनकर डस ले.
"मुंडमाला" है जो इस बात का प्रतीक है कि शिव ने मृत्यु को वश में कर रखा है.भस्म रमा के चले है भस्म काम नाशक है विवाह में हल्दी लगायी जाती है जो कामवर्द्धक है.
जब उनकी बारात चलि है तो शिव जी के हाथ में त्रिशूल है.त्रिशूल अर्थात जो तीन शूल है - "काम", "क्रोध", "लोभ" इन तीनो को अधीन करके चले है। गृहस्थ में प्रवेश करने से पहले तीनो अधीन है. नंदी पर बैठकर चले है. नंदी धर्म का प्रतीक है.अर्थात धर्म हम किसी भी परिस्थिति में नहीं छोडेगे.
उनके भाल पर "चंद्रमा" सुशोभित है जो मन का प्रतीक है. मन कैसा करके चलो ? भोला, निर्मल, पवित्र, सशक्त है. उज्जवल हो. सिर पर जटाओ का मुकुट है, गृहस्थ में प्रवेश करने जा रहे है.और गृहस्थी में जंजाल भी बहुत होते है,परन्तु उन जंजाल रूपी जटाओ को, संकट को भी श्रंगार बनाकर धारण करो.मुकुट के रूप में स्वीकार करो.
जटाओं से "गंगा की धारा" बह रही है,अर्थात गृहस्थी के सिर पर जो जंजालो की जटाए है उनसे कलह के नाले न निकले, विवेक की, भक्ति की, गंगा निकलती रहे. नागों के आभूषण पहन रखे है अर्थात जीवन में संपत्ति इतनी मत बढाओ कि वही संपत्ति एक दिन नाग बनकर डस ले.
"मुंडमाला" है जो इस बात का प्रतीक है कि शिव ने मृत्यु को वश में कर रखा है.भस्म रमा के चले है भस्म काम नाशक है विवाह में हल्दी लगायी जाती है जो कामवर्द्धक है.
शिव के शरीर पर व्याघ्र "चर्म" है, व्याघ्र हिंसा व अंहकार का प्रतीक माना जाता है. इसका अर्थ है कि शिव ने हिंसा व अहंकार का दमन कर उसे अपने नीचे दबा कर चले है.गृहस्थ में हिंसा और अहंकार दोनों की ही जगह नहीं है.
गृहस्थ में सभी का बड़ा ही समन्वय है.जहाँ पत्नी,पुत्र और वाहन सभी की पूजा होती है. पार्वती भवानी है,पुत्र गणेश और कार्तिकेय है.वाहन नंदी है सभी की पूजा होती है.जहाँ सभी आदरणीय और पूजनीय है भगवान राम और कृष्ण के पिता वासुदेव और दशरथ जी के मंदिर नहीं है.केवल शिव जी का परिवार ही है जहाँ सभी की पूजा होती है.
गले में सर्प है उनकी भी पूजा होती है.अर्थात अपने चरित्र को ऐसा बनाये कि सभी आदर करे. कार्तिकेय का वाहन मोर है गणेश जी का वाहन चूहा है, माता का वाहन शेर है. मोर सर्प को खाता है. सर्प चूहे को खा जाता है.सिंह, बैल को खाता है पर सभी साथ-साथ प्यार से रहते है.यही समन्वय परिवार में होना चाहिये.
गृहस्थ में सभी का बड़ा ही समन्वय है.जहाँ पत्नी,पुत्र और वाहन सभी की पूजा होती है. पार्वती भवानी है,पुत्र गणेश और कार्तिकेय है.वाहन नंदी है सभी की पूजा होती है.जहाँ सभी आदरणीय और पूजनीय है भगवान राम और कृष्ण के पिता वासुदेव और दशरथ जी के मंदिर नहीं है.केवल शिव जी का परिवार ही है जहाँ सभी की पूजा होती है.
गले में सर्प है उनकी भी पूजा होती है.अर्थात अपने चरित्र को ऐसा बनाये कि सभी आदर करे. कार्तिकेय का वाहन मोर है गणेश जी का वाहन चूहा है, माता का वाहन शेर है. मोर सर्प को खाता है. सर्प चूहे को खा जाता है.सिंह, बैल को खाता है पर सभी साथ-साथ प्यार से रहते है.यही समन्वय परिवार में होना चाहिये.
और गृहस्थ कैसा है ?शिव पार्वती काम चरित्र की नहीं राम चरित्र की चर्चा करते है . भगवान शिव जी ने ही पार्वती जी को राम कथा सुनाई है.कौन कहता है पति-पत्नी में केवल खटसंग अर्थात झगड़ा ही होता है, काम चर्चा ही होती है, संत्संग और राम चर्चा भी हो सकती है.
यदि हम श्रीमद्भागवत में देवहुति और कर्दम जी के गृहस्थ जीवन को देखे तो गृहस्थ में प्रवेश होने पर १४ वर्षों तक दोनों पति पत्नी के बीच में केवल सत्संग ही हुआ है फिर गृहस्थ में प्रवेश किया है. इसलिए भगवान कपिल के रूप में उनके यहाँ अवतरित हुए है. इसलिए जो इस शिव चरित्र को अपने जीवन में उतारता है वही राम कथा में प्रवेश का अधिकारी है !
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8>ये 5 चढ़ावे भगवान शिव को कभी न चढ़ाए
हिंदू धर्म और परंपरा के अनुसार शिवलिंग कभी ऐसी जगह नहीं रखा जाता जहां उसकी उसकी रीति-रिवाज के अनुसार पूजा ना हो सके क्योंकि इससे शिव जी नाराज़ हो सकते हैं। माना जाता है कि भगवान शिव बहुत ही मासूम और रहमदिल हैं जो आसानी से लोगों की मन्नत पूरी कर देते हैं लेकिन इनका ग़ुस्सा भी उतना ही तेज़ है।
शिव जी को बैरागी कहा गया है इस लिए उन्हें आम ज़िन्दगी में इस्तेमाल होने वाली चीज़ें नहीं चढ़ाई जाती हैं। भगवान भोलेनाथ को खुश करने के लिए आप उन्हें भांग-धतूरा, दूध, चंदन, और भस्म चढ़ाते हैं। कहा जाता है कि भोलेनाथ की पूजा करने से वही नही बल्कि सारे भगवान ख़ुश हो जाते हैं। शिव पुराण के अनुसार शिव जी के भक्तों को शिवलिंग पर कभी भी नीचे दी गयी वस्तुएं नहीं चढ़ानी चाहिए।
केतकी
केतकी के फूल एक बार ब्रह्माजी व विष्णुजी में विवाद छिड़ गया कि दोनों में श्रेष्ठ कौन है। ब्रह्माजी सृष्टि के रचयिता होने के कारण श्रेष्ठ होने का दावा कर रहे थे और भगवान विष्णु पूरी सृष्टि के पालनकर्ता के रूप में स्वयं को श्रेष्ठ कह रहे थे। तभी वहां एक विराट लिंग प्रकट हुआ। दोनों देवताओं ने सहमति से यह निश्चय किया गया कि जो इस लिंग के छोर का पहले पता लगाएगा उसे ही श्रेष्ठ माना जाएगा। अत: दोनों विपरीत दिशा में शिवलिंग की छोर ढूढंने निकले। छोर न मिलने के कारण विष्णुजी लौट आए। ब्रह्मा जी भी सफल नहीं हुए परंतु उन्होंने आकर विष्णुजी से कहा कि वे छोर तक पहुँच गए थे। उन्होंने केतकी के फूल को इस बात का साक्षी बताया। ब्रह्मा जी के असत्य कहने पर स्वयं शिव वहाँ प्रकट हुए और उन्होंने ब्रह्माजी की एक सिर काट दिया और केतकी के फूल को श्राप दिया कि शिव जी की पूजा में कभी भी केतकी के फूलों का इस्तेमाल नहीं होगा।
तुलसी
शिव पुराण के अनुसार जालंधर नाम का असुर भगवान शिव के हाथों मारा गया था। जालंधर को एक वरदान मिला हुआ था कि वह अपनी पत्नी की पवित्रता की वजह से उसे कोई भी अपराजित नहीं कर सकता है। लेकिन जालंधर को मरने के लिए भगवान विष्णु को जालंधर की पत्नी तुलसी की पवित्रता को भंग करना पड़ा। अपने पति की मौत से नाराज़ तुलसी ने भगवान शिव का बहिष्कार कर दिया था
नारियल पानी
शिव जी की पूजा नारियल से होती है लेकिन नारियल पानी से नहीं। क्योंकि शिवलिंग पर चढ़ाई जाने वाली सारी चीज़ें निर्मल होनी चाहिए यानि जिसका सेवन ना किया जाए। नारियल पानी देवताओं को चढ़ाये जाने के बाद ग्रहण किया जाता है इसीलिए शिवलिंग पर नारियल पानी नहीं चढ़ाया जाता है।
हल्दी
शिवलिंग पर हल्दी कभी नहीं चढ़ाई जाती है क्योंकि यह महिलाओं की सुंदरता को बढ़ाने के लिए इस्तेमाल होती है। और शिवलिंग भगवान शिव का प्रतीक है।
कुमकुम
सिंदूर या कुमकुम हिंदू महिलाएं अपने पति की लम्बी उम्र के लिए लगाती हैं। जैसा की हम जानते हैं कि भगवान शिव विध्वंसक के रूप में जाने जाते हैं इसलिए शिवलिंग पर कुमकुम नहीं चढ़ाया जाता है।
ये भी पढ़ें:जानें सपने में शिवलिंग और सांप देखने का क्या होता है मतलब
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9>मनवांछित फल==(भोलेनाथ)
हिन्दू धर्म में सभी देवी-देवताओं को प्रसन्न करने, उनकी आराधना करने के विशिष्ट तरीकों का वर्णन उपलब्ध हैं। कुछ ऐसी सामग्रियां और विधियां होती हैं जो विशिष्ट अराध्य देव को बहुत पसंद होती हैं, उनकी पूजा में उन सामग्रियों की उपलब्धता मनवांछित फल प्रदान करती है।
समस्या का कारण
लेकिन कुछ ऐसी सामग्रियां भी होती हैं जिनका प्रयोग करना उलटा परिणाम प्रदान कर सकता है। जहां कुछ चीजें आराध्य देवी-देवताओं को पसंद आती हैं वहीं कुछ उन्हें कतई नापसंद होती हैं, ऐसे में अगर उन्हें वे अर्पित की जाएं या उनकी पूजा में उन सामग्रियों का प्रयोग किया जाए तो यह समस्या का कारण बन सकता है।
भोलेनाथ
भगवान शिव जिन्हें भोलेनाथ भी कहा जाता है और विनाशक भी। जहां वे अपने भक्तों से बहुत ही जल्दी प्रसन्न भी होते हैं तो क्रोध के कारण बहुत जल्दी रौद्र रूप भी धारण कर लेते हैं।
भांग-धतूरे का चढ़ावा
हम ये बात तो जानते ही हैं भगवान शिव को भांग-धतूरे का चढ़ावा बहुत पसंद है, आज हम आपको कुछ ऐसी सामग्रियां बताएंगे जिनका उपयोग शिव आराधना के दौरान बिल्कुल नहीं करना चाहिए।
शिवपुराण
शिवपुराण के अनुसार शिव भक्तों को कभी भी भगवान शिव को इन पांच वस्तुओं का प्रसाद नहीं चढ़ाना चाहिए। आइए जानते हैं क्या हैं वे पांच चीजें।
केतकी के फूल
एक दिन भगवान विष्णु और ब्रह्म देव, खुद को सबसे अधिक ताकतवर साबित करने के लिए आपस में युद्ध कर रहे थे। जैसे ही वे दोनों एक दूसरे पर घातक अस्त्रों का प्रयोग करने लगे वहां ज्योतिर्लिंग के रूप में भगवान शिव प्रकट हुए। शिव ने उन दोनों से इस ज्योतिर्लिंग का आदि और अंत का पता लगाने को कहा, भगवान शिव ने कहा कि दोनों में से जो भी इस सवाल का जवाब दे देगा वहीं सबसे श्रेष्ठ होगा।
ज्योतिर्लिंग
शिव ने उन दोनों से इस ज्योतिर्लिंग का आदि और अंत का पता लगाने को कहा, भगवान शिव ने कहा कि दोनों में से जो भी इस सवाल का जवाब दे देगा वहीं सबसे श्रेष्ठ होगा।
भगवान विष्णु
भगवान विष्णु उस ज्योतिर्लिंग के अंत की ओर बढ़े लेकिन उस छोर का पता लगाने में नाकामयाब रहे। ब्रह्म देव भी ऊपर की ओर बढ़े और अपने साथ केतकी के फूल को ले गए। भगवान विष्णु ने अपनी हार स्वीकार कर ली थी।
ज्योतिर्लिंग का छोरा
वापस आकर ब्रह्मा जी भगवान शिव से कहा कि उन्होंने ज्योतिर्लिंग के अंत का पता लगा लिया है और केतकी के फूल ने भी उनके झूठ को सच करार दे दिया।
अत्यंत क्रोधित
ब्रह्मा जी के इस झूठ ने भगवान शिव को अत्यंत क्रोधित कर दिया, क्रोध में आकर महादेव ने ब्रह्मा जी का एक सिर काट दिया और साथ ही उन्हें श्राप दे दिया कि उनकी कभी कोई पूजा नहीं होगी। ब्रह्माजी का वो कटा सिर केतकी के फूल में बदल गया।
श्राप
भगवान शिव ने केतकी के फूल को भी श्राप देकर कहा कि उनके शिवलिंग पर कभी केतकी के फूल को अर्पित नहीं किया जाएगा। तबसे शिव को केतकी के फूल अर्पित किया जाना अशुभ माना जाता है।
तुलसी
शिवपुराण के अनुसार असुर जालंधर की पत्नी तुलसी के मजबूत पतिधर्म की वजह से उसे कोई भी देव हरा नहीं सकता था। इसलिए भगवान विष्णु ने तुलसी के पतिव्रत को ही खंडित करने की सोची। वह जालंधर का वेष धारण कर तुलसी के पास पहुंच गए, जिसकी वजह से तुलसी का पतिधर्म टूट गया और भगवान शिव ने असुर जालंधर का वध कर उसे भस्म कर दिया।
दैवीय गुणों वाले पत्तों से वंचित
इस पूरी घटना ने तुलसी को बेहद निराश कर दिया उन्होंने स्वयं भगवान शिव को अपने अलौकिक और दैवीय गुणों वाले पत्तों से वंचित कर दिया।
नारियल का पानी
हालांकि शिवलिंग पर नारियल अर्पित किया जाता है लेकिन कभी भी शिवलिंग पर नारियल के पानी से अभिषेक नहीं करना चाहिए। देवताओं को चढ़ाया जाने वाला प्रसाद ग्रहण करना आवश्यक होता है लेकिन शिवलिंग का अभिषेक जिन पदार्थों से होता है उन्हें ग्रहण नहीं किया जाता। इसलिए शिव पर नारियल का जल नहीं चढ़ाना चाहिए
हल्दी
हल्दी का प्रयोग स्त्रियों की सुंदरता बढ़ाने के लिए किया जाता है। इसलिए शिवलिंग पर कभी हल्दी नहीं चढ़ाई जाती, क्योंकि वह स्वयं शिव का रूप है।
कुमकुम या सिंदूर
सिंदूर, विवाहित स्त्रियों का गहना माना गया है। स्त्रियां अपने पति की लंबे और स्वस्थ जीवन की कामना हेतु सिंदूर लगाती हैं। लेकिन शिव तो विनाशक हैं, सिंदूर से उनकी सेवा करना अशुभ माना जाता है।
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हिन्दू धर्म में सभी देवी-देवताओं को प्रसन्न करने, उनकी आराधना करने के विशिष्ट तरीकों का वर्णन उपलब्ध हैं। कुछ ऐसी सामग्रियां और विधियां होती हैं जो विशिष्ट अराध्य देव को बहुत पसंद होती हैं, उनकी पूजा में उन सामग्रियों की उपलब्धता मनवांछित फल प्रदान करती है।
समस्या का कारण
लेकिन कुछ ऐसी सामग्रियां भी होती हैं जिनका प्रयोग करना उलटा परिणाम प्रदान कर सकता है। जहां कुछ चीजें आराध्य देवी-देवताओं को पसंद आती हैं वहीं कुछ उन्हें कतई नापसंद होती हैं, ऐसे में अगर उन्हें वे अर्पित की जाएं या उनकी पूजा में उन सामग्रियों का प्रयोग किया जाए तो यह समस्या का कारण बन सकता है।
भोलेनाथ
भगवान शिव जिन्हें भोलेनाथ भी कहा जाता है और विनाशक भी। जहां वे अपने भक्तों से बहुत ही जल्दी प्रसन्न भी होते हैं तो क्रोध के कारण बहुत जल्दी रौद्र रूप भी धारण कर लेते हैं।
भांग-धतूरे का चढ़ावा
हम ये बात तो जानते ही हैं भगवान शिव को भांग-धतूरे का चढ़ावा बहुत पसंद है, आज हम आपको कुछ ऐसी सामग्रियां बताएंगे जिनका उपयोग शिव आराधना के दौरान बिल्कुल नहीं करना चाहिए।
शिवपुराण
शिवपुराण के अनुसार शिव भक्तों को कभी भी भगवान शिव को इन पांच वस्तुओं का प्रसाद नहीं चढ़ाना चाहिए। आइए जानते हैं क्या हैं वे पांच चीजें।
केतकी के फूल
एक दिन भगवान विष्णु और ब्रह्म देव, खुद को सबसे अधिक ताकतवर साबित करने के लिए आपस में युद्ध कर रहे थे। जैसे ही वे दोनों एक दूसरे पर घातक अस्त्रों का प्रयोग करने लगे वहां ज्योतिर्लिंग के रूप में भगवान शिव प्रकट हुए। शिव ने उन दोनों से इस ज्योतिर्लिंग का आदि और अंत का पता लगाने को कहा, भगवान शिव ने कहा कि दोनों में से जो भी इस सवाल का जवाब दे देगा वहीं सबसे श्रेष्ठ होगा।
ज्योतिर्लिंग
शिव ने उन दोनों से इस ज्योतिर्लिंग का आदि और अंत का पता लगाने को कहा, भगवान शिव ने कहा कि दोनों में से जो भी इस सवाल का जवाब दे देगा वहीं सबसे श्रेष्ठ होगा।
भगवान विष्णु
भगवान विष्णु उस ज्योतिर्लिंग के अंत की ओर बढ़े लेकिन उस छोर का पता लगाने में नाकामयाब रहे। ब्रह्म देव भी ऊपर की ओर बढ़े और अपने साथ केतकी के फूल को ले गए। भगवान विष्णु ने अपनी हार स्वीकार कर ली थी।
ज्योतिर्लिंग का छोरा
वापस आकर ब्रह्मा जी भगवान शिव से कहा कि उन्होंने ज्योतिर्लिंग के अंत का पता लगा लिया है और केतकी के फूल ने भी उनके झूठ को सच करार दे दिया।
अत्यंत क्रोधित
ब्रह्मा जी के इस झूठ ने भगवान शिव को अत्यंत क्रोधित कर दिया, क्रोध में आकर महादेव ने ब्रह्मा जी का एक सिर काट दिया और साथ ही उन्हें श्राप दे दिया कि उनकी कभी कोई पूजा नहीं होगी। ब्रह्माजी का वो कटा सिर केतकी के फूल में बदल गया।
श्राप
भगवान शिव ने केतकी के फूल को भी श्राप देकर कहा कि उनके शिवलिंग पर कभी केतकी के फूल को अर्पित नहीं किया जाएगा। तबसे शिव को केतकी के फूल अर्पित किया जाना अशुभ माना जाता है।
तुलसी
शिवपुराण के अनुसार असुर जालंधर की पत्नी तुलसी के मजबूत पतिधर्म की वजह से उसे कोई भी देव हरा नहीं सकता था। इसलिए भगवान विष्णु ने तुलसी के पतिव्रत को ही खंडित करने की सोची। वह जालंधर का वेष धारण कर तुलसी के पास पहुंच गए, जिसकी वजह से तुलसी का पतिधर्म टूट गया और भगवान शिव ने असुर जालंधर का वध कर उसे भस्म कर दिया।
दैवीय गुणों वाले पत्तों से वंचित
इस पूरी घटना ने तुलसी को बेहद निराश कर दिया उन्होंने स्वयं भगवान शिव को अपने अलौकिक और दैवीय गुणों वाले पत्तों से वंचित कर दिया।
नारियल का पानी
हालांकि शिवलिंग पर नारियल अर्पित किया जाता है लेकिन कभी भी शिवलिंग पर नारियल के पानी से अभिषेक नहीं करना चाहिए। देवताओं को चढ़ाया जाने वाला प्रसाद ग्रहण करना आवश्यक होता है लेकिन शिवलिंग का अभिषेक जिन पदार्थों से होता है उन्हें ग्रहण नहीं किया जाता। इसलिए शिव पर नारियल का जल नहीं चढ़ाना चाहिए
हल्दी
हल्दी का प्रयोग स्त्रियों की सुंदरता बढ़ाने के लिए किया जाता है। इसलिए शिवलिंग पर कभी हल्दी नहीं चढ़ाई जाती, क्योंकि वह स्वयं शिव का रूप है।
कुमकुम या सिंदूर
सिंदूर, विवाहित स्त्रियों का गहना माना गया है। स्त्रियां अपने पति की लंबे और स्वस्थ जीवन की कामना हेतु सिंदूर लगाती हैं। लेकिन शिव तो विनाशक हैं, सिंदूर से उनकी सेवा करना अशुभ माना जाता है।
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10>श्री महाकालेश्वर मंदिर
भारत के द्वादश ज्योतिर्लिंगों में से स्वयंभू दक्षिणमुखी ज्योतिर्लिंग महाकालेश्वर का स्थान प्रमुख है। तांत्रिक परम्परा में मात्र महाकाल को ही दक्षिण मूर्ति पूजा का महत्व प्राप्त है। इसका वर्णन महाभारत, स्कन्दपुराण, वराहपुराण, नृसिंह पुराण, शिवपुराण, भागवत, शिवलीलामृत आदि ग्रन्थों में आता है। वर्तमान मंदिर तीन भाग में सबसे नीचे श्री महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग’ उसके ऊपर ’श्री ओंकारेश्वर’ एवं सबसे ऊपर श्री नागचंद्रेश्वर है। श्री महाकालेश्वर मंदिर के दक्षिण दिशा में श्री वृद्धमहाकालेश्वर एवं श्री सप्तऋषि के मंदिर हैं।
इस मंदिर का वर्णन महाभारत, स्कन्द पुराण, वराहपुराण, नृसिंहपुराण, शिवपुराण, भागवत्, शिवलीलामृत आदि ग्रन्थों में तथा कथासरित्सागर, राजतरंगिणी, कादम्बरी, मेघदूत, रघुवंश आदि काव्यों में इस देवालय का अत्यन्त सुन्दर वर्णन दिया गया है। अलबरूनी व फरिश्ता ने भी इस देवालय का सुन्दर वर्णन किया है। पुराणकारों के कथनानुसार विश्वकर्मा ने श्री महाकालेश्वर के निवासार्थ एक भव्य मन्दिर का निर्माण किया, चारों ओर एक परकोटा खिंचवाया। उस मन्दिर के महाद्वार पर एक बड़ा भारी घण्टा स्वर्ण श्रृंखला से लटकता था, और मन्दिर में सर्वत्र रत्नखचित दीपस्तम्भ थे जिन पर रत्नजड़ित दीप प्रकाशित होते थे।
भारत के द्वादश ज्योतिर्लिंगों में से स्वयंभू दक्षिणमुखी ज्योतिर्लिंग महाकालेश्वर का स्थान प्रमुख है। तांत्रिक परम्परा में मात्र महाकाल को ही दक्षिण मूर्ति पूजा का महत्व प्राप्त है। इसका वर्णन महाभारत, स्कन्दपुराण, वराहपुराण, नृसिंह पुराण, शिवपुराण, भागवत, शिवलीलामृत आदि ग्रन्थों में आता है। वर्तमान मंदिर तीन भाग में सबसे नीचे श्री महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग’ उसके ऊपर ’श्री ओंकारेश्वर’ एवं सबसे ऊपर श्री नागचंद्रेश्वर है। श्री महाकालेश्वर मंदिर के दक्षिण दिशा में श्री वृद्धमहाकालेश्वर एवं श्री सप्तऋषि के मंदिर हैं।
इस मंदिर का वर्णन महाभारत, स्कन्द पुराण, वराहपुराण, नृसिंहपुराण, शिवपुराण, भागवत्, शिवलीलामृत आदि ग्रन्थों में तथा कथासरित्सागर, राजतरंगिणी, कादम्बरी, मेघदूत, रघुवंश आदि काव्यों में इस देवालय का अत्यन्त सुन्दर वर्णन दिया गया है। अलबरूनी व फरिश्ता ने भी इस देवालय का सुन्दर वर्णन किया है। पुराणकारों के कथनानुसार विश्वकर्मा ने श्री महाकालेश्वर के निवासार्थ एक भव्य मन्दिर का निर्माण किया, चारों ओर एक परकोटा खिंचवाया। उस मन्दिर के महाद्वार पर एक बड़ा भारी घण्टा स्वर्ण श्रृंखला से लटकता था, और मन्दिर में सर्वत्र रत्नखचित दीपस्तम्भ थे जिन पर रत्नजड़ित दीप प्रकाशित होते थे।
परमार नरेशों के अभिलेखो का प्रारम्भ ही शिव स्तुति से होता है। परमार शासकों का व्यक्तिगत धर्म शैव धर्म होने के कारण जनता में शैव धर्म का प्रचार प्रसार अधिक हुआ। परमार नरेश वाक्पति राज द्वितीय की उज्जयिनी ताम्र पट्टिका से ज्ञात होता है कि उन्होंने भवानीपति की आराधना की व उज्जयिनी में शिवकुण्ड का निर्माण करवाया। परमार नरेश उदयादित्य ने महाकाल मन्दिर का जीर्णोद्धार करवाकर मन्दिर में नाग बंध अभिलेख उत्कीर्ण करवाया। परमार नरेश नरवर्मन के महाकाल अभिलेख से ज्ञात होता है कि उसने उज्जयिनी में शिव मन्दिर का निर्माण करवाया था।
श्री महाकालेश्वर मंदिर के नीचे सभा मण्डप से लगा हुआ एक कुण्ड है जो ’कोटितीर्थ’ के नाम से प्रसिद्ध है। सभा मण्डप मे एक राम मंदिर है। जिसके पीछे ’अवंतिका देवी’ की प्रतिमा है। श्री महाकालेश्वर मंदिर में प्रातः 4 बजे होने वाली भस्मारती विशेष दर्शनीय है। भस्मारती में सम्पूर्ण जीवन के जन्म से लेकर मोक्ष तक के दर्शन की कल्पना की जा सकती है। यह भस्म निरन्तर प्रज्वलित धूनी से तैयार होती है। मंदिर खुलने का समय प्रातः 4 बजे से रात्रि 11 बजे तक है। त्रिलोकी तीन अवतारों में मृत्युलोक में श्री महाकालेश्वर का अद्वितीय अवतार हैं।
मालववंशीय विक्रमादित्य के विषय में जो आख्यान से प्रतीत होता है इस राजा ने महाकालेश्वर का स्वर्ण शिखर-सुशोभित बड़ा मन्दिर बनवाया। उसके लिए अनेक अलंकार तथा चँवर, वितानादि राजचिन्ह समर्पित किए। इसके बाद ई. सं. ग्वारहवीं शताब्दी में इस मन्दिर का जीर्णोद्धार परमार वंश के भोजराजा ने करवाया था। ई. सं.1265 में दिल्ली के सुलतान शमसुद्दीन इल्तुतमिश ने इस मन्दिर को तुड़वाकर महाकाल का लिंग कोटितीर्थ में फिकवा दिया।
इस घटना के 500 वर्षां पश्चात् जब उज्जैन पर राणोजीराव शिन्दे का अधिकार हुआ उस समय उनके दीवान रामचन्द्रबाबा ने उसी स्थान पर महाकालेश्वर का मन्दिर फिर से बनवाया जो आज भी स्थित है। मन्दिर के अन्दर श्री महाकालेश्वर के पश्चिम, उत्तर और पूर्व की ओर क्रमशः गणेश, गिरिजा और षडानन की मूर्तियाँ स्थापित हैं। दक्षिण की ओर गर्भगृह के बाहर नन्दीकेश्वर विराजमान हैं। लिंग विशाल है और सुन्दर नागवेष्टित रजत जलाधारी में विराजमान हैं। बारह ज्योतिर्लिंगों में महाकालेश्वर ही दक्षिणमुखी मन्दिर है। महाकालेश्वर के गर्भगृह के ऊपर के मंजिल पर ओंकारेश्वर विराजमान हैं। श्री महाकालेश्वर के मन्दिर के दक्षिण दिशा में वृद्धकालेश्वर महाकाल और सप्तऋषि का मन्दिर है। महाकालेश्वर के ऊपर जो ओंकारेश्वर जी का मन्दिर है उसके समीप आसपास षटांगण मे स्वप्नेश्वर महादेव, बद्रीनारायण जी, नृसिंह जी, साक्षी गोपाल तथा अनादि कालेश्वर के भी मन्दिर हैं।
महाकालेश्वर के सभामण्डप में ही एक राम मन्दिर है। राम मन्दिर के पीछे अवन्तिका देवी की प्रतिमा है जो इस अवन्तिका की अधिष्ठात्री देवी हैं। नागपंचमी पर महाकाल मन्दिर के ऊपर विराजित नागचन्द्रेश्वर के दर्शन के लिए हज़ारों श्रद्धालु यहाँ आते हैं। भगवान महाकालेश्वर की आरती दिन में पाँच बार होती है-1. पट खुलने – बंद होने का समय। 2. आरती समय। 3. विशिष्ट कार्यक्रम श्रावणमास के चारों सोमवारों के दिन नगर में महाकालेश्वर की भव्य रजत प्रतिमा की सवारी निकाली जाती है जिसमें नगर के हर धर्म के लोग अपना सहयोग देते हैं। सवारी मन्दिर से निकलकर पहले क्षिप्रा तट पर जाती है। वहाँ पूजन के पश्चात नगर के प्रमुख मार्गों से होते हुए यथा स्थान पहुँच जाती है। पाँचवीं शाही एवं अंतिम सवारी मार्गों में निकाली जाती है। श्रावण मास में काँवड़ यात्रियों की सुविधा के कारण विशेष व्यवस्था होती है।
महाकालेश्वर मंदिर मे अभिषेक एवं पूजन व्यवस्था महाकाल मन्दिर मे प्रबन्ध समिति द्वारा विशेष दर्शन व्यवस्था की सुविधा शुल्क निर्धारित है। जिसका शुल्क समय-समय पर मंदिर समिति के निर्णयानुसार निर्धारित होता है।
महाकालेश्वर की सवारियाँ :-
श्रीमहाकालेश्वर क्षेत्र में ठहरने की व्यवस्था -
धर्मशाला
विश्रामधाम
प्रवचन सभागार
श्री महाकालेश्वर प्रसादी व्यवस्था- महाकालेश्वर सेवा समिति द्वारा तीन प्रकार के प्रसाद तैयार कराकर विक्रय किया जाता है-सूखे मेवा, बेसन लड्डू, चिरौंजी।
अमानती सामान पट-निःशुल्क।
भूतभावन भगवान महाकाल की वर्षभर मे निम्नांकित-सवारियाँ निकाली जाती हैं- सभी सवारियों में प्रशासन की ओर से पुलिस व्यवस्था, प्राचीन राज्य के प्रतीक चोपदार, पुरोहित एवं श्रद्धालुजन सम्मिलित रहते हैं- ये सवारियाँ निश्चित् समय शाम चार बजे निकलती हैं। ये सवारियाँ हैं-
सावन-भादों की 6 सवारियाँ कभी 7 जिसमें एक शाही सवारी (अंतिम सवारी जो भाद्रपद, कृष्ण के अन्तिम सोमवार को निकलती है।)
कार्तिक माह की सवारी (कार्तिक शुक्ल से मार्ग कृष्ण के प्रत्येक सोमवार को)
दशहरा मैदान तक दशहरा के दिन सभी पूजन के लिए
बैकुण्ठ चौदस (कार्तिक शुक्ल चतुर्दशी) को रात्रि 11 बजे गोपाल मन्दिर तक ( यह एक मात्र सवारी रात्रि को निकलती है)
उमा साँझी सवारी
ज्योतिर्लिंग महाकालेश्वर का विभिन्न अवसरों पर आकर्षक श्रृंगार किया जाता है। यह श्रृंगार दर्शनीय होता है।
श्रामण माह में
शिवरात्रि को
नागपंचमी
भाग पूजा
भात-पूजा
भस्मार्ती शिवरात्रि के दूसरे दिवस दोपहर 12 बजे कार्तिक कृष्ण चतुर्दशी रूप चौदस के दिन महाकालेश्वर में विशेष अन्नकूट एवं इसके अलावा महाकालेश्वर मन्दिर में अनेक विभिन्न उल्लेखनीय गतिविधियाँ आयोजित होती हैं जो निम्नानुसार है-
हरिहर मिलाप-हरि (विष्णु) और हर (शिव) का मिलाप
श्रावण महोत्सव- महाकाल मंदिर समिति द्वारा श्रावण भाद्रपद के सोमवार से पहले अर्थात् रविवार की शाम को सांस्कृतिक आयोजन करवाया जाता है। जिसमें देश के ख्यातिनाम शास्त्रीय गायक, वादक भागीदारी करते हैं एवं शास्त्रीय नृत्य का आयोजन भी होता है।
शिवरात्रि को दिन में भस्मारती का आयोजन होता है। इस दिन भस्मारती पूजन एवं दर्शन का विशेष महत्व होता है।
उमा-महेश्वर व्रत
साँझी उत्सव- मालवा की परम्परानुसार यह उत्सव आयोजित होता है।
नाग पंचमी: वर्ष में 1 बार खुलने वाले नागचंद्रेश्वर मन्दिर में दर्शन के लिए भारी संख्या में श्रद्धालुओं की कतार लगती है।
महाकालेश्वर मंदिर में भूतभावन ज्योर्तिलिंग की पूजा अर्चन के लिए 16 पुजारी प्रशासन द्वारा नियुक्त हैं। भस्मारती के नेम्नूकदार 4 परिवार 8 पुजारी हें, इसके अतिरिक्त ब्राह्मण पुरोहित जो सभा मण्डप में विराजित होते हैं, पूजन अर्चन करवाने के लिए अधिकृत हैं। 16 पुजारी में एक पुजारी मुख्य पुजारी होता है।
पुजारियों को महाकालेश्वर मन्दिर संस्थान द्वारा वेतन दिया जाता है। जबकि पुरोहितों को पूजन-अर्चन करवाने की रसीद का 75 प्रतिशत मिलता है। शेष 25 प्रतिशत मन्दिर के विकास में खर्च किया जाता है। मन्दिर प्रवेश द्वार से पूजन की रसीद कटवाने पर ज्योतिर्लिंग महाकालेश्वर के विविध पूजन निम्नानुसार करवाया जा सकता है-
पूजन
सामान्य पूजा
अभिषेक महिम्न स्रोत
रुद्राभिषेक वैदिक पूजा
रुद्राभिषेक ग्यारह दर्शना वैदिक पूजा
लघु रूद्र
महारूद्र रूद्राभिषेक 11 एक दर्शना वैदिक पूजा
इसके अतिरिक्त एवं भाँग पूजा, भण्डारा, अन्नकूट भी करवाया जा सकता है।
मंदिरो का विवरण
उज्जैन, आज भी मंदिरों और पुरानी परम्पराओं को एक-दूसरे से जोड़े हुए है। समय के थपेड़ों ने कई प्राचीन मंदिरों को जीर्ण-शीर्ण कर दिया है, लेकिन जनमानस की आस्थाओं की तरह दृढ़ ये मंदिर आज भी खड़े हैं। श्रद्धालु और सरकार समय-समय पर इन मंदिरों का जीर्णोद्धार करते रहे हैं। उज्जैन की परम्पराएँ और मंदिर पुरातन काल की भाँति आज भी अक्षुण्ण बनी हुई हैं।
भगवान गणेश का यह मन्दिर क्षिप्रा नदी के समीप फ़तेहाबाद रेलवे लाइन पर स्थित है। यह माना जाता है कि इस मंदिर में स्थापित गणेश जी की प्रतिमा स्वयंभू है। उनके दोनों ओर उनकी पत्नियां रिद्धि और सिद्धि विराजमान हैं।निरंतर...
श्री महाकालेश्वर मन्दिर
उज्जैन के अधिपति भगवान शिव की महिमा यहाँ के कण-कण में विराजमान हैं। भारत के हृदयस्थल मध्यप्रदेश के उज्जैन में पुण्य सलिला क्षिप्रा के तट के निकट भगवान शिव 'महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग' के रूप में विराजमान हैं।निरंतर...
हरसिद्धि मन्दिर
उज्जैन के प्राचीन पवित्र स्थलों की आकाशगंगा में यह मन्दिर एक विशेष स्थान रखता है। यह मंदिर देवी अन्नपूर्णा को समर्पित है जो गहरे सिंदूरी रंग में रंगी है। देवी अन्नपूर्णा की मूर्ति देवी महालक्ष्मी और देवी सरस्वती की मूर्तियों के बीच विराजमान है।निरंतर...
बड़े गणेशजी का मन्दिर
यह मन्दिर महाकालेश्वर मन्दिर के पास एक तालाब के ऊपर स्थित है, जिसमें भगवान शिव के सुपुत्र की विशाल कलात्मक प्रतिमा स्थापित है। यह शहर में स्थित पारम्परिक मंदिरों में से एक माना जाता है।निरंतर...
श्री रामजनार्दन मन्दिर
प्राचीन विष्णु सागर के तट पर स्थित यह विशाल परकोटे से घिरा मंदिर समूह है। इसमें एक राममंदिर है दूसरा जनार्दन (विष्णु) का मंदिर है। इसे सवाई राजा एवं मालवा के सूबेदार जयसिंह ने बनवाया था। परकोटा तथा कुण्ड मराठाकाल में निर्मित हुए। होल्कर महारानी अहिल्याबाई ने इसका जीर्णोद्धार कराया था।निरंतर...
नगरकोट की रानी का मन्दिर
स्थूल रूप से यह प्रतीत होता है कि यह नगरकोट के परकोटे की रक्षिका देवी है। मन्दिर परमारकालीन है। यहाँ अवन्ति खण्ड में वर्णित नौ मातृकाओं में से सातवीं 'कोटरी देवी' है। दोनों नवरात्रि के अवसर पर यहाँ विशेष नवरात्रि उत्सव मनाया जाता है।निरंतर...
चौबीस खम्बा माता मन्दिर
श्री महाकालेश्वर मन्दिर के पास से पटनी बाजार की ओर जाने वाले मार्ग पर यह पुरातन द्वारा 'चौबीस खम्बा' कहलाता है। यह द्वार बहुत प्राचीन है। यहाँ पर १२ वीं शताब्दी का एक शिलालेख लगा हुआ था उसमें लिखा था कि अनहीलपट्टन के राजा ने अवन्ति में व्यापार करने के लिए नागर व चतुर्वेदी व्यापारियों को यहाँ लाकर बसाया था।निरंतर...
त्रिवेणी नवग्रह (शनि मन्दिर)
शिप्रा नदी के त्रिवेणी घाट पर नवग्रह का यह मन्दिर यात्रियों का प्रमुख केन्द्र है। त्रिवेणी घाट के पास शिप्रा नदी पर खान नदी से संगम है. इस नदी का नाम पास ही इन्दौर नगर में बाणगंगा है। कुछ लोग इस नदी को तुंगभद्रा भी मानते थे। त्रिवेणी संगम की कल्पना के साथ अदृश्य नदी सरस्वती की पौराणिक मान्यता इस स्थान के साथ भी जुड़ी हुई है।निरंतर...
गढ़कालिका मन्दिर
यह मन्दिर कालिका देवी को समर्पित है, जो हिन्दू पौराणिक कथाओं के अनुसार बहुत शक्तिशाली देवी हैं। कालजयी कवि कालिदास गढ़ कालिका देवी के उपासक थे। कालिदास के सम्बन्ध में मान्यता है कि जब से वे इस मंदिर में पूजा-अर्चना करने लगे तभी से उनके प्रतिभाशाली व्यक्तित्व का निर्माण होने लगा।निरंतर...
श्री गोपाल मन्दिर
महाराजा दौलतराव शिन्दे की धर्मपत्नी बायजाबाई शिन्दे ने अपने आराध्य देव गोपाल कृष्ण का यह मन्दिर उन्नीसवीं शताब्दी में बनवाया था. यह मन्दिर मराठा स्थापत्य कला का सुन्दर उदाहरण है। इस मन्दिर के गर्भगृह में गोपाल कृष्ण के अलावा शिव-पार्वती, और बायजाबाई की प्रतिमाएँ भी हैं।निरंतर...
मंगलनाथ मन्दिर
अंकपात के निकट शिप्रा तट के एक टीले पर मंगलनाथ का मन्दिर है। मंगलेश्वर का भव्य मंदिर शिप्रा तट पर स्थित है। मन्दिर के निकट शिप्रा का विशाल घाट है। पौराणिक परंपरा से यह मान्यता है कि उज्जैन मंगलग्रह की जन्मभूमि है। ऐसा भी माना जाता है कि मंगलनाथ के ठीक शीर्ष के ऊपर ही आकाश में मंगलग्रह स्थित है।निरंतर...
सांदिपनी आश्रम
संदीपनी आश्रम का पौराणिक महत्व है। गुरु सांदीपनि के इस आश्रम में ही श्रीकृष्ण, उनके मित्र सुदामा और भाई बलराम ने शिक्षा ग्रहण की। इस जगह का उल्लेख महाभारत में किया गया है।निरंतर...
श्री कालभैरव मन्दिर
आठ भैरव की पूजा शैव परंपरा का एक हिस्सा है और इनमें से काल भैरव को प्रधान माना जाता है। कहते हैं कि शिप्रा के तट पर काल भैरव के मंदिर का निर्माण राजा भद्रसेन ने करावाया था। भगवान काल भैरव को उज्जैन नगर का सेनापति भी कहा जाता है और प्रसाद के रूप में मदिरा का भोग लगाया जाता है।निरंतर...
श्री सिद्धवट मन्दिर (शक्तिभेद तीर्थ)
उज्जैन का सिध्दवट प्रयत्न के अक्षयवट, वृन्दावन के वंशीवट तथा नासिक के पंचवट के समान अपनी पवित्रता के लिए प्रसिध्द है। पुण्यसलिला शिप्रा के सिध्दवट घाट पर अन्त्येष्टि-संस्कार सम्पन्न किया जाता है। स्कन्द पुराण में इस स्थान को प्रेत-शिला-तीर्थ कहा गया है। एक मान्यता के अनुसार पार्वती ने यहाँ तपस्या की थी।निरंतर...
इस्कॉन मन्दिर
इस्कॉन एक अंतरराष्ट्रीय आध्यात्मिक संस्था है। जिसकी स्थापना कृष्ण कृपामूर्ति श्रीमद् अभय चरणारविन्द स्वामी प्रभुपाद ने सन 1966 में न्यूयॉर्क शहर में की। अंग्रेजी में इसे International Society for Krishna Consciousness अर्थात अंतरराष्ट्रीय कृष्ण भावनामृत संघ कहते है। विश्व के लगभग सभी देशों में इस्कॉन ने अपने केंद्र खोल रखे है।निरंतर...
पीर मत्स्येन्द्रनाथ
भर्तृहरि गुफा के चारों ओर का क्षेत्र प्राचीन उज्जैन क्षेत्र था। पुरातत्वीय उत्खनन से प्राप्त अवशेष इसकी प्राचीनता सिद्ध करते हैं। यहीं पर 'पीर मत्स्येन्द्रनाथ' की समाधि है। नवनाथों के प्रमुख 'मत्स्येन्द्रनाथ' थे। नाथ सम्प्रदाय के संतों को पीर कहा जाता है अतः 'मत्स्येन्द्रनाथ' को 'पीर' कहा जाता है।
उज्जैन में 84 महादेव
उज्जैन कैसे पहुँचें
वायु सेवा द्वारा
उज्जैन के शहर के सबसे पास इन्दौर का देवी अहिल्याबाई होलकर हवाई अड्डा है जो यहाँ से 55कि.मी की दूरी पर स्थित है। निजी और सार्वजनिक घरेलू विमान सेवाओं के माध्यम से इन्दौर हवाई अड्डा भारत के अन्य महत्वपूर्ण शहरों से जुड़ा है। पर्यटक उज्जैन तक आने के लिए इन्दौर हवाई अड्डे से टैक्सी भी ले सकते हैं। इन्दौर से उज्जैन तक आने के लिए यात्री बस भी ले सकते हैं।
उज्जैन
55 किमी दूर
इन्दौर हवाई अड्डे (IDR)इन्दौर, मध्य प्रदेश
उज्जैन
172 किमी दूर
भोपाल हवाई अड्डे (BHO)भोपाल, मध्य प्रदेश
उज्जैन सिंहस्थ महाकुम्भ २०१६ मेले में आने के लिये के लिये हवाई उड़ान यहाँ खोजिये|
ट्रेन द्वारा
उज्जैन जंक्शन रेलवे स्टेशन उज्जैन का मुख्य रेलवे स्टेशन है जो भारत के सभी प्रमुख रेलवे स्टेशनों से जुड़ा है। पर्यटक उज्जैन से इंदौर, दिल्ली, पुणे, मुंबई, चेन्नई, कोलकाता, जम्मू, भोपाल, जयपुर, वाराणसी, गोरखपुर, रतलाम, अहमदाबाद, बड़ौदा, ग्वालियर, हैदराबाद, बैंगलोर और अन्य कई बड़े शहरों के लिए सीधी रेलगाडि़याँ ले सकते हैं। आईआरसीटीसी
सड़क मार्ग (बस, टैक्सी)
यह शहर भली प्रकार से राज्य सड़क परिवहन की सार्वजनिक बसों द्वारा जुड़ा है। भोपाल (183 किमी), इन्दौर (55 किमी), अहमदाबाद (400 किमी) तथा ग्वालियर (450 किमी) से उज्जैन के लिए नियमित बसें उपलब्ध हैं। इसके अलावा इन मार्गों पर पर्यटक नियमित रूप से डीलक्स एसी और सुपरफास्ट बसों का लाभ उठा सकते हैं।
टैक्सी सेवा: उज्जैन-इंदौर और उज्जैन-भोपाल और अन्य आसपास के स्थानों के लिये शीघ्र, सुरक्षित और सुविधाजनक अंतर्नगरीय टैक्सी सेवा उपलब्ध है। ये सेवाएँ देश के नामी-गिरामी टैक्सी ऑपरेटर्स द्वारा संचालित की जा रही है।
बस स्टैंड : (१) देवास गेट बस स्टैंड (रेलवे स्टेशन के पास) (२) नानाखेड़ा बस स्टैंड
मध्यप्रदेश के बारे में जानकारी
मध्यप्रदेश राज्य भारत के केन्द्र में स्थित है| अतः अक्सर इसे “भारत का ह्रदय” कहा जाता है| यह राज्य एक समृद्ध सांस्कृतिक विरासत का घर है और व्यवहारिक रूप से यहाँ सब कुछ है; जैसे कि बड़े पठार, शानदार पर्वत श्रृंखला, दूरी तक फैले घने जंगलों के बीच चकरा देने वाली नदियां, वनवासी परिवेश में वन्य जीवों की रोमांचक चित्रमाला, अनगिनत स्मारक|
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