3>|| **झारखंड के रामगढ़शिव***(1 to 5 )
1>------------झारखंड के रामगढ़ जिला में स्थित भगवान शिव का
ऐसा शिव मंदिर जहां पर भक्त नहीं स्वयं गंगा करती है जलाभिषेक
2>------------तेरा दर्शण पाने को जी चाहता हैं।
3>----------मंढीप बाबा शिवलिंग दर्शन के लिए पार करनी पड़ती है एक ही नदी 16 बार
4>-----------पाताल में धंस रहा है ये शिवलिंग
5>-----------जब यमराज के एक भूल ने बना दिया महादेव शिव को ”कालांतक” !
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1>झारखंड के रामगढ़ जिला में स्थित भगवान शिव का
ऐसा शिव मंदिर जहां पर भक्त नहीं स्वयं गंगा करती है जलाभिषेक
शिव जी जिन्हे कई नामों से जाना जाता है। साथ ही शिव जी को बैरागी कहा गया है इस लिए उन्हें आम ज़िन्दगी में इस्तेमाल होने वाली चीज़ें नहीं चढ़ाई जाती हैं। भगवान भोलेनाथ को खुश करने के लिए आप उन्हें भांग-धतूरा, दूध, चंदन, और भस्म साथ ही गंगाजल से जलाभिषेक करने से वह जल्द प्रसन्न होते है।
किसी भी कार्य, परेशानी या कोई भी समस्या हो तो सबसे पहले भगवान को याद किया जाता है जिसके लिए न जाने कितने हवन, पूजा-पाठ करते है जिससे कि घर में सुख- शांति आए। हम भगवान की पूजा तो सच्चे मन से करते है, लेकिन उसका फल आपको इच्छानुसार नही मिलता है।
कोई भी अवसर हो हम भोले बाबा का जलाभिषेक जरुर करते है, लेकिन आप जानते है कि एक ऐसी जगह है जहां पर भक्तगण नहीं स्वयं गंगा माता अभिषेक करती है। जी हां चौक गए न लेकिन यह सच है कि झारखंड के रामगढ़ में एक ऐसा मंदिर है। जहां पर माता गंगा स्वयं जलाभिषेक करती है।
यह मंदिर लोगों के लिए एर रहस्यमयी मंदिर माना जाता है। क्योंकि इस मंदिर के शिंवलिंग में स्वयं माता गंगा अपना जल गिराती है। वो भी पूरे 24 घंटे जलाभिषेक करती है। इस मंदिर को टूटी झरना मंदिर नाम से जाना जाता है। इस मंदिर की पूजा सदियों से चली आ रही है। इस मंदिर के बारें में हमारे पुराणों में कहा गया है।
झारखंड के रामगढ़ जिला में स्थित भगवान शिव का यह प्राचीन मंदिर हा। जहां पर भक्तगण बहुत ही दूर-दूर से यहां पर आते है। इस मंदिर का इतिहास सन 1925 से ही जुड़ा हुआ है। कहा जाता है कि एक बार अंग्रेज इस इलाके में रेल की पटरी बिछाने आए थे।
पानी के लिए खुदाई के दौरान उन्हें जमीन के अन्दर कुछ गुम्बदनुमा चीज दिखाई पड़ा। जिसके कारण अंग्रेजों ने इस जगह की पूरी खुदाई की। जब ये शिवलिंग उन्हे नंजर आया । साथ ही इस मंदिक के अंदर शिवलिंग के ठीक ऊपर मां गंगा की सफेद रंग की प्रतिमा मिली। प्रतिमा के नाभी से आपरूपी जल निकलता रहता है जो उनके दोनों हाथों की हथेली से गुजरते हुए शिव लिंग पर गिरता है।
मंदिर की खासियत यह है कि यहां जलाभिषेक साल के बारह महिने और 24 घंटे होता है। जिसके कारण भक्तगण सच्चे दिल से इस मंदिर में जाकर भगवान की पूजा-अर्चना करते है। जिससे भगवान शिव उनकी हर मनोकामना को पूरा करते है।
साथ ही यह प्रसाद के रुप में भक्त शिवलिंग पर गिरने वाले जल को प्रसाद के रूप में ग्रहण करते हैं और इसे अपने घर ले जाकर रख लेते हैं। माना जाता है कि इस जल में इतनी शक्तियां समाहित हैं कि इसे ग्रहण करने के साथ ही मन शांत हो जाता है। साथ ही सभी परेशानी दूर हो जाती है।
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2> तेरा दर्शण पाने को जी चाहता हैं।
तेरा दर्श पाने को जी चाहता है। // खुदी को मिटाने का जी चाहता है॥
पिला दो मुझे मस्ती के प्याले। // मस्ती में आने को जी चाहता है॥
उठे गुरूजी तेरी मोहब्बत का दरिया // मेरा डूब जाने को जी चाहता है॥
यह दुनिया है एक नज़र का धोखा। // इसे ठुकराने को जी चाहता है....
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3>मंढीप बाबा शिवलिंग दर्शन के लिए पार करनी पड़ती है एक ही नदी 16 बार
छत्तीसगढ़ के राजनांदगांव जिले में घनघोर जंगलों के बीच गुफा में एक शिवलिंग स्थापित है, जिसे लोग मंढीप बाबा के नाम से जानते हैं। निर्जन स्थान में गुफा के ढा़ई सौ मीटर अंदर उस शिवलिंग को किसने और कब स्थापित किया यह कोई नहीं जानता। कहा जाता है कि वहां बाबा स्वयं प्रकट हुए हैं। यानी शिवलिंग का निर्माण प्राकृतिक रूप से हुआ है।
राजनांदगांव-कवर्धा मुख्य मार्ग पर स्थित गंडई से करीब 35 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है मंढीप गुफा। लेकिन यहां बाबा के दर्शन करने का मौका साल में एक ही दिन मिल सकता है, अक्षय तृतीया के बाद पड़ने वाले पहले सोमवार को। दिलचस्प बात ये है कि वहां जाने के लिए एक ही नदी को 16 बार लांघना पड़ता है। यह कोई अंधविश्वास नहीं है, बल्कि वहां जाने का रास्ता ही इतना घुमावदार है कि वह नदी रास्ते में 16 बार आती है।
साल में एक ही बार जाने के पीछे पुरानी परंपरा के अलावा कुछ व्यवहारिक कठिनाइयां भी हैं। बरसात में गुफा में पानी भर जाता है, जबकि ठंड के मौसम में खेती-किसानी में लोग वहां नहीं जाते। रास्ता भी इतना दुर्गम है कि सात-आठ किलोमीटर का सफर तय करने में घंटो लग जाते है। उसके बाद पैदल चलते समय पहले पहाड़ी पर चढ़ना पड़ता है और फिर उतरना, तब जाकर गुफा का दरवाजा मिलता है। यह घोर नक्सल इलाके में पड़ता है, इसलिए भी आम दिनों में लोग इधर नहीं आते।
हर साल अक्षय तृतीया के बाद पड़ने वाले पहले सोमवार के दिन गुफा के पास इलाके के हजारों लोग जुटते हैं। परंपरानुसार सबसे पहले ठाकुर टोला राजवंश के लोग पूजा करने के बाद गुफा में प्रवेश करते हैं। उसके बाद आम दर्शनार्थियों को प्रवेश करने का मौका मिलता है। गुफा के डेढ़-दो फीट के रास्ते में घुप अंधेरा रहता है। लोग काफी कठिनाई से रौशनी कीव्यवस्था साथ लेकर बाबा के दर्शन के लिए अंदर पहुंचते हैं। गुफा में एक साथ 500-600 लोग प्रवेश कर जाते हैं।
गुफा के अंदर जाने के बाद उसकी कई शाखाएं मिलती हैं, इसलिए अनजान आदमी को भटक जाने का डर बना रहता है। ऐसा होने के बाद शिवलिंग तक पहुंचने में चार-पांच घंटे का समय लग जाता है।
स्थानीय महंत राधा मोहन वैष्णव का कहना है मैकल पर्वत पर स्थित इस गुफा का एक छोर अमरकंटक में है। हालांकि उन्होंने यह भी कहा कि आज तक कोई वहां तक नहीं पहुंच पाया है, लेकिन बहुत पहले पानी के रास्ते एक कुत्ता छोड़ा गया था, जो अमरकंटक में निकला। अमरकंट यहां से करीब पांच सौ किलोमीटर दूर है।
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4>पाताल में धंस रहा है ये शिवलिंग
महादेव का यह मंदिर कांगड़ा घाटी के परागपुर गांव में स्थित है।
भारत में कई महादेव के मंदिर हैं और सबका अपना एक खास महत्व भी है। लेकिन एक ऐसा मंदिर भी है जहां पर शिव लिंग जो हर साल पताल में समा रहा है। इसका रहस्य आज तक कोई नही समझ पाया है। आखिर मंदिर में शिवलिंग कैसे अपने आप जमीन में समा रहा है और इसका कारण क्या है यह आज तक अपने आप में एक पहेली बना हुआ है। लेकिन इस मंदिर को लेकर एक यह मान्यता है की जिस दिन पाप बढ़ जाएगा उस दिन यह शिवलिंग पताल लोक में समा जायेगा ।
महादेव का यह मंदिर कांगड़ा घाटी के परागपुर गांव में स्थित है। इसे मंदिर में शिव भगवान को महाकालेश्वर के नाम से जाना जाता है। इस मंदिर की शिवलिंग हर साल जमीन में धस रहा है और कहतें हैं की जब पृथ्वी पर पाप जब अपने चरम पर होगा तो यह शिवलिंग पाताल में समाहित हो जाएगा। एक मान्यता के अनुसार इस मंदिर से पताला में जाने का रास्ता छीपा है। जिसका आज से पहले ऋषि मुनि उपयोग किया करते थे। लेकिन शिवलिंग जिस तरह से धस रहा है उसे देख के आश्चर्य होता है।
कहा जाता है की इस मंदिर में खुद रावण भगवान शिव को खुश करने के लिए जल चढ़ाने आता था। लेकिन आप को जानकर हैरानी होगी की मंदिर के गुप्त मार्ग भी है जिसके जरिये पांडव भी दर्शन करने निकले थे। लेकिन आज भी मंदिर का रहस्य बरकरार है और लाखों सवाल लिए आज के आधुनिक युग को चुनौती दे रहा है। लेकिन इसका जवाब न तो विज्ञान के पास है और नही देखने वालों के पास लेकिन इस शिवलिंग का दर्शन करने आज भी लाखो भक्त यहां बड़ी आस्था से यहां आतें हैं।
4>पाताल में धंस रहा है ये शिवलिंग
महादेव का यह मंदिर कांगड़ा घाटी के परागपुर गांव में स्थित है।
भारत में कई महादेव के मंदिर हैं और सबका अपना एक खास महत्व भी है। लेकिन एक ऐसा मंदिर भी है जहां पर शिव लिंग जो हर साल पताल में समा रहा है। इसका रहस्य आज तक कोई नही समझ पाया है। आखिर मंदिर में शिवलिंग कैसे अपने आप जमीन में समा रहा है और इसका कारण क्या है यह आज तक अपने आप में एक पहेली बना हुआ है। लेकिन इस मंदिर को लेकर एक यह मान्यता है की जिस दिन पाप बढ़ जाएगा उस दिन यह शिवलिंग पताल लोक में समा जायेगा ।
महादेव का यह मंदिर कांगड़ा घाटी के परागपुर गांव में स्थित है। इसे मंदिर में शिव भगवान को महाकालेश्वर के नाम से जाना जाता है। इस मंदिर की शिवलिंग हर साल जमीन में धस रहा है और कहतें हैं की जब पृथ्वी पर पाप जब अपने चरम पर होगा तो यह शिवलिंग पाताल में समाहित हो जाएगा। एक मान्यता के अनुसार इस मंदिर से पताला में जाने का रास्ता छीपा है। जिसका आज से पहले ऋषि मुनि उपयोग किया करते थे। लेकिन शिवलिंग जिस तरह से धस रहा है उसे देख के आश्चर्य होता है।
कहा जाता है की इस मंदिर में खुद रावण भगवान शिव को खुश करने के लिए जल चढ़ाने आता था। लेकिन आप को जानकर हैरानी होगी की मंदिर के गुप्त मार्ग भी है जिसके जरिये पांडव भी दर्शन करने निकले थे। लेकिन आज भी मंदिर का रहस्य बरकरार है और लाखों सवाल लिए आज के आधुनिक युग को चुनौती दे रहा है। लेकिन इसका जवाब न तो विज्ञान के पास है और नही देखने वालों के पास लेकिन इस शिवलिंग का दर्शन करने आज भी लाखो भक्त यहां बड़ी आस्था से यहां आतें हैं।
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5>जब यमराज के एक भूल ने बना दिया महादेव शिव को ”कालांतक” !
मह्रिषी भृगु के परिवार में जन्म लेने वाले महान ऋषि मार्कण्डेय भगवान शिव और ब्र्ह्मा को अपना आराध्य देव मानते थे. मह्रिषी मार्कण्डेय का जिक्र विभिन्न पुराणों में कई बार किया गया है. ऋषि मार्कण्डेय और संत जैमनी के बीच हुए संवाद के आधार पर ही प्रसिद्ध ग्रन्थ मार्कण्डेय पुराण के स्थापना हुई.
प्रसिद्ध धार्मिक ग्रन्थ भगवत पुराण भी मार्कण्डेय ऋषि के अनेको प्रार्थनाओं तथा उपदेशों पर आधारित है.मार्कण्डेय ऋषि का संपूर्ण जीवन अपने आप में एक शिक्षा है, इनके बारे में बहुत सी बातें हम सुनते-कहते आए हैं. यहां हम आपको उनके जीवन से जुड़ी एक ऐसी घटना के बारे में बताएंगे, जिनसे शायद आप अवगत नहीं हैं.
ऋषि मृकण्डु और उनकी पत्नी पुत्र रत्न की प्राप्ति के लिए भगवान शिव की तपस्या करी. भगवान शिव ने प्रसन्न होकर उन्हें दर्शन दिए तथा वरदान मांगने के लिए कहा. तब ऋषि मृकण्डु और उनकी पत्नी ने भगवान शिव के समक्ष अपने पुत्र प्राप्ति की इच्छा रखी.
भगवान शिव ने उन्हें वरदान देने से पूर्व एक शर्त रखी की यदि तुम्हे बुद्धिमान तथा तीव्र बुद्धि वाला बालक चाहिए तो उसकी आयु अल्प होगी तथा वह कम आयु में ही मृत्यु को प्राप्त हो जाएगा , परन्तु यदि तुम्हे दीर्घ आयु का पुत्र चाहिए तो वह मंद बुद्धि होगा
.
ऋषि मृकण्डु तथा उनकी पत्नी दोनों ने अल्प आयु परन्तु बुद्धिमान पुत्र की कामना भगवान शिव से की. भगवान शिव के आशीर्वाद से उनके आश्रम में मार्कण्डेय नाम का विलक्षण एवं तीव्र बुद्धि वाले बालक ने जन्म लिया. मार्कण्डेय की आयु सिर्फ 16 वर्ष की ही थी. जैसे-जैसे मार्कण्डेय बड़ा हुआ उसका भगवान शिव के प्रति समपर्ण भी बढ़ता गया.
जब मार्कण्डेय के मृत्यु का दिन निश्चित था उस दिन भी वे भगवान शिव की पूजा में लीन थे. मार्कण्डेय का भगवान शिव की पूजा में पूरी तरह लीन होने के कारण यमदूत भी उनकी पूजा में विघ्न डालने में असफल रहे.
यमदूतों के उनके कार्य में सफल न हो पाने के कारण स्वयं यमराज को पृथ्वी लोक में आना पड़ा. उन्होंने मार्कण्डेय को अपने पास में फ़साने के लिए उसका फंदा बनाकर उस पर डाला परन्तु वह गलती से भगवान शिव पर जा लगा.
इस पर भगवान शिव को यमराज पर क्रोध आ गया तथा वे अपने रूद्र रूप में वहां पर प्रकट हुए. रूद्र रूप में भगवान शिव का यमराज के साथ बहुत भयंकर युद्ध हुआ जिसमे यमराज को पराजय का सामना करना पड़ा.
तब भगवान शिव ने यमराज से एक शर्त रखी की उनका भक्त मार्कण्डेय अमर रहेगा. इस घटना के बाद से ही महादेव शिव ”कालांतक” नाम से जाने जाने लगे. कालांतक शब्द का अर्थ होता है काल यानि जो मृत्यु का भी अंत कर दे.
सती पुराण में भी यह उल्लेखित है की स्वयं देवी पार्वती ने ऋषि मार्कण्डेय को वरदान दिया था की केवल वही उनके वीर चरित्र को लिख पाएंगे. इस लेख को दुर्गा सप्तशती के नाम से जाना जाता है जो की मार्कण्डेय पुराण का एक अहम भाग माना जाता है.
अगला पेज
भगवत पुराण के अनुसार एक बार ऋषि नारायण ऋषि मार्कण्डेय के पास आये तथा उनसे वरदान मांगने को कहा. ऋषि नारायण को साक्षात भगवान विष्णु का अवतार माना जाता है. ऋषि नारयण के ऐसा कहने पर ऋषि मार्कण्डेय ने उनसे अपनी चमत्कारी शक्तियां दिखाने को कहा.
उनकी इस इच्छा पर भगवान नारायण ने एक पत्ते पर बालक का रूप धारण किया तथा कहा की ये समय और मृत्यु है. ऋषि मार्कण्डेय उस बालक के मुख के अंदर चले गए तथा वहां जाकर उन्होंने बर्ह्माण्ड का अद्भुत नजारा देखा.
भगवान नारायण के बालक रूप के मुंह के अंदर जब वे पेट की ओर पहुंचे तो उन्हें वहां नदी, पहाड़, झरने सब कुछ दिखाई दिए. कुछ देर बाद जब ऋषि मार्कण्डेय ने उनके पेट से बाहर आने की सोची तो उन्हें कोई रास्त समझ नहीं आया. तब उन्होंने भगवान विष्णु की प्राथना करनी शुरू कर दी तथा कुछ देर बाद वे बालक के पेट से बाहर निकाल आये.
इसके बाद उन्हें भगवान विष्णु का करीब 1000 साल तक सानिध्य प्राप्त हुआ. भगवान विष्णु के साथ रहकर ऋषि मार्कण्डेय ने जो अनुभव प्राप्त किये उसके आधार पर उन्होंने ”बालक मुकुंदष्टकम” ग्रन्थ की रचना करी.
5>जब यमराज के एक भूल ने बना दिया महादेव शिव को ”कालांतक” !
मह्रिषी भृगु के परिवार में जन्म लेने वाले महान ऋषि मार्कण्डेय भगवान शिव और ब्र्ह्मा को अपना आराध्य देव मानते थे. मह्रिषी मार्कण्डेय का जिक्र विभिन्न पुराणों में कई बार किया गया है. ऋषि मार्कण्डेय और संत जैमनी के बीच हुए संवाद के आधार पर ही प्रसिद्ध ग्रन्थ मार्कण्डेय पुराण के स्थापना हुई.
प्रसिद्ध धार्मिक ग्रन्थ भगवत पुराण भी मार्कण्डेय ऋषि के अनेको प्रार्थनाओं तथा उपदेशों पर आधारित है.मार्कण्डेय ऋषि का संपूर्ण जीवन अपने आप में एक शिक्षा है, इनके बारे में बहुत सी बातें हम सुनते-कहते आए हैं. यहां हम आपको उनके जीवन से जुड़ी एक ऐसी घटना के बारे में बताएंगे, जिनसे शायद आप अवगत नहीं हैं.
ऋषि मृकण्डु और उनकी पत्नी पुत्र रत्न की प्राप्ति के लिए भगवान शिव की तपस्या करी. भगवान शिव ने प्रसन्न होकर उन्हें दर्शन दिए तथा वरदान मांगने के लिए कहा. तब ऋषि मृकण्डु और उनकी पत्नी ने भगवान शिव के समक्ष अपने पुत्र प्राप्ति की इच्छा रखी.
भगवान शिव ने उन्हें वरदान देने से पूर्व एक शर्त रखी की यदि तुम्हे बुद्धिमान तथा तीव्र बुद्धि वाला बालक चाहिए तो उसकी आयु अल्प होगी तथा वह कम आयु में ही मृत्यु को प्राप्त हो जाएगा , परन्तु यदि तुम्हे दीर्घ आयु का पुत्र चाहिए तो वह मंद बुद्धि होगा
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ऋषि मृकण्डु तथा उनकी पत्नी दोनों ने अल्प आयु परन्तु बुद्धिमान पुत्र की कामना भगवान शिव से की. भगवान शिव के आशीर्वाद से उनके आश्रम में मार्कण्डेय नाम का विलक्षण एवं तीव्र बुद्धि वाले बालक ने जन्म लिया. मार्कण्डेय की आयु सिर्फ 16 वर्ष की ही थी. जैसे-जैसे मार्कण्डेय बड़ा हुआ उसका भगवान शिव के प्रति समपर्ण भी बढ़ता गया.
जब मार्कण्डेय के मृत्यु का दिन निश्चित था उस दिन भी वे भगवान शिव की पूजा में लीन थे. मार्कण्डेय का भगवान शिव की पूजा में पूरी तरह लीन होने के कारण यमदूत भी उनकी पूजा में विघ्न डालने में असफल रहे.
यमदूतों के उनके कार्य में सफल न हो पाने के कारण स्वयं यमराज को पृथ्वी लोक में आना पड़ा. उन्होंने मार्कण्डेय को अपने पास में फ़साने के लिए उसका फंदा बनाकर उस पर डाला परन्तु वह गलती से भगवान शिव पर जा लगा.
इस पर भगवान शिव को यमराज पर क्रोध आ गया तथा वे अपने रूद्र रूप में वहां पर प्रकट हुए. रूद्र रूप में भगवान शिव का यमराज के साथ बहुत भयंकर युद्ध हुआ जिसमे यमराज को पराजय का सामना करना पड़ा.
तब भगवान शिव ने यमराज से एक शर्त रखी की उनका भक्त मार्कण्डेय अमर रहेगा. इस घटना के बाद से ही महादेव शिव ”कालांतक” नाम से जाने जाने लगे. कालांतक शब्द का अर्थ होता है काल यानि जो मृत्यु का भी अंत कर दे.
सती पुराण में भी यह उल्लेखित है की स्वयं देवी पार्वती ने ऋषि मार्कण्डेय को वरदान दिया था की केवल वही उनके वीर चरित्र को लिख पाएंगे. इस लेख को दुर्गा सप्तशती के नाम से जाना जाता है जो की मार्कण्डेय पुराण का एक अहम भाग माना जाता है.
अगला पेज
भगवत पुराण के अनुसार एक बार ऋषि नारायण ऋषि मार्कण्डेय के पास आये तथा उनसे वरदान मांगने को कहा. ऋषि नारायण को साक्षात भगवान विष्णु का अवतार माना जाता है. ऋषि नारयण के ऐसा कहने पर ऋषि मार्कण्डेय ने उनसे अपनी चमत्कारी शक्तियां दिखाने को कहा.
उनकी इस इच्छा पर भगवान नारायण ने एक पत्ते पर बालक का रूप धारण किया तथा कहा की ये समय और मृत्यु है. ऋषि मार्कण्डेय उस बालक के मुख के अंदर चले गए तथा वहां जाकर उन्होंने बर्ह्माण्ड का अद्भुत नजारा देखा.
भगवान नारायण के बालक रूप के मुंह के अंदर जब वे पेट की ओर पहुंचे तो उन्हें वहां नदी, पहाड़, झरने सब कुछ दिखाई दिए. कुछ देर बाद जब ऋषि मार्कण्डेय ने उनके पेट से बाहर आने की सोची तो उन्हें कोई रास्त समझ नहीं आया. तब उन्होंने भगवान विष्णु की प्राथना करनी शुरू कर दी तथा कुछ देर बाद वे बालक के पेट से बाहर निकाल आये.
इसके बाद उन्हें भगवान विष्णु का करीब 1000 साल तक सानिध्य प्राप्त हुआ. भगवान विष्णु के साथ रहकर ऋषि मार्कण्डेय ने जो अनुभव प्राप्त किये उसके आधार पर उन्होंने ”बालक मुकुंदष्टकम” ग्रन्थ की रचना करी.
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