1>|| कुंवारी कन्याओं-नहीं करनी चाहिए***( 1 to 8 )
1>------------कुंवारी कन्याओं को शिवलिंग की पूजा क्यों नहीं करनी चाहिए=+mtl
2>------------भगवान शिव के दो नहीं पांच पुत्रो=+mtl
3>------------अर्द्धनारीश्वर रूप के पीछे छुपे इस सत्य को जान आपकी रूह कांप उठेगी!=+mtl
4>------------क्यों चढ़ाते हैं शिवलिंग पर भस्म?=+mtl
5>------------किस बात का शिवजी को हुआ पछतावा कि तोड़ दिया अपना त्रिशूल ?=+mt
6>----------रामेश्वरम शिवलिंग स्थापना
7>------------शिव प्रतिमा होती है आठ तरह की
8>------------शिवलिङ्ग (शिवलिंग),का अर्थ
1>=कुंवारी कन्याओं को शिवलिंग की पूजा क्यों नहीं करनी चाहिए
धार्मिक रीति-रिवाज
धार्मिक रीति-रिवाजों को लोग विशेष महत्ता प्रदान करते हैं.... धर्म शास्त्रों में बताया गया है कि किसी भी धार्मिक कार्य को करते समय उसके नियमों का पालन करना आनिवार्य है। धार्मिक शास्त्रों में उल्लेखित किसी भी बात को अनदेखा करना उस जातक के लिए ही नुकसानदेह है, जो किसी विशेष पूजा से वरदान की अपेक्षा रखता है।
धार्मिक नियमहम इस बात को झुठला नहीं सकते कि नियमों का पालन करने के साथ हमारे धार्मिक शास्त्र अपने भक्तों को कुछ नियमों में विभाजित भी करते हैं। कौन से जातक किस प्रकार के धार्मिक कार्यों का हिस्सा बन सकते हैं एवं किन कार्यों में गलती से भी भाग नहीं ले सकते, इस सबका वर्णन धर्म ग्रंथों में किया गया है।
भगवान शिव का ‘शिवलिंग’
ऐसा ही एक नियम भगवान शिव के रूप ‘शिवलिंग’ से जुड़ा है, जिसके संदर्भ में यह माना जाता है कि कुंवारी कन्याएं शिवलिंग को हाथ भी नहीं लगा सकतीं। उनके द्वारा इस शिवलिंग की पूजा का ख्याल करना भी निषेध है। लेकिन ऐसा क्यों?
कुछ धार्मिक मान्यताएं
हम जिस गुरु अथवा भगवान को मानते हैं, जिनकी दिन रात आराधना करते हैं, वे स्वयं ही हमें नियमों में क्यों बांधना पसंद करेंगे? लेकिन धार्मिक मान्यताओं को आधार बनाते हुए ऐसा कहा जाता है कि अविवाहित कन्याओं को हमेशा ही शिवलिंग की पूजा से दूर रखना चाहिए।
कुंवारी कन्याओं के लिए वर्जित है पूजा
ऐसी मान्यता है कि लिंगम एक साथ योनि (जो देवी शक्ति का प्रतीक है एवं महिला की रचनात्मक ऊर्जा है) का प्रतिनिधित्व करता है। हालांकि शास्त्रों में ऐसा कुछ नहीं लिखा है। शिवपुराण के अनुसार यह एक ज्योति का प्रतीक है।
क्या है सामाजिक धारणा?
कुछ सामाजिक धारणाओं के अनुसार शिवलिंग की पूजा सिर्फ पुरुष के द्वारा संपन्न होनी चाहिए न कि नारी के द्वारा। महिलाओं को शिवलिंग की पूजा से दूर ही रखा जाता है, खासतौर पर अविवाहित स्त्री को शिवलिंग पूजा से पूरी तरह से वर्जित रखा जाता है। परन्तु ऐसी मान्यताएं क्यों बनाई गई हैं?
शिवलिंग के करीब जाने से मनाही
किंवदंतियों के अनुसार अविवाहित स्त्री को शिवलिंग के करीब जाने की आज्ञा नहीं है। आमतौर पर शिवलिंग की पूजा करने के बाद श्रद्धालु इसके आसपास घूमकर परिक्रमा करने को सही मानते हैं, लेकिन अविवाहित स्त्री को इसके चारों ओर घूमने की भी इजाज़त नहीं दी जाती। ऐसा इसलिए क्योंकि भगवान शिव बेहद गंभीर तपस्या में लीन रहते हैं।
शिव की तपस्या से है संबंध
और किसी स्त्री के कारण उनकी तपस्या भंग ना हो जाए, इसका ध्यान रखना बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है। हमेशा से ही जब भी भगवान शिव की पूजा की जाती है तो विधि-विधान का बहुत खयाल रखा जाता है। केवल मनुष्य जाति ही नहीं, देवता व अप्सराएं भी भगवान शिव की पूजा करते समय बेहद सावधानी से उनकी पूजा करती हैं।
क्रोधित हो जाते हैं शिव जी
यह इसलिए कि कहीं देवों के देव महादेव की समाधि भंग न हो जाए। जब शिव की समाधि भंग होती है तो वे क्रोधित हो जाते हैं और अपने रौद्र रूप में प्रकट होते हैं जिसे शांत कर सकना किसी असंभव कार्य के समान है। इसी कारण से महिलाओं को शिव पूजा न करने के लिए कहा गया है।
लेकिन शिव की पूजा कर सकते हैं
लेकिन शिवलिंग की पूजा से अविवाहित स्त्रियों को दूर रखने का यह अर्थ नहीं है कि वे भगवान शिव की पूजा नहीं कर सकतीं। बल्कि कुंवारी कन्याएं ही शिव जी की सबसे अधिक आराधना करती हैं। अपने लिए एक अच्छे वर की कामना करते हुए वे पूर्ण विधि-विधान से शिव जी के 16 सोमवार का व्रत रखती हैं।
शिव के सोमवार व्रत
व्रत के साथ वे शिव जी की पूर्ण नियमों के साथ पूजा भी करती हैं। और ऐसी मान्यता है कि भक्तों के भोले भगवान शंकर उन्हें वरदान भी देते हैं। एक अच्छे वर के अलावा एक महिला का पति उससे प्रेम करे और अच्छा बर्ताव करे, इसके लिए भी महिलाएं 10 सोमवार का व्रत रखती हैं।
धार्मिक मान्यताएं
इसके साथ ही पति-पत्नी का वैवाहिक जीवन सफल बना रहे, इसके लिए महिलाएं शिव तथा माता पार्वती जी की एक साथ पूजा करती हैं। हिन्दू मान्यताओं में दुनिया की सबसे श्रेष्ठ जोड़ी का श्रेय भगवान शिव एवं पार्वती जी को दिया गया है।
शिव एवं पार्वती
ऐसी मान्यता प्रसिद्ध है कि इन दोनों के प्रेम तथा स्नेह वाली जोड़ी पूरी दुनिया में और किसी की नहीं है। इसलिए भक्त अपने अच्छे विवाहित जीवन के लिए शिव एवं पार्वती की विधिपूर्वक पूजा करते हैं।
सफल विवाह के लिए पूजा
पति-पत्नी का विवाह सफल हो इसके लिए पूजा के साथ कुछ लोग व्रत भी रखते हैं। लेकिन यह व्रत विशेष रूप से केवल सोमवार को ही किया जाए, ऐसी कोई मान्यता नहीं है। यह व्रत किसी भी दिन रखा जा सकता है, लेकिन शिव के भक्त सोमवार को भगवन शिव जी का प्रिय दिन मानकर ही व्रत एवं पूजा करते हैं।
श्रावण के माह में करें व्रत
यूं तो वर्ष के सभी सोमवार भगवान शिव की आराधना के लिए माने गए हैं, लेकिन विशेष रूप से श्रावण के माह (सावन का महीना) के सोमवार को अधिक महत्ता प्रदान की गयी है। सावन का महीना जो कि भगवान शिव को सबसे ज्यादा प्रिय है, इस समय भक्त वे सब कुछ करते हैं जिससे शिव जी प्रसन्न होकर उन्हें मनोवांछित वरदान प्रदान कर सकें।
होगी शिव जी की अपार कृपा
इसलिए यदि आप भी भगवान शिव से इस समय किसी वरदान की अपेक्षा कर रहे हैं, तो सावन का यह महीना आपके लिए सही समय लेकर आया है। इस महीने कुल 4 सोमवार हैं, जिसमें विधिपूर्वक व्रत एवं पूजा करके शिव जी की कृपा पाई जा सकती है।
भगवान शिव भोलेनाथ है और अपने भक्तो पर अपनी कृपा बनाये रखते है विशेष कर श्रावण मास तो उनका प्रिय है और इस महीने में उन्हें आसानी से मनाया जा सकता है. उन भोलेनाथ के परिवार के बारे में हम आपको इस विशेष माह में बताते है, आ शायद शिव के पुत्रो के बारे में जानते होंगे गणेश और कार्तिकेय पर आपको पता है शिव को इन दो के आलावा भी तीन और पुत्र है.
पहले गणेश जिन्हे पारवती ने अपने शरीर के मैल से बनाया फिर कार्तिकेय जो की शिव और पारवती के मिलानसे पैदा हुए, तीसरे क्रम का तो हमें पता नहीं पर फिर भी हम आपको बता देते है की उनकी उत्पति कैसे हुई. भष्मासुर का नाम तो आपने सुना ही होगा, शिव से वरदान पा वो शिव पे ही आजमाने चला था तब शिव वंहा से भागे. तब मोहिनी रूप धर विष्णु ने भस्मासुर को अपने ही हाथो मरवाया, उनके इस रूप से शिव भी मोहित हो गए और दोनों ने मिलान किया जिससे अय्यपा या सास्वत पुत्र ने जन्म लिया. इनकी पूजा विशेष कर दक्षिण भारत में होती है वो भी इन्ही दिनों में.
दूसरा था अंधक जो की भगवान शिव के पसीने से पैदा हुआ था, भगवान शिव तपस्या में रत थे तो उस समय उन्हें सर पे पसीना आया और उसकी बून्द धरती पर गिरी. पसीने की बून्द से एक बालक बना जिसे असुर ले गए उन्होंने ही उसे पाल पोसा, आखिर में दैत्य प्रवर्ति के चलते अंधक ने शिव की अर्धांगिनी पारवती पर कुदृष्टि डाली तो भोलेनाथ ने अपने हाथो से ही उसका वध कर दिया.
(भगवान श्री राम ने रामेश्वरम में जब शिवलिंग की स्थापना की तब आचार्यत्व के लिए रावण को निमंत्रित किया था। रावण ने उस निमंत्रण को स्वीकार किया और उस अनुष्ठान का आचार्य बना। रावण त्रिकालज्ञ था, उसे पता था कि उसकी मृत्यु सिर्फ श्रीराम के हाथों लिखी है। वह कुछ भी दक्षिणा माँग सकता था। पर उसने क्या विचित्र दक्षिणा माँगी वह इस लेख में पढ़िए।
>>> रावण केवल शिव भक्त, विद्वान एवं वीर ही नहीं, अति-मानववादी भी था..। उसे भविष्य का पता था..। वह जानता था कि श्रीराम से जीत पाना उसके लिए असंभव था..। जामवंत जी को आचार्यत्व का निमंत्रण देने के लिए लंका भेजा गया..। जामवन्त जी दीर्घाकार थे, वे आकार में कुम्भकर्ण से तनिक ही छोटे थे। लंका में प्रहरी भी हाथ जोड़कर मार्ग दिखा रहे थे। इस प्रकार जामवन्त को किसी से कुछ पूछना नहीं पड़ा।स्वयं रावण को उन्हें राजद्वार पर अभिवादन का उपक्रम करते देख जामवन्त ने मुस्कराते हुए कहा कि मैं अभिनंदन का पात्र नहीं हूँ। मैं वनवासी राम का दूत बनकर आया हूँ। उन्होंने तुम्हें सादर प्रणाम कहा है।
रावण ने सविनय कहा– आप हमारे पितामह के भाई हैं। इस नाते आप हमारे पूज्य हैं। आप कृपया आसन ग्रहण करें। यदि आप मेंरा निवेदन स्वीकार कर लेंगे, तभी संभवतः मैं भी आपका संदेश सावधानी से सुन सकूंगा।
जामवन्त ने कोई आपत्ति नहीं की। उन्होंने आसन ग्रहण किया। रावण ने भी अपना स्थान ग्रहण किया। तदुपरान्त जामवन्त ने पुनः सुनाया कि वनवासी राम ने सागर-सेतु निर्माण उपरांत अब यथाशीघ्र महेश्व-लिंग-विग्रह की स्थापना करना चाहते हैं। इस अनुष्ठान को सम्पन्न कराने के लिए उन्होने ब्राह्मण, वेदज्ञ और शैव रावण को आचर्य पद पर वरण करने की इच्छा प्रकट की है। मैं उनकी ओर से आपको आमंत्रित करने आया हूँ।
प्रणाम प्रतिक्रिया, अभिव्यक्ति उपरान्त रावण ने मुस्कान भरे स्वर में पूछ ही लिया कि क्या राम द्वारा महेश्व-लिंग-विग्रह स्थापना लंका-विजय की कामना से किया जा रहा है ?
बिल्कुल ठीक। श्रीराम की महेश्वर के चरणों में पूर्ण भक्ति है।
जीवन में प्रथम बार किसी ने रावण को ब्राह्मण माना है और आचार्य बनने योग्य जाना है। क्या रावण इतना अधिक मूर्ख कहलाना चाहेगा कि वह भारतवर्ष के प्रथम प्रशंसित महर्षि पुलस्त्य के सगे भाई महर्षि वशिष्ठ के यजमान का आमंत्रण और अपने आराध्य की स्थापना हेतु आचार्य पद अस्वीकार कर दिया। लेकिन हाँ। यह जाँच तो नितांत आवश्यक है ही कि जब वनवासी राम ने इतना बड़ा आचार्य पद पर पदस्थ होने हेतु आमंत्रित किया है तब वह भी यजमान पद हेतु उचित अधिकारी है भी अथवा नहीं।
जामवंत जी ! आप जानते ही हैं कि त्रिभुवन विजयी अपने इस शत्रु की लंकापुरी में आप पधारे हैं। यदि हम आपको यहाँ बंदी बना लें और आपको यहाँ से लौटने न दें तो आप क्या करेंगे ?
जामवंत खुलकर हँसे।
मुझे निरुद्ध करने की शक्ति समस्त लंका के दानवों के संयुक्त प्रयास में नहीं है, किन्तु मुझे किसी भी प्रकार की कोई विद्वत्ता प्रकट करने की न तो अनुमति है और न ही आवश्यकता। ध्यान रहे, मैं अभी एक ऐसे उपकरण के साथ यहां विद्यमान हूँ, जिसके माध्यम से धनुर्धारी लक्ष्मण यह दृश्यवार्ता स्पष्ट रूप से देख-सुन रहे हैं। जब मैं वहाँ से चलने लगा था तभी धनुर्वीर लक्ष्मण वीरासन में बैठे हुए हैं। उन्होंने आचमन करके अपने त्रोण से पाशुपतास्त्र निकाल कर संधान कर लिया है और मुझसे कहा है कि जामवन्त! रावण से कह देना कि यदि आप में से किसी ने भी मेरा विरोध प्रकट करने की चेष्टा की तो यह पाशुपतास्त्र समस्त दानव कुल के संहार का संकल्प लेकर तुरन्त छूट जाएगा। इस कारण भलाई इसी में है कि आप मुझे अविलम्ब वांछित प्रत्युत्तर के साथ सकुशल और आदर सहित धनुर्धर लक्ष्मण के दृष्टिपथ तक वापस पहुँचने की व्यवस्था करें।
उपस्थित दानवगण भयभीत हो गए। लंकेश तक काँप उठे। पाशुपतास्त्र ! महेश्वर का यह अमोघ अस्त्र तो सृष्टि में एक साथ दो धनुर्धर प्रयोग ही नहीं कर सकते। अब भले ही वह रावण मेघनाथ के त्रोण में भी हो। जब लक्ष्मण ने उसे संधान स्थिति में ला ही दिया है, तब स्वयं भगवान शिव भी अब उसे उठा नहीं सकते। उसका तो कोई प्रतिकार है ही नहीं।
रावण ने अपने आपको संभाल कर कहा – आप पधारें। यजमान उचित अधिकारी है। उसे अपने दूत को संरक्षण देना आता है। राम से कहिएगा कि मैंने उसका आचार्यत्व स्वीकार किया।
जामवन्त को विदा करने के तत्काल उपरान्त लंकेश ने सेवकों को आवश्यक सामग्री संग्रह करने हेतु आदेश दिया और स्वयं अशोक वाटिका पहुँचे, जो आवश्यक उपकरण यजमान उपलब्ध न कर सके जुटाना आचार्य का परम कर्त्तव्य होता है। रावण जानता है कि वनवासी राम के पास क्या है और क्या होना चाहिए।
अशोक उद्यान पहुँचते ही रावण ने सीता से कहा कि राम लंका विजय की कामना समुद्रतट पर महेश्वर लिंग विग्रह की स्थापना करने जा रहे हैं और रावण को आचार्य वरण किया है। यजमान का अनुष्ठान पूर्ण हो यह दायित्व आचार्य का भी होता है। तुम्हें विदित है कि अर्द्धांगिनी के बिना गृहस्थ के सभी अनुष्ठान अपूर्ण रहते हैं। विमान आ रहा है, उस पर बैठ जाना। ध्यान रहे कि तुम वहाँ भी रावण के अधीन ही रहोगी। अनुष्ठान समापन उपरान्त यहाँ आने के लिए विमान पर पुनः बैठ जाना। स्वामी का आचार्य अर्थात् स्वयं का आचार्य। यह जान जानकी जी ने दोनों हाथ जोड़कर मस्तक झुका दिया। स्वस्थ कण्ठ से सौभाग्यवती भव कहते रावण ने दोनों हाथ उठाकर भरपूर आशीर्वाद दिया।
सीता और अन्य आवश्यक उपकरण सहित रावण आकाश मार्ग से समुद्र तट पर उतरा। आदेश मिलने पर आना कहकर सीता को उसने विमान में ही छोड़ा और स्वयं राम के सम्मुख पहुँचा। जामवन्त से संदेश पाकर भाई, मित्र और सेना सहित श्रीराम स्वागत सत्कार हेतु पहले से ही तत्पर थे। सम्मुख होते ही वनवासी राम आचार्य दशग्रीव को हाथ जोड़कर प्रणाम किया। दीर्घायु भव ! लंका विजयी भव ! दशग्रीव के आशीर्वचन के शब्द ने सबको चौंका दिया । सुग्रीव ही नहीं विभीषण को भी उसने उपेक्षा कर दी। जैसे वे वहाँ हों ही नहीं।
भूमि शोधन के उपरान्त रावणाचार्य ने कहा कि यजमान ! अर्द्धांगिनी कहाँ है ? उन्हें यथास्थान आसन दें।
श्रीराम ने मस्तक झुकाते हुए हाथ जोड़कर अत्यन्त विनम्र स्वर से प्रार्थना की कि यदि यजमान असमर्थ हो तो योग्याचार्य सर्वोत्कृष्ट विकल्प के अभाव में अन्य समकक्ष विकल्प से भी तो अनुष्ठान सम्पादन कर सकते हैं।
अवश्य-अवश्य, किन्तु अन्य विकल्प के अभाव में ऐसा संभव है, प्रमुख विकल्प के अभाव में नहीं। यदि तुम अविवाहित, विधुर अथवा परित्यक्त होते तो संभव था। इन सबके अतिरिक्त तुम सन्यासी भी नहीं हो और पत्नीहीन वानप्रस्थ का भी तुमने व्रत नहीं लिया है। इन परिस्थितियों में पत्नीरहित अनुष्ठान तुम कैसे कर सकते हो ?
कोई उपाय आचार्य ?
आचार्य आवश्यक साधन, उपकरण अनुष्ठान उपरान्त वापस ले जाते हैं। स्वीकार हो तो किसी को भेज दो, सागर सन्निकट पुष्पक विमान में यजमान पत्नी विराजमान हैं।
श्रीराम ने हाथ जोड़कर मस्तक झुकाते हुए मौन भाव से इस सर्वश्रेष्ठ युक्ति को स्वीकार किया।
श्री रामादेश के परिपालन में विभीषण मंत्रियों सहित पुष्पक विमान तक गए और सीता सहित लौटे।
अर्द्ध यजमान के पार्श्व में बैठो अर्द्ध यजमान। आचार्य के इस आदेश का वैदेही ने पालन किया। गणपति पूजन, कलश स्थापना और नवग्रह पूजन उपरान्त आचार्य ने पूछा - लिंग विग्रह ?
यजमान ने निवेदन किया कि उसे लेने गत रात्रि के प्रथम प्रहर से पवनपुत्र कैलाश गए हुए हैं। अभी तक लौटे नहीं हैं। आते ही होंगे।
आचार्य ने आदेश दे दिया - विलम्ब नहीं किया जा सकता। उत्तम मुहूर्त उपस्थित है। इसलिए अविलम्ब यजमान-पत्नी बालुका-लिंग-विग्रह स्वयं बना ले।
जनक नंदिनी ने स्वयं के कर-कमलों से समुद्र तट की आर्द्र रेणुकाओं से आचार्य के निर्देशानुसार यथेष्ट लिंग-विग्रह निर्मित की।
यजमान द्वारा रेणुकाओं का आधार पीठ बनाया गया। श्रीसीताराम ने वही महेश्वर लिंग-विग्रह स्थापित किया। आचार्य ने परिपूर्ण विधि-विधान के साथ अनुष्ठान सम्पन्न कराया।
अब आती है बारी आचार्य की दक्षिणा की...... श्रीराम ने पूछा - आपकी दक्षिणा?
पुनः एक बार सभी को चौंकाया।
आचार्य के शब्दों ने। घबराओ नहीं यजमान। स्वर्णपुरी के स्वामी की दक्षिणा सम्पत्ति नहीं हो सकती। आचार्य जानते हैं कि उनका यजमान वर्तमान में वनवासी है, लेकिन फिर भी राम अपने आचार्य कि जो भी माँग हो उसे पूर्ण करने की प्रतिज्ञा करता है।
आचार्य जब मृत्यु शैय्या ग्रहण करे तब यजमान सम्मुख उपस्थित रहे। आचार्य ने अपनी दक्षिणा मांगी।
ऐसा ही होगा आचार्य। यजमान ने वचन दिया और समय आने पर निभाया भी।
“रघुकुल रीति सदा चली आई । प्राण जाई पर वचन न जाई ।”
यह दृश्य वार्ता देख सुनकर सभी ने उपस्थित समस्त जन समुदाय के नयनाभिराम प्रेमाश्रुजल से भर गए। सभी ने एक साथ एक स्वर से सच्ची श्रद्धा के साथ इस अद्भुत आचार्य को प्रणाम किया ।
रावण जैसे भविष्यदृष्टा ने जो दक्षिणा माँगी, उससे बड़ी दक्षिणा क्या हो सकती थी? जो रावण यज्ञ-कार्य पूरा करने हेतु राम की बंदी पत्नी को शत्रु के समक्ष प्रस्तुत कर सकता है, व राम से लौट जाने की दक्षिणा कैसे मांग सकता है?
बहुत कुछ हो सकता था। काश राम को वनवास न होता, काश सीता वन न जाती, किन्तु ये धरती तो है ही पाप भुगतने वालों के लिए और जो यहाँ आया है, उसे अपने पाप भुगतने होंगे और इसलिए रावण जैसा पापी लंका का स्वामी तो हो सकता है देवलोक का नहीं।
वह तपस्वी रावण जिसे मिला था-
ब्रह्मा से विद्वता और अमरता का वरदान
शिव भक्ति से पाया शक्ति का वरदान....
चारों वेदों का ज्ञाता,
ज्योतिष विद्या का पारंगत,
अपने घर की वास्तु शांति हेतु आचार्य रूप में जिसे, भगवन शंकर ने किया आमंत्रित..., शिव भक्त रावण, रामेश्वरम में शिवलिंग पूजा हेतु, अपने शत्रु प्रभु राम का, जिसने स्वीकार किया निमंत्रण। आयुर्वेद, रसायन और कई प्रकार की
जानता जो विधियां, अस्त्र शास्त्र, तंत्र-मन्त्र की सिद्धियाँ..। शिव तांडव स्तोत्र का महान कवि, अग्नि-बाण ब्रह्मास्त्र का ही नहि, बेला या वायलिन का आविष्कर्ता, जिसे देखते ही दरबार में राम भक्त हनुमान भी एक बार मुग्ध हो, बोल उठे थे -
"राक्षस राजश्य सर्व लक्षणयुक्ता"....
काश रामानुज लक्ष्मण ने सुर्पणखा की नाक न कटी होती, काश रावण के मन में सुर्पणखा के प्रति अगाध प्रेम न होता, गर बदला लेने के लिए सुर्पणखा ने रावण को न उकसाया होता, रावण के मन में सीता हरण का ख्याल कभी न आया होता...।
इस तरह रावण में, अधर्म बलवान न होता, तो देव लोक का भी स्वामी रावण ही होता..।
(रामेश्वरम् देवस्थान में लिखा हुआ है कि इस ज्योतिर्लिंग की स्थापना श्रीराम ने रावण द्वारा करवाई थी। बाल्मीकि रामायण और तुलसीकतृ रामायण में इस कथा का वर्णन नहीं है, पर तमिल भाषा में लिखी महर्षि कम्बन की 'इरामावतारम्' मे यह कथा है।)
हम जिस गुरु अथवा भगवान को मानते हैं, जिनकी दिन रात आराधना करते हैं, वे स्वयं ही हमें नियमों में क्यों बांधना पसंद करेंगे? लेकिन धार्मिक मान्यताओं को आधार बनाते हुए ऐसा कहा जाता है कि अविवाहित कन्याओं को हमेशा ही शिवलिंग की पूजा से दूर रखना चाहिए।
कुंवारी कन्याओं के लिए वर्जित है पूजा
ऐसी मान्यता है कि लिंगम एक साथ योनि (जो देवी शक्ति का प्रतीक है एवं महिला की रचनात्मक ऊर्जा है) का प्रतिनिधित्व करता है। हालांकि शास्त्रों में ऐसा कुछ नहीं लिखा है। शिवपुराण के अनुसार यह एक ज्योति का प्रतीक है।
क्या है सामाजिक धारणा?
कुछ सामाजिक धारणाओं के अनुसार शिवलिंग की पूजा सिर्फ पुरुष के द्वारा संपन्न होनी चाहिए न कि नारी के द्वारा। महिलाओं को शिवलिंग की पूजा से दूर ही रखा जाता है, खासतौर पर अविवाहित स्त्री को शिवलिंग पूजा से पूरी तरह से वर्जित रखा जाता है। परन्तु ऐसी मान्यताएं क्यों बनाई गई हैं?
शिवलिंग के करीब जाने से मनाही
किंवदंतियों के अनुसार अविवाहित स्त्री को शिवलिंग के करीब जाने की आज्ञा नहीं है। आमतौर पर शिवलिंग की पूजा करने के बाद श्रद्धालु इसके आसपास घूमकर परिक्रमा करने को सही मानते हैं, लेकिन अविवाहित स्त्री को इसके चारों ओर घूमने की भी इजाज़त नहीं दी जाती। ऐसा इसलिए क्योंकि भगवान शिव बेहद गंभीर तपस्या में लीन रहते हैं।
शिव की तपस्या से है संबंध
और किसी स्त्री के कारण उनकी तपस्या भंग ना हो जाए, इसका ध्यान रखना बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है। हमेशा से ही जब भी भगवान शिव की पूजा की जाती है तो विधि-विधान का बहुत खयाल रखा जाता है। केवल मनुष्य जाति ही नहीं, देवता व अप्सराएं भी भगवान शिव की पूजा करते समय बेहद सावधानी से उनकी पूजा करती हैं।
क्रोधित हो जाते हैं शिव जी
यह इसलिए कि कहीं देवों के देव महादेव की समाधि भंग न हो जाए। जब शिव की समाधि भंग होती है तो वे क्रोधित हो जाते हैं और अपने रौद्र रूप में प्रकट होते हैं जिसे शांत कर सकना किसी असंभव कार्य के समान है। इसी कारण से महिलाओं को शिव पूजा न करने के लिए कहा गया है।
लेकिन शिव की पूजा कर सकते हैं
लेकिन शिवलिंग की पूजा से अविवाहित स्त्रियों को दूर रखने का यह अर्थ नहीं है कि वे भगवान शिव की पूजा नहीं कर सकतीं। बल्कि कुंवारी कन्याएं ही शिव जी की सबसे अधिक आराधना करती हैं। अपने लिए एक अच्छे वर की कामना करते हुए वे पूर्ण विधि-विधान से शिव जी के 16 सोमवार का व्रत रखती हैं।
शिव के सोमवार व्रत
व्रत के साथ वे शिव जी की पूर्ण नियमों के साथ पूजा भी करती हैं। और ऐसी मान्यता है कि भक्तों के भोले भगवान शंकर उन्हें वरदान भी देते हैं। एक अच्छे वर के अलावा एक महिला का पति उससे प्रेम करे और अच्छा बर्ताव करे, इसके लिए भी महिलाएं 10 सोमवार का व्रत रखती हैं।
धार्मिक मान्यताएं
इसके साथ ही पति-पत्नी का वैवाहिक जीवन सफल बना रहे, इसके लिए महिलाएं शिव तथा माता पार्वती जी की एक साथ पूजा करती हैं। हिन्दू मान्यताओं में दुनिया की सबसे श्रेष्ठ जोड़ी का श्रेय भगवान शिव एवं पार्वती जी को दिया गया है।
शिव एवं पार्वती
ऐसी मान्यता प्रसिद्ध है कि इन दोनों के प्रेम तथा स्नेह वाली जोड़ी पूरी दुनिया में और किसी की नहीं है। इसलिए भक्त अपने अच्छे विवाहित जीवन के लिए शिव एवं पार्वती की विधिपूर्वक पूजा करते हैं।
सफल विवाह के लिए पूजा
पति-पत्नी का विवाह सफल हो इसके लिए पूजा के साथ कुछ लोग व्रत भी रखते हैं। लेकिन यह व्रत विशेष रूप से केवल सोमवार को ही किया जाए, ऐसी कोई मान्यता नहीं है। यह व्रत किसी भी दिन रखा जा सकता है, लेकिन शिव के भक्त सोमवार को भगवन शिव जी का प्रिय दिन मानकर ही व्रत एवं पूजा करते हैं।
श्रावण के माह में करें व्रत
यूं तो वर्ष के सभी सोमवार भगवान शिव की आराधना के लिए माने गए हैं, लेकिन विशेष रूप से श्रावण के माह (सावन का महीना) के सोमवार को अधिक महत्ता प्रदान की गयी है। सावन का महीना जो कि भगवान शिव को सबसे ज्यादा प्रिय है, इस समय भक्त वे सब कुछ करते हैं जिससे शिव जी प्रसन्न होकर उन्हें मनोवांछित वरदान प्रदान कर सकें।
होगी शिव जी की अपार कृपा
इसलिए यदि आप भी भगवान शिव से इस समय किसी वरदान की अपेक्षा कर रहे हैं, तो सावन का यह महीना आपके लिए सही समय लेकर आया है। इस महीने कुल 4 सोमवार हैं, जिसमें विधिपूर्वक व्रत एवं पूजा करके शिव जी की कृपा पाई जा सकती है।
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2>== भगवान शिव के दो नहीं पांच पुत्रोभगवान शिव भोलेनाथ है और अपने भक्तो पर अपनी कृपा बनाये रखते है विशेष कर श्रावण मास तो उनका प्रिय है और इस महीने में उन्हें आसानी से मनाया जा सकता है. उन भोलेनाथ के परिवार के बारे में हम आपको इस विशेष माह में बताते है, आ शायद शिव के पुत्रो के बारे में जानते होंगे गणेश और कार्तिकेय पर आपको पता है शिव को इन दो के आलावा भी तीन और पुत्र है.
पहले गणेश जिन्हे पारवती ने अपने शरीर के मैल से बनाया फिर कार्तिकेय जो की शिव और पारवती के मिलानसे पैदा हुए, तीसरे क्रम का तो हमें पता नहीं पर फिर भी हम आपको बता देते है की उनकी उत्पति कैसे हुई. भष्मासुर का नाम तो आपने सुना ही होगा, शिव से वरदान पा वो शिव पे ही आजमाने चला था तब शिव वंहा से भागे. तब मोहिनी रूप धर विष्णु ने भस्मासुर को अपने ही हाथो मरवाया, उनके इस रूप से शिव भी मोहित हो गए और दोनों ने मिलान किया जिससे अय्यपा या सास्वत पुत्र ने जन्म लिया. इनकी पूजा विशेष कर दक्षिण भारत में होती है वो भी इन्ही दिनों में.
दूसरा था अंधक जो की भगवान शिव के पसीने से पैदा हुआ था, भगवान शिव तपस्या में रत थे तो उस समय उन्हें सर पे पसीना आया और उसकी बून्द धरती पर गिरी. पसीने की बून्द से एक बालक बना जिसे असुर ले गए उन्होंने ही उसे पाल पोसा, आखिर में दैत्य प्रवर्ति के चलते अंधक ने शिव की अर्धांगिनी पारवती पर कुदृष्टि डाली तो भोलेनाथ ने अपने हाथो से ही उसका वध कर दिया.
शिव का पांचवा पुत्र भी कुछ ऐसे ही जन्मा उसका जन्म शिव जो की तपस्या रत थे के सीने से निकले प्रकाश के धरती पर पड़ने से हुआ, भगवान शिव ने उसे पृथ्वी को ही पलने के लिए दिया. जब वो पैदा हुआ तो पूरा लाल रंग का था और उसके चार हाथ थे. थोड़ा बड़ा होने के बाद खुरा (भौमा) उसका नाम रखा गया और उसने भगवान शिव की तपस्या कर उनसे वरदान पाया और मंगल गृह बन के सितारा बन रहने लगे जो की मंगल गृह है वो मेष राशि के स्वामी है और लोहे के देवता भी है. शुक्रग्रह के मुकाबले वो कई बड़ी गृह है.
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3>अर्द्धनारीश्वर रूप के पीछे छुपे इस सत्य को जान आपकी रूह कांप उठेगी!
भगवान की महिमा अपने भक्तो से ही है, भगवान अपने से ज्यादा अपने भक्तो का गुणगान करने से अत्यधिक प्रसन्न होते है. ऐसे ही एक परम भक्त जिनकी महिमा हालाँकि उतनी नही फैली जितनी की होनी चाहिए क्योंकि उनकी भक्ति में थोड़ी सी कमी रह गई थी जिसकी बाद में उन्होंने भरपाई की.
"शीश गैंग अर्धांग पार्वती..... नंदी भृंगी नृत्य करात है" शिव स्तुति में भृंगी नाम आपने सुना होगा, ये एक पौराणिक कालीन ऋषि थे जो की शिव के परम भक्त थे. लेकिन भक्त कुछ ज्यादा ही कट्टर थे, इतने की शिव की तो आराधना करते लेकिन बाकि भक्तो की भांति पार्वती को नहीं भजते थे.
उनकी भक्ति अदम्य थी लेकिन वो पार्वती जी को हमेशा ही शिव से अलग समझते थे या यु कहे उनके कुछ नही समझते थे, ये उनका घमंड नही बल्कि शिव और केवल शिव में आसक्ति थी जिसमे उन्हें शिव के आलावा कुछ और दीखता ही नही था. एक बार तो ऐसा हुआ की वो कैलाश पर भगवान शिव की परिक्रमा करने गए लेकिन वो पार्वती की परिक्रमा नही करना चाहते थे.
इस पार्वती ने ऐतराज जताया और कहा की हम दो जिस्म एक जान है तुम ऐसा नही कर सकते पर कट्टरता देखिये भृंगी ने पार्वती को अनसुना किया और शिव की परिक्रमा लगाने बढे. लेकिन तब पार्वती शिव से सट के बैठ गई, मामले में और नया मोड़ आया भृंगी ने सर्प का रूप धरा और दोनों के बीच से होते हुए शिव की परिक्रमा देनी चाही.
तब शिव ने पार्वती का साथ दिया और संसार में अर्धनारीश्वर रूप धरा, तब भृंगी क्या करते पर गुस्से में आके उन्होंने चूहे का रूप धरा और शिव और पार्वती को बीच से कुतरने लगे. पर तब शक्ति को क्रोध आया और उन्होंने भृंगी को श्राप दिया की जो शरीर तुम्हे अपनी माँ से मिला है वो तुरंत तुम्हारी देह छोड़ देगा.
तंत्र साधना के हिसाब से मनुष्य को अपनी देह में हड्डिया और मांसपेशिया पिता की दें होती है जबकि खून और मांस माता की, श्राप के तुरंत प्रभाव से भृंगी ऋषि के शरीर से खून और मांस गिर गया. भृंगी निढाल हो जमीं पे गिर पड़े और हालत ये थे की वो खड़े भी होने की स्थिति में नही थे, तब उन्हें अपनी भूल का एहसास हुआ और उन्होंने माँ पार्वती से अपनी भूल की क्षमा मांगी.
हालाँकि तब पार्वती ने अपना श्राप वापस लेना चाहा पर अपराध बोध से भृंगी ने मना कर दिया, पर उन्हें खड़ा रहने के लिए सहारे स्वरुप एक और (तीसरा) पैर प्रदान किया गया जिसके सहारे वो चल और खड़े हो सके. तो भक्त भृंगी के कारण हुआ था अर्धनारीश्वर रूप का उदय.
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4>क्यों चढ़ाते हैं शिवलिंग पर भस्म?भगवान की महिमा अपने भक्तो से ही है, भगवान अपने से ज्यादा अपने भक्तो का गुणगान करने से अत्यधिक प्रसन्न होते है. ऐसे ही एक परम भक्त जिनकी महिमा हालाँकि उतनी नही फैली जितनी की होनी चाहिए क्योंकि उनकी भक्ति में थोड़ी सी कमी रह गई थी जिसकी बाद में उन्होंने भरपाई की.
"शीश गैंग अर्धांग पार्वती..... नंदी भृंगी नृत्य करात है" शिव स्तुति में भृंगी नाम आपने सुना होगा, ये एक पौराणिक कालीन ऋषि थे जो की शिव के परम भक्त थे. लेकिन भक्त कुछ ज्यादा ही कट्टर थे, इतने की शिव की तो आराधना करते लेकिन बाकि भक्तो की भांति पार्वती को नहीं भजते थे.
उनकी भक्ति अदम्य थी लेकिन वो पार्वती जी को हमेशा ही शिव से अलग समझते थे या यु कहे उनके कुछ नही समझते थे, ये उनका घमंड नही बल्कि शिव और केवल शिव में आसक्ति थी जिसमे उन्हें शिव के आलावा कुछ और दीखता ही नही था. एक बार तो ऐसा हुआ की वो कैलाश पर भगवान शिव की परिक्रमा करने गए लेकिन वो पार्वती की परिक्रमा नही करना चाहते थे.
इस पार्वती ने ऐतराज जताया और कहा की हम दो जिस्म एक जान है तुम ऐसा नही कर सकते पर कट्टरता देखिये भृंगी ने पार्वती को अनसुना किया और शिव की परिक्रमा लगाने बढे. लेकिन तब पार्वती शिव से सट के बैठ गई, मामले में और नया मोड़ आया भृंगी ने सर्प का रूप धरा और दोनों के बीच से होते हुए शिव की परिक्रमा देनी चाही.
तब शिव ने पार्वती का साथ दिया और संसार में अर्धनारीश्वर रूप धरा, तब भृंगी क्या करते पर गुस्से में आके उन्होंने चूहे का रूप धरा और शिव और पार्वती को बीच से कुतरने लगे. पर तब शक्ति को क्रोध आया और उन्होंने भृंगी को श्राप दिया की जो शरीर तुम्हे अपनी माँ से मिला है वो तुरंत तुम्हारी देह छोड़ देगा.
तंत्र साधना के हिसाब से मनुष्य को अपनी देह में हड्डिया और मांसपेशिया पिता की दें होती है जबकि खून और मांस माता की, श्राप के तुरंत प्रभाव से भृंगी ऋषि के शरीर से खून और मांस गिर गया. भृंगी निढाल हो जमीं पे गिर पड़े और हालत ये थे की वो खड़े भी होने की स्थिति में नही थे, तब उन्हें अपनी भूल का एहसास हुआ और उन्होंने माँ पार्वती से अपनी भूल की क्षमा मांगी.
हालाँकि तब पार्वती ने अपना श्राप वापस लेना चाहा पर अपराध बोध से भृंगी ने मना कर दिया, पर उन्हें खड़ा रहने के लिए सहारे स्वरुप एक और (तीसरा) पैर प्रदान किया गया जिसके सहारे वो चल और खड़े हो सके. तो भक्त भृंगी के कारण हुआ था अर्धनारीश्वर रूप का उदय.
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शिवजी के पूजन में भस्म अर्पित करने का विशेष महत्व है। बारह ज्योर्तिलिंग में से एक उज्जैन स्थित महाकालेश्वर मंदिर में प्रतिदिन भस्म आरती विशेष रूप से की जाती है। यह प्राचीन परंपरा है। आइए जानते है शिवपुराण के अनुसार शिवलिंग पर भस्म क्यों अर्पित की जाती है…
शिवजी का रूप है निराला
भगवान शिव अद्भुत व अविनाशी हैं। भगवान शिव जितने सरल हैं, उतने ही रहस्यमयी भी हैं। भोलेनाथ का रहन-सहन, आवास, गण आदि सभी देवताओं से एकदम अलग हैं। शास्त्रों में एक ओर जहां सभी देवी-देवताओं को सुंदर वस्त्र और आभूषणों से सुसज्जित बताया गया है, वहीं दूसरी ओर भगवान शिव का रूप निराला ही बताया गया है। शिवजी सदैव मृगचर्म (हिरण की खाल) धारण किए रहते हैं और शरीर पर भस्म (राख) लगाए रहते हैं।
भस्म का रहस्य
शिवजी का प्रमुख वस्त्र भस्म यानी राख है, क्योंकि उनका पूरा शरीर भस्म से ढंका रहता है। शिवपुराण के अनुसार भस्म सृष्टि का सार है, एक दिन संपूर्ण सृष्टि इसी राख के रूप में परिवर्तित हो जानी है। ऐसा माना जाता है कि चारों युग (त्रेता युग, सत युग, द्वापर युग और कलियुग) के बाद इस सृष्टि का विनाश हो जाता है और पुन: सृष्टि की रचना ब्रह्माजी द्वारा की जाती है। यह क्रिया अनवरत चलती रहती है। इस सृष्टि के सार भस्म यानी राख को शिवजी सदैव धारण किए रहते हैं। इसका यही अर्थ है कि एक दिन यह संपूर्ण सृष्टि शिवजी में विलीन हो जानी है।
ऐसे तैयार की जाती है भस्म
शिवपुराण के लिए अनुसार भस्म तैयार करने के लिए कपिला गाय के गोबर से बने कंडे, शमी, पीपल, पलाश, बड़, अमलतास और बेर के वृक्ष की लकडिय़ों को एक साथ जलाया जाता है। इस दौरान उचित मंत्रोच्चार किए जाते हैं। इन चीजों को जलाने पर जो भस्म प्राप्त होती है, उसे कपड़े से छान लिया जाता है। इस प्रकार तैयार की गई भस्म शिवजी को अर्पित की जाती है।
भगवान शिव अद्भुत व अविनाशी हैं। भगवान शिव जितने सरल हैं, उतने ही रहस्यमयी भी हैं। भोलेनाथ का रहन-सहन, आवास, गण आदि सभी देवताओं से एकदम अलग हैं। शास्त्रों में एक ओर जहां सभी देवी-देवताओं को सुंदर वस्त्र और आभूषणों से सुसज्जित बताया गया है, वहीं दूसरी ओर भगवान शिव का रूप निराला ही बताया गया है। शिवजी सदैव मृगचर्म (हिरण की खाल) धारण किए रहते हैं और शरीर पर भस्म (राख) लगाए रहते हैं।
भस्म का रहस्य
शिवजी का प्रमुख वस्त्र भस्म यानी राख है, क्योंकि उनका पूरा शरीर भस्म से ढंका रहता है। शिवपुराण के अनुसार भस्म सृष्टि का सार है, एक दिन संपूर्ण सृष्टि इसी राख के रूप में परिवर्तित हो जानी है। ऐसा माना जाता है कि चारों युग (त्रेता युग, सत युग, द्वापर युग और कलियुग) के बाद इस सृष्टि का विनाश हो जाता है और पुन: सृष्टि की रचना ब्रह्माजी द्वारा की जाती है। यह क्रिया अनवरत चलती रहती है। इस सृष्टि के सार भस्म यानी राख को शिवजी सदैव धारण किए रहते हैं। इसका यही अर्थ है कि एक दिन यह संपूर्ण सृष्टि शिवजी में विलीन हो जानी है।
ऐसे तैयार की जाती है भस्म
शिवपुराण के लिए अनुसार भस्म तैयार करने के लिए कपिला गाय के गोबर से बने कंडे, शमी, पीपल, पलाश, बड़, अमलतास और बेर के वृक्ष की लकडिय़ों को एक साथ जलाया जाता है। इस दौरान उचित मंत्रोच्चार किए जाते हैं। इन चीजों को जलाने पर जो भस्म प्राप्त होती है, उसे कपड़े से छान लिया जाता है। इस प्रकार तैयार की गई भस्म शिवजी को अर्पित की जाती है।
भस्म से बढ़ता है आकर्षण
ऐसा माना जाता है कि इस प्रकार तैयार की गई भस्म को यदि कोई इंसान भी धारण करता है तो वह सभी सुख-सुविधाएं प्राप्त करता है। शिवपुराण के अनुसार ऐसी भस्म धारण करने से व्यक्ति का आकर्षण बढ़ता है, समाज में मान-सम्मान प्राप्त होता है। अत: शिवजी को अर्पित की गई भस्म का तिलक लगाना चाहिए।
ऐसा माना जाता है कि इस प्रकार तैयार की गई भस्म को यदि कोई इंसान भी धारण करता है तो वह सभी सुख-सुविधाएं प्राप्त करता है। शिवपुराण के अनुसार ऐसी भस्म धारण करने से व्यक्ति का आकर्षण बढ़ता है, समाज में मान-सम्मान प्राप्त होता है। अत: शिवजी को अर्पित की गई भस्म का तिलक लगाना चाहिए।
भस्म से होती है शुद्धि
जिस प्रकार भस्म यानी राख से कई प्रकार की वस्तुएं शुद्ध और साफ की जाती है, ठीक उसी प्रकार यदि हम भी शिवजी को अर्पित की गई भस्म का तिलक लगाएंगे तो अक्षय पुण्य की प्राप्ति होगी और कई जन्मों के पापों से मुक्ति मिल जाएगी।
जिस प्रकार भस्म यानी राख से कई प्रकार की वस्तुएं शुद्ध और साफ की जाती है, ठीक उसी प्रकार यदि हम भी शिवजी को अर्पित की गई भस्म का तिलक लगाएंगे तो अक्षय पुण्य की प्राप्ति होगी और कई जन्मों के पापों से मुक्ति मिल जाएगी।
भस्म की विशेषता
भस्म की यह विशेषता होती है कि यह शरीर के रोम छिद्रों को बंद कर देती है। इसे शरीर पर लगाने से गर्मी में गर्मी और सर्दी में सर्दी नहीं लगती। भस्म, त्वचा संबंधी रोगों में भी दवा का काम भी करती है। शिवजी का निवास कैलाश पर्वत पर बताया गया है, जहां का वातावरण एकदम प्रतिकूल है। इस प्रतिकूल वातावरण को अनुकूल बनाने में भस्म महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। भस्म धारण करने वाले शिव संदेश देते हैं कि परिस्थितियों के अनुसार स्वयं को ढाल लेना चाहिए। जहां जैसे हालात बनते हैं, हमें भी स्वयं को उसी के अनुरूप बना लेना चाहिए।
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5>किस बात का शिवजी को हुआ पछतावा कि तोड़ दिया अपना त्रिशूल ?
त्रिशूल भगवान शिव का अस्त्र माना जाता है। इससे वे भक्तों की रक्षा तथा दुष्टों को दंड देते हैं। भारत में भगवान शिव का एक मंदिर ऐसा भी है जहां उनके खंडित त्रिशूल के टुकड़े जमीन में गड़े हुए हैं। आमतौर पर खंडित मूर्ति और उसके अस्त्रों का पूजन करना निषिद्ध होता है लेकिन यहां भगवान शिव के दर्शन-पूजन के लिए दूर-दूर से श्रद्धालु आते हैं।
यह मंदिर जम्मू से करीब 120 किमी की दूरी पर स्थित है। इस इलाके में पटनीटाप के पास सुध महादेव (शुद्ध महादेव) विराजमान हैं। यह शिवजी के अत्यंत प्राचीन मंदिरों में से एक है। यहीं उनके त्रिशूल के तीन टुकड़े हैं।
पास ही मानतलाई नामक स्थान है जिसे पार्वती की जन्मभूमि माना जाता है। इतिहासकारों के अनुसार, मंदिर लगभग 2,800 साल पुराना है। मंदिर में प्राचीन शिवलिंग और शिवपरिवार विराजमान हैं।
कहा जाता है कि मानतलाई से मां पार्वती भगवान शिव का पूजन करने आती थीं। यहां सुधांत नामक एक राक्षस भी शिवजी का पूजन करने आता था। एक दिन जब देवी पार्वती शिव का ध्यान कर रही थीं तब सुधांत उनसे वार्ता करने के लिए आ गया।
जब उन्होंने नेत्र खोले तो सामने सुधांत को देखकर घबरा गईं। वे जोर-जोर से चिल्लाने लगीं। तब उनकी आवाज सुनकर शिवजी ने कैलाश पर्वत से त्रिशूल फेंका। त्रिशूल का प्रहार सुधांत की छाती पर हुआ। त्रिशूल फेंकने के बाद शिव को पश्चाताप हुआ क्योंकि सुधांत उनका भक्त था।
उन्होंने उसे पुनः जीवनदान देने का फैसला किया लेकिन सुधांत शिव के हाथों से ही मोक्ष पाना चाहता था। उसने शिव को विनम्रता से मना कर दिया।
शिव ने उसका आग्रह स्वीकार कर लिया और यह वरदान दिया कि यह स्थान उसके नाम से प्रसिद्ध होगा। उन्होंने अपने त्रिशूल के तीन टुकड़े कर जमीन में गाड़ दिए। मंदिर के एक स्थान के बारे में कहा जाता है कि वहां सुधांत की अस्थियां रखी हुई हैं।
त्रिशूल के टुकड़ों पर एक प्राचीन लिपि लिखी हुई है। माना जाता है कि इसे अनेक विद्वानों ने पढ़ने का प्रयास किया लेकिन अभी तक इस लिपि को पढ़ने में सफलता नहीं मिली है।
त्रिशूल भगवान शिव का अस्त्र माना जाता है। इससे वे भक्तों की रक्षा तथा दुष्टों को दंड देते हैं। भारत में भगवान शिव का एक मंदिर ऐसा भी है जहां उनके खंडित त्रिशूल के टुकड़े जमीन में गड़े हुए हैं। आमतौर पर खंडित मूर्ति और उसके अस्त्रों का पूजन करना निषिद्ध होता है लेकिन यहां भगवान शिव के दर्शन-पूजन के लिए दूर-दूर से श्रद्धालु आते हैं।
यह मंदिर जम्मू से करीब 120 किमी की दूरी पर स्थित है। इस इलाके में पटनीटाप के पास सुध महादेव (शुद्ध महादेव) विराजमान हैं। यह शिवजी के अत्यंत प्राचीन मंदिरों में से एक है। यहीं उनके त्रिशूल के तीन टुकड़े हैं।
पास ही मानतलाई नामक स्थान है जिसे पार्वती की जन्मभूमि माना जाता है। इतिहासकारों के अनुसार, मंदिर लगभग 2,800 साल पुराना है। मंदिर में प्राचीन शिवलिंग और शिवपरिवार विराजमान हैं।
कहा जाता है कि मानतलाई से मां पार्वती भगवान शिव का पूजन करने आती थीं। यहां सुधांत नामक एक राक्षस भी शिवजी का पूजन करने आता था। एक दिन जब देवी पार्वती शिव का ध्यान कर रही थीं तब सुधांत उनसे वार्ता करने के लिए आ गया।
जब उन्होंने नेत्र खोले तो सामने सुधांत को देखकर घबरा गईं। वे जोर-जोर से चिल्लाने लगीं। तब उनकी आवाज सुनकर शिवजी ने कैलाश पर्वत से त्रिशूल फेंका। त्रिशूल का प्रहार सुधांत की छाती पर हुआ। त्रिशूल फेंकने के बाद शिव को पश्चाताप हुआ क्योंकि सुधांत उनका भक्त था।
उन्होंने उसे पुनः जीवनदान देने का फैसला किया लेकिन सुधांत शिव के हाथों से ही मोक्ष पाना चाहता था। उसने शिव को विनम्रता से मना कर दिया।
शिव ने उसका आग्रह स्वीकार कर लिया और यह वरदान दिया कि यह स्थान उसके नाम से प्रसिद्ध होगा। उन्होंने अपने त्रिशूल के तीन टुकड़े कर जमीन में गाड़ दिए। मंदिर के एक स्थान के बारे में कहा जाता है कि वहां सुधांत की अस्थियां रखी हुई हैं।
त्रिशूल के टुकड़ों पर एक प्राचीन लिपि लिखी हुई है। माना जाता है कि इसे अनेक विद्वानों ने पढ़ने का प्रयास किया लेकिन अभी तक इस लिपि को पढ़ने में सफलता नहीं मिली है।
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6>रामेश्वरम शिवलिंग स्थापना
>>> रावण केवल शिव भक्त, विद्वान एवं वीर ही नहीं, अति-मानववादी भी था..। उसे भविष्य का पता था..। वह जानता था कि श्रीराम से जीत पाना उसके लिए असंभव था..। जामवंत जी को आचार्यत्व का निमंत्रण देने के लिए लंका भेजा गया..। जामवन्त जी दीर्घाकार थे, वे आकार में कुम्भकर्ण से तनिक ही छोटे थे। लंका में प्रहरी भी हाथ जोड़कर मार्ग दिखा रहे थे। इस प्रकार जामवन्त को किसी से कुछ पूछना नहीं पड़ा।स्वयं रावण को उन्हें राजद्वार पर अभिवादन का उपक्रम करते देख जामवन्त ने मुस्कराते हुए कहा कि मैं अभिनंदन का पात्र नहीं हूँ। मैं वनवासी राम का दूत बनकर आया हूँ। उन्होंने तुम्हें सादर प्रणाम कहा है।
रावण ने सविनय कहा– आप हमारे पितामह के भाई हैं। इस नाते आप हमारे पूज्य हैं। आप कृपया आसन ग्रहण करें। यदि आप मेंरा निवेदन स्वीकार कर लेंगे, तभी संभवतः मैं भी आपका संदेश सावधानी से सुन सकूंगा।
जामवन्त ने कोई आपत्ति नहीं की। उन्होंने आसन ग्रहण किया। रावण ने भी अपना स्थान ग्रहण किया। तदुपरान्त जामवन्त ने पुनः सुनाया कि वनवासी राम ने सागर-सेतु निर्माण उपरांत अब यथाशीघ्र महेश्व-लिंग-विग्रह की स्थापना करना चाहते हैं। इस अनुष्ठान को सम्पन्न कराने के लिए उन्होने ब्राह्मण, वेदज्ञ और शैव रावण को आचर्य पद पर वरण करने की इच्छा प्रकट की है। मैं उनकी ओर से आपको आमंत्रित करने आया हूँ।
प्रणाम प्रतिक्रिया, अभिव्यक्ति उपरान्त रावण ने मुस्कान भरे स्वर में पूछ ही लिया कि क्या राम द्वारा महेश्व-लिंग-विग्रह स्थापना लंका-विजय की कामना से किया जा रहा है ?
बिल्कुल ठीक। श्रीराम की महेश्वर के चरणों में पूर्ण भक्ति है।
जीवन में प्रथम बार किसी ने रावण को ब्राह्मण माना है और आचार्य बनने योग्य जाना है। क्या रावण इतना अधिक मूर्ख कहलाना चाहेगा कि वह भारतवर्ष के प्रथम प्रशंसित महर्षि पुलस्त्य के सगे भाई महर्षि वशिष्ठ के यजमान का आमंत्रण और अपने आराध्य की स्थापना हेतु आचार्य पद अस्वीकार कर दिया। लेकिन हाँ। यह जाँच तो नितांत आवश्यक है ही कि जब वनवासी राम ने इतना बड़ा आचार्य पद पर पदस्थ होने हेतु आमंत्रित किया है तब वह भी यजमान पद हेतु उचित अधिकारी है भी अथवा नहीं।
जामवंत जी ! आप जानते ही हैं कि त्रिभुवन विजयी अपने इस शत्रु की लंकापुरी में आप पधारे हैं। यदि हम आपको यहाँ बंदी बना लें और आपको यहाँ से लौटने न दें तो आप क्या करेंगे ?
जामवंत खुलकर हँसे।
मुझे निरुद्ध करने की शक्ति समस्त लंका के दानवों के संयुक्त प्रयास में नहीं है, किन्तु मुझे किसी भी प्रकार की कोई विद्वत्ता प्रकट करने की न तो अनुमति है और न ही आवश्यकता। ध्यान रहे, मैं अभी एक ऐसे उपकरण के साथ यहां विद्यमान हूँ, जिसके माध्यम से धनुर्धारी लक्ष्मण यह दृश्यवार्ता स्पष्ट रूप से देख-सुन रहे हैं। जब मैं वहाँ से चलने लगा था तभी धनुर्वीर लक्ष्मण वीरासन में बैठे हुए हैं। उन्होंने आचमन करके अपने त्रोण से पाशुपतास्त्र निकाल कर संधान कर लिया है और मुझसे कहा है कि जामवन्त! रावण से कह देना कि यदि आप में से किसी ने भी मेरा विरोध प्रकट करने की चेष्टा की तो यह पाशुपतास्त्र समस्त दानव कुल के संहार का संकल्प लेकर तुरन्त छूट जाएगा। इस कारण भलाई इसी में है कि आप मुझे अविलम्ब वांछित प्रत्युत्तर के साथ सकुशल और आदर सहित धनुर्धर लक्ष्मण के दृष्टिपथ तक वापस पहुँचने की व्यवस्था करें।
उपस्थित दानवगण भयभीत हो गए। लंकेश तक काँप उठे। पाशुपतास्त्र ! महेश्वर का यह अमोघ अस्त्र तो सृष्टि में एक साथ दो धनुर्धर प्रयोग ही नहीं कर सकते। अब भले ही वह रावण मेघनाथ के त्रोण में भी हो। जब लक्ष्मण ने उसे संधान स्थिति में ला ही दिया है, तब स्वयं भगवान शिव भी अब उसे उठा नहीं सकते। उसका तो कोई प्रतिकार है ही नहीं।
रावण ने अपने आपको संभाल कर कहा – आप पधारें। यजमान उचित अधिकारी है। उसे अपने दूत को संरक्षण देना आता है। राम से कहिएगा कि मैंने उसका आचार्यत्व स्वीकार किया।
जामवन्त को विदा करने के तत्काल उपरान्त लंकेश ने सेवकों को आवश्यक सामग्री संग्रह करने हेतु आदेश दिया और स्वयं अशोक वाटिका पहुँचे, जो आवश्यक उपकरण यजमान उपलब्ध न कर सके जुटाना आचार्य का परम कर्त्तव्य होता है। रावण जानता है कि वनवासी राम के पास क्या है और क्या होना चाहिए।
अशोक उद्यान पहुँचते ही रावण ने सीता से कहा कि राम लंका विजय की कामना समुद्रतट पर महेश्वर लिंग विग्रह की स्थापना करने जा रहे हैं और रावण को आचार्य वरण किया है। यजमान का अनुष्ठान पूर्ण हो यह दायित्व आचार्य का भी होता है। तुम्हें विदित है कि अर्द्धांगिनी के बिना गृहस्थ के सभी अनुष्ठान अपूर्ण रहते हैं। विमान आ रहा है, उस पर बैठ जाना। ध्यान रहे कि तुम वहाँ भी रावण के अधीन ही रहोगी। अनुष्ठान समापन उपरान्त यहाँ आने के लिए विमान पर पुनः बैठ जाना। स्वामी का आचार्य अर्थात् स्वयं का आचार्य। यह जान जानकी जी ने दोनों हाथ जोड़कर मस्तक झुका दिया। स्वस्थ कण्ठ से सौभाग्यवती भव कहते रावण ने दोनों हाथ उठाकर भरपूर आशीर्वाद दिया।
सीता और अन्य आवश्यक उपकरण सहित रावण आकाश मार्ग से समुद्र तट पर उतरा। आदेश मिलने पर आना कहकर सीता को उसने विमान में ही छोड़ा और स्वयं राम के सम्मुख पहुँचा। जामवन्त से संदेश पाकर भाई, मित्र और सेना सहित श्रीराम स्वागत सत्कार हेतु पहले से ही तत्पर थे। सम्मुख होते ही वनवासी राम आचार्य दशग्रीव को हाथ जोड़कर प्रणाम किया। दीर्घायु भव ! लंका विजयी भव ! दशग्रीव के आशीर्वचन के शब्द ने सबको चौंका दिया । सुग्रीव ही नहीं विभीषण को भी उसने उपेक्षा कर दी। जैसे वे वहाँ हों ही नहीं।
भूमि शोधन के उपरान्त रावणाचार्य ने कहा कि यजमान ! अर्द्धांगिनी कहाँ है ? उन्हें यथास्थान आसन दें।
श्रीराम ने मस्तक झुकाते हुए हाथ जोड़कर अत्यन्त विनम्र स्वर से प्रार्थना की कि यदि यजमान असमर्थ हो तो योग्याचार्य सर्वोत्कृष्ट विकल्प के अभाव में अन्य समकक्ष विकल्प से भी तो अनुष्ठान सम्पादन कर सकते हैं।
अवश्य-अवश्य, किन्तु अन्य विकल्प के अभाव में ऐसा संभव है, प्रमुख विकल्प के अभाव में नहीं। यदि तुम अविवाहित, विधुर अथवा परित्यक्त होते तो संभव था। इन सबके अतिरिक्त तुम सन्यासी भी नहीं हो और पत्नीहीन वानप्रस्थ का भी तुमने व्रत नहीं लिया है। इन परिस्थितियों में पत्नीरहित अनुष्ठान तुम कैसे कर सकते हो ?
कोई उपाय आचार्य ?
आचार्य आवश्यक साधन, उपकरण अनुष्ठान उपरान्त वापस ले जाते हैं। स्वीकार हो तो किसी को भेज दो, सागर सन्निकट पुष्पक विमान में यजमान पत्नी विराजमान हैं।
श्रीराम ने हाथ जोड़कर मस्तक झुकाते हुए मौन भाव से इस सर्वश्रेष्ठ युक्ति को स्वीकार किया।
श्री रामादेश के परिपालन में विभीषण मंत्रियों सहित पुष्पक विमान तक गए और सीता सहित लौटे।
अर्द्ध यजमान के पार्श्व में बैठो अर्द्ध यजमान। आचार्य के इस आदेश का वैदेही ने पालन किया। गणपति पूजन, कलश स्थापना और नवग्रह पूजन उपरान्त आचार्य ने पूछा - लिंग विग्रह ?
यजमान ने निवेदन किया कि उसे लेने गत रात्रि के प्रथम प्रहर से पवनपुत्र कैलाश गए हुए हैं। अभी तक लौटे नहीं हैं। आते ही होंगे।
आचार्य ने आदेश दे दिया - विलम्ब नहीं किया जा सकता। उत्तम मुहूर्त उपस्थित है। इसलिए अविलम्ब यजमान-पत्नी बालुका-लिंग-विग्रह स्वयं बना ले।
जनक नंदिनी ने स्वयं के कर-कमलों से समुद्र तट की आर्द्र रेणुकाओं से आचार्य के निर्देशानुसार यथेष्ट लिंग-विग्रह निर्मित की।
यजमान द्वारा रेणुकाओं का आधार पीठ बनाया गया। श्रीसीताराम ने वही महेश्वर लिंग-विग्रह स्थापित किया। आचार्य ने परिपूर्ण विधि-विधान के साथ अनुष्ठान सम्पन्न कराया।
अब आती है बारी आचार्य की दक्षिणा की...... श्रीराम ने पूछा - आपकी दक्षिणा?
पुनः एक बार सभी को चौंकाया।
आचार्य के शब्दों ने। घबराओ नहीं यजमान। स्वर्णपुरी के स्वामी की दक्षिणा सम्पत्ति नहीं हो सकती। आचार्य जानते हैं कि उनका यजमान वर्तमान में वनवासी है, लेकिन फिर भी राम अपने आचार्य कि जो भी माँग हो उसे पूर्ण करने की प्रतिज्ञा करता है।
आचार्य जब मृत्यु शैय्या ग्रहण करे तब यजमान सम्मुख उपस्थित रहे। आचार्य ने अपनी दक्षिणा मांगी।
ऐसा ही होगा आचार्य। यजमान ने वचन दिया और समय आने पर निभाया भी।
“रघुकुल रीति सदा चली आई । प्राण जाई पर वचन न जाई ।”
यह दृश्य वार्ता देख सुनकर सभी ने उपस्थित समस्त जन समुदाय के नयनाभिराम प्रेमाश्रुजल से भर गए। सभी ने एक साथ एक स्वर से सच्ची श्रद्धा के साथ इस अद्भुत आचार्य को प्रणाम किया ।
रावण जैसे भविष्यदृष्टा ने जो दक्षिणा माँगी, उससे बड़ी दक्षिणा क्या हो सकती थी? जो रावण यज्ञ-कार्य पूरा करने हेतु राम की बंदी पत्नी को शत्रु के समक्ष प्रस्तुत कर सकता है, व राम से लौट जाने की दक्षिणा कैसे मांग सकता है?
बहुत कुछ हो सकता था। काश राम को वनवास न होता, काश सीता वन न जाती, किन्तु ये धरती तो है ही पाप भुगतने वालों के लिए और जो यहाँ आया है, उसे अपने पाप भुगतने होंगे और इसलिए रावण जैसा पापी लंका का स्वामी तो हो सकता है देवलोक का नहीं।
वह तपस्वी रावण जिसे मिला था-
ब्रह्मा से विद्वता और अमरता का वरदान
शिव भक्ति से पाया शक्ति का वरदान....
चारों वेदों का ज्ञाता,
ज्योतिष विद्या का पारंगत,
अपने घर की वास्तु शांति हेतु आचार्य रूप में जिसे, भगवन शंकर ने किया आमंत्रित..., शिव भक्त रावण, रामेश्वरम में शिवलिंग पूजा हेतु, अपने शत्रु प्रभु राम का, जिसने स्वीकार किया निमंत्रण। आयुर्वेद, रसायन और कई प्रकार की
जानता जो विधियां, अस्त्र शास्त्र, तंत्र-मन्त्र की सिद्धियाँ..। शिव तांडव स्तोत्र का महान कवि, अग्नि-बाण ब्रह्मास्त्र का ही नहि, बेला या वायलिन का आविष्कर्ता, जिसे देखते ही दरबार में राम भक्त हनुमान भी एक बार मुग्ध हो, बोल उठे थे -
"राक्षस राजश्य सर्व लक्षणयुक्ता"....
काश रामानुज लक्ष्मण ने सुर्पणखा की नाक न कटी होती, काश रावण के मन में सुर्पणखा के प्रति अगाध प्रेम न होता, गर बदला लेने के लिए सुर्पणखा ने रावण को न उकसाया होता, रावण के मन में सीता हरण का ख्याल कभी न आया होता...।
इस तरह रावण में, अधर्म बलवान न होता, तो देव लोक का भी स्वामी रावण ही होता..।
(रामेश्वरम् देवस्थान में लिखा हुआ है कि इस ज्योतिर्लिंग की स्थापना श्रीराम ने रावण द्वारा करवाई थी। बाल्मीकि रामायण और तुलसीकतृ रामायण में इस कथा का वर्णन नहीं है, पर तमिल भाषा में लिखी महर्षि कम्बन की 'इरामावतारम्' मे यह कथा है।)
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7>शिव प्रतिमा होती है आठ तरह की
8 Types of Shiva Statue : हिन्दू धर्म में मान्यता है की भगवान शिव इस संसार में आठ रूपों में समाए है जो है शर्व, भव, रुद्र, उग्र, भीम, पशुपति, ईशान और महादेव। इसी आधार पर धर्मग्रंथों में शिव जी की मूर्तियों को भी आठ प्रकार का बताया गया है । आईए भगवान शिव के इन आठ मूर्ति स्वरुप के बारे में थोड़ा विस्तार से जानते है।
1. शर्व (Sharva) :- पूरे जगत को धारण करने वाली पृथ्वीमयी मूर्ति के स्वामी शर्व है, इसलिए इसे शिव की शार्वी प्रतिमा भी कहते हैं। सांसारिक नजरिए से शर्व नाम का अर्थ और शुभ प्रभाव भक्तों के हर को कष्टों को हरने वाला बताया गया है।
2. भीम (Bheema) : – शिव की आकाशरूपी मूर्ति है, जो बुरे और तामसी गुणों का नाश कर जगत को राहत देने वाली मानी जाती है। इसके स्वामी भीम है। यह भैमी नाम से प्रसिद्ध है। भीम नाम का अर्थ भयंकर रूप वाले भी हैं, जो उनके भस्म से लिपटी देह, जटाजूटधारी, नागों के हार पहनने से लेकर बाघ की खाल धारण करने या आसन पर बैठने सहित कई तरह से उजागर होता है।
3. उग्र (Ugra) : – वायु रूप में शिव जगत को गति देते हैं और पालन-पोषण भी करते हैं। इसके स्वामी उग्र है, इसलिए यह मूर्ति औग्री के नाम से भी प्रसिद्ध है। उग्र नाम का मतलब बहुत ज्यादा उग्र रूप वाले होना बताया गया है। शिव के तांडव नृत्य में भी यह शक्ति स्वरूप उजागर होता है।
4. भव (Bhava) : – शिव की जल से युक्त मूर्ति पूरे जगत को प्राणशक्ति और जीवन देने वाली है। इसके स्वामी भव है, इसलिए इसे भावी भी कहते हैं। शास्त्रों में भी भव नाम का मतलब पूरे संसार के रूप में ही प्रकट होने वाले देवता बताया गया है।
5. पशुपति (Pashupati) : – यह सभी आंखों में बसी होकर सभी आत्माओं की नियंत्रक है। यह पशु यानी दुर्जन वृत्तियों का नाश और उनसे मुक्त करने वाली होती है। इसलिए इसे पशुपति भी कहा जाता है। पशुपति नाम का मतलब पशुओं के स्वामी बताया गया है, जो जगत के जीवों की रक्षा व पालन करते हैं।
6. रुद्र (Rudra) :- यह शिव की अत्यंत ओजस्वी मूर्ति है, जो पूरे जगत के अंदर-बाहर फैली समस्त ऊर्जा व गतिविधियों में स्थित है। इसके स्वामी रूद्र है। इसलिए यह रौद्री नाम से भी जानी जाती है। रुद्र नाम का अर्थ भयानक भी बताया गया है, जिसके जरिए शिव तामसी व दुष्ट प्रवृत्तियों पर नियंत्रण रखते हैं।
7. ईशान (Ishana) : – यह सूर्य रूप में आकाश में चलते हुए जगत को प्रकाशित करती है। शिव की यह दिव्य मूर्ति ईशान कहलाती है। ईशान रूप में शिव ज्ञान व विवेक देने वाले बताए गए हैं।
8. महादेव (Mahadeva) : – चन्द्र रूप में शिव की यह साक्षात मूर्ति मानी गई है। चन्द्र किरणों को अमृत के समान माना गया है। चन्द्र रूप में शिव की यह मूर्ति महादेव के रूप में प्रसिद्ध है। इस मूर्ति का रूप अन्य से व्यापक है। महादेव नाम का अर्थ देवों के देव होता है। यानी सारे देवताओं में सबसे विलक्षण स्वरूप व शक्तियों के स्वामी शिव ही हैं।
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शिवलिंग के महात्म्यका वर्णन करते हुए शास्त्रों ने कहा है कि जो मनुष्य किसी तीर्थ की मृत्तिका से शिवलिंग बना कर उनका विधि-विधान के साथ पूजा करता है, वह शिवस्वरूप हो जाता है। शिवलिंग का सविधि पूजन करने से मनुष्य सन्तान, धन, धन्य, विद्या, ज्ञान, सद्बुद्धि, दीर्घायु और मोक्ष की प्राप्ति करता है। जिस स्थान पर शिवलिंग की पूजा होती है, वह तीर्थ न होने पर भी तीर्थ बन जाता है। जिस स्थान पर सर्वदा शिवलिंग का पूजन होता है, उस स्थान पर मृत्यु होने पर मनुष्य शिवलोक जाता है। शिव शब्द के उच्चारण मात्र से मनुष्य समस्त पापों से मुक्त हो जाता है और उसका बाह्य और अंतकरण शुद्ध हो जाता है। दो अक्षरों का मंत्र शिव परब्रह्मस्वरूप एवं तारक है। इससे अलग दूसरा कोई तारक ब्रह्म नहीं है।
हिमानी शिवलिंग
हिमानी शिवलिंग अमरनाथ की गुफा में हिम से अपने आप बनने वाले शिवलिंग को कहले हैं जिसका भारतीय जीवन में धार्मिक महत्व है और जिसे देखने दूर-दूर से लोग आते हैं। यह शिवलिंग मौसम में बदलाव के अनुसार चंद्रमा की कलाओं के रूप में घटता बढ़ता रहता है और पूर्णिमा के दिन लगभग 10 या 12 फीट की ऊंचाई तक बनता है। हर साल श्रावण पूर्णिमा के दिन जुलाई-अगस्त माह में शिवलिंग अपनी अधिकतम ऊँचाई पाता है और इस दिन संसार भर के श्रद्धालु गुफा में स्थित मंदिर में इकट्ठा होते हैं।
अमरनाथ श्रीनगर के पूर्व में १४५ किमी. दूर स्थित है। अमरनाथ गुफा जहां स्थित है वह जगह बर्फ से ढकी घाटी है और समुद्र तल से १३७०० फीट ऊँचाई पर स्थित है। सितंबर से जून तक यह पूरी घाटी बर्फ से ढकी होती है और यहां पहुँचना दुष्कर ही नहीं नामुमकिन होता है। अमरनाथ गुफा लगभग १५० फीट ऊंची और ९० फीट लंबी है।
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8 Types of Shiva Statue : हिन्दू धर्म में मान्यता है की भगवान शिव इस संसार में आठ रूपों में समाए है जो है शर्व, भव, रुद्र, उग्र, भीम, पशुपति, ईशान और महादेव। इसी आधार पर धर्मग्रंथों में शिव जी की मूर्तियों को भी आठ प्रकार का बताया गया है । आईए भगवान शिव के इन आठ मूर्ति स्वरुप के बारे में थोड़ा विस्तार से जानते है।
1. शर्व (Sharva) :- पूरे जगत को धारण करने वाली पृथ्वीमयी मूर्ति के स्वामी शर्व है, इसलिए इसे शिव की शार्वी प्रतिमा भी कहते हैं। सांसारिक नजरिए से शर्व नाम का अर्थ और शुभ प्रभाव भक्तों के हर को कष्टों को हरने वाला बताया गया है।
2. भीम (Bheema) : – शिव की आकाशरूपी मूर्ति है, जो बुरे और तामसी गुणों का नाश कर जगत को राहत देने वाली मानी जाती है। इसके स्वामी भीम है। यह भैमी नाम से प्रसिद्ध है। भीम नाम का अर्थ भयंकर रूप वाले भी हैं, जो उनके भस्म से लिपटी देह, जटाजूटधारी, नागों के हार पहनने से लेकर बाघ की खाल धारण करने या आसन पर बैठने सहित कई तरह से उजागर होता है।
3. उग्र (Ugra) : – वायु रूप में शिव जगत को गति देते हैं और पालन-पोषण भी करते हैं। इसके स्वामी उग्र है, इसलिए यह मूर्ति औग्री के नाम से भी प्रसिद्ध है। उग्र नाम का मतलब बहुत ज्यादा उग्र रूप वाले होना बताया गया है। शिव के तांडव नृत्य में भी यह शक्ति स्वरूप उजागर होता है।
4. भव (Bhava) : – शिव की जल से युक्त मूर्ति पूरे जगत को प्राणशक्ति और जीवन देने वाली है। इसके स्वामी भव है, इसलिए इसे भावी भी कहते हैं। शास्त्रों में भी भव नाम का मतलब पूरे संसार के रूप में ही प्रकट होने वाले देवता बताया गया है।
5. पशुपति (Pashupati) : – यह सभी आंखों में बसी होकर सभी आत्माओं की नियंत्रक है। यह पशु यानी दुर्जन वृत्तियों का नाश और उनसे मुक्त करने वाली होती है। इसलिए इसे पशुपति भी कहा जाता है। पशुपति नाम का मतलब पशुओं के स्वामी बताया गया है, जो जगत के जीवों की रक्षा व पालन करते हैं।
6. रुद्र (Rudra) :- यह शिव की अत्यंत ओजस्वी मूर्ति है, जो पूरे जगत के अंदर-बाहर फैली समस्त ऊर्जा व गतिविधियों में स्थित है। इसके स्वामी रूद्र है। इसलिए यह रौद्री नाम से भी जानी जाती है। रुद्र नाम का अर्थ भयानक भी बताया गया है, जिसके जरिए शिव तामसी व दुष्ट प्रवृत्तियों पर नियंत्रण रखते हैं।
7. ईशान (Ishana) : – यह सूर्य रूप में आकाश में चलते हुए जगत को प्रकाशित करती है। शिव की यह दिव्य मूर्ति ईशान कहलाती है। ईशान रूप में शिव ज्ञान व विवेक देने वाले बताए गए हैं।
8. महादेव (Mahadeva) : – चन्द्र रूप में शिव की यह साक्षात मूर्ति मानी गई है। चन्द्र किरणों को अमृत के समान माना गया है। चन्द्र रूप में शिव की यह मूर्ति महादेव के रूप में प्रसिद्ध है। इस मूर्ति का रूप अन्य से व्यापक है। महादेव नाम का अर्थ देवों के देव होता है। यानी सारे देवताओं में सबसे विलक्षण स्वरूप व शक्तियों के स्वामी शिव ही हैं।
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8>शिवलिङ्ग (शिवलिंग),का अर्थ
शिवलिङ्ग (शिवलिंग), का अर्थ है भगवान शिव का आदि-अनादी स्वरुप। शून्य, आकाश, अनन्त, ब्रह्माण्ड और निराकार परमपुरुष का प्रतीक होने से इसे लिंग कहा गया है।स्कन्द पुराण में कहा है कि आकाश स्वयं लिंग है। धरती उसका पीठ या आधार है और सब अनन्त शून्य से पैदा हो उसी में लय होने के कारण इसे लिंग कहा है | वातावरण सहित घूमती धरती या सारे अनन्त ब्रह्माण्ड (ब्रह्माण्ड गतिमान है) का अक्ष/धुरी (axis) ही लिंग है।
पुराणो में शिवलिंग को कई अन्य नामो से भी संबोधित किया गया है जैसे : प्रकाश स्तंभ/लिंग, अग्नि स्तंभ/लिंग, उर्जा स्तंभ/लिंग, ब्रह्माण्डीय स्तंभ/लिंग |
उत्पत्ति
शिवलिंग भगवान शिव और देवी शक्ति (पार्वती) का आदि-आनादी एकल रूप है तथा पुरुष और प्रकृति की समानता का प्रतिक भी अर्थात इस संसार में न केवल पुरुष का और न केवल प्रकृति (स्त्री) का वर्चस्व है अर्थात दोनों सामान है | हम जानते है की सभी भाषाओँ में एक ही शब्द के कई अर्थ निकलते है जैसे: सूत्र के - डोरी/धागा, गणितीय सूत्र, कोई भाष्य, लेखन को भी सूत्र कहा जाता है जैसे नासदीय सूत्र, ब्रह्म सूत्र आदि | अर्थ :- सम्पति, मतलब (मीनिंग), उसी प्रकार यहाँ लिंग शब्द से अभिप्राय चिह्न, निशानी या प्रतीक है, लिङ्ग का यही अर्थ वैशेषिकशास्त्र में कणाद मुनि ने भी प्रयोग किया। ब्रह्माण्ड में दो ही चीजे है : ऊर्जा और पदार्थ । हमारा शरीर प्रदार्थ से निर्मित है और आत्मा ऊर्जा है । इसी प्रकार शिव पदार्थ और शक्ति ऊर्जा का प्रतीक बन कर शिवलिंग कहलाते है | ब्रह्मांड में उपस्थित समस्त ठोस तथा उर्जा शिवलिंग में निहित है। वास्तव में शिवलिंग हमारे ब्रह्मांड की आकृति है | अब जरा आईंसटीन का सूत्र देखिये जिस के आधार पर परमाणु बम बनाया गया, परमाणु के अन्दर छिपी अनंत ऊर्जा की एक झलक दिखाई जो कितनी विध्वंसक थी सब जानते है | e / c = m c {e=mc^2}
इसके अनुसार पदार्थ को पूर्णतयः ऊर्जा में बदला जा सकता है अर्थात दो नही एक ही है पर वो दो हो कर स्रष्टि का निर्माण करता है। हमारे ऋषियो ने ये रहस्य हजारो साल पहले ही ख़ोज लिया था | हम अपने देनिक जीवन में भी देख सकते है कि जब भी किसी स्थान पर अकस्मात् उर्जा का उत्सर्जन होता है तो उर्जा का फैलाव अपने मूल स्थान के चारों ओर एक वृताकार पथ में तथा उपर व निचे की ओर अग्रसर होता है अर्थात दशोदिशाओं (आठों दिशों की प्रत्येक डिग्री (360 डिग्री)+ऊपर व निचे) होता है, फलस्वरूप एक क्षणिक शिवलिंग आकृति की प्राप्ति होती है जैसे बम विस्फोट से प्राप्त उर्जा का प्रतिरूप, शांत जल में कंकर फेंकने पर प्राप्त तरंग (उर्जा) का प्रतिरूप आदि।
स्रष्टि के आरम्भ में महाविस्फोट (bigbang) के पश्चात् उर्जा का प्रवाह वृत्ताकार पथ में तथा ऊपर व नीचे की ओर हुआ फलस्वरूप एक महाशिवलिंग का प्राकट्य हुआ जैसा की आप उपरोक्त चित्र में देख सकते है | जिसका वर्णन हमें लिंगपुराण, शिवमहापुराण, स्कन्द पुराण आदि में मिलता है की आरम्भ में निर्मित शिवलिंग इतना विशाल (अनंत) तथा की देवता आदि मिल कर भी उस लिंग के आदि और अंत का छोर या शास्वत अंत न पा सके। पुराणो में कहा गया है की प्रत्येक महायुग के पश्चात समस्त संसार इसी शिवलिंग में समाहित (लय) होता है तथा इसी से पुनः सृजन होता है ।
शास्त्रों में महात्म्य
शिवलिंग भगवान शिव और देवी शक्ति (पार्वती) का आदि-आनादी एकल रूप है तथा पुरुष और प्रकृति की समानता का प्रतिक भी अर्थात इस संसार में न केवल पुरुष का और न केवल प्रकृति (स्त्री) का वर्चस्व है अर्थात दोनों सामान है | हम जानते है की सभी भाषाओँ में एक ही शब्द के कई अर्थ निकलते है जैसे: सूत्र के - डोरी/धागा, गणितीय सूत्र, कोई भाष्य, लेखन को भी सूत्र कहा जाता है जैसे नासदीय सूत्र, ब्रह्म सूत्र आदि | अर्थ :- सम्पति, मतलब (मीनिंग), उसी प्रकार यहाँ लिंग शब्द से अभिप्राय चिह्न, निशानी या प्रतीक है, लिङ्ग का यही अर्थ वैशेषिकशास्त्र में कणाद मुनि ने भी प्रयोग किया। ब्रह्माण्ड में दो ही चीजे है : ऊर्जा और पदार्थ । हमारा शरीर प्रदार्थ से निर्मित है और आत्मा ऊर्जा है । इसी प्रकार शिव पदार्थ और शक्ति ऊर्जा का प्रतीक बन कर शिवलिंग कहलाते है | ब्रह्मांड में उपस्थित समस्त ठोस तथा उर्जा शिवलिंग में निहित है। वास्तव में शिवलिंग हमारे ब्रह्मांड की आकृति है | अब जरा आईंसटीन का सूत्र देखिये जिस के आधार पर परमाणु बम बनाया गया, परमाणु के अन्दर छिपी अनंत ऊर्जा की एक झलक दिखाई जो कितनी विध्वंसक थी सब जानते है | e / c = m c {e=mc^2}
इसके अनुसार पदार्थ को पूर्णतयः ऊर्जा में बदला जा सकता है अर्थात दो नही एक ही है पर वो दो हो कर स्रष्टि का निर्माण करता है। हमारे ऋषियो ने ये रहस्य हजारो साल पहले ही ख़ोज लिया था | हम अपने देनिक जीवन में भी देख सकते है कि जब भी किसी स्थान पर अकस्मात् उर्जा का उत्सर्जन होता है तो उर्जा का फैलाव अपने मूल स्थान के चारों ओर एक वृताकार पथ में तथा उपर व निचे की ओर अग्रसर होता है अर्थात दशोदिशाओं (आठों दिशों की प्रत्येक डिग्री (360 डिग्री)+ऊपर व निचे) होता है, फलस्वरूप एक क्षणिक शिवलिंग आकृति की प्राप्ति होती है जैसे बम विस्फोट से प्राप्त उर्जा का प्रतिरूप, शांत जल में कंकर फेंकने पर प्राप्त तरंग (उर्जा) का प्रतिरूप आदि।
स्रष्टि के आरम्भ में महाविस्फोट (bigbang) के पश्चात् उर्जा का प्रवाह वृत्ताकार पथ में तथा ऊपर व नीचे की ओर हुआ फलस्वरूप एक महाशिवलिंग का प्राकट्य हुआ जैसा की आप उपरोक्त चित्र में देख सकते है | जिसका वर्णन हमें लिंगपुराण, शिवमहापुराण, स्कन्द पुराण आदि में मिलता है की आरम्भ में निर्मित शिवलिंग इतना विशाल (अनंत) तथा की देवता आदि मिल कर भी उस लिंग के आदि और अंत का छोर या शास्वत अंत न पा सके। पुराणो में कहा गया है की प्रत्येक महायुग के पश्चात समस्त संसार इसी शिवलिंग में समाहित (लय) होता है तथा इसी से पुनः सृजन होता है ।
शास्त्रों में महात्म्य
शिवलिंग के महात्म्यका वर्णन करते हुए शास्त्रों ने कहा है कि जो मनुष्य किसी तीर्थ की मृत्तिका से शिवलिंग बना कर उनका विधि-विधान के साथ पूजा करता है, वह शिवस्वरूप हो जाता है। शिवलिंग का सविधि पूजन करने से मनुष्य सन्तान, धन, धन्य, विद्या, ज्ञान, सद्बुद्धि, दीर्घायु और मोक्ष की प्राप्ति करता है। जिस स्थान पर शिवलिंग की पूजा होती है, वह तीर्थ न होने पर भी तीर्थ बन जाता है। जिस स्थान पर सर्वदा शिवलिंग का पूजन होता है, उस स्थान पर मृत्यु होने पर मनुष्य शिवलोक जाता है। शिव शब्द के उच्चारण मात्र से मनुष्य समस्त पापों से मुक्त हो जाता है और उसका बाह्य और अंतकरण शुद्ध हो जाता है। दो अक्षरों का मंत्र शिव परब्रह्मस्वरूप एवं तारक है। इससे अलग दूसरा कोई तारक ब्रह्म नहीं है।
हिमानी शिवलिंग
हिमानी शिवलिंग अमरनाथ की गुफा में हिम से अपने आप बनने वाले शिवलिंग को कहले हैं जिसका भारतीय जीवन में धार्मिक महत्व है और जिसे देखने दूर-दूर से लोग आते हैं। यह शिवलिंग मौसम में बदलाव के अनुसार चंद्रमा की कलाओं के रूप में घटता बढ़ता रहता है और पूर्णिमा के दिन लगभग 10 या 12 फीट की ऊंचाई तक बनता है। हर साल श्रावण पूर्णिमा के दिन जुलाई-अगस्त माह में शिवलिंग अपनी अधिकतम ऊँचाई पाता है और इस दिन संसार भर के श्रद्धालु गुफा में स्थित मंदिर में इकट्ठा होते हैं।
अमरनाथ श्रीनगर के पूर्व में १४५ किमी. दूर स्थित है। अमरनाथ गुफा जहां स्थित है वह जगह बर्फ से ढकी घाटी है और समुद्र तल से १३७०० फीट ऊँचाई पर स्थित है। सितंबर से जून तक यह पूरी घाटी बर्फ से ढकी होती है और यहां पहुँचना दुष्कर ही नहीं नामुमकिन होता है। अमरनाथ गुफा लगभग १५० फीट ऊंची और ९० फीट लंबी है।
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