Friday, February 19, 2016

5>|| शिव के 19 अवतारों* ==>( 1 to 11 )

 5>|| शिव के 19 अवतारों***(1 to 11 )

1>----------------दिसंबर शुक्रवार को पूर्णिमा है।
2>----------------भगवान शिव के 19 अवतारों मे से भिक्षुवर्य अवतार:-
3>----------------सोमवार ही शिव का दिन क्यों?
4>----------------भगवान शिव की अर्ध परिक्रमा क्यों.. ??
5>----------------वाह भोले तेरी महिमा कोई न जाने आपका प्रेम भी अदभुत है
6>----------------जानिए भगवान शिव जी के 108 नाम – संस्कृति।
7>----------------जानिए शिवलिंग पर क्यों नहीं चढ़ाते शंख से जल।
8>----------------जानिए अमरनाथ गुफा के अद्भुत रहस्य।
9>----------------बाबा बर्फानी =बाबा बर्फानी नहीं अमरनाथ बाबा कहो,  ( a to d ) 
10>---------------अमरनाथ
11>----------------द्वादश ज्योतिर्लिंग


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ॐ नमोः शिबाय
1> दिसंबर शुक्रवार को पूर्णिमा है।
पूर्णिमा के दिन शिवलिंग पर शहद, कच्चा दूध, बेलपत्र, शमीपत्र और फल चढ़ाने से भगवान शिव की जातक पर सदैव कृपा बनी रहती है, आर्थिक संकट दूर होते है ।
 पूर्णिमा के दिन घिसे हुए सफ़ेद चंदन में केसर मिलाकर भगवान शंकर को अर्पित करने से घर से कलह और अशांति दूर होती है।
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2>भगवान शिव के 19 अवतारों मे से भिक्षुवर्य अवतार:-

भगवान शिव के 19 अवतारों मे से
"भगवान् शिव का चौदहवाँ अवतार  "भिक्षुवर्य अवतार:-
भगवान शंकर देवों के देव हैं।
संसार में जन्म लेने वाले हर प्राणी के जीवन के रक्षक भी हैं।
भगवान शंकर का भिक्षुवर्य अवतार यही संदेश देता है।
धर्म ग्रंथों के अनुसार विदर्भ नरेश सत्यरथ को शत्रुओं ने मार डाला।
उसकी गर्भवती पत्नी ने शत्रुओं से छिपकर अपने प्राण बचाए।
समय आने पर उसने एक पुत्र को जन्म दिया।
रानी जब जल पीने के लिए सरोवर गई तो उसे घडिय़ाल ने अपना आहार बना लिया।
तब वह बालक भूख-प्यास से तड़पने लगा।
इतने में ही शिवजी की प्रेरणा से एक भिखारिन वहां पहुंची।
तब शिवजी ने भिक्षुक का रूप धर उस भिखारिन को बालक का परिचय दिया और उसके पालन-पोषण का निर्देश दिया तथा यह भी कहा कि यह बालक विदर्भ नरेश सत्यरथ का पुत्र है।
यह सब कह कर भिक्षुक रूपधारी शिव ने उस भिखारिन को अपना वास्तविक रूप दिखाया।
शिव के आदेश अनुसार भिखारिन ने उस बालक का पालन-पोषण किया।
बड़ा होकर उस बालक ने शिवजी की कृपा से अपने दुश्मनों को हराकर पुन: अपना राज्य प्राप्त किया।
।।हर हर महादेव ।।
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3>सोमवार ही शिव का दिन क्यों?

सनातन धर्म में हर दिवस का संबंध किसी न किसी देवता से है। रविवार को भगवान भास्कर की उपासना की जाती है। मंगलवार को भगवान् मारूतिनन्दन का दिन माना जाता है। कहीं कहीं इसे मंगलमूर्ति गणपति का भी दिवस मानते हैं। बुधवार को बुध की पूजा का विधान है क्योंकि यह शांति का दिवस है। बृहस्पतिवार को कदली वृक्ष में गुरु की पूजा की जाती है। शुक्रवार भगवती संतोषी का दिवस प्रसिद्ध है तो शनिवार को महाकाल रूप भैरव एवं महाकाली की सपर्या संपन्न की जाती है। ठीक ऐसे ही भगवान् शंकर सोमवार को सबसे ज्यादा पूजे जाते हैं। हर सनातनधर्मी का आग्रह होता है कि और किसी दिन शिव मंदिर जाएँ या न जाएँ लेकिन सोमवार को दर्शन अवश्य करेंगे। आखिर ऐसा क्यों? शिव के लिए सोमवार का आग्रह ही क्यों? आईए! इस पर कुछ विचार करें।

सबसे पहले दिनों की उत्पत्ति के सन्दर्भ में विचार करते हैं। वास्तव में ये सारे दिवस भगवान् शंकर से ही प्रकट माने जाते हैं। शिव-महापुराण के अनुसार प्राणियों की आयु का निर्धारण करने के लिए भगवान् शंकर ने काल की कल्पना की। उसी से ही ब्रह्मा से लेकर अत्यन्त छोटे जीवों तक की आयुष्य का अनुमान लगाया जाता है। उस काल को ही व्यवस्थित करने के लिए महाकाल ने सप्तवारों की कल्पना की। सबसे पहले ज्योतिस्वरूप सूर्य के रूप में प्रकट होकर आरोग्य के लिए प्रथमवार की कल्पना की-

संसारवैद्यः सर्वज्ञः सर्वभेषजभेषजम्।
आय्वारोग्यदं वारं स्ववारं कृतवान्प्रभुः॥

अपनी सर्वसौभाग्यदात्री शक्ति के लिए द्वितीयवार की कल्पना की। उसके बाद अपने ज्येष्ठ पुत्र कुमार के लिए अत्यन्त सुन्दर तृतीयवार की कल्पना की। तदनन्तर सर्वलोकों की रक्षा का भार वहन करने वाले परम मित्र मुरारी के लिए चतुर्थवार की कल्पना की। देवगुरु के नाम से पञ्चमवार की कल्पना कर उसका स्वामी यम को बना दिया। असुरगुरु के नाम से छठे वार की कल्पना करके उसका स्वामी ब्रह्मा को बना दिया एवं सप्तमवार की कल्पना कर उसका स्वामी इंद्र को बना दिया। नक्षत्र चक्र में सात मूल ग्रह ही दृष्टिगोचर होते हैं, इसलिए भगवान् ने सूर्य से लेकर शनि तक के लिए सातवारों की कल्पना की। राहु और केतु छाया ग्रह होने के कारण दृष्टिगत न होने से उनके वार की कल्पना नहीं की गई।

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4>भगवान शिव की अर्ध परिक्रमा क्यों.. ??
शिवजी की आधी परिक्रमा करने का विधान है। वह इसलिए की शिव के सोमसूत्र को लांघा नहीं जाता है। जब व्यक्ति आधी परिक्रमा करता है तो उसे चंद्राकार परिक्रमा कहते हैं। शिवलिंग को ज्योति माना गया है और उसके आसपास के क्षेत्र को चंद्र। आपने आसमान में अर्ध चंद्र के ऊपर एक शुक्र तारा देखा होगा। यह शिवलिंग उसका ही प्रतीक नहीं है बल्कि संपूर्ण ब्रह्मांड ज्योतिर्लिंग के ही समान है।

''अर्द्ध सोमसूत्रांतमित्यर्थ: शिव प्रदक्षिणीकुर्वन सोमसूत्र न लंघयेत ।।
इति वाचनान्तरात।''
सोमसूत्र :
शिवलिंग की निर्मली को सोमसूत्र की कहा जाता है। शास्त्र का आदेश है कि शंकर भगवान की प्रदक्षिणा में सोमसूत्र का उल्लंघन नहीं करना चाहिए, अन्यथा दोष लगता है। सोमसूत्र की व्याख्या करते हुए बताया गया है कि भगवान को चढ़ाया गया जल जिस ओर से गिरता है, वहीं सोमसूत्र का स्थान होता है।
क्यों नहीं लांघते सोमसूत्र :
सोमसूत्र में शक्ति-स्रोत होता है अत: उसे लांघते समय पैर फैलाते हैं और वीर्य ‍निर्मित और 5 अन्तस्थ वायु के प्रवाह पर विपरीत प्रभाव पड़ता है। इससे देवदत्त और धनंजय वायु के प्रवाह में रुकावट पैदा हो जाती है। जिससे शरीर और मन पर बुरा असर पड़ता है। अत: शिव की अर्ध चंद्राकार प्रदशिक्षा ही करने का शास्त्र का आदेश है।
तब लांघ सकते हैं :
शास्त्रों में अन्य स्थानों पर मिलता है कि तृण, काष्ठ, पत्ता, पत्थर, ईंट आदि से ढके हुए सोम सूत्र का उल्लंघन करने से दोष नहीं लगता है,
लेकिन
‘शिवस्यार्ध प्रदक्षिणा’
का मतलब शिव की आधी ही प्रदक्षिणा करनी चाहिए।
किस ओर से परिक्रमा : भगवान शिवलिंग की परिक्रमा हमेशा बांई ओर से शुरू कर जलाधारी के आगे निकले हुए भाग यानी जल स्रोत तक जाकर फिर विपरीत दिशा में लौटकर दूसरे सिरे तक आकर परिक्रमा पूरी करें।
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5>वाह भोले तेरी महिमा कोई न जाने
आपका प्रेम भी अदभुत है 

एक गाँव के बाहर बने शिवमंदिर मे चार पाँच गजेडी रोज गाँजा पीते थे , पिछले कइ साल से
जब भी वो गाँजा पीते थे तब "बम भोले" का जयकारा करते थे चिल्लम की हर फुँक के साथ,
एक दिन खुद शिव जी उनके इस भग्ति माध्यम से प्रसन्न हो गये, वो एक साधारण मनुष्य के रूप मे उन गजेडीयो के पास आ कर बैठ गये, गजेडीयो ने चिल्लम बनाना शुरू किया तो एक
गजेडी ने शिव जी को गाजा आफर किया, प्रायः गजेडीयो मे मेहमानवाजी बडे उच्च स्तर
की होती है इसलिए गजेडीयो ने पहला चिल्लम भोलेनाथ को ही दिया, एक फुँक मे ही शिव ने पुरा चिल्लम खाली कर दिया , गजेडीयो को लग गया कि ये कोइ उच्च कोटी का पीने वाला है , फिर भी उन्होने दुसरा चिल्लम बनाया और फिर पहला मौका भोलेनाथ को दिया शिव ने फिर एक फुँक मे ही पुरा चिल्लम खाली कर दिया, हर फुक के बाद एक गजेडी , भोलेनाथ से पुछता " नशा आया ? जवाब मे शिव केवल मुस्कुरा के ना मे सर हिला देते, ऍसे कर के जब पाँच चिल्लम खाली हो गये तो गजेडी आखीरी चिल्लम भरने लगे तभी उनमे से एक गजेडी ने पुछा " क्यो अभी भी नशा नही हुआ ? तब शिव ने कहा " जानते हो मै कौन हुँ ! कौन हो भाऊ !

शिव " मै इस ससांर का सहाँरक , सभी भुत प्रेत यक्ष असुर गंधर्व का स्वामी , ब्रम्हाड का
आदिवासी हिमालय का निवासी हुँ , आदि अंत प्रारंभ ,नाश और नशा सब की सीमा मुझसे
प्रारंभ होती है मुझपर खत्म , शकंर नाम है मेरा , जिसको तुम लोग रोज याद करते हो "
गजेडी जोर से चिल्लाया " अब इसको चिल्लम मत देना बे , गाँजा चढ गया इसको
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6> जानिए भगवान शिव जी के 108 नाम – संस्कृति।

सनातन धर्म में भगवान को कई नामों से जाना जाता है। वस्तुत: यह नाम देवताओं और महान श्रषियों द्वारा भगवान की स्तुति करने पर प्रकट होते हैं। भगवान शिव जी को भी कई नामों से जाना जाता है, पर सनातन धर्म से 108 नामों का अलग ही महत्व होता है।
पढ़िए उनमे से उनके मुख्य 108 नाम। भगवान शिव नामावली

1. शिव – कल्याण स्वरूप - - - - - - - - - - - - - - - - - - - -- 2. महेश्वर – माया के अधीश्वर
3. शम्भू – आनंद स्स्वरूप वाले - -- - - - - - - - - - - - - - -- 4. पिनाकी – पिनाक धनुष धारण करने वाले
5. शशिशेखर – सिर पर चंद्रमा धारण करने वाले - - - -- - - 6. वामदेव – अत्यंत सुंदर स्वरूप वाले
7. विरूपाक्ष – भौंडी आँख वाले -- -- - - - - - - - - - - - - - - 8. कपर्दी – जटाजूट धारण करने वाले
9. नीललोहित – नीले और लाल रंग वाले - - - - - - - - - -10. शंकर – सबका कल्याण करने वाले
11. शूलपाणी – हाथ में त्रिशूल धारण करने वाले - - - - - 12. खटवांगी – खटिया का एक पाया रखने वाले
13. विष्णुवल्लभ – भगवान विष्णु के अतिप्रेमी - - - - - - 14. शिपिविष्ट – सितुहा में प्रवेश करने वाले
15. अंबिकानाथ – भगवति के पति - - - - - - - - - - - 16. श्रीकण्ठ – सुंदर कण्ठ वाले
17. भक्तवत्सल – भक्तों को अत्यंत स्नेह करने वाले - - --18. भव – संसार के रूप में प्रकट होने वाले
19. शर्व – कष्टों को नष्ट करने वाले - - - - - - - - - - - 20. त्रिलोकेश – तीनों लोकों के स्वामी
21. शितिकण्ठ – सफेद कण्ठ वाले -- - - - - - - - - - -22. शिवाप्रिय – पार्वती के प्रिय
23. उग्र – अत्यंत उग्र रूप वाले - - - - - - - - - - - - 24. कपाली – कपाल धारण करने वाले
25. कामारी – कामदेव के शत्रु - - - - - - - - - - - - - -26. अंधकारसुरसूदन – अंधक दैत्य को मारने वाले
27. गंगाधर – गंगा जी को धारण करने वाले-- - - - - - - -28. ललाटाक्ष – ललाट में आँख वाले
29. कालकाल – काल के भी काल- - - - - - - - - - - - 30. कृपानिधि – करूणा की खान
31. भीम – भयंकर रूप वाले----------------------------------32. परशुहस्त – हाथ में फरसा धारण करने वाले
33. मृगपाणी – हाथ में हिरण धारण करने वाले--------------34. जटाधर – जटा रखने वाले
35. कैलाशवासी – कैलाश के निवासी-------------------------36. कवची – कवच धारण करने वाले
37. कठोर – अत्यन्त मजबूत देह वाले------------------------38. त्रिपुरांतक – त्रिपुरासुर को मारने वाले
39. वृषांक – बैल के चिह्न वाली झंडा वाले--------------------40. वृषभारूढ़ – बैल की सवारी वाले
41. भस्मोद्धूलितविग्रह – सारे शरीर में भस्म लगाने वाले---42. सामप्रिय – सामगान से प्रेम करने वाले
43. स्वरमयी – सातों स्वरों में निवास करने वाले--------------44. त्रयीमूर्ति – वेदरूपी विग्रह करने वाले
45. अनीश्वर – जिसका और कोई मालिक नहीं है-------------46. सर्वज्ञ – सब कुछ जानने वाले
47. परमात्मा – सबका अपना आपा----------------------------48. सोमसूर्याग्निलोचन – चंद्र, सूर्य और अग्निरूपी
                                                                                                 आँख वाले
49. हवि – आहूति रूपी द्रव्य वाले------------------------------50. यज्ञमय – यज्ञस्वरूप वाले
51. सोम – उमा के सहित रूप वाले-----------------------------52. पंचवक्त्र – पांच मुख वाले
53. सदाशिव – नित्य कल्याण रूप वाले-------------------------54. विश्वेश्वर – सारे विश्व के ईश्वर
55. वीरभद्र – बहादुर होते हुए भी शांत रूप वाले---------------56. गणनाथ – गणों के स्वामी
57. प्रजापति – प्रजाओं का पालन करने वाले--------------------58. हिरण्यरेता – स्वर्ण तेज वाले
59. दुर्धुर्ष – किसी से नहीं दबने वाले-------------------------------60. गिरीश – पहाड़ों के मालिक
61. गिरिश – कैलाश पर्वत पर सोने वाले-------------------------62. अनघ – पापरहित
63. भुजंगभूषण – साँप के आभूषण वाले-------------------------64. भर्ग – पापों को भूंज देने वाले
65. गिरिधन्वा – मेरू पर्वत को धनुष बनाने वाले-----------------66. गिरिप्रिय – पर्वत प्रेमी
67. कृत्तिवासा – गजचर्म पहनने वाले-----------------------------68. पुराराति – पुरों का नाश करने वाले
69. भगवान् – सर्वसमर्थ षड्ऐश्वर्य संपन्न--------------------------70. प्रमथाधिप – प्रमथगणों के अधिपति
71. मृत्युंजय – मृत्यु को जीतने वाले-------------------------------72. सूक्ष्मतनु – सूक्ष्म शरीर वाले
73. जगद्व्यापी – जगत् में व्याप्त होकर रहने वाले----------------74. जगद्गुरू – जगत् के गुरू
75. व्योमकेश – आकाश रूपी बाल वाले-------------------------76. महासेनजनक – कार्तिकेय के पिता
77. चारुविक्रम – सुन्दर पराक्रम वाले----------------------------78. रूद्र – भक्तों के दुख देखकर रोने वाले
79. भूतपति – भूतप्रेत या पंचभूतों के स्वामी----------------------80. स्थाणु – स्पंदन रहित कूटस्थ रूप वाले
81. अहिर्बुध्न्य – कुण्डलिनी को धारण करने वाले----------------82. दिगम्बर – नग्न, आकाशरूपी वस्त्र वाले
83. अष्टमूर्ति – आठ रूप वाले-----------------------------------84. अनेकात्मा – अनेक रूप धारण करने वाले
85. सात्त्विक – सत्व गुण वाले------------------------------------86. शुद्धविग्रह – शुद्धमूर्ति वाले
87. शाश्वत – नित्य रहने वाले- - - - - - - - - - - - - - - - - - - - -88. खण्डपरशु – टूटा हुआ फरसा धारण करने                                                                                                         वाले
89. अज – जन्म रहित- - - - - - - -- - - - - - - - - - - - - - - - - 90. पाशविमोचन – बंधन से छुड़ाने वाले
91. मृड – सुखस्वरूप वाले- - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - 92. पशुपति – पशुओं के मालिक
93. देव – स्वयं प्रकाश रूप- - -- - -- - - - - - - - - - - - - - - --94. महादेव – देवों के भी देव
95. अव्यय – खर्च होने पर भी न घटने वाले- - - - - - - - - - - 96. हरि – विष्णुस्वरूप
97. पूषदन्तभित् – पूषा के दांत उखाड़ने वाले- - -- - - - - - - 98. अव्यग्र – कभी भी व्यथित न होने वाले
99. दक्षाध्वरहर – दक्ष के यज्ञ को नष्ट करने वाले- - - - - - - -100. हर – पापों व तापों को हरने वाल
101. भगनेत्रभिद् – भग देवता की आंख फोड़ने वाले- - - - -102. अव्यक्त – इंद्रियों के सामने प्रकट न होने वाले
103. सहस्राक्ष – अनंत आँख वाले- -- - - - - - - - - - - - - - --104. सहस्रपाद – अनंत पैर वाले
105. अपवर्गप्रद – कैवल्य मोक्ष देने वाले- - - - - - - - - - - - 106. अनंत – देशकालवस्तुरूपी परिछेद से रहित
107. तारक – सबको तारने वाला- - - - - - - - - - - - - - - - - -108. परमेश्वर – सबसे परे ईश्वर
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7>जानिए शिवलिंग पर क्यों नहीं चढ़ाते शंख से जल।

शिवलिंग भगवान शिव का ही एक रूप है यह रुप हमें परमपिता परमात्मा शिव के निराकार स्वरुप को दर्शाता है। माना जाता है कि शिवलिंग ही उस निराकार ज्योतिर्मय स्वरुप का प्रतीक है। शिवलिंग का रोज अभिषेक होता है हमारे देश में 12 शिवलिंग के मंदिर हैं , इनमें रोज शिवलिंग को जल चढ़ाया जाता है पर शंख से नहीं चढ़ाया जाता है, आखिर क्यों?

हम सब जानते है की पूजन कार्य में शंख का उपयोग महत्वपूर्ण होता है। लगभग सभी देवी-देवताओं को शंख से जल चढ़ाया जाता है लेकिन शिवलिंग पर शंख से जल चढ़ाना वर्जित माना गया है। आखिर क्यों शिवजी को शंख से जल अर्पित नहीं करते है ? इस संबंध में शिवपुराण में एक कथा बताई गई है।

शिवपुराण की कथा
शिवपुराण के अनुसार शंखचूड नाम का महापराक्रमी दैत्य हुआ। शंखचूड दैत्यराम दंभ का पुत्र था। दैत्यराज दंभ को जब बहुत समय तक कोई संतान उत्पन्न नहीं हुई तब उसने भगवान विष्णु के लिए कठिन तपस्या की। तप से प्रसन्न होकर विष्णु प्रकट हुए। विष्णुजी ने वर मांगने के लिए कहा तब दंभ ने तीनों लोको के लिए अजेय एक महापराक्रमी पुत्र का वर मांगा। श्रीहरि तथास्तु बोलकर अंतध्र्यान हो गए। तब दंभ के यहां एक पुत्र का जन्म हुआ जिसका नाम शंखचूड़ पड़ा। शंखचुड ने पुष्कर में ब्रह्माजी के निमित्त घोर तपस्या की और उन्हें प्रसन्न कर लिया। ब्रह्मा ने वर मांगने के लिए कहा तब शंखचूड ने वर मांगा कि वो देवताओं के लिए अजेय हो जाए। ब्रह्माजी ने तथास्तु बोला और उसे श्रीकृष्णकवच दिया। साथ ही ब्रह्मा ने शंखचूड को धर्मध्वज की कन्या तुलसी से विवाह करने की आज्ञा दी। फिर वे अंतध्र्यान हो गए।

ब्रह्मा की आज्ञा से तुलसी और शंखचूड का विवाह हो गया। ब्रह्मा और विष्णु के वरदान के मद में चूर दैत्यराज शंखचूड ने तीनों लोकों पर स्वामित्व स्थापित कर लिया। देवताओं ने त्रस्त होकर विष्णु से मदद मांगी परंतु उन्होंने खुद दंभ को ऐसे पुत्र का वरदान दिया था अत: उन्होंने शिव से प्रार्थना की। तब शिव ने देवताओं के दुख दूर करने का निश्चय किया और वे चल दिए। परंतु श्रीकृष्ण कवच और तुलसी के पतिव्रत धर्म की वजह से शिवजी भी उसका वध करने में सफल नहीं हो पा रहे थे तब विष्णु ने ब्राह्मण रूप बनाकर दैत्यराज से उसका श्रीकृष्णकवच दान में ले लिया। इसके बाद शंखचूड़ का रूप धारण कर तुलसी के शील का हरण कर लिया। अब शिव ने शंखचूड़ को अपने त्रिशुल से भस्म कर दिया और उसकी हड्डियों से शंख का जन्म हुआ। चूंकि शंखचूड़ विष्णु भक्त था अत: लक्ष्मी-विष्णु को शंख का जल अति प्रिय है और सभी देवताओं को शंख से जल चढ़ाने का विधान है। परंतु शिव ने चूंकि उसका वध किया था अत: शंख का जल शिव को निषेध बताया गया है। इसी वजह से शिवजी को शंख से जल नहीं चढ़ाया जाता है। साभार -अजबगजब.काम
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8>जानिए अमरनाथ गुफा के अद्भुत रहस्य।

अमरनाथ गुफा भगवान शिव से संबधिंत है। अमरनाथ गुफा में भगवान शिव का हर वर्ष प्राकृतिक शिव लिंग बनता है जिसके दर्शन के लिए भारत ही नहीं समुचे विश्व से लोग आते हैं। जानिए इस गुफा से के सबसे अद्भुत औऱ अनजाने रहस्य।।
शास्त्रों में जगह-जगह पर भगवान शिव के महात्म्य का वर्णन मिलता है। ऋग्वेद में भी शिवजी का गुणगान मिलता है। श्री अमरनाथ धाम एक ऐसा शिव धाम है जिसके संबंध में मान्यता है कि भगवान शिव साक्षात श्री अमरनाथ गुफा में विराजमान रहते हैं।

बाबा बर्फानी से जुडे हैरान कर देने वाले तथ्य –
धार्मिक व ऐतिहासिक दृष्टी से अति महत्वपूर्ण श्री अमरनाथ यात्रा को कुछ शिव भक्त स्वर्ग की प्राप्ति का माध्यम बताते हैं तो कुछ लोग मोक्ष प्राप्ति का। श्री अमरनाथ यात्रा हमारी एकता का भी प्रतीक माना जता है। पावन गुफा में बर्फीली बूंदों से बनने वाला हिमशिवलिंग ऐसा दैवी चमत्कार है जिसे देखने के लिए हर कोई लालायित रहता है और जो देख लेता है वो धन्य हो जाता है।
भारत के कोने-कोने से और विदेशों से असंख्य शिव भक्त लगभग 14 हजार फुट की ऊंचाई पर स्थित श्री अमरनाथ की गुफा में प्रकृति के इस चमत्कार के दर्शन करने के लिए अनेकों बाधाएं पार करके भी पहुंचते हैं। श्री अमरनाथ गुफा में स्थित पार्वती पीठ 51 शक्तिपीठों में से एक है। मान्यता है कि यहां भगवती सती का कंठ भाग गिरा था।
कश्मीर घाटी में स्थित पावन श्री अमरनाथ गुफा प्राकृतिक है। यह पावन गुफा लगभग 160 फुट लम्बी, 100 फुट चौड़ी और काफी ऊंची है। कश्मीर में वैसे तो 45 शिव धाम, 60 विष्णु धाम, 3 ब्रह्मा धाम, 22 शक्ति धाम, 700 नाग धाम तथा असंख्य तीर्थ हैं पर श्री अमरनाथ धाम का सबसे अधिक महत्व है।

काशी में लिंग दर्शन एवं पूजन से दस गुणा, प्रयाग से सौ गुणा, नैमिषारण्य तथा कुरुक्षेत्र से हजार गुणा फल देने वाला श्री अमरनाथ स्वामी का पूजन है। देवताओं की हजार वर्ष तक स्वर्ण पुष्प मोती एवं पट्टआ वस्त्रों से पूजा का जो फल मिलता है, वह श्री अमरनाथ की रसलिंग पूजा से एक ही दिन में प्राप्त हो जाता है।

श्री अमरनाथ गुफा में शिव भक्त प्राकृतिक हिमशिवलिंग के साथ-साथ बर्फ से ही बनने वाले प्राकृतिक शेषनाग, श्री गणेश पीठ व माता पार्वती पीठ के भी दर्शन करते हैं। प्राकृतिक रूप से प्रति वर्ष बनने वाले हिमशिवलिंग में इतनी अधिक चमक विद्यमान होती है कि देखने वालों की आंखों को चकाचौंध कर देती है।

हिमशिवलिंग पक्की बर्फ का बनता है जबकि गुफा के बाहर मीलों तक सर्वत्र कच्ची बर्फ ही देखने को मिलती है। मान्यता यह भी है कि गुफा के ऊपर पर्वत पर श्री राम कुंड है। भगवान शिव ने माता पार्वती को सृष्टिआ की रचना इसी अमरनाथ गुफा में सुनाई थी।

गुफा की खोज –
इस गुफा की खोज बूटा मलिक नामक एक बहुत ही नेक और दयालु एक मुसलमान गडरिए ने की थी। वह एक दिन भेड़ें चराते-चराते बहुत दूर निकल गया। एक जंगल में पहुंचकर उसकी एक साधू से भेंट हो गई। साधू ने बूटा मलिक को कोयले से भरी एक कांगड़ी दे दी। घर पहुंचकर उसने कोयले की जगह सोना पाया तो वह बहुत हैरान हुआ। उसी समय वह साधू का धन्यवाद करने के लिए गया परन्तु वहां साधू को न पाकर एक विशाल गुफा को देखा। उसी दिन से यह स्थान एक तीर्थ बन गया।
एक बार देवर्षि नारद कैलाश पर्वत पर भगवान शंकर के दर्शनार्थ पधारे। भगवान शंकर उस समय वन विहार को गए हुए थे और पार्वती जी वहां विराजमान थीं। पार्वती जी ने देवर्षि के आने का कारण पूछा तो उन्होंने कहा-देवी! भगवान शंकर, जो हम दोनों से बड़े हैं, के गले में मुंडमाला क्यों है? भगवान शंकर के वहां आने पर यही प्रश्र पार्वती जी ने उनसे किया। भगवान शंकर ने कहा-हे पार्वती! जितनी बार तुम्हारा जन्म हुआ है, उतने ही मुंड मैंने धारण किए हैं।

पार्वती जी बोलीं –
मेरा शरीर नाशवान है, मृत्यु को प्राप्त होता है परन्तु आप अमर हैं, इसका कारण बताने का कष्ट करें। भगवान शंकर ने कहा -यह सब अमरकथा के कारण है। इस पर पार्वती जी के हृदय में भी अमरत्व प्राप्त करने की भावना पैदा हो गई और वह भगवान से कथा सुनाने का आग्रह करने लगीं।
भगवान शंकर ने बहुत वर्षों तक टालने का प्रयत्न किया परन्तु अंतत: उन्हें अमरकथा सुनाने को बाध्य होना पड़ा। अमरकथा सुनाने के लिए समस्या यह थी कि कोई अन्य जीव उस कथा को न सुने। इसलिए शिव जी पांच तत्वों (पृथ्वी, जल, वायु, आकाश और अग्रि) का परित्याग करके इन पर्वत मालाओं में पहुंच गए और श्री अमरनाथ गुफा में पार्वती जी को अमरकथा सुनाई।
श्री अमरकथा गुफा की ओर जाते हुए वह सर्वप्रथम पहलगाम पहुंचे, जहां उन्होंने अपने नंदी (बैल) का परित्याग किया। उसके बाद चंदनबाड़ी में अपनी जटा से चंद्रमा को मुक्त किया। शेषनाग नामक झील पर पहुंच कर उन्होंने गले से सर्पों को भी उतार दिया। प्रिय पुत्र श्री गणेश जी को भी उन्होंने महागुणस पर्वत पर छोड़ देने का निश्चय किया। फिर पंचतरणी नामक स्थान पर पहुंच कर शिव भगवान ने पांचों तत्वों का परित्याग किया।

इसके पश्चात ऐसी मान्यता है कि शिव-पार्वती ने इस पर्वत शृंखला में तांडव किया था। तांडव नृत्य वास्तव में सृष्टिआ के त्याग का प्रतीक माना गया। सब कुछ छोड़ अंत में भगवान शिव ने इस गुफा में प्रवेश किया और पार्वती जी को अमरकथा सुनाई। किंवदंती के अनुसार रक्षा बंधन की पूर्णिमा के दिन जो सामान्यत: अगस्त के बीच में पड़ती है, भगवान शंकर स्वयं श्री अमरनाथ गुफा में पधारते हैं।

ऐसा भी ग्रंथों में लिखा मिलता है कि भगवान शिव इस गुफा में पहले पहल श्रावण की पूर्णिमा को आए थे इसलिए उस दिन को श्री अमरनाथ की यात्रा को विशेष महत्व मिला। रक्षा बंधन की पूर्णिमा के दिन ही छड़ी मुबारक भी गुफा में बने हिमशिवलिंग के पास स्थापित कर दी जाती है।

श्री अमरनाथ गुफा में बर्फ से बने शिवलिंग की पूजा होती है। इस सम्बन्ध में अमरेश महादेव की कथा भी मशहूर है। इसके अनुसार आदिकाल में ब्रह्म, प्रकृति, अहंकार, स्थावर (पर्वतादि) जंगल (मनुष्य) संसार की उत्पत्ति हुई। इस क्रमानुसार देवता, ऋषि, पितर, गंधर्व, राक्षस, सर्प, यक्ष, भूतगण, दानव आदि की उत्पत्ति हुई।

इस तरह नए प्रकार के भूतों की सृष्टिआ हुई परन्तु इंद्रादि देवता सहित सभी मृत्यु के वश में हुए थे। देवता भगवान सदाशिव के पास आए क्योंकि उन्हें मृत्यु का भय था। भय से त्रस्त सभी देवताओं ने भगवान भोलेनाथ की स्तुति कर मृत्यु बाधा से मुक्ति का उपाय पूछा। भोलेनाथ स्वामी बोले-मैं आप लोगों की मृत्यु के भय से रक्षा करूंगा। कहते हुए सदाशिव ने अपने सिर पर से चंद्रमा की कला को उतार कर निचोड़ा और देवगणों से बोले, यह आप लोगों के मृत्युरोग की औषधि है
उस चंद्रकला के निचोडऩे से पवित्र अमृत की धारा बह निकली। चंद्रकला को निचोड़ते समय भगवान सदाशिव के शरीर से अमृत बिंबदु पृथ्वी पर गिर कर सूख गए। पावन गुफा में जो भस्म है, वह इसी अमृत ङ्क्षबदु के कण है। सदाशिव भगवान देवताओं पर प्रेम न्यौछावर करते समय स्वयं द्रवीभूत हो गए और देवताओं से कहा-देवताओ! आपने मेरा बर्फ का लिंग शरीर इस गुफा में देखा है। इस कारण मेरी कृपा से आप लोगों को मृत्यु का भय नहीं रहेगा।
अब आप यहीं अमर होकर शिव रूप को प्राप्त हो जाएं। आज से मेरा यह अनादि लिंग शरीर तीनों लोकों में अमरेश के नाम से विख्यात होगा। भगवान सदाशिव देवताओं को ऐसा वर देकर उस दिन से लीन होकर गुफा में रहने लगे। भगवान सदाशिव महाराज ने देवताओं की मृत्यु का नाश किया, इसलिए तभी से उनका नाम अमरेश्वर प्रसिद्ध हुआ है।
मनुष्य श्री अमरनाथ जी की यात्रा करके शुद्धि को प्राप्त करता है तथा शिवलिंग के दर्शनों से भीतर-बाहर से शुद्ध होकर धर्म, अर्थ, काम वचन तथा मोक्ष को प्राप्त करने में समर्थ हो जाता है। अमरनाथ धाम पहुंचना सौभाग्य की बात है। वहां भगवान शिव के दर्शन करने से सर्वसुख की प्राप्ति होती है। बाबा बर्फानी की गुफा में प्रवेश करके भगवान शिव की साक्षात उपस्थिति का एहसास होता है।
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9>बाबा बर्फानी  ( a to d ) 

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बाबा बर्फानी नहीं अमरनाथ बाबा कहो, जानिए प्राचीन इतिहास

अमरनाथ गुफा श्रीनगर से करीब 145 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। अमरनाथ गुफा हिमालय पर्वत श्रेणियों में स्थित एक पर्वत की गुफा है। समुद्र तल से 3,978 मीटर की ऊंचाई पर स्थित यह गुफा 150 फीट ऊंची और करीब 90 फीट लंबी है। अमरनाथ यात्रा पर जाने के लिए 2 रास्ते हैं। एक पहलगाम होकर जाता है और दूसरा सोनमर्ग बालटाल से जाता है यानी देशभर के किसी भी क्षेत्र से पहले पहलगाम या बालटाल पहुंचना होता है। इसके बाद की यात्रा पैदल की जाती है।

पहलगाम से अमरनाथ जाने का रास्ता सरल और सुविधाजनक समझा जाता है। बालटाल से अमरनाथ गुफा की दूरी 14 किलोमीटर है, लेकिन यह मार्ग पार करना मुश्किलभरा होता है। इसी वजह से अधिकतर यात्री पहलगाम के रास्ते अमरनाथ जाते हैं।

अमरनाथ गुफा हिन्दुओं का प्रमुख तीर्थस्‍थल है। इसके बारे में बहुत भ्रम फैलाया जाता है। आजकल बाबा अमरनाथ को 'बर्फानी बाबा' कहकर प्रचारित करने का चलन भी चल रहा है। इसी तरह धर्म का बिगाड़ होता है। असल में यह अमरेश्वर महादेव का स्थान है। प्राचीनकाल में इसे 'अमरेश्वर' कहा जाता था।

यह बहुत ही गलत धारणा फैलाई गई है कि इस गुफा को पहली बार किसी मुस्लिम ने 18वीं-19वीं शताब्दी में खोज निकाला था। वह गुज्जर समाज का एक गडरिया था, जिसे बूटा मलिक कहा जाता है। क्या गडरिया इतनी ऊंचाई पर, जहां ऑक्सीजन नहीं के बराबर रहती है, वहां अपनी बकरियों को चराने ले गया था? स्थानीय इतिहासकार मानते हैं कि 1869 के ग्रीष्मकाल में गुफा की फिर से खोज की गई और पवित्र गुफा की पहली औपचारिक तीर्थयात्रा 3 साल बाद 1872 में आयोजित की गई थी। इस तीर्थयात्रा में मलिक भी साथ थे।

स्वामी विवेकानंद ने 1898 में 8 अगस्त को अमरनाथ गुफा की यात्रा की थी और बाद में उन्होंने उल्लेख किया कि मैंने सोचा कि बर्फ का लिंग स्वयं शिव हैं। मैंने ऐसी सुन्दर, इतनी प्रेरणादायक कोई चीज नहीं देखी और न ही किसी धार्मिक स्थल का इतना आनंद लिया है।

खराब मौसम : यूं तो हर वर्ष 2 जून से 2 अगस्त तक चलने वाली यात्रा में कम से कम 5 से 10 लोगों की मौत होती ही है और ज्यादा से ज्यादा 60-65 लोग खराब मौसम और हृदयाघात से मर जाते हैं। लेकिन वर्ष 1996 में अमरनाथ यात्रा के दौरान खराब मौसम के कारण 250 यात्री मारे गए थे। यह अमरनाथ यात्रा के इतिहास की सबसे बड़ी प्राकृतिक त्रासदी मानी जाती है।

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एक अंग्रेज लेखक लारेंस अपनी पुस्तक 'वैली ऑफ कश्मीर' में लिखते हैं कि पहले मट्टन के कश्मीरी ब्राह्मण अमरनाथ के तीर्थयात्रियों की यात्रा कराते थे। बाद में बटकुट में मलिकों ने यह जिम्मेदारी संभाल ली, क्योंकि मार्ग को बनाए रखना और गाइड के रूप में कार्य करना उनकी जिम्मेदारी थी। वे ही बीमारों, वृद्धों की सहायता करते और उन्हें अमरनाथ के दर्शन कराते थे इसलिए मलिकों ने यात्रा कराने की जिम्मेदारी संभाल ली। इन्हें मौसम की जानकारी भी होती थी। आज भी चौथाई चढ़ावा इस मुसलमान गडरिए के वंशजों को मिलता है।

दरअसल, मध्यकाल में कश्मीर घाटी पर विदेशी ईरानी और तुर्क आक्रमणों के चलते वहां अशांति और भय का वातावरण फैल गया जिसके चलते वहां से हिन्दुओं ने पलायन कर दिया। पहलगांव को विदेशी मुस्लिम आक्रांताओं ने सबसे पहले इसलिए निशाना बनाया, क्योंकि इस गांव की ऐतिहासिकता और इसकी प्रसिद्धि इसराइल तक थी। यहीं पर सर्वप्रथम यहूदियों का एक कबीला आकर बस गया था।

इस हिल स्टेशन पर हिन्दू और बौद्धों के कई मठ थे, जहां लोग ध्यान करते थे। ऐसा एक शोध हुआ है कि इसी पहलगांव में ही मूसा और ईसा ने अपने जीवन के अंतिम दिन बिताए थे। बाद में उनको श्रीनगर के पास रौजाबल में दफना दिया गया। पहलगांव का अर्थ होता है गड़रिए का गांव।

ऐसे में जब आक्रमण हुआ तो 14वीं शताब्दी के मध्य से लगभग 300 वर्ष की अवधि के लिए अमरनाथ यात्रा बाधित रही। कश्मीर के शासकों में से एक था 'जैनुलबुद्दीन' (1420-70 ईस्वी), उसने अमरनाथ गुफा की यात्रा की थी। फिर 18वीं सदी में फिर से शुरू की गई। वर्ष 1991 से 95 के दौरान आतंकी हमलों की आशंका के चलते इसे इस यात्रा को स्थगित कर दिया गया था।

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पौराणिक मान्यता है कि एक बार कश्मीर की घाटी जलमग्न हो गई। उसने एक बड़ी झील का रूप ले लिया। जगत के प्राणियों की रक्षा के उद्देश्य से ऋषि कश्यप ने इस जल को अनेक नदियों और छोटे-छोटे जलस्रोतों के द्वारा बहा दिया। उसी समय भृगु ऋषि पवित्र हिमालय पर्वत की यात्रा के दौरान वहां से गुजरे। तब जल स्तर कम होने पर हिमालय की पर्वत श्रृखंलाओं में सबसे पहले भृगु ऋषि ने अमरनाथ की पवित्र गुफा और बर्फानी शिवलिंग को देखा। मान्यता है कि तब से ही यह स्थान शिव आराधना का प्रमुख देवस्थान बन गया और अनगिनत तीर्थयात्री शिव के अद्भुत स्वरूप के दर्शन के लिए इस दुर्गम यात्रा की सभी कष्ट और पीड़ाओं को सहन कर लेते हैं। यहां आकर वह शाश्वत और अनंत अध्यात्मिक सुख को पाते हैं।

कितनी प्राचीन गुफा? : जम्मू-कश्मीर की राजधानी श्रीनगर से करीब 141 किलोमीटर दूर 3,888 मीटर की ऊंचाई पर स्थित अमरनाथ गुफा को पुरातत्व विभाग वाले 5 हजार वर्ष पुराना मानते हैं अर्थात महाभारत काल में यह गुफा थी। लेकिन उनका यह आकलन गलत हो सकता है, क्योंकि सवाल यह उठता है कि जब 5 हजार वर्ष पूर्व गुफा थी तो उसके पूर्व क्या गुफा नहीं थी? हिमालय के प्राचीन पहाड़ों को लाखों वर्ष पुराना माना जाता है। उनमें कोई गुफा बनाई गई होगी तो वह हिमयुग के दौरान ही बनाई गई होगी अर्थात आज से 12 से 13 हजार वर्ष पूर्व।

पुराण के अनुसार काशी में दर्शन से दस गुना, प्रयाग से सौ गुना और नैमिषारण्य से हजार गुना पुण्य देने वाले श्री बाबा अमरनाथ के दर्शन हैं। और कैलाश को जो जाता है, वह मोक्ष पाता है। पुराण कब लिखे गए? कुछ महाभारतकाल में और कुछ बौद्धकाल में। तब पुराणों में इस तीर्थ का जिक्र है।

इसके बाद ईसा पूर्व लिखी गई कल्हण की 'राजतरंगिनी तरंग द्वि‍तीय' में उल्लेख मिलता है कि कश्मीर के राजा सामदीमत (34 ईपू-17वीं ईस्वीं) शिव के भक्त थे और वेपहलगाम के वनों में स्थित बर्फ के शिवलिंग की पूजा करने जाते थे। बर्फ का शिवलिंग कश्मीर को छोड़कर विश्व में कहीं भी नहीं मिलता।

इस उल्लेख से पता चलता है कि यह तीर्थ कितना पुराना है। पहले के तीर्थ में साधु-संत और कुछ विशिष्ट लोगों के अलावा घरबार छोड़कर तीर्थयात्रा पर निकले लोग ही जा पाते थे, क्योंकि यात्रा का कोई सुगम साधन नहीं था इसलिए कुछ ही लोग दुर्गम स्थानों की तीर्थयात्रा कर पाते थे।

बृंगेश संहिता, नीलमत पुराण, कल्हण की राजतरंगिनी आदि में अमरनाथ तीर्थ का बराबर उल्लेख मिलता है। बृंगेश संहिता में कुछ महत्वपूर्ण स्थानों का उल्लेख है, जहां तीर्थयात्रियों को अमरनाथ गुफा की ओर जाते समय धार्मिक अनुष्ठान करने पड़ते थे। उनमें अनंतनया (अनंतनाग), माच भवन (मट्टन), गणेशबल (गणेशपुर), मामलेश्वर (मामल), चंदनवाड़ी (2,811 मीटर), सुशरामनगर (शेषनाग, 3454 मीटर), पंचतरंगिनी (पंचतरणी, 3,845 मीटर) और अमरावती शामिल हैं।

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गुफा के दर्शन का महत्व : इस गुफा का महत्व इसलिए नहीं है कि यहां हिम शिवलिंग का निर्माण होता है। इस गुफा का महत्व इसलिए भी है कि इसी गुफा में भगवान शिव ने अपनी पत्नी देवी पार्वती को अमरत्व का मंत्र सुनाया था और उन्होंने कई वर्ष रहकर यहां तपस्या की थी, तो यह शिव का एक प्रमुख और पवित्र स्थान है।

शिव के 5 प्रमुख स्थान हैं- 1. कैलाश पर्वत, 2. अमरनाथ, 3. केदारनाथ, 4. काशी और 5. पशुपतिनाथ।

अमरनाथ की कहानी : शास्त्रों के अनुसार इसी गुफा में भगवान शिव ने माता पार्वती को अमरत्व का रहस्य बताया था। माता पार्वती के साथ ही इस रहस्य को शुक (तोता) और दो कबूतरों ने भी सुन लिया था। यह शुक बाद में शुकदेव ऋषि के रूप में अमर हो गए, जबकि गुफा में आज भी कई श्रद्धालुओं को कबूतरों का एक जोड़ा दिखाई देता है जिन्हें अमर पक्षी माना जाता है।

भगवान शिव जब पार्वती को अमरकथा सुनाने ले जा रहे थे, तो उन्होंने छोटे-छोटे अनंत नागों को अनंतनाग में छोड़ा, माथे के चंदन को चंदनवाड़ी में उतारा, अन्य पिस्सुओं को पिस्सू टॉप पर और गले के शेषनाग को शेषनाग नामक स्थल पर छोड़ा था। ये सभी स्थान अभी भी अमरनाथ यात्रा के दौरान रास्ते में दिखाई देते हैं।
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10>अमरनाथ

स्थान: अमरनाथ, जम्मू एवं कश्मीर

अमरनाथ हिन्दुओ का एक प्रमुख तीर्थस्थल है। यह कश्मीर राज्य के श्रीनगर शहर के उत्तर-पूर्व में १३५ सहस्त्रमीटर दूर समुद्रतल से १३,६०० फुट की ऊँचाई पर स्थित है। इस गुफा की लंबाई (भीतर की ओर गहराई) १९ मीटर और चौड़ाई १६ मीटर है। गुफा ११ मीटर ऊँची है। अमरनाथ गुफा भगवान शिव के प्रमुख धार्मिक स्थलों में से एक है। अमरनाथ को तीर्थों का तीर्थ कहा जाता है क्यों कि यहीं पर भगवान शिव ने माँ पार्वती को अमरत्व का रहस्य बताया था।

यहाँ की प्रमुख विशेषता पवित्र गुफा में बर्फ से प्राकृतिक शिवलिंग का निर्मित होना है। प्राकृतिक हिम से निर्मित होने के कारण इसे स्वयंभू हिमानी शिवलिंगभी कहते हैं। आषाढ़ पूर्णिमा से शुरू होकर रक्षाबंधन तक पूरे सावन महीने में होने वाले पवित्र हिमलिंग दर्शन के लिए लाखो लोग यहां आते है। गुफा की परिधि लगभग डेढ़ सौ फुट है और इसमें ऊपर से बर्फ के पानी की बूँदें जगह-जगह टपकती रहती हैं। यहीं पर एक ऐसी जगह है, जिसमें टपकने वाली हिम बूँदों से लगभग दस फुट लंबा शिवलिंग बनता है। चन्द्रमा के घटने-बढ़ने के साथ-साथ इस बर्फ का आकार भी घटता-बढ़ता रहता है। श्रावण पूर्णिमा को यह अपने पूरे आकार में आ जाता है और अमावस्या तक धीरे-धीरे छोटा होता जाता है। आश्चर्य की बात यही है कि यह शिवलिंग ठोस बर्फ का बना होता है, जबकि गुफा में आमतौर पर कच्ची बर्फ ही होती है जो हाथ में लेते ही भुरभुरा जाए। मूल अमरनाथ शिवलिंग से कई फुट दूर गणेश, भैरव और पार्वती के वैसे ही अलग अलग हिमखंड हैं।

अमरनाथ गुफा में बर्फ से बना प्रकृतिक शिवलिंग


जनश्रुति प्रचलित है कि इसी गुफा में माता पार्वती को भगवान शिव ने अमरकथा सुनाई थी, जिसे सुनकर सद्योजात शुक-शिशु शुकदेव ऋषि के रूप में अमर हो गये थे। गुफा में आज भी श्रद्धालुओं को कबूतरों का एक जोड़ा दिखाई दे जाता है, जिन्हें श्रद्धालु अमर पक्षी बताते हैं। वे भी अमरकथा सुनकर अमर हुए हैं। ऐसी मान्यता भी है कि जिन श्रद्धालुओं को कबूतरों को जोड़ा दिखाई देता है, उन्हें शिव पार्वती अपने प्रत्यक्ष दर्शनों से निहाल करके उस प्राणी को मुक्ति प्रदान करते हैं। यह भी माना जाता है कि भगवान शिव ने अद्र्धागिनी पार्वती को इस गुफा में एक ऐसी कथा सुनाई थी, जिसमें अमरनाथ की यात्रा और उसके मार्ग में आने वाले अनेक स्थलों का वर्णन था। यह कथा कालांतर में अमरकथा नाम से विख्यात हुई।


कुछ विद्वानों का मत है कि भगवान शंकर जब पार्वती को अमर कथा सुनाने ले जा रहे थे, तो उन्होंने छोटे-छोटे अनंत नागों को अनंतनाग में छोड़ा, माथे के चंदनको चंदनबाड़ी में उतारा, अन्य पिस्सुओं को पिस्सू टॉप पर और गले के शेषनाग को शेषनाग नामक स्थल पर छोड़ा था। ये तमाम स्थल अब भी अमरनाथ यात्रा में आते हैं। अमरनाथ गुफा का सबसे पहले पता सोलहवीं शताब्दी के पूर्वाध में एक मुसलमान गडरिए को चला था।  आज भी चौथाई चढ़ावा उस मुसलमान गडरिए के वंशजों को मिलता है। आश्चर्य की बात यह है कि अमरनाथ गुफा एक नहीं है। अमरावती नदी के पथ पर आगे बढ़ते समय और भी कई छोटी-बड़ी गुफाएं दिखती हैं। वे सभी बर्फ से ढकी हैं।

अमरनाथ यात्रा

अमर नाथ यात्रा पर जाने के भी दो रास्ते हैं। एक पहलगाम होकर और दूसरा सोनमर्ग बलटाल से। यानी कि पहलमान और बलटाल तक किसी भी सवारी से पहुँचें, यहाँ से आगे जाने के लिए अपने पैरों का ही इस्तेमाल करना होगा। अशक्त या वृद्धों के लिए सवारियों का प्रबंध किया जा सकता है। पहलगाम से जानेवाले रास्ते को सरल और सुविधाजनक समझा जाता है। बलटाल से अमरनाथ गुफा की दूरी केवल १४ किलोमीटर है और यह बहुत ही दुर्गम रास्ता है और सुरक्षा की दृष्टि से भी संदिग्ध है। इसीलिए सरकार इस मार्ग को सुरक्षित नहीं मानती और अधिकतर यात्रियों को पहलगाम के रास्ते अमरनाथ जाने के लिए प्रेरित करती है। लेकिन रोमांच और जोखिम लेने का शौक रखने वाले लोग इस मार्ग से यात्रा करना पसंद करते हैं। इस मार्ग से जाने वाले लोग अपने जोखिम पर यात्रा करते है। रास्ते में किसी अनहोनी के लिए भारत सरकार जिम्मेदारी नहीं लेती है।
पहलगाम से अमरनाथ

पहलगाम जम्मू से ३१५ किलोमीटर की दूरी पर है। यह विख्यात पर्यटन स्थल भी है और यहाँ का नैसर्गिक सौंदर्य देखते ही बनता है। पहलगाम तक जाने के लिए जम्मू-कश्मीर पर्यटन केंद्र से सरकारी बस उपलब्ध रहती है। पहलगाम में गैर सरकारी संस्थाओं की ओर से लंगर की व्यवस्था की जाती है। तीर्थयात्रियों की पैदल यात्रा यहीं से आरंभ होती है।

पहलगाम के बाद पहला पड़ाव चंदनबाड़ी है, जो पहलगाम से आठ किलोमीटर की दूरी पर है। पहली रात तीर्थयात्री यहीं बिताते हैं। यहाँ रात्रि निवास के लिए कैंप लगाए जाते हैं। इसके ठीक दूसरे दिन पिस्सु घाटी की चढ़ाई शुरू होती है। कहा जाता है कि पिस्सु घाटी पर देवताओं और राक्षसों के बीच घमासान लड़ाई हुई जिसमें राक्षसों की हार हुई। लिद्दर नदी के किनारे-किनारे पहले चरण की यह यात्रा ज्यादा कठिन नहीं है। चंदनबाड़ी से आगे इसी नदी पर बर्फ का यह पुल सलामत रहता है।

चंदनबाड़ी से १४ किलोमीटर दूर शेषनाग में अगला पड़ाव है। यह मार्ग खड़ी चढ़ाई वाला और खतरनाक है। यहीं पर पिस्सू घाटी के दर्शन होते हैं। अमरनाथ यात्रा में पिस्सू घाटी काफी जोखिम भरा स्थल है। पिस्सू घाटी समुद्रतल से ११,१२० फुट की ऊँचाई पर है। यात्री शेषनाग पहुँच कर ताजादम होते हैं। यहाँ पर्वतमालाओं के बीच नीले पानी की खूबसूरत झील है। इस झील में झांककर यह भ्रम हो उठता है कि कहीं आसमान तो इस झील में नहीं उतर आया। यह झील करीब डेढ़ किलोमीटर लम्बाई में फैली है। किंवदंतियों के मुताबिक शेषनाग झील में शेषनाग का वास है और चौबीस घंटों के अंदर शेषनाग एक बार झील के बाहर दर्शन देते हैं, लेकिन यह दर्शन खुशनसीबों को ही नसीब होते हैं। तीर्थयात्री यहाँ रात्रि विश्राम करते हैं और यहीं से तीसरे दिन की यात्रा शुरू करते हैं।

शेषनाग से पंचतरणी आठ मील के फासले पर है। मार्ग में बैववैल टॉप और महागुणास दर्रे को पार करना पड़ता हैं, जिनकी समुद्रतल से ऊँचाई क्रमश: १३,५०० फुट व १४,५०० फुट है। महागुणास चोटी से पंचतरणी तक का सारा रास्ता उतराई का है। यहाँ पांच छोटी-छोटी सरिताएँ बहने के कारण ही इस स्थल का नाम पंचतरणी पड़ा है। यह स्थान चारों तरफ से पहाड़ों की ऊंची-ऊंची चोटियों से ढका है। ऊँचाई की वजह से ठंड भी ज्यादा होती है। ऑक्सीजन की कमी की वजह से तीर्थयात्रियों को यहाँ सुरक्षा के इंतजाम करने पड़ते हैं।

अमरनाथ की गुफा यहाँ से केवल आठ किलोमीटर दूर रह जाती हैं और रास्ते में बर्फ ही बर्फ जमी रहती है। इसी दिन गुफा के नजदीक पहुँच कर पड़ाव डाल रात बिता सकते हैं और दूसरे दिन सुबह पूजा अर्चना कर पंचतरणी लौटा जा सकता है। कुछ यात्री शाम तक शेषनाग तक वापस पहुँच जाते हैं। यह रास्ता काफी कठिन है, लेकिन अमरनाथ की पवित्र गुफा में पहुँचते ही सफर की सारी थकान पल भर में छू-मंतर हो जाती है और अद्भुत आत्मिक आनंद की अनुभूति होती है।

बलटाल से अमरनाथ- जम्मू से बलटाल की दूरी ४०० किलोमीटर है। जम्मू से उधमपुर के रास्ते बलटाल के लिए जम्मू कश्मीर पर्यटक स्वागत केंद्र की बसें आसानी से मिल जाती हैं। बलटाल कैंप से तीर्थयात्री एक दिन में अमरनाथ गुफा की यात्रा कर वापस कैंप लौट सकते हैं।

अमरनाथ गुफा की वार्षिक तीर्थयात्रा इस साल पहली जुलाई से शुरू हुई थी जो 24 अगस्त तक चलेगी। शिवभक्त यहां बर्फानी बाबा के पवित्र गुफा में बर्फ से बने प्राकृतिक शिवलिंग का दर्शन करते हैं। यह तीर्थस्थल समुद्रतल से करीब 3888 मीटर की ऊंचाई पर है।
गौर हो कि बाबा अमरनाथ को तीर्थों का तीर्थ कहा जाता है क्यों कि यहीं पर भगवान शिव ने मां पार्वती को अमरत्व का रहस्य बताया था। अमरनाथ बाबा की प्रसिद्ध गुफा जम्मू और कश्मीर राज्य के श्रीनगर शहर के उत्तर-पूर्व में स्थित है। गुफा 11 मीटर ऊँची है। इसकी लंबाई 19 मीटर और चौड़ाई 16 मीटर है। पवित्र गुफा में बर्फ बना प्राकृतिक शिवलिंग स्थित है। प्राकृतिक हिम से निर्मित होने के कारण इसे हिमानी या बर्फानी शिवलिंग भी कहते हैं। पवित्र हिमलिंग दर्शन के लिए प्रतिवर्ष यहां लाखों की संख्या में लोग आते हैं।
गुफा में ऊपर से बर्फ के समान पानी की बूंदें जगह-जगह टपकती रहती हैं। यहीं पर एक ऐसी जगह है, जिसमें टपकने वाली बर्फ की बूंदों से लगभग दस फुट लंबा शिवलिंग बन जाता है। चन्द्रमा के घटने-बढ़ने के साथ-साथ इस बर्फ का आकार भी घटता-बढ़ता रहता है।


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11>द्वादश ज्योतिर्लिंग


सोमनाथ // मल्लिकार्जुन // महाकालेश्वर // ॐकारेश्वर // वैद्यनाथ // भीमाशंकर

रामेश्वर // नागेश्वर // विश्वनाथ // त्रयम्बकेश्वर // केदारनाथ // घृष्णेश्वर

द्वादश ज्योतिर्लिंग मंदिरों की स्थिति।

हिन्दू धर्म में पुराणों के अनुसार शिवजी जहाँ-जहाँ स्वयं प्रगट हुए उन बारह स्थानों पर स्थित शिवलिंगों को ज्योतिर्लिंगों के रूप में पूजा जाता है। ये संख्या में १२ है। सौराष्ट्र प्रदेश (काठियावाड़) में श्रीसोमनाथ, श्रीशैल पर श्रीमल्लिकार्जुन, उज्जयिनी (उज्जैन) में श्रीमहाकाल, ॐकारेश्वर अथवा अमलेश्वर, परली में वैद्यनाथ, डाकिनी नामक स्थान में श्रीभीमशङ्कर, सेतुबंध पर श्री रामेश्वर, दारुकावन में श्रीनागेश्वर, वाराणसी (काशी) में श्री विश्वनाथ, गौतमी (गोदावरी) के तट पर श्री त्र्यम्बकेश्वर, हिमालय पर केदारखंड में श्रीकेदारनाथ और शिवालय में श्रीघुश्मेश्वर। हिंदुओं में मान्यता है कि जो मनुष्य प्रतिदिन प्रात:काल और संध्या के समय इन बारह ज्योतिर्लिङ्गों का नाम लेता है, उसके सात जन्मों का किया हुआ पाप इन लिंगों के स्मरण मात्र से मिट जाता है।

१२ ज्योतिर्लिंगों के नाम शिव पुराण अनुसार (शतरुद्र संहिता, अध्याय ४२/२-४) हैं।

क्रम.ज्योतिर्लिंगचित्रराज्यस्थितिवर्णन
१ सोमनाथ गुजरात प्रभास पाटन,सौराष्ट्र श्री सोमनाथ सौराष्ट्र, (गुजरात) के प्रभास क्षेत्र में विराजमान है। इस प्रसिद्ध मंदिर को अतीत में छह बार ध्वस्त एवं निर्मित किया गया है। १०२२ ई में इसकी समृद्धि को महमूद गजनवी के हमले से सार्वाधिक नुकसान पहुँचा था।
२ मल्लिकार्जुन आंध्र प्रदेश कुर्नूल आन्ध्र प्रदेश प्रांत के कृष्णा जिले में कृष्णा नदी के तटपर श्रीशैल पर्वत पर श्रीमल्लिकार्जुन विराजमान हैं। इसे दक्षिण का कैलाश कहते हैं।
३ महाकालेश्वर मध्य प्रदेश महाकाल,उज्जैन श्री महाकालेश्वर (मध्यप्रदेश) के मालवा क्षेत्र में क्षिप्रा नदी के तटपर पवित्र उज्जैन नगर में विराजमान है। उज्जैन को प्राचीनकाल में अवंतिकापुरी कहते थे।
४ ॐकारेश्वर मध्य प्रदेश नर्मदा नदी में एक द्वीप पर मालवा क्षेत्र में श्रीॐकारेश्वर स्थान नर्मदा नदी के बीच स्थित द्वीप पर है। उज्जैन से खण्डवा जाने वाली रेलवे लाइन पर मोरटक्का नामक स्टेशन है, वहां से यह स्थान 10 मील दूर है। यहां ॐकारेश्वर और मामलेश्वर दो पृथक-पृथक लिङ्ग हैं, परन्तु ये एक ही लिङ्ग के दो स्वरूप हैं। श्रीॐकारेश्वर लिंग को स्वयंभू समझा जाता है।
५ केदारनाथ उत्तराखंड केदारनाथ श्री केदारनाथ हिमालय के केदार नामक श्रृङ्गपर स्थित हैं। शिखर के पूर्व की ओर अलकनन्दा के तट पर श्री बदरीनाथ अवस्थित हैं और पश्चिम में मन्दाकिनी के किनारे श्री केदारनाथ हैं। यह स्थान हरिद्वार से 150 मील औरऋषिकेश से 132 मील दूर उत्तरांचल राज्य में है।
६ भीमाशंकर महाराष्ट्र भीमाशंकर श्री भीमशङ्कर का स्थान मुंबई से पूर्व और पूना से उत्तर भीमा नदी के किनारे सह्याद्रि पर्वत पर है। यह स्थान नासिकसे लगभग 120 मील दूर है। सह्याद्रि पर्वत के एक शिखर का नाम डाकिनी है। शिवपुराण की एक कथा के आधार पर भीमशङ्कर ज्योतिर्लिङ्ग को असम के कामरूप जिले में गुवाहाटी के पास ब्रह्मपुर पहाड़ी पर स्थित बतलाया जाता है। कुछ लोग मानते हैं कि नैनीताल जिले के काशीपुर नामक स्थान में स्थित विशाल शिवमंदिर भीमशंकर का स्थान है।
७ काशी विश्वनाथ उत्तर प्रदेश वाराणसी वाराणसी (उत्तर प्रदेश) स्थित काशी के श्रीविश्वनाथजी सबसे प्रमुख ज्योतिर्लिंगों में एक हैं। गंगा तट स्थित काशी विश्वनाथ शिवलिंग दर्शन हिंदुओं के लिए सबसे पवित्र है।
८ त्रयम्बकेश्वर महाराष्ट्र त्रयम्बकेश्वर, निकट नासिक श्री त्र्यम्बकेश्वर ज्योतिर्लिङ्ग महाराष्ट्र प्रांत के नासिक जिले में पंचवटी से 18 मील की दूरी पर ब्रह्मगिरि के निकटगोदावरी के किनारे है। इस स्थान पर पवित्र गोदावरी नदी का उद्गम भी है।
९ वैद्यनाथ झारखंड देवघर जिला शिवपुराण में 'वैद्यनाथं चिताभूमौ' ऐसा पाठ है, इसके अनुसार (झारखंड) राज्य के संथाल परगना क्षेत्र में जसीडीह स्टेशन के पास देवघर (वैद्यनाथधाम) नामक स्थान पर श्रीवैद्यनाथ ज्योतिर्लिङ्ग सिद्ध होता है, क्योंकि यही चिताभूमि है। महाराष्ट्र में पासे परभनी नामक जंक्शन है, वहां से परली तक एक ब्रांच लाइन गयी है, इस परली स्टेशन से थोड़ी दूर पर परली ग्राम के निकट श्रीवैद्यनाथ को भी ज्योतिर्लिङ्ग माना जाता है। परंपरा और पौराणिक कथाओं से देवघर स्थित श्रीवैद्यनाथ ज्योतिर्लिङ्ग को ही प्रमाणिक मान्यता है।
१० नागेश्वर गुजरात दारुकावन,द्वारका श्रीनागेश्वर ज्योतिर्लिङ्ग बड़ौदा क्षेत्रांतर्गत गोमती द्वारका से ईशानकोण में बारह-तेरह मील की दूरी पर है। निजाम हैदराबाद राज्य के अन्तर्गत औढ़ा ग्राम में स्थित शिवलिङ्ग को ही कोई-कोई नागेश्वर ज्योतिर्लिङ्ग मानते हैं। कुछ लोगों के मत से अल्मोड़ा से 17 मील उत्तर-पूर्व में यागेश (जागेश्वर) शिवलिङ्ग ही नागेश ज्योतिर्लिङ्ग है।
११ रामेश्वर तमिल नाडु रामेश्वरम श्रीरामेश्वर तीर्थ तमिलनाडु प्रांत के रामनाड जिले में है। यहाँ लंका विजय के पश्चात भगवान श्रीराम ने अपने अराध्यदेव शंकर की पूजा की थी। ज्योतिर्लिंग को श्रीरामेश्वर या श्रीरामलिंगेश्वर के नाम से जाना जाता है।.
१२ घृष्णेश्वर महाराष्ट्र निकटएल्लोरा,औरंगाबाद जिला श्रीघुश्मेश्वर (गिरीश्नेश्वर) ज्योतिर्लिंग को घुसृणेश्वर या घृष्णेश्वर भी कहते हैं। इनका स्थान महाराष्ट्र प्रांत में दौलताबादस्टेशन से बारह मील दूर बेरूल गांव के पास है।
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