Friday, March 11, 2016

6> || *शिवरात्रि - ***( 1 to 8 )

6>শিব=Post=6***शिवरात्रि - ***( 1 to 7 ) 

1>शिवरात्रि -------07--03--2016 इस साल सोमबार के दिन शिवरात्रि।
                                ए एक सुंदर एबं महा जोग।
2>बहुत ही महत्वपूर्ण है भगवान शिव से जुड़े यह सात रहस्य !
3>महादेव शिव के अस्त्र त्रिशूल से जुड़े इन गुप्त एवं गहरे राज को जान हैरान रह
                                                जायेंगे आप ! Nu

4>जाने कैलाश पर्वत एवं शिवलिंग में स्थापित आश्चर्यचकित करने वाले
                                            अलौकिक शक्तियों का वैज्ञानिक सत्य !
5>क्यों खोला था शिव ने अपना तीसरा नेत्र, क्या है तीसरे नेत्र का रहस्य?
6>कौन हैं शिव
7>भगवान शिव के ग्यारह रुद्र रूप
8>শিবরাত্রি  ব্রত = তথা মহা শিবরাত্রি ব্রত।


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1>शिवरात्रि -------07--03--2016 इस साल सोमबार के दिन शिवरात्रि।
                                ए एक सुंदर एबं महा जोग। 
     इस बारे में कुंछ लिखने के इच्छा हुआ ,अतः लिख ने के प्रयास कर रहा हूँ।

 प्रत्येक माह में शिवरात्रि की तिथि होती है। लेकिन फाल्गुन माह के कृष्ण पक्ष त्रयोदशी को भगवान शिव का वरदान प्राप्त है और यह तिथि भगवान शिव की पूजा-अर्चना के लिए समर्पित मानी गई है। ज्योतिषाचार्यों के मुताबिक महाशिवरात्रि अद्भुत संयोग लेकर आ रही है। इस बार महाशिवरात्रि का पर्व सोमवार को मनाया जाएगा। वर्षों बाद इस तरह का संयोग निर्मित हुआ है। इसलिए इस महाशिवरात्रि का महत्व कई गुना अधिक होगा।

सोमवार का दिन महादेव की आराधना का महत्वपूर्ण दिन होता है, इसलिए यह तिथि अपने आप में ही श्रेष्ठ मानी जाती है। महाशिवरात्रि फाल्गुन कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी की तिथि घनिष्ठा नक्षत्र में मनाई जाएगी। सात मार्च को महाशिवरात्रि के दिन सोमवार पड़ रहा है। इस वर्ष महाशिवरात्रि का यह अद्भुत संयोग महादेव की आराधना के लिए सर्वोत्तम होगा।
सिंहस्थ योग का पुण्य: सालों बाद सिंहस्थ का योग निर्मित हुआ है। देव गुरु बृहस्पति सिंह राशि में गोचर करेंगे। इस प्रकार से यह तिथि धार्मिक कार्यों की दृष्टि से खास है। इस दौरान महाशिवरात्रि की पूजा करने से भगवान प्रसन्न होंगे साथ ही अपने भक्तों पर विशेष कृपा करेंगे।

रात्रि जागरण का महत्व: महाशिवरात्रि का पर्व दिन भर पूजन के साथ ही रात भर महादेव की भक्ति करने का होता है। महाशिवरात्रि का अर्थ ही होता है रात्रि में जागरण कर शिव की आराधना करना। महाशिवरात्रि की तिथि को रात में भजन-कीर्तन, शिव नाम जाप करने से भक्तों के कष्टों का अंत होगा।

चंद्र दोष से मुक्ति
सोमवार को महाशिवरात्रि की तिथि होने से जिन राशि के जातकों की कुंडली में चंद्र देव की स्थिति कमजोर है वे जातक रात में दुग्ध से चंद्र देव को अघ्र्य अर्पित करते हुए आराधना कर इस दोष से मुक्ति प्राप्त कर सकते हैं।
राशि के मुताबिक करें पूजा

मेष- इस राशि के जातकों को जल से महादेव का अभिषेक करना चाहिए।
वृषभ- गंगा जल मिश्रित जल अथवा गंगा जल महादेव को करे अर्पित।
मिथुन- भगवान को बेलपत्र अर्पित करें।
कर्क- दूध से महादेव के शिवलिंग का अभिषेक करें।
सिंह- अनार का रस अर्पित करते हुए महादेव का अभिषेक करें।
कन्या- भगवान शिव को गन्ने के रस से स्नान कराए।
तुला- इस राशि के जातक चांदी से निर्मित सर्प महादेव को अर्पित करें।
वृश्चिक- लाल वस्त्र अर्पित करें।
धनु- केशर युक्त दूध अर्पित करें।
मकर व कुंभ- महादेव का अभिषेक कर काले तिल अर्पित करें।
मीन- पीले पदार्थो का भोग लगाएं।
भगवान शिव की वेशभूषा के 15 रहस्य...

✔ चन्द्रमा : शिव का एक नाम 'सोम' भी है। सोम का अर्थ चन्द्र होता है। उनका दिन सोमवार है। चन्द्रमा मन का कारक है। शिव द्वारा चन्द्रमा को धारण करना मन के नियंत्रण का भी प्रतीक है। हिमालय पर्वत और समुद्र से चन्द्रमा का सीधा संबंध है।

चन्द्र कला का महत्व : मूलत: शिव के सभी त्योहार और पर्व चान्द्रमास पर ही आधारित होते हैं। शिवरात्रि, महाशिवरात्रि आदि शिव से जुड़े त्योहारों में चन्द्र कलाओं का महत्व है।

कई धर्मों का प्रतीक चिह्न : यह अर्द्धचन्द्र शैवपंथियों और चन्द्रवंशियों के पंथ का प्रतीक चिह्न है। मध्य एशिया में यह मध्य एशियाई जाति के लोगों के ध्वज पर बना होता था। चंगेज खान के झंडे पर अर्द्धचन्द्र होता था। इस्लाम का प्रतीक चिह्न है अर्द्धचन्द्र। इस अर्धचंद्र का ध्वज पर होने का अपना ही एक अलग इतिहास है।

चन्द्रदेव से संबंध : भगवान शिव के सोमनाथ ज्योतिर्लिंग के बारे में मान्यता है कि भगवान शिव द्वारा सोम अर्थात चन्द्रमा के श्राप का निवारण करने के कारण यहां चन्द्रमा ने शिवलिंग की स्थापना की थी। इसी कारण इस ज्योतिर्लिंग का नाम 'सोमनाथ' प्रचलित हुआ।

✔ त्रिशूल : भगवान शिव के पास हमेशा एक त्रिशूल ही होता था। यह बहुत ही अचूक और घातक अस्त्र था। इसकी शक्ति के आगे कोई भी शक्ति ठहर नहीं सकती।

त्रिशूल 3 प्रकार के कष्टों दैनिक, दैविक,भौतिक के विनाश का सूचक भी है। इसमें 3तरह की शक्तियां हैं- सत, रज और तम। प्रोटॉन, न्यूट्रॉन और इलेक्ट्रॉन।

त्रिशूल के 3 शूल सृष्टि के क्रमशः उदय,संरक्षण और लयीभूत होने का प्रतिनिधित्व करते भी हैं। शैव मतानुसार शिव इन तीनों भूमिकाओं के अधिपति हैं। यह शैव सिद्धांत के पशुपति, पशु एवं पाश का प्रतिनिधित्व करता है।

माना जाता है कि यह महाकालेश्वर के 3कालों (वर्तमान, भूत, भविष्य) का प्रतीक भी है। इसके अलावा यह स्वपिंड, ब्रह्मांड और शक्ति का परम पद से एकत्व स्थापित होने का प्रतीक है। यह वाम भाग में स्थिर इड़ा, दक्षिण भाग में स्थित पिंगला तथा मध्य देश में स्थित सुषुम्ना नाड़ियों का भी प्रतीक है।

शिव का सेवक वासुकि : शिव को नागवंशियों से घनिष्ठ लगाव था। नाग कुल के सभी लोग शिव के क्षेत्र हिमालय में ही रहते थे। कश्मीर का अनंतनाग इन नागवंशियों का गढ़ था। नाग कुल के सभी लोग शैव धर्म का पालन करते थे। भगवान शिव के नागेश्वर ज्योतिर्लिंग नाम से स्पष्ट है कि नागों के ईश्वर होने के कारण शिव का नाग या सर्प से अटूट संबंध है। भारत में नागपंचमी पर नागों की पूजा की परंपरा है।

विरोधी भावों में सामंजस्य स्थापित करने वाले शिव नाग या सर्प जैसे क्रूर एवं भयानक जीव को अपने गले का हार बना लेते हैं। लिपटा हुआ नाग या सर्प जकड़ी हुई कुंडलिनी शक्ति का प्रतीक है।

नागों के प्रारंभ में 5 कुल थे। उनके नाम इस प्रकार हैं- शेषनाग (अनंत), वासुकि, तक्षक,पिंगला और कर्कोटक। ये शोध के विषय हैं कि ये लोग सर्प थे या मानव या आधे सर्प और आधे मानव? हालांकि इन सभी को देवताओं की श्रेणी में रखा गया है, तो निश्‍चित ही ये मनुष्य नहीं होंगे।

नाग वंशावलियों में 'शेषनाग' को नागों का प्रथम राजा माना जाता है। शेषनाग को ही'अनंत' नाम से भी जाना जाता है। ये भगवान विष्णु के सेवक थे। इसी तरह आगे चलकर शेष के बाद वासुकि हुए, जो शिव के सेवक बने। फिर तक्षक और पिंगला ने राज्य संभाला। वासुकि का कैलाश पर्वत के पास ही राज्य था और मान्यता है कि तक्षक ने ही तक्षकशिला (तक्षशिला) बसाकर अपने नाम से 'तक्षक' कुल चलाया था। उक्त पांचों की गाथाएं पुराणों में पाई जाती हैं।

उनके बाद ही कर्कोटक, ऐरावत, धृतराष्ट्र,अनत, अहि, मनिभद्र, अलापत्र, कंबल,अंशतर, धनंजय, कालिया, सौंफू, दौद्धिया,काली, तखतू, धूमल, फाहल, काना इत्यादि नाम से नागों के वंश हुए जिनके भारत के भिन्न-भिन्न इलाकों में इनका राज्य था।

✔ डमरू : सभी हिन्दू देवी और देवताओं के पास एक न एक वाद्य यंत्र रहता है। उसी तरह भगवान के पास डमरू था, जो नाद का प्रतीक है। भगवान शिव को संगीत का जनक भी माना जाता है। उनके पहले कोई भी नाचना, गाना और बजाना नहीं जानता था। भगवान शिव दो तरह से नृत्य करते हैं- एक तांडव जिसमें उनके पास डमरू नहीं होता और जब वे डमरू बजाते हैं तो आनंद पैदा होता है।

अब बात करते हैं नाद की। नाद अर्थात ऐसी ध्वनि, जो ब्रह्मांड में निरंतर जारी है जिसे'ॐ' कहा जाता है। संगीत में अन्य स्वर तो आते-जाते रहते हैं, उनके बीच विद्यमान केंद्रीय स्वर नाद है। नाद से ही वाणी के चारों रूपों की उत्पत्ति मानी जाती है- 1. पर, 2.पश्यंती, 3. मध्यमा और 4. वैखरी।

आहत नाद का नहीं अपितु अनाहत नाद का विषय है। बिना किसी आघात के उत्पन्न चिदानंद, अखंड, अगम एवं अलख रूप सूक्ष्म ध्वनियों का प्रस्फुटन अनाहत या अनहद नाद है। इस अनाहत नाद का दिव्य संगीत सुनने से गुप्त मानसिक शक्तियां प्रकट हो जाती हैं। नाद पर ध्यान की एकाग्रता से धीरे-धीरे समाधि लगने लगती है। डमरू इसी नाद-साधना का प्रतीक है।

✔ शिव का वाहन वृषभ : वृषभ शिव का वाहन है। वे हमेशा शिव के साथ रहते हैं। वृषभ का अर्थ धर्म है। मनुस्मृति के अनुसार'वृषो हि भगवान धर्म:'। वेद ने धर्म को 4 पैरों वाला प्राणी कहा है। उसके 4 पैर धर्म, अर्थ,काम और मोक्ष हैं। महादेव इस 4 पैर वाले वृषभ की सवारी करते हैं यानी धर्म, अर्थ,काम और मोक्ष उनके अधीन हैं।

एक मान्यता के अनुसार वृषभ को नंदी भी कहा जाता है, जो शिव के एक गण हैं। नंदी ने ही धर्मशास्त्र, अर्थशास्त्र, कामशास्त्र और मोक्षशास्त्र की रचना की थी।

✔ जटाएं : शिव अंतरिक्ष के देवता हैं। उनका नाम व्योमकेश है अत: आकाश उनकी जटास्वरूप है। जटाएं वायुमंडल की प्रतीक हैं। वायु आकाश में व्याप्त रहती है। सूर्य मंडल से ऊपर परमेष्ठि मंडल है। इसके अर्थ तत्व को गंगा की संज्ञा दी गई है अत: गंगा शिव की जटा में प्रवाहित है। शिव रुद्रस्वरूप उग्र और संहारक रूप धारक भी माने गए हैं।

✔ गंगा : गंगा को जटा में धारण करने के कारण ही शिव को जल चढ़ाए जाने की प्रथा शुरू हुई। जब स्वर्ग से गंगा को धरती पर उतारने का उपक्रम हुआ तो यह भी सवाल उठा कि गंगा के इस अपार वेग से धरती में विशालकाय छिद्र हो सकता है, तब गंगा पाताल में समा जाएगी।

ऐसे में इस समाधान के लिए भगवान शिव ने गंगा को सर्वप्रथम अपनी जटा में विराजमान किया और फिर उसे धरती पर उतारा। गंगोत्री तीर्थ इसी घटना का गवाह है।

✔ भभूत या भस्म : शिव अपने शरीर पर भस्म धारण करते हैं। भस्म जगत की निस्सारता का बोध कराती है। भस्म आकर्षण, मोह आदि से मुक्ति का प्रतीक भी है। देश में एकमात्र जगह उज्जैन के महाकाल मंदिर में शिव की भस्म आरती होती है जिसमें श्मशान की भस्म का इस्तेमाल किया जाता है।

यज्ञ की भस्म में वैसे कई आयुर्वेदिक गुण होते हैं। प्रलयकाल में समस्त जगत का विनाश हो जाता है, तब केवल भस्म (राख) ही शेष रहती है। यही दशा शरीर की भी होती है।

✔ तीन नेत्र : शिव को 'त्रिलोचन' कहते हैं यानी उनकी तीन आंखें हैं। प्रत्येक मनुष्य की भौहों के बीच तीसरा नेत्र रहता है। शिव का तीसरा नेत्र हमेशा जाग्रत रहता है, लेकिन बंद। यदि आप अपनी आंखें बंद करेंगे तो आपको भी इस नेत्र का अहसास होगा।

संसार और संन्यास : शिव का यह नेत्र आधा खुला और आधा बंद है। यह इसी बात का प्रतीक है कि व्यक्ति ध्यान-साधना या संन्यास में रहकर भी संसार की जिम्मेदारियों को निभा सकता है

त्र्यंबकेश्वर : त्र्यंबकेश्वर ज्योतिर्लिंग के व्युत्पत्यर्थ के संबंध में मान्यता है कि तीन नेत्रों वाले शिवशंभू के यहां विराजमान होने के कारण इस जगह को त्र्यंबक (तीन नेत्र) के ईश्वर कहा जाता है।

पीनिअल ग्लैंड : आध्यात्मिक दृष्टि से कुंडलिनी जागरण में एक चक्र को भेदने के बाद जब षट्चक्र पूर्ण हो जाता है तो इसके बाद आत्मा का तीसरा नेत्र मलशून्य हो जाता है। वह स्वच्छ और प्रसन्न हो जाता है।

कुमारस्वामी ने शिव के तीसरे नेत्र को प्रमस्तिष्क (सेरिब्रम) की पीयूष-ग्रंथि (पीनिअल ग्लैंड) माना है। पीयूष-ग्रंथि उन सभी ग्रंथियों पर नियंत्रण रखती है जिनसे उसका संबंध होता है। कुमारस्वामी ने पीयूष-ग्रंथि को जागृत, स्पंदित एवं विकसित करने की प्रक्रियाओं का विवेचन किया है।

✔ हस्ति चर्म और व्याघ्र चर्म : शिव अपनी देह पर हस्ति चर्म और व्याघ्र चर्म को धारण करते हैं। हस्ती अर्थात हाथी और व्याघ्र अर्थात शेर। हस्ती अभिमान का और व्याघ्र हिंसा का प्रतीक है अत: शिवजी ने अहंकार और हिंसा दोनों को दबा रखा है।

✔ शिव का धनुष पिनाक : शिव ने जिस धनुष को बनाया था उसकी टंकार से ही बादल फट जाते थे और पर्वत हिलने लगते थे। ऐसा लगता था मानो भूकंप आ गया हो। यह धनुष बहुत ही शक्तिशाली था। इसी के एक तीर से त्रिपुरासुर की तीनों नगरियों को ध्वस्त कर दिया गया था। इस धनुष का नाम पिनाक था। देवी और देवताओं के काल की समाप्ति के बाद इस धनुष को देवराज को सौंप दिया गया था।

उल्लेखनीय है कि राजा दक्ष के यज्ञ में यज्ञ का भाग शिव को नहीं देने के कारण भगवान शंकर बहुत क्रोधित हो गए थे और उन्होंने सभी देवताओं को अपने पिनाक धनुष से नष्ट करने की ठानी। एक टंकार से धरती का वातावरण भयानक हो गया। बड़ी मुश्किल से उनका क्रोध शांत किया गया, तब उन्होंने यह धनुष देवताओं को दे दिया।

देवताओं ने राजा जनक के पूर्वज देवराज को धनुष दे दिया। राजा जनक के पूर्वजों में निमि के ज्येष्ठ पुत्र देवराज थे। शिव-धनुष उन्हीं की धरोहरस्वरूप राजा जनक के पास सुरक्षित था। इस धनुष को भगवान शंकर ने स्वयं अपने हाथों से बनाया था। उनके इस विशालकाय धनुष को कोई भी उठाने की क्षमता नहीं रखता था। लेकिन भगवान राम ने इसे उठाकर इसकी प्रत्यंचा चढ़ाई और इसे एक झटके में तोड़ दिया।

✔ शिव का चक्र : चक्र को छोटा, लेकिन सबसे अचूक अस्त्र माना जाता था। सभी देवी-देवताओं के पास अपने-अपने अलग-अलग चक्र होते थे। उन सभी के अलग-अलग नाम थे। शंकरजी के चक्र का नाम भवरेंदु, विष्णुजी के चक्र का नाम कांता चक्र और देवी का चक्र मृत्यु मंजरी के नाम से जाना जाता था। सुदर्शन चक्र का नाम भगवान कृष्ण के नाम के साथ अभिन्न रूप से जुड़ा हुआ है।

यह बहुत कम ही लोग जानते हैं कि सुदर्शन चक्र का निर्माण भगवान शंकर ने किया था। प्राचीन और प्रामाणिक शास्त्रों के अनुसार इसका निर्माण भगवान शंकर ने किया था। निर्माण के बाद भगवान शिव ने इसे श्रीविष्णु को सौंप दिया था। जरूरत पड़ने पर श्रीविष्णु ने इसे देवी पार्वती को प्रदान कर दिया। पार्वती ने इसे परशुराम को दे दिया और भगवान कृष्ण को यह सुदर्शन चक्र परशुराम से मिला।

✔ त्रिपुंड तिलक : माथे पर भगवान शिव त्रिपुंड तिलक लगाते हैं। यह तीन लंबी धारियों वाला तिलक होता है। यह त्रिलोक्य और त्रिगुण का प्रतीक है। यह सतोगुण,रजोगुण और तमोगुण का प्रतीक भी है। यह त्रिपुंड सफेद चंदन का या भस्म का होता है।

त्रिपुंड दो प्रकार का होता है- पहला तीन धारियों के बीच लाल रंग का एक बिंदु होता है। यह बिंदु शक्ति का प्रतीक होता है। आम इंसान को इस तरह का त्रिपुंड नहीं लगाना चाहिए। दूसरा होता है सिर्फ तीन धारियों वाला तिलक या त्रिपुंड। इससे मन एकाग्र होता है।

✔ कान में कुंडल : शिव कुंडल : हिन्दुओं में एक कर्ण छेदन संस्कार है। शैव, शाक्त और नाथ संप्रदाय में दीक्षा के समय कान छिदवाकर उसमें मुद्रा या कुंडल धारण करने की प्रथा है। कर्ण छिदवाने से कई प्रकार के रोगों से तो बचा जा ही सकता है साथ ही इससे मन भी एकाग्र रहता है। मान्यता अनुसार इससे वीर्य शक्ति भी बढ़ती है।

कर्णकुंडल धारण करने की प्रथा के आरंभ की खोज करते हुए विद्वानों ने एलोरा गुफा की मूर्ति, सालीसेटी, एलीफेंटा, आरकाट जिले के परशुरामेश्वर के शिवलिंग पर स्थापित मूर्ति आदि अनेक पुरातात्विक सामग्रियों की परीक्षा कर निष्कर्ष निकाला है कि मत्स्येंद्र और गोरक्ष के पूर्व भी कर्णकुंडल धारण करने की प्रथा थी और केवल शिव की ही मूर्तियों में यह बात पाई जाती है।

भगवान बुद्ध की मूर्तियों में उनके कान काफी लंबे और छेदे हुए दिखाई पड़ते हैं। प्राचीन मूर्तियों में प्राय: शिव और गणपति के कान में सर्प कुंडल, उमा तथा अन्य देवियों के कान में शंख अथवा पत्र कुंडल और विष्णु के कान में मकर कुंडल देखने में आता है।

✔ रुद्राक्ष : माना जाता है कि रुद्राक्ष की उत्पत्ति शिव के आंसुओं से हुई थी। धार्मिक ग्रंथानुसार 21 मुख तक के रुद्राक्ष होने के प्रमाण हैं, परंतु वर्तमान में 14 मुखी के पश्चात सभी रुद्राक्ष अप्राप्य हैं। इसे धारण करने से सकारात्मक ऊर्जा मिलती है तथा रक्त प्रवाह भी संतुलित रहता है।महाशिवरात्रि इस बार सात मार्च को पंचग्रही व शिव योग में हर्षोल्लास से मनाया जाएगा। इस दिन कुंभ राशि में सूर्य, चंद्रमा, बुध, शुक्र व केतु, पांच ग्रह मिलन (युति) करेंगे। ज्योतिषाचार्यों के अनुसार स्थिर राशि कुंभ में पांच ग्रहों का यह योग महाशिवरात्रि पर चारों प्रहर की पूजा करने वाले शिव भक्तों को स्थिर लक्ष्मी व आरोग्यता प्रदान करेगा।

इस बार शैव और वैष्णव दोनों मतों के लोग एक ही दिन शिवरात्रि का पर्व मनाएंगे। महाशिवरात्रि पर पंचग्रही योग 18 साल बाद बन रहा है। इससे पूर्व यह विशेष योग 25 फरवरी 1998 में बना था। इसके बाद 9 मार्च 2024 को यह योग बनेगा।

भगवान शिव को प्रसन्न करने की रात

शैव व वैष्णव दोनों मतों के लोगों के एक ही दिन यह पर्व मनाने के कारण चार प्रहर की पूजा भी इसी दिन की जाएगी। भगवान शिव को प्रसन्न करने के लिए हर प्रहर में गन्ना, डाब (कुशा), दुग्ध, खस आदि का अभिषेक किया जाएगा। साथ ही रुद्र पाठ, शिव महिमन और तांडव स्त्रोत का पाठ होगा। षोड्षोपचार पूजन के साथ भगवान शिव को आक, धतूरा, भांग, बेर, गाजर चढ़ाया जाएगा। किसी व्यक्ति की कुंड़ली में राहु-केतु के मध्य में आने पर बनने वाला कालसर्प योग के निवारण के लिए भी विशेष पूजा की जाएगी।

चार प्रहर पूजन का समय इस बार 07/03/2016

प्रथम प्रहर : सायंकाल 6.27 से रात्रि 9.32 बजे तक
द्वितीय प्रहर : रात्रि 9.33 से 12.37 बजे तक
तृतीय प्रहर : मध्यरात्रि 12.38 से 3.42 बजे तक
चतुर्थ प्रहर : मध्यरात्रि बाद 3.43 से प्रात: 6.47 बजे तक
निशीथ काल : मध्यरात्रि 12.13 से 1.02 बजे तक
इस प्रकार पांच प्रहर तो रोजना होती हैं।
This timing event pl be follow by PONJIKA

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2>बहुत ही महत्वपूर्ण है भगवान शिव से जुड़े यह सात रहस्य !

एक परम दिव्य तत्व के तीन भाग ( ब्र्ह्मा, विष्णु, शिव ) का अंतिम भाग है भगवान शिव. महादेव शिव के गुण एवं उनकी अद्भुत महिमा अपरम्पार एवं अनन्त है. यदि हम सरल शब्दों में कहे तो भगवान शिव अव्यक्त एवं अनन्त स्वरूप के देवता है तथा उनके गुणों एवं महिमा की गिनती हम साधारण मनुष्यो के बस की बात नहीं .

स्वयं शास्त्रों में लिखी एक बात भगवान शिव के गुणों की अनन्ता को प्रदर्शित करती है. जिसके अनुसार यदि पर्वत जितना काजल लेकर, समुद्र रूपी दवात में रखे तथा कल्पवृक्ष को कलम बनाकर पृथ्वी रूपी कागज में स्वयं ज्ञान की देवी सरस्वती शिव के गुणों को लिखना प्रारम्भ करें तो भी भगवान शिव के गुणों एवं उनकी महिमा की गाथा का अंत नहीं होगा.

महादेव शिव के ऐसे ही गुणगान से जुडा उनका एक नाम बहुत ही अद्भुत एवं प्रभावकारी माना जाता है. यह नाम विशेषकर सावन के महीने भगवान शिव के हर भक्त के मुंह में होता है. भगवान शिव का वह पावन नाम है ”हर”. भगवान शिव के सभी भक्त हर हर महदेव का जयकार करते है.

हर शब्द से अभिप्राय है हरण करने वाला. पुराणों के अनुसार महादेव शिव तथा उनका परम नाम सभी भक्तो के दुःख को हर लेता है. बुद्धि, विचार, कर्म तथा वाणी से जुड़े हर पकार के दोष भगवान शिव के एक नाम ”हर” जपने से दूर हो जाते है . दूसरे शब्दों में भगवान शिव का यह नाम पाप, दोष तथा दुर्गुण आदि का निवारण करता है.
भगवान शिव की अपार महिमा तथा उनके वेशभूसा, श्रृंगार भगवान शिव को सबसे अनोखा एवं निराला बनाती है.
आइये जानते है सबसे निराले एवं रहस्मयी देवो के देव महादेव शिव से जुड़े साथ अनोखी बाते :-

सर्प :-

भगवान शिव सदैव अपने गले में सर्प धारण करते है जबकि वही अन्य सभी देवो के गलो में पुष्पों का हार होता है.

भगवान शिव के गले में सर्प धारण करने का अर्थ है जिन्हे संसार पसंद नहीं करता भगवान शिव उन्हें भी अपने गले से लगाते है. भगवान शिव हर प्राणी से प्यार करते है चाहे उसकी प्रकृति एवं स्वभाव कैसा ही क्यों न हो.

त्रिनेत्र :-

भगवान शिव त्रिनेत्रधारी है. सम्पूर्ण जगत भगवान शिव द्वारा रांची गई है इसके साथ ही भगवान शिव समय के भी रचियता है तथा वे काल से भी पर है. भगवान शिव भुत, भविष्य तथा वर्तमान तीनो के ज्ञाता है तथा उन्हें प्रत्यक्ष देख सकते है.

संसार जिस सत्य को अपनी आँखों के सामने होते हुए भी देख नहीं पाता वह सत्य कभी भी भगवान शिव के आँखों से औझल नहीं होती. क्योकि भगवान शिव ही इस समस्त संसार को बनाने वाले है.

डमरू :-

भगवान शिव जितने महान एवं परम योगी है, संगीत एवं नृत्य कला में भी वे उतने ही कुशल है. भगवान शिव के डमरू से निकली ध्वनि के नाध्य से ही संस्कृत भाषा के व्याकरण का जन्म हुआ था.

संस्कृत भाषा सभी भाषाओं की जननी है तथा ज्ञान विज्ञान का आधार है. तथा इससे यह अभिप्राय निकलता है की शिव के डमरू से ज्ञान विज्ञान, तकनीकी, चिकित्सा विज्ञान, सभ्यता एवं संस्कृति का उदय हुआ है.

त्रिशूल :-

महादेव शिव अपने एक हाथो से अपने भक्तो को वरदान देते है तो वही दूसरे हाथो से दुष्टों एवं पापियों का संहार भी करते है. भगवान शिव ने अपने त्रिशूल से कई असुरो एवं अत्याचारियो का संहार किया है.

महादेव शिव के त्रिशूल के तिन शुक्ल मनुष्य के भीतर से तीन ( भौतिक, दैहिक, देविक ) प्रकार के पाप निकालकर उनका जीवन सुखमय बनाने का प्रतीक है.

चन्द्रमा :-

शिव के श्रृंगार को और सुंदर बनाता है उनके मस्तक पर विराजमान चंद्रमा. ज्योतिष में चंद्रमा मन का कारक है और यह नए विचारों को उत्पन्न करता है.

नियंत्रण और सदुपयोग से मन मनुष्य को प्रगति की ओर लेकर जाता है तो अनियंत्रण से पतन की ओर. शिव ने इसे मस्तक पर धारण किया है. इसका मतलब है, उनका मन पर पूरा नियंत्रण है. स्वयं के मन पर भी और संसार के मन पर भी.

भस्म :-

महादेव शिव अपने शरीर में भस्म रमाते है यह प्रतीक है के मनुष्य का शरीर नाशवान है, तथा अंत में वह भगवान शिव में समा जाएगा. परन्तु इस सत्य को जानते हुए भी मनुष्य इससे अंजान होने का बहाना करता है और संसार की झूठी माया मोह में फसा रहता है.

भस्म का तातपर्य भगवान शिव के अमर होने तथा संसार के नाश्वान होने से है.

नंदी :-

भगवान शिव की सवारी है नंदी तथा भगवान शिव को बहुत प्रिय है. नंदी के नाम के संबंध में अनेक अर्थ जुड़े हुए है जो भगवान शिव की महिमा का गुणगान करते है. लेकिन इन सब में सबसे गहन अर्थ नंदी के पैरो से जुडा हुआ है.

नंदी के चार चरण है जिनकी सहायता से वह भगवान शिव को एक स्थान से दूसरे स्थान तक ले जाते है. ये चारो चरण मनुष्य की चार अवस्थाओं ( ब्रह्मचर्य, वामप्रस्थ, सन्यास, गृहस्थ ) और चार पुरुषार्थ ( धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष) को प्रदर्शित करते है.
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3>महादेव शिव के अस्त्र त्रिशूल से जुड़े इन गुप्त एवं गहरे राज को जान हैरान रह जायेंगे आप !

धार्मिक ग्रंथो में यह वर्णन मिलता है के इस सम्पूर्ण सृष्टि के संचालन का दायित्व त्रिदेवो (ब्र्ह्मा, विष्णु, महेश) के हाथो में है . ब्रह्म देव ने इस सृष्टि का निर्माण किया है, भगवान विष्णु इस सृष्टि के पालनकर्ता है तथा महादेव शिव संहारकर्ता है.

देवो के देव महादेव शिव अत्यन्त निराले तथा इसके साथ ही उनकी वेशभूषा भी अत्यन्त विचित्र है. भगवान शिव का प्रमुख अस्त्र त्रिशूल है. शिव शंकर के हाथ में मौजूद यह त्रिशूल अपने विषय में एक अलग ही कथा प्रस्तुत करता है.

कुछ लोग भगवान शिव के अस्त्र त्रिशूल को विनाश की निशानी मानते है. परन्तु वास्तव में भगवान शिव के त्रिशूल के रहस्य को समझपाना भगवान शिव के समान ही रहस्मयी एवं बहुत कठिन है.

हमारे हिन्दू धार्मिक पुराणों एवं ग्रंथो में अनेक गूढ़ रहस्य छिपे हुए है जिनमे से एक है भगवान शिव के हाथ में उपस्थित त्रिशूल.

आइये जानते है भगवान शिव के त्रिशूल से जुड़े अनोखे एवं रहस्मयी बाते.

भगवान शिव के त्रिशूल के संबंध में कहा जाता है की यह त्रिदेवो का प्रतीक ब्र्ह्मा, विष्णु, महेश है यानि इसे रचना, पालन एवं विनाश के रूप में देखा जाता है. इसे भुत, भविष्य तथा वर्तमान के साथ स्वर्ग, धरती तथा पाताल एवं इच्छा क्रिया एवं बुद्धि का प्रतीक भी माना जाता है.

इसके साथ ही हिन्दू धर्म में देवियो के हाथो में भी त्रिशूल देखा जाता है. देवी शक्ति दुष्टों का विनाश अपने शस्त्र त्रिशूल से करती है. अतः भगवान शिव के त्रिशूल को त्रिदेवियों माता लक्ष्मी, सरस्वती एवं पार्वती के प्रतीक के रूप में भी देखा जाता है.

ऐसा भी कहा जाता है की भगवान शिव के त्रिशूल का निर्माण भौतिक लोक, पूर्वजो की दुनिया तथा विचारों की दुनिया के सर्वविनाश के लिए हुआ था.

ताकि दुनिया में मनुष्य के बढ़ते पाप का विनाश कर एक नए आध्यात्मिक दुनिया का निर्माण हो सके ताकि सृष्टि में कोई पाप शेष ना रहे.

त्रिशूल, तीनों गुण सत, रज, तम का भी परिचायक है और त्रिशूल का शिव के हाथ में होने का अर्थ है कि भगवान तीनों गुणों से ऊपर है, वह निर्गुण है.

शिव का त्रिशूल पवित्रता एवं शुभकर्म का प्रतीक है तथा इसमें मनुष्य के अतीत, भविष्य तथा वर्तमान के कष्टों को दूर करने की ताकत होती है. इतना ही नहीं इसी के साथ हमारी आत्मा जन्म एवं मृत्यु के चक्र को छोड़ मोक्ष की प्राप्ति द्वारा ईश्वर का सानिध्य पा सकती है.

शिव के त्रिशूल में इंसानी मस्तिष्क और शरीर में व्याप्त विभिन्न बुराइयों और नकारात्मकता को समाप्त करने की भी ताकत है. मनुष्य शरीर में भी त्रिशूल, जहां तीन नाड़ियां मिलती हैं, मौजूद है और यह ऊर्जा स्त्रोतों, इड़ा, पिंगला और सुषुम्ना को दर्शाता है.

सुषुम्ना जो कि मध्य में है, को सातवां चक्र और ऊर्जा का केंद्र कहा जाता है. हमारे शरीर में एक स्थान ऐसा होता है जो बाहरी उठापटक को पूरी तरह नजरअंदाज करता है और यह तभी कार्य करता है जब सुषुम्ना तक ऊर्जा पहुंचने लगती है.

सुषुम्ना तक ऊर्जा पहुंचने के साथ ही जीवन की असली शुरुआत होती है. जब बाहर हो रही किसी भी तरह की गतिविधियों का प्रभाव मनुष्य के भीतर नहीं होता.

वहीं अन्य दो कोनों को इड़ा और पिंगला कहा जाता है. इड़ा और पिंगला को शिव और शक्ति का नाम भी दिया जाता है. इन्हें शिव और शक्ति का नाम लिंग के अनुसार नहीं बल्कि उनकी विेशेषताओं के आधार पर दिया गया है.
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4>जाने कैलाश पर्वत एवं शिवलिंग में स्थापित आश्चर्यचकित करने वाले अलौकिक शक्तियों का वैज्ञानिक सत्य !

सनातन धर्म के अनुसार जब सम्पूर्ण बर्ह्माण्ड में कुछ नहीं था तब ईश्वर ने स्वयं प्रकट होकर अपने में एक स्त्री शक्ति को स्थान देकर पृथक किया. ईश्वर की स्त्री पुरष शक्ति ने विभक्त होकर त्रिदेवो एवं त्रिशक्तियों को उतपन्न किया.

महादेव शिव ने ब्रह्माण्ड सृजनी शक्ति के साथ एक दिव्य लिंग के रूप में प्रकट हुए जिसका ना कोई आदि था और न कोई अंत. उस दव्य लिंग ने ब्र्ह्मा एवं विष्णु से कहा की जो भी मेरा आदि या अंत पा लेगा वह सर्वपूजित होगा. अंत में सत्य की वजह से भगवान विष्णु विजय हुए.

उस ब्रह्माण्ड सृजनी शक्ति के साथ भगवान शिव ने लिंग रूप में धरती पर वास किया. वह शक्ति कुछ और नहीं बल्कि अणु एवं परमाणु शक्ति थी जिसके द्वारा आज विनाशकारी बमो का निर्माण किया जाता है पहले इसी शक्ति का प्रयोग ब्र्ह्मास्त्र के रूप में किया जाता था.

शिवलिंग का जो आकार है वह भी इसी आधार पर है की इसके अंदर उपस्थित संचारित होने वाली ऊर्जा और विफसोट अंदर ही बनी रहे. ऐसा ही आकार आत्मा का भी माना जाता है.

भारत का रेडियोएक्टिविटी मैप उठा लो तो हैरान हो जाओगे की भारत सरकार के नुक्लिएर रिएक्टर के अलावा सभी ज्योत्रिलिंगो के स्थानों पर सबसे ज्यादा रेडिएशन पाया जाता है. शिवलिंग और कुछ नहीं बल्कि न्यूक्लिअर रिएक्टर्स ही हैं तभी उनपर जल चढ़ाया जाता है ताकि वो शांत रहे.

महादेव के सभी प्रिय पदार्थ जैसे किए बिल्व पत्र, आक, आकमद, धतूरा, गुड़हल, आदि सभी न्यूक्लिअर एनर्जी सोखने वाले हैं . क्यूंकि शिवलिंग पर चढ़ा पानी भी रिएक्टिव हो जाता है तभी जल निकासी नलिका को लांघा नहीं जाता. भाभा एटॉमिक रिएक्टर का डिज़ाइन भी शिव लिंग की तरह है.

एक्सिस मुंडी :-

एक्सिस मुंडी को ब्रह्माण्ड का केंद्र, आकाशीय ध्रुव बिंदु और भगौलिक बिंदु, आकाश एवं पृथ्वी के बीच संबंध दर्शाने वाला एक ध्रुव है जहा सभी दिशाएं आकर मिलती है. तथा यह नाम वास्तविक एवं महान, सबसे पवित्र तथा अनोखी रहस्मयी शक्ति वाले पहाड़ों में से एक कैलाश पर्वत से संबंधित है.

एक्सिस मुंडी ऐसी जगह होती है जहा अलौकिक शक्तियों का प्रवाह होता है तथा जहा आप उन से सम्पर्क बना सकते है रुसी वैज्ञानिकों ने यह स्थान कैलाश पर्वत को बताया है.

अप्राकृतिक शक्तियों का भंडारक कैलाश पर्वत चार महान नदियों के स्रोतों से घिरा हुआ है सिंधु, सतलज, ब्र्ह्म्पुत्र तथा घाघरा. तथा इसके साथ कैलाश पर्वत दो मांसरोवरो से घिरा जो इसके आधार है. पहला सरोवर है मानसरोवर जो दुनिया के सबसे उच्च्तम शुद्ध जलो में से एक कहा गया है तथा इसका आकर सूर्य की तरह है.

दुसरा सरोवर है राक्षस सरोवर जो दुनिया के उच्च्तम खारे जल का सरोवर कहलाता है तथा इसका आकर चन्द्र की तरह है. ये दोनों झीले सौर एवं चन्द्र दोनों ऊर्जा को प्रदर्शित करते है जो सकरात्मक एवं नकरात्मक ऊर्जा को भी दिखाता है. कैलाश पर्वत को दक्षिण की दिशा से देखने में वास्तव में स्वस्तिका का निशान देखा जा सकता है.

कैलाश पर्वत एवं उसके आस पास के वातावरण का अध्ययन कर रहे रुसी वैज्ञानिकों ने बताया की की वहां पर उपस्थित अलौकिक शक्तियों के माध्यम से ही तपस्वी भगवान से टेलीपेथी के माध्यम से सम्पर्क साधते थे.

कैलास पर्वत तथा यहाँ के वातावरण पर रुसी वैज्ञानिक ने अनेको रिसर्च किया तथा उनके इस रिसर्च से जो परिणाम निकले उसे कोई नकार नहीं सकता. उन्होंने बताया के कैलश पर्वत एक विशाल पिरामिड है जो लगभग सो पिरामिडों का केंद्र है.

कैलाश पर्वत अपने आप में अनेको अलौकिक शक्तियों को समेटे हुए है. रुसी वैज्ञानिकों ने दावा किया था की कैलाश पर्वत प्रकृति के माध्यम से उतपन्न हुआ उच्च्तम पिरामिडों में से एक है.

हमारे परम्पराओ के पीछे कितना गूढ़ विज्ञान छुपा हुआ है यह हमे पता नहीं है. जो वास्तविक ज्ञान है उससे हम अभी तक अपरिचित है तथा विज्ञान के नाम पर हमे जो पढ़ाया जा रहा है वह हमे हमारी परम्पराओ से दूर कर रहा है.
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5>क्यों खोला था शिव ने अपना तीसरा नेत्र, क्या है तीसरे नेत्र का रहस्य?


रामचरित मानस के अनुसार तारका नाम का एक असुर हुआ उसने सभी देवताओं को हराकर तीनों लोकों को जीत लिया। वह अमर था। इसीलिए देवता उसका कुछ नहीं बिगाड़ सकते थे। आखिर में सभी देवता उसके आतंक से परेशान होकर ब्रह्माजी के पास पहुंचे। तब ब्रह्माजी ने देवताओं को बताया कि इस असुर का संहार सिर्फ शिव पुत्र के द्वारा ही हो सकता है। तब सभी देवता चिंतित हो गए क्योंकि सती के देह त्याग के बाद से शिव समाधि में बैठे थे। तब ब्रह्माजी बोले कि सती ने देह त्याग के बाद हिमाचल के यहां जन्म लिया है।
उन्होंने पार्वती के रूप में शिव को पाने के लिए बहुत तप किया लेकिन वे तो समाधि लगाकर बैठे हैं। इसलिए आप लोग जाकर कामदेव को शिवजी के पास भेजो ताकि उनके मन में काम का भाव उत्पन्न हो। इसके अलावा कोई उपाय नहीं है। देवताओं ने जब कामदेव को जाकर सारी बात बताई। तब कामदेव फूलों का धनुष लेकर निकल पड़े। उनके प्रभाव से सभी पशु-पक्षी काम के बस में हो गए। लेकिन जब कामदेव शिव के पास पहुंचे तो वे डर गए।
उन्होंने शिव को मनाने के लिए बसंत को भेजा लेकिन शिव की समाधि नहीं टूटी। जब कामदेव सारी कोशिश कर हार गए। तब उन्होंने शिव पर काम के पांच बाण चलाए। क्रोध के कारण शिव का तीसरा नेत्र खुल गया और जैसे ही उन्होंने कामदेव को देखा तो वे जलकर भस्म हो गए। साधारण रूप में देखें तो शिव ईश्वर हैं और बुरे लोगों को अपने तीसरे नेत्र की अग्नि से जलाकर भस्म कर देते है और यदि अलग तरह से देखने का प्रयत्न करें तो शिव का तीसरा नेत्र ज्ञान पुंज है जो अज्ञान का नाश करता है!

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6>कौन हैं शिव

शिव संस्कृत भाषा का शब्द है, जिसका अर्थ है, कल्याणकारी या शुभकारी। यजुर्वेद में शिव को शांतिदाता बताया गया है। 'शि' का अर्थ है, पापों का नाश करने वाला, जबकि 'व' का अर्थ देने वाला यानी दाता।

क्या है शिवलिंग.

शिव की दो काया है। एक वह, जो स्थूल रूप से व्यक्त किया जाए, दूसरी वह, जो सूक्ष्म रूपी अव्यक्त लिंग के रूप में जानी जाती है। शिव की सबसे ज्यादा पूजा लिंग रूपी पत्थर के रूप में ही की जाती है। लिंग शब्द को लेकर बहुत भ्रम होता है। संस्कृत में लिंग का अर्थ है चिह्न। इसी अर्थ में यह शिवलिंग के लिए इस्तेमाल होता है। शिवलिंग का अर्थ है : शिव यानी परमपुरुष का प्रकृति के साथ समन्वित-चिह्न

शिव, शंकर, महादेव...

शिव का नाम शंकर के साथ जोड़ा जाता है लोग कहते हैं - शिव शंकर भोलेनाथ। इस तरह अनजाने ही कई लोग शिव और शंकर को एक ही सत्ता के दो नाम बताते हैं असल में, दोनों की प्रतिमाएं अलग-अलग आकृति की हैं शंकर को हमेशा तपस्वी रूप में दिखाया जाता है कई जगह तो शंकर को शिवलिंग का ध्यान करते हुए दिखाया गया है शिव ने सृष्टि की स्थापना पालना और विनाश के लिए क्रमश: ब्रह्मा, विष्णु और महेश
(महेश भी शंकर का ही नाम है)
नामक तीन सूक्ष्म देवताओं की रचना की है इस तरह शिव ब्रह्मांड के रचयिता हुए और शंकर उनकी एक रचना भगवान शिव को इसीलिए महादेव भी कहा जाता है इसके अलावा शिव को 108 दूसरे नामों से भी जाना और पूजा जाता है

अर्द्धनारीश्वर क्यों..

शिव को अर्द्धनारीश्वर भी कहा गया है, इसका अर्थ यह नहीं है कि शिव आधे पुरुष ही हैं या उनमें संपूर्णता नहीं दरअसल यह शिव ही हैं, जो आधे होते हुए भी पूरे हैं। इस सृष्टि के आधार और रचयिता यानी स्त्री-पुरुष शिव और शक्ति के ही स्वरूप हैं इनके मिलन और सृजन से यह संसार संचालित और संतुलित है दोनों ही एक-दूसरे के पूरक हैं नारी प्रकृति है और नर पुरुष प्रकृति के बिना पुरुष बेकार है और पुरुष के बिना प्रकृति दोनों का अन्योन्याश्रय संबंध है अर्धनारीश्वर शिव इसी पारस्परिकता के प्रतीक हैं आधुनिक समय में स्त्री-पुरुष की बराबरी पर जो इतना जोर है, उसे शिव के इस स्वरूप में बखूबी देखा-समझा जा सकता है। यह बताता है कि शिव जब शक्ति युक्त होता है तभी समर्थ होता है। शक्ति के अभाव में शिव 'शिव' न होकर 'शव' रह जाता है

नीलकंठ क्यों...

अमृत पाने की इच्छा से जब देव-दानव बड़े जोश और वेग से मंथन कर
रहे थे, तभी समुद से कालकूट नामक भयंकर विष निकला उस विष की अग्नि से दसों दिशाएं जलने लगीं समस्त प्राणियों में हाहाकार मच गया। देवताओं और दैत्यों सहित ऋषि, मुनि, मनुष्य, गंधर्व और यक्ष आदि उस विष की गरमी से जलने लगे देवताओं की प्रार्थना पर, भगवान शिव विषपान के लिए तैयार हो गए उन्होंने भयंकर विष को हथेलियों में भरा और भगवान विष्णु का स्मरण कर उसे पी गए भगवान विष्णु अपने भक्तों के संकट हर लेते हैं उन्होंने उस विष को शिवजी के कंठ (गले) में ही रोक कर उसका प्रभाव खत्म कर दिया। विष के कारण भगवान शिव का कंठ नीला पड़ गया और वे संसार में नीलकंठ के नाम से प्रसिद्ध हुए

भोले बाबा

शिव पुराण में एक शिकारी की कथा है एकबार उसे जंगल में देर हो गई तब उसने एक बेल वृक्ष पर रात बिताने का निश्चय किया जगे रहने के लिए उसने एक तरकीब सोची वह सारी रात एक-एक पत्ता तोड़कर नीचे फेंकता रहा कथानुसार, बेल के पत्ते शिव को बहुत प्रिय हैं बेल वृक्ष के ठीक नीचे एक शिवलिंग था
शिवलिंग पर प्रिय पत्तों का अर्पण होते देख शिव प्रसन्न हो उठे, जबकि शिकारी को अपने शुभ काम का अहसास न था उन्होंने शिकारी को दर्शन देकर उसकी मनोकामना पूरी होने का वरदान दिया कथा से यह साफ है कि शिव कितनी आसानी से प्रसन्न हो जाते हैं शिव महिमा की ऐसी कथाओं और बखानों से पुराण भरे पड़े हैं

शिव स्वरूप

भगवान शिव का रूप-स्वरूप जितना विचित्र है, उतना ही आकर्षक भी शिव जो धारण करते हैं, उनके भी बड़े व्यापक अर्थ हैं :

जटाएं :
शिव की जटाएं अंतरिक्ष का प्रतीक हैं

चंद्र :
चंद्रमा मन का प्रतीक है शिव का मन चांद की तरह भोला, निर्मल, उज्ज्वल और जाग्रत है

त्रिनेत्र :
शिव की तीन आंखें हैं इसीलिए इन्हें त्रिलोचन भी कहते हैं। शिव की ये आंखें सत्व, रज, तम (तीन गुणों), भूत, वर्तमान, भविष्य (तीन कालों), स्वर्ग, मृत्यु पाताल (तीनों लोकों) का प्रतीक हैं

सर्पहार :
सर्प जैसा हिंसक जीव शिव के अधीन है। सर्प तमोगुणी व संहारक जीव है, जिसे शिव ने अपने वश में कर रखा है

त्रिशूल :
शिव के हाथ में एक मारक शस्त्र है त्रिशूल भौतिक, दैविक, आध्यात्मिक इन तीनों तापों को नष्ट करता है

डमरू :
शिव के एक हाथ में डमरू है, जिसे वह तांडव नृत्य करते समय बजाते हैं डमरू का नाद ही ब्रह्मा रूप है

मुंडमाला :
शिव के गले में मुंडमाला है, जो इस बात का प्रतीक है कि शिव ने मृत्यु को वश में किया हुआ है

छाल :
शिव ने शरीर पर व्याघ्र चर्म यानी बाघ की खाल पहनी हुई है व्याघ्र हिंसा और अहंकार का प्रतीक माना जाता है इसका अर्थ है कि शिव ने हिंसा और अहंकार का दमन कर उसे अपने नीचे दबा लिया है

भस्म :
शिव के शरीर पर भस्म लगी होती है शिवलिंग का अभिषेक भी भस्म से किया जाता है भस्म का लेप बताता है कि यह संसार नश्वर है

वृषभ :
शिव का वाहन वृषभ यानी बैल है वह हमेशा शिव के साथ रहता है वृषभ धर्म का प्रतीक है महादेव इस चार पैर वाले जानवर की सवारी करते हैं जो बताता है कि धर्म अर्थ कम और मोक्ष उनकी कृपा से ही मिलते है

ओम नमो शिवा


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7>भगवान शिव के ग्यारह रुद्र रूप


शास्त्रों के मुताबिक शिव ग्यारह अलग-अलग रुद्र रूपों में दु:खों का नाश करते हैं। यह ग्यारह रूप एकादश रुद्र के नाम से जाने जाते हैं। लगभग सभी पुराणों में शिव को त्याग, तपस्या, वात्सल्य तथा करुणा की मूर्ति बताया गया है। शिव सहज ही प्रसन्न हो जाने वाले एवं मनोवांछित फल देने वाले हैं। भगवान शिव के अनगिनत रूप हैं, क्योंकि सारी प्रकृति को ही शिव स्वरूप माना गया है। यही कारण है कि शिव को दु:खों को नाश करने वाले देवता के रुप में पूजा जाता है।


1. शम्भू - शास्त्रों के मुताबिक यह रुद्र रूप साक्षात ब्रह्म है। इस रूप में ही वह जगत की रचना, पालन और संहार करते हैं।


2. पिनाकी - ज्ञान शक्ति रुपी चारों वेदों के के स्वरुप माने जाने वाले पिनाकी रुद्र दु:खों का अंत करते हैं।


3. गिरीश - कैलाशवासी होने से रुद्र का तीसरा रुप गिरीश कहलाता है। इस रुप में रुद्र सुख और आनंद देने वाले माने गए हैं।


4. स्थाणु - समाधि, तप और आत्मलीन होने से रुद्र का चौथा अवतार स्थाणु कहलाता है। इस रुप में पार्वती रूप शक्ति बाएं भाग में विराजित होती है।


5. भर्ग - भगवान रुद्र का यह रुप बहुत तेजोमयी है। इस रुप में रुद्र हर भय और पीड़ा का नाश करने वाले होते हैं।


6. भव - रुद्र का भव रुप ज्ञान बल, योग बल और भगवत प्रेम के रुप में सुख देने वाला माना जाता है।


7. सदाशिव - रुद्र का यह स्वरुप निराकार ब्रह्मका साकार रूप माना जाता है। जो सभी वैभव, सुख और आनंद देने वाला माना जाता है।


8. शिव - यह रुद्र रूप अंतहीन सुख देने वाला यानि कल्याण करने वाला माना जाता है। मोक्ष प्राप्ति के लिए शिव आराधना महत्वपूर्ण मानीजाती है।


9. हर - इस रुप में नाग धारण करने वाले रुद्र शारीरिक, मानसिक और सांसारिक दु:खों को हर लेते हैं। नाग रूपी काल पर इन का नियंत्रण होता है।


10. शर्व - काल को भी काबू में रखने वाला यह रुद्र रूप शर्व कहलाता है।


11. कपाली - कपाल रखने के कारण रुद्र का यह रूप कपाली कहलाता है। इस रुप में ही दक्ष का दंभ नष्ट किया, किंतु प्राणीमात्र के लिए रुद्र का यही रूप समस्त सुख देने वाला माना जाता है।

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8>শিবরাত্রি  ব্রত = তথা মহা শিবরাত্রি ব্রত।
                      <--©➽-আদ্যনাথ--->
 ফাল্গুন মাসে  শিবরাত্রি উপলক্ষে সকল শিব মন্দির জেগে ওঠে। গ্রাম গঞ্জে,
শহরের অলিতে গলিতে অজস্র শিবমন্দির জেগে ওঠে। কারণ সকল ব্রতের মধ্যে শিবরাত্রিকেই তো শ্রেষ্ঠ ব্রত বলে গণ্য। 
এই ব্রত পালন করলে সকল মন কামনা পূর্ণ হয়ে যায়।

ব্রতকথা অনুযায়ী, শিবরাত্রি ব্রতের ব্যাখ্যা করেন মহাদেব স্বয়ং। পার্বতী মহাদেবকে জিজ্ঞাসা করেছিলেন, প্রভু, এমন এক সহজ ব্রত বলে দিন, যা সকলেই পালন করে পাপমুক্ত হতে পারে। মহাদেব বললেন, ‘ফাল্গুন মাসের কৃষ্ণপক্ষের চতুর্দশী তিথিতে যে ভয়ানক অন্ধকার রাত্রি হয়, তা-ই শিবরাত্রি। শিবরাত্রিতে যে উপবাস করে, আমি তার উপর খুব সন্তুষ্ট হই।... শিবরাত্রিতে চার প্রহরে চারটি গঙ্গামাটির শিব গড়ে পূজা করবে।... ওই দিন রাত্রি জাগবে...’ পুজোর উপকরণ সরল, বেলপাতা আর গঙ্গাজলই যথেষ্ট। জটিল মন্ত্রতন্ত্র কিছু নেই, দীর্ঘ প্রস্তুতিরও প্রয়োজন নেই। সাধে কি আর সবচেয়ে জনপ্রিয় ব্রত, সহজে পাপমুক্তি আর সপরিবার মঙ্গলের ব্যবস্থা!

 শিবরাত্রির ব্রত স্ত্রী পুরুষ সকলেরই পালনীয় ব্রত । ছেলেরাও শিবরাত্রি করতে পারে এবং করেও। আসলে প্রথম শিবরাত্রি তো করেছিল এক জন পুরুষই! সে গল্পও শুনিয়েছেন শিব। বারাণসীর এক ব্যাধ—পশুহত্যাই তার জীবিকা। পাপের ভারা তাই কানায় কানায় পূর্ণ। সারা দিন শিকারের পর ক্লান্তিতে গাছতলায় ঘুমিয়ে পড়েছিল, সন্ধে হয়ে যাওয়ায় বাড়ি যেতে পারবে না ভেবে সে গাছের ডালেই রাতটা কাটিয়ে দেয়। গাছটা ছিল বেলগাছ, আর তলায় ছিল একটা শিবলিঙ্গ। ব্যাধের গায়ে লেগে একটা বেলপাতা শিশিরের জলের সঙ্গে মিশে শিবের মাথায় পড়ল। সেটা ছিল শিবরাত্রি, আর ব্যাধও ছিল উপবাসী। পর দিন বাড়ি ফিরে স্নান করে সে দেখে, এক অতিথি উপস্থিত। তাঁকে খাইয়ে তার পরেই ব্যাধ নিজে খেয়েছিল। ফলে তার ব্রত পালন ঠিকমতই সম্পন্ন হল। ব্যাধ মারা যাওয়ার পর শিবদূত আর যমদূতদের মধ্যে মারামারি লেগে গেল তাকে নিয়ে যাওয়ার জন্য। শেষে শিবের দূতেরাই জয়ী হল, আর যমরাজও স্বীকার করলেন, শিবচতুর্দশী করলে তার উপর আর যমের অধিকার থাকবে না। মানুষকে পাপ থেকে উদ্ধারের এটাই একমাত্র উপায়, পার্বতীকে জানালেন শিব।

সত্যি, শিব তো আশুতোষ, খুব সহজেই তাঁর মন পাওয়া যায়। 
ব্রহ্মা বিষ্ণু মহেশ্বরকে সৃষ্টি স্থিতি প্রলয়ের দেবতা বলে সাধারণ ভাবে চিহ্নিত করা হলেও, শিবভক্তরা শিবকেই সব কিছুর স্রষ্টা ও সংহারকর্তা বলে মানেন। পৌরাণিক নানা কাহিনিতে ব্রহ্মা ও বিষ্ণুর থেকে শিবের শ্রেষ্ঠত্ব প্রমাণ করা হয়েছে। সব থেকে পরিচিত বোধহয় সেই স্তম্ভরূপী শিবের গল্প, যেখানে হংসের রূপ নিয়ে ব্রহ্মা স্তম্ভের শীর্ষ আর বরাহের রূপ নিয়ে বিষ্ণু তার তলদেশ নির্ণয়ের চেষ্টা করে ব্যর্থ হন, ব্রহ্মা আবার মিথ্যে করে বলেন, তিনি শীর্ষদেশ দেখতে পেয়েছেন, তাতে শিব অভিশাপ দেন— ভারতে আর ব্রহ্মার পূজা হবে না। শেষে ব্রহ্মা বিষ্ণু দুজনেই শিবকে স্রষ্টা হিসেবে মেনে নেন। শিবের লিঙ্গপূজা প্রচলনের গল্প আছে ‘কূর্মপুরাণ’-এ। দেবদারু বনে তপস্যারত মুনিঋষিরা ছদ্মবেশী শিব আর বিষ্ণুকে চিনতে পারেননি, নানা ঘটনার পর প্রকৃত রূপ দেখে তাঁর বন্দনা করেন এবং লিঙ্গপূজা প্রচলিত হয়। ব্রাহ্মণ্য পরিমণ্ডলে নিজের জায়গা করে নিতে ভূতপ্রেত নিয়ে দক্ষযজ্ঞ পণ্ড করতে হয়েছিল শিবকে, নাচতে হয়েছিল প্রলয়নাচন। কিন্তু সব কিছু সত্ত্বেও শিবের মধ্যে সেই দ্বৈত সত্তাই থেকে গিয়েছে— এক দিকে তিনি শ্মশানের দেবতা, ভূতপ্রেত তাঁর অনুচর, কাপালিকরা তাঁর সাধক; অন্য দিকে তিনি কৈলাসে পার্বতী কার্তিক গণেশকে নিয়ে ঘোর সংসারী। আর এই সংসারী, সহজে সন্তুষ্ট, আলাভোলা শিবকে কাছের করে নিতে মধ্যযুগের বাঙালির কোনও অসুবিধেই হয়নি।

পালরাজাদের লিপি থেকে বেশ কিছু শিবমন্দির তৈরির কথা জানা যায়। 
প্রাচীন পাশুপত সম্প্রদায়ের শৈবদের 
জন্য রাজানুগ্রহের কথাও আছে সেখানে। সুন্দরবনে জটার দেউল, বর্ধমানের রাঢ়েশ্বর, বাঁকুড়ার এক্তেশ্বর ষাঁড়েশ্বর শৈলেশ্বর-এর মতো আটশো-হাজার বছরের শিবমন্দির টিকে আছে এখনও। পাল-সেন যুগের বাংলায় শিবের যে সব মূর্তির সন্ধান পাওয়া গিয়েছে, তার মধ্যে লিঙ্গমূর্তি বাদ দিলে শিব-পার্বতীর মূর্তি, বিশেষত উমা-মহেশ্বরের সংখ্যা খুবই বেশি। অর্থাৎ বাঙালি মননে একক শিব নয়, হরগৌরীর কল্পনাই প্রাধান্য পেয়েছে। শিব ও শক্তির এই সব যুগ্মমূর্তির পিছনে 
 তন্ত্রচর্চার প্রভাব ছিল।সে যাই হোক, শিব ও পার্বতীর পারিবারিক রূপ যে ভাবে পরে বাঙালির সমাজ সংস্কৃতির অবিচ্ছেদ্য অঙ্গ হয়ে উঠল, তার সূত্র কিছুটা হলেও যে এর মধ্যে থেকে গিয়েছে, সন্দেহ নেই।

একসময়  চৈতন্যের বৈষ্ণবধর্ম যেমন বিষ্ণুপুরের মল্লরাজাদের আনুকূল্য নিয়ে সবাইকে টানল, তেমনই শিবের মাহাত্ম্য সবার মন জয় করে নিল। বাংলার প্রতি গ্রামে গড়ে উঠল ছোটবড় শিবমন্দির, পূজার চল হল লিঙ্গমূর্তিতে। দ্বাদশ শিব, ১০৮ শিবমন্দির তৈরি করে অভিজাতরাও পুণ্যের ভাগ নিতে এগিয়ে এলেন।
 এমনি করে ঘরের অন্দরমহলে ব্রতকথার 
মাধ্যমে শিবের পূজা শুরু হল  ঘরের অন্দরমহলে। 
কৃষিজীবী সমাজের প্রাত্যহিক যাপনেও মিশে গেল শিবের উৎসব— সারা বাংলা জুড়ে আজও চৈত্র-বৈশাখে ‘গাজন’ হয়, যে নাম নাকি এসেছে শিববিবাহের এই লৌকিক উৎসবে সমবেত মানুষের 
"গর্জন" থেকে। রাঢ়ের সব থেকে বড় লোক-উৎসব এই "গাজন", 
উত্তরবঙ্গে আবার তারই নাম গম্ভীরা। গাজনের গানে লৌকিক শিবের কত না কীর্তিকলাপ— চাষবাস শুরুর গল্প বোধহয় সব থেকে আগ্রহ জাগায়। ‘শিবায়ন’ কাব্যেও আছে এমন গল্প। পার্বতীর পরামর্শে শিব চাষ করবার  মনস্থির করলেন। কিন্তু চাষ করার মতন জমি কোথায় ? তখন ইন্দ্রের কাছে শিব জমি চাইলেন। ইন্দ্র আদিগন্ত পতিত জমি দিলেন চাষের জন্য। যম দিলেন তাঁর মহিষ, শিবের ষাঁড় আর যমের মহিষ হাল চষবে। বিশ্বকর্মা চাষের যন্ত্রপাতি বানালেন, বীজ দিলেন কুবের। হাল চষার জন্য এগিয়ে এলেন ভীম, দশমনি কাস্তে দিয়ে ফসলও কাটলেন। ধান হল মাত্র দু’হাল। শিব বললেন, ধান পুড়িয়ে দাও। ভীম ধানে আগুন দিয়ে ফুঁ দিলেন— ধান পুড়তে লাগল, পুড়তেই লাগল। এ থেকেই তৈরি হল নানা রঙের ধান এবং নানান ধরনের  ধানের বীজ। 
অর্থাৎ  শিবরাত্রির ব্রত শুধু  শিবের মাথায় জল ঢেলে ভাল বর চাওয়া নয়, শিবের মহিমা মধ্যযুগ থেকে আজ পর্যন্ত অনেকটাই ব্যাপক। গবেষকদের মতে, বাংলায় এর উৎস আরও দূর অতীতে। 
সেই কারণেই শিবরাত্রির ব্রত কতার মাহত্য অনেক। যা বলে বা লিখে শেষ করা অসম্ভব।
 <--©➽-আদ্যনাথ রায় চৌধুরী--->
  11/03/2021;; 08:20:12 pm
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